Thursday, 22 November 2012



रामायण के प्रमुख पात्र एवं उनका परिचय



(ये जानकारी सिर्फ इसलिए दी जा रही है जिससे की आप रामायण को आसानी से और अच्छे से समझ सकें !)
                  
दशरथ – रघुवंशी राजा इन्द्र के मित्र कोशल के राजा तथा राजधानी एवं निवास अयोध्या ।
कौशल्या – दशरथ की बङी रानीराम की माता ।
सुमित्रा - दशरथ की मझली रानीलक्ष्मण तथा शत्रुध्न की माता ।
कैकयी - दशरथ की छोटी रानीभरत की माता ।
सीता – जनकपुत्रीराम की पत्नी ।
उर्मिला – जनकपुत्रीलक्ष्मण की पत्नी ।
मांडवी – जनक के भाई कुशध्वज की पुत्रीभरत की पत्नी ।       
श्रुतकीर्ति - जनक के भाई कुशध्वज की पुत्रीशत्रुध्न की पत्नी ।
राम – दशरथ तथा कौशल्या के पुत्रसीता के पति ।  
लक्ष्मण - दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्रउर्मिला के पति ।
भरत – दशरथ तथा कैकयी के पुत्रमांडवी के पति ।
शत्रुध्न - दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्रश्रुतकीर्ति के पतिमथुरा के राजा लवणासूर के संहारक ।
शान्ता – दशरथ की पुत्रीराम भगिनी ।
बाली – किश्कंधा (पंपापुर) का राजारावण का मित्र तथा साढ़ूसाठ हजार हाथीयो का बल ।
सुग्रीव – बाली का छोटा भाईजिनकी हनुमान जी ने मित्रता करवाई ।
तारा – बाली की पत्नीअंगद की मातापंचकन्याओ मे स्थान ।
रुमा – सुग्रीव की पत्नीसुषेण वैध की बेटी ।
अंगद – बाली तथा तारा का पुत्र ।  
रावण – ऋषि पुलस्त्य का पौत्रविश्रवा तथा पुष्पोत्कटा का पुत्र ।
कुंभकर्ण – रावण तथा कुंभिनसी का भाईविश्रवा तथा पुष्पोत्कटा का पुत्र ।       
कुंभिनसी – रावण तथा कूंभकर्ण की भगिनीविश्रवा तथा पुष्पोत्कटा की पुत्री ।
विश्रवा - ऋषि पुलस्त्य का पुत्रपुष्पोत्कटा-राका-मालिनी का पति ।
विभीषण – विश्रवा तथा राका का पुत्रराम का भक्त ।
पुष्पोत्कटा – विश्रवा की पत्नीरावणकुंभकर्ण तथा कुंभिनसी की माता ।
राका – विश्रवा की पत्नीविभीषण की माता ।
मालिनी - विश्रवा की तीसरी पत्नीखर-दूषण त्रिसरा तथा शूर्पणखा की माता । 
त्रिसरा – विश्रवा तथा मालिनी का पुत्रखर-दूषण का भाई एवं सेनापति ।
शूर्पणखा - विश्रवा तथा मालिनी की पुत्रीखर-दूसन एवं त्रिसरा की भगिनीविंध्य क्षेत्र मे निवास ।
मंदोदरी – रावण की पत्नीतारा की भगिनीपंचकन्याओ मे स्थान ।
मेघनाद – रावण का पुत्र इंद्रजीतल्क्ष्मन द्वारा वध । 
दधिमुख – सुग्रीव का मामा ।
ताङका – राक्षसीमिथिला के वनो मे निवासराम द्वारा वध ।
मारीची – ताङका का पुत्रराम द्वारा वध (स्वर्ण मर्ग के रूप मे ) ।
सुबाहू – मारीची का साथी राक्षसराम द्वारा वध ।
सुरसा – सर्पो की माता ।
त्रिजटा – अशोक वाटिका निवासिनी राक्षसीरामभक्तसीता से अनुराग ।
प्रहस्त – रावण का सेनापतिराम-रावण युद्ध मे मृत्यु ।   
विराध – दंडक वन मे निवासराम लक्ष्मण द्वारा मिलकर वध ।
शंभासुर – राक्षसइन्द्र द्वरा वधइसी से युद्ध करते समय कैकेई ने दशरथ को बचाया था तथा दशरथ ने वरदान देने को कहा ।
सिंहिका – लंका के निकट रहने वाली राक्षसीछाया को पकङकर खाती थी ।
कबंद – दण्डक वन का दैत्यइन्द्र के प्रहार से इसका सर धङ मे घुस गयाबाहें बहुत लम्बी थीराम-लक्ष्मण को पकङाराम- लक्ष्मण ने गङ्ढा खोद कर उसमे गाङ दिया ।
जामबंत – रीछ थेरीछ सेना के सेनापति ।
नल – सुग्रीव की सेना का वानरवीर ।
नील – सुग्रीव का सेनापति जिसके स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरते थेसेतुबंध की रचना की थी ।  
नल और नील – सुग्रीव सेना मे इंजीनियर व राम सेतु निर्माण मे महान योगदान । (विश्व के प्रथम इंटरनेशनल हाईवे “रामसेतु” के आर्किटेक्ट इंजीनियर)
शबरी – अस्पृश्य जाती की रामभक्तमतंग ऋषि के आश्रम मे राम-लक्ष्मण-सीता का आतिथ्य सत्कार ।
संपाती – जटायु का बङा भाईवानरो को सीता का पता बताया ।
जटायु  रामभक्त पक्षीरावण द्वारा वधराम द्वारा अंतिम संस्कार ।
गृह – श्रंगवेरपुर के निषादों का राजाराम का स्वागत किया था ।
हनुमान – पवन के पुत्रराम भक्तसुग्रीव के मित्र ।
सुषेण वैध – सुग्रीव के ससुर ।    
केवट – नाविकराम-लक्ष्मण-सीता को गंगा पार करायी ।
शुक्र-सारण – रावण के मंत्री जो बंदर बनकर राम की सेना का भेद जानने गये ।
अगस्त्य – पहले आर्य ऋषि जिन्होने विन्ध्याचल पर्वत पार किया था तथा दक्षिण भारत गये ।
गौतम – तपस्वी ऋषिअहल्या के पतिआश्रम मिथिला के निकट ।
अहल्या - गौतम ऋषि की पत्नीइन्द्र द्वारा छलित तथा पति द्वारा शापितराम ने शाप मुक्त कियापंचकन्याओ मे स्थान ।
ऋण्यश्रंग – ऋषि जिन्होने दशरथ से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कटाया था ।
सुतीक्ष्ण – अगस्त्य ऋषि के शिष्यएक ऋषि ।
मतंग – ऋषिपंपासुर के निकट आश्रमयही शबरी भी रहती थी ।
वसिष्ठ  अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओ के गुरु ।
विश्वमित्र – राजा गाधि के पुत्रराम-लक्ष्मण को धनुर्विधा सिखायी थी ।
शरभंग – एक ऋषिचित्रकूट के पास आश्रम ।
सिद्धाश्रम  विश्वमित्र के आश्रम का नाम ।
भरद्वाज – बाल्मीकी के शिष्यतमसा नदी पर क्रौच पक्षी के वध के समय वाल्मीकि के साथ थेमाँ-निषाद’ वाला श्लोक कंठाग्र कर तुरंत वाल्मीकि को सुनाया था ।
सतानन्द – राम के स्वागत को जनक के साथ जाने वाले ऋषि । 
युधाजित – भरत के मामा ।
जनक – मिथिला के राजा ।
सुमन्त्र – दशरथ के आठ मंत्रियो मे से प्रधान ।
मंथरा – कैकयी की मुंह लगी दासीकुबङी ।
देवराज – जनक के पूर्वज-जिनके पास परशुराम ने शंकर का धनुष सुनाभ (पिनाक) रख दिया था । आयोध्य – राजा दशरथ के कोशल प्रदेश की राजधानीबारह योजना लंबी तथा तीन योजन चौङीनगर के चारो ओर ऊँची व चौङी दीवारों व खाई थीराजमहल से आठ सङके बराबर दूरी पर परकोटे तक जाती थी ।    

Tuesday, 20 November 2012

लाल किला एक हिन्दू ईमारत...



लाल किला शाहजहाँ से भी कई शताब्दी पहले पृथ्वीराज चौहान के  नाना श्री अनंग पाल सिंह  तोमर  द्वारा बनवाया हुआ लाल कोट है !
क्या कभी किसी ने सोचा है की इतिहास के नाम पर हम झूठ क्यों पढ़ रहे है ? सारे प्रमाण होते हुए भी झूठ को सच क्यों बनाया जा रहा है ?
हम क्षत्रियों की बुद्धि की आज ऐसी दशा हो गयी है की अगर एक आदमी की पीठ मे खंजर मार कर हत्या कर दी गयी हो और उसको आत्महत्या घोषित कर दिया जाए तो कोई भी ये भी सोचने का प्रयास नही करेगा की कोई आदमी खुद की पीठ मे खंजर कैसे मार सकता है...
यही हाल है हम सब का की सच देख कर भी झूठ को सच मान लेना फ़ितरत बना ली है हमने.....
*दिल्ली का लाल किला शाहजहाँ से भी कईशताब्दी पहले प्रथवीराज चौहान द्वाराबनवाया हुआ लाल कोट है*
जिसको शाहजहाँ ने बहुत तोड़ -फोड़ करकेकई बदलाव किया है ताकि वो उसके द्वारा बनाया साबित हो सके.लेकिन सच सामने आ ही जाता है.
* इसके पूरे साक्ष्य प्रथवीराज रासो से मिलता है
*शाहजहाँ से २५० वर्ष पहले १३९८ मे तैमूर लंग ने पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया है .
(जो की शाहजहाँ द्वारा बसाई बताई जातीहै)
* सुवर (वराह) के मूह वेल चार नल अभी भी लाल किले के एक खास महल मे लगे है. क्या ये शाहजहाँ के इस्लाम का प्रतीक चिन्ह है या हमारे सनातन धर्म एवं क्षत्रित्व के प्रमाण ?
* किले के एक द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है राजपूत राजा लोग गज ( हाथियों ) के प्रति अपने प्रेम के लिए विख्यात थे ( इस्लाम मूर्ति का विरोध करता है)
* दीवाने खास मे केसर कुंड नाम से कुंड बना है जिसके फर्श पर सनातनी क्षत्रियो के पूज्य कमल पुष्प अंकित है, केसर कुंड सनातनी शब्दावली है जो की हमारे राजाओ द्वारा केसर जल से भरेस्नान कुंड के लिए प्रयुक्त होती रही है
* मुस्लिमों के प्रिय गुंबद या मीनार का कोई भी अस्तित्व नही है दीवाने खास और दीवाने आम मे.
* दीवाने खास के ही निकट राजा की न्याय तुला अंकित है , अपनी प्रजा मे से ९९% भाग को नीच समझने वाला मुगल कभी भी न्याय तुला की कल्पना भी नही कर सकता, ब्राम्हणों द्वारा उपदेषितराजपूत राजाओ की न्याय तुला चित्र से प्रेरणा लेकर न्याय करना हमारे इतिहास मे प्रसिद्ध है
* दीवाने ख़ास और दीवाने आम की मंडप शैली पूरी तरह से 984 के अंबर के भीतरी महल (आमेर--पुराना जयपुर) से मिलती है जो की राजपूताना शैली मे बनाहुवा है
* लाल किले से कुछ ही गज की दूरी पर बने देवालय जिनमे से एक लाल जैन मंदिरऔर दूसरा गौरीशंकार मंदिर दोनो ही गैर मुस्लिम है जो की शाहजहाँ से कई शताब्दी पहले राजपूत राजाओं ने बनवाएथे .
* लाल किले का मुख्य बाजार चाँदनी चौककेवल सनातन घर्म के अनुयाईयों से घिरा हुवा है, समस्त पुरानी दिल्ली मेअधिकतर आबादी सनातन घर्म के अनुयाईयों की ही है, सनलिष्ट और घूमाओदार शैली के मकान भी सनातन शैली के ही है ..क्या शाहजहा जैसा मुस्लिम व्यक्ति अपने किले के आसपास अरबी, फ़ारसी, तुर्क, अफ़गानी के बजाय हम सनातन घर्म के अनुयाईयों के लिए मकान बनवा कर हमको अपने पास बसाता ?* एक भी इस्लामी शिलालेख मे लाल किले का वर्णन नही है
"गर फ़िरदौस बरुरुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता--अर्थात इस धरती पे अगर कहीं स्वर्ग हैतो यही है, यही है, यही है....इस अनाम शिलालेख को कभी भी किसी भवन का निर्माण कर्ता नही लिखवा सकता .. और नाही ये किसी केनिर्माण कर्ता होने का सबूत देता है
इसके अलावा अनेकों ऐसे प्रमाण है जो की इसके लाल कोट होने का प्रमाण देते है, और ऐसे ही क्षत्रिय राजाओ के सारे प्रमाण नष्ट करके क्षत्रियो का नाम ही इतिहास से हटा दिया गया है,
अगर क्षत्रिय का नाम आता है तो केवल नष्ट होने वाले शिकार के रूप मे.ताकि हम हमेशा ही अहिंसा और शांति का पाठ पढ़ कर इस झूठे इतिहास से प्रेरणा ले सके...सही है ना ?
लेकिन कब तक अपने धर्म को ख़तम करने वालो की पूजा करते रहोगे और खुद के सम्मान को बचाने वाले महान क्षत्रिय शासकों के नाम भुलाते रहोगे..ऐसे ही ?
जागो जागो और इतिहास की सच्चाई को जानो ...मुस्लिम शासको ने ज्यादातर लुट- पाट,तोड़ फोड़ करके हमारे मंदिरों और महलों को परिवर्तित किया है ,बाबरी मस्जिद ( जिसे देश भक्त सनातनी वीरो ने गुलामी के प्रतीक को नेस्तनाबूद कर दिया) धार की भोजशाला जैसे कितने प्रमाण आज भी मौजूद है जो चिल्ला -चिल्ला कर हमसे कह रहे है की देखो इतिहास की सच्चाई .
जय माँ भारती

तक्षशिला विश्वविद्यालय

तक्षशिला विश्वविद्यालय

'तक्षशिला विश्वविद्यालय'वर्तमान पाकिस्तान की राजधानी रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित था। जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाता है कि श्री राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी। यह विश्व का प्रथम विश्विद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे
। यहां 60 से भी अधिक विष
यों को पढ़ाया जाता था। 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था। विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यो ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे। छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ललित कला, हस्त विद्या, अश्व-विद्या, मन्त्र-विद्या, विविद्य भाषाएं, शिल्प आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे। प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट पाठयक्रम था। आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी। शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे। परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी। चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छ: माह का शोध कार्य करना पड़ता था। इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी।

* यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी।

* तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे।

* यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था।

* 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के'चिकित्सा शास्त्र'का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था।

आयुर्वेद विज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र

500 ई. पू. जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परंपरा भी नहीं थी तब तक्षशिला'आयुर्वेद विज्ञान'का सबसे बड़ा केन्द्र था। जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां के स्नातक मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों तक का ऑपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। इसके अतिरिक्त अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था। शिष्य आचार्य के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करते थे। एक आचार्य के पास अनेक विद्यार्थी रहते थे। इनकी संख्या प्राय: सौ से अधिक होती थी और अनेक बार 500 तक पहुंच जाती थी। अध्ययन में क्रियात्मक कार्य को बहुत महत्त्व दिया जाता था। छात्रों को देशाटन भी कराया जाता था।

शुल्क और परीक्षा

शिक्षा पूर्ण होने पर परीक्षा ली जाती थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक होना उससमय अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता था। यहां धनी तथा निर्धन दोनों तरह के छात्रों के अध्ययन की व्यवस्था थी। धनी छात्रा आचार्य को भोजन, निवास और अध्ययन का शुल्क देते थे तथा निर्धन छात्र अध्ययन करते हुए आश्रम के कार्य करते थे। शिक्षा पूरी होने पर वे शुल्क देने की प्रतिज्ञा करते थे। प्राचीन साहित्य से विदित होता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले उच्च वर्ण के ही छात्र होते थे। सुप्रसिद्ध विद्वान, चिंतक, कूटनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री चाणक्य ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूर्ण की थी। उसके बाद यहीं शिक्षण कार्य करने लगे। यहीं उन्होंने अपने अनेक ग्रंथों की रचना की। इस विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसे स्थान पर थी, जहां पूर्व और पश्चिम से आने वाले मार्ग मिलते थे। चतुर्थ शताब्दी ई. पू. से ही इस मार्ग से भारतवर्ष पर विदेशी आक्रमण होने लगे। विदेशी आक्रांताओं ने इस विश्वविद्यालय को काफ़ी क्षति पहुंचाई। अंतत: छठवीं शताब्दी में यह आक्रमणकारियों द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिया।

पाठ्यक्रम

* उस समय विश्वविद्यालय कई विषयों के पाठ्यक्रम उपलब्ध करता था, जैसे - भाषाएं , व्याकरण, दर्शन शास्त्र , चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, कृषि , भूविज्ञान, ज्योतिष, खगोल शास्त्र, ज्ञान-विज्ञान, समाज-शास्त्र, धर्म , तंत्र शास्त्र, मनोविज्ञान तथा योगविद्या आदि।

* विभिन्न विषयों पर शोध का भी प्रावधान था।

* शिक्षा की अवधि 8 वर्ष तक की होती थी।

* विशेष अध्ययन के अतिरिक्त वेद , तीरंदाजी, घुड़सवारी, हाथी का संधान व एक दर्जन से अधिक कलाओं की शिक्षा दी जाती थी।

* तक्षशिला के स्नातकों का हर स्थान पर बड़ा आदर होता था।

* यहां छात्र 15-16 वर्ष की अवस्था में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने आते थे।

स्वाभाविक रूप से चाणक्य को उच्च शिक्षा की चाह तक्षशिला ले आई। यहां चाणक्य ने पढ़ाई में विशेष योग्यता प्राप्त की

जय महाकाल !!
जय जय श्री राम !!

Friday, 16 November 2012

हिंदु विज्ञान

हिंदु वेदोंको मान्यता देते हैं और वेदोंमें विज्ञान बताया गया है । केवल सौ वर्षों में पृथ्वीको नष्टप्राय बनाने के मार्ग पर लानेवाले आधुनिक विज्ञान की अपेक्षा, अत्यंत प्रगतिशील एवं एक भी समाज विघातक शोध न करने वाला प्राचीन ‘हिंदु विज्ञान’ था


पूर्वकाल के शोधकर्ता हिंदु ऋषियोंकी बुद्धिकी विशालता देखकर आजके वैज्ञानिकों को अत्यंत आश्चर्य होता है । पाश्चात्त्य वैज्ञानिकों की न्यूनता सिद्ध करनेवाला शो
ध सहस्रों वर्ष पूर्व ही करनेवाले हिंदु ऋषि-मुनि ही खरे वैज्ञानिक शोधकर्ता हैं ।

गुरुत्वाकर्षणका गूढ उजागर करनेवाले भास्कराचार्य भास्कराचार्यजी ने अपने (दूसरे) ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथमें गुरुत्वाकर्षणके विषयमें लिखा है कि, ‘पृथ्वी अपने आकाशका पदार्थ स्व-शक्ति से अपनी ओर खींच लेती हैं । इस कारण आकाश का पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’ । इससे सिद्ध होता है कि, उन्होंने गुरुत्वाकर्षणका शोध न्यूटन से ५०० वर्ष पूर्व लगाया ।

* परमाणुशास्त्रके जनक आचार्य कणाद अणुशास्त्रज्ञ जॉन डाल्टन के २५०० वर्ष पूर्व आचार्य कणादजी ने बताया कि, ‘द्रव्यके परमाणु होते हैं । ’विख्यात इतिहासज्ञ टी.एन्. कोलेबु्रकजीने कहा है कि, ‘अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ युरोपीय शास्त्रज्ञों की तुलना में विश्वविख्यात थे ।’ *

कर्करोग प्रतिबंधित करनेवाला पतंजली ऋषिका योगशास्त्र ‘पतंजली ऋषि द्वारा २१५० वर्ष पूर्व बताया ‘योगशास्त्र’, कर्करोग जैसी दुर्धर व्याधि पर सुपरिणामकारक उपचार है । योगसाधना से कर्करोग प्रतिबंधित होता है ।’ - भारत शासन के ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था’के (‘एम्स’के) ५ वर्षों के शोधका निष्कर्ष ! *

औषधि-निर्मिति के पितामह : आचार्य चरक इ.स. १०० से २०० वर्ष पूर्व काल के आयुर्वेद विशेषज्ञ चरकाचार्यजी । ‘चरकसंहिता’ प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ के निर्माणकर्ता चरकजी को ‘त्वचा चिकित्सक’ भी कहते हैं । आचार्य चरक ने शरीरशास्त्र, गर्भशास्त्र, रक्ताभिसरणशास्त्र, औषधिशास्त्र इत्यादिके विषयमें अगाध शोध किया था ।

मधुमेह, क्षयरोग, हृदयविकार आदि दुर्धररोगों के निदान एवं औषधोपचार विषयक अमूल्य ज्ञानके किवाड उन्होंने अखिल जगत के लिए खोल दिए । चरकाचार्यजी एवं सुश्रुताचार्यजीने इ.स. पूर्व ५००० में लिखे गए अर्थववेद से ज्ञान प्राप्त करके ३ खंड में आयुर्वेद पर प्रबंध लिखे । *

शल्यकर्म में निपुण महर्षि सुश्रुत ६०० वर्ष ईसापूर्व विश्व के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) महर्षि सुश्रुत शल्यचिकित्सा के पूर्व अपने उपकरण उबाल लेते थे । आधुनिक विज्ञानने इसका शोध केवल ४०० वर्ष पूर्व किया ! महर्षि सुश्रुत सहित अन्य आयुर्वेदाचार्य त्वचारोपण शल्यचिकित्सा के साथ ही मोतियाबिंद, पथरी, अस्थिभंग इत्यादि के संदर्भ में क्लिष्ट शल्यकर्म करने में निपुण थे । इस प्रकारके शल्यकर्मों का ज्ञान पश्चिमी देशोंने अभी के कुछ वर्षोंमें विकसित किया है ! महर्षि सुश्रुतद्वारा लिखित ‘सुश्रुतसंहिता' ग्रंथमें शल्य चिकित्सा के विषय में विभिन्न पहलू विस्तृतरूप से विशद किए हैं । उसमें चाकू, सुईयां, चिमटे आदि १२५ से भी अधिक शल्यचिकित्सा हेतु आवश्यक उपकरणोंके नाम तथा ३०० प्रकारके शल्यकर्मोंका ज्ञान बताया है । *

नागार्जुन नागार्जुन, ७वीं शताब्दी के आरंभके रसायन शास्त्र के जनक हैं । इनका पारंगत वैज्ञानिक कार्य अविस्मरणीय है । विशेष रूप से सोने धातु पर शोध किया एवं पारेपर उनका संशोधन कार्य अतुलनीय था । उन्होंने पारे पर संपूर्ण अध्ययन कर सतत १२ वर्ष तक संशोधन किया । पश्चिमी देशों में नागार्जुन के पश्चात जो भी प्रयोग हुए उनका मूलभूत आधार नागार्जुन के सिद्धांत के अनुसार ही रखा गया | *

बौद्धयन २५०० वर्ष पूर्व (५०० इ.स.पूर्व) ‘पायथागोरस सिद्धांत’ की खोज करने वाले भारतीय त्रिकोणमितितज्ञ । अनुमानतः २५०० वर्षपूर्व भारतीय त्रिकोणमितिवितज्ञों ने त्रिकोणमितिशास्त्र में महत्त्वपूर्ण शोध किया । विविध आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोज निकाली । दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करनेपर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्तमें परिवर्तन करना, इस प्रकारके अनेक कठिन प्रश्नों को बौद्धयन ने सुलझाया | *

ऋषि भारद्वाज राइट बंधुओंसे २५०० वर्ष पूर्व वायुयान की खोज करनेवाले भारद्वाज ऋषि ! आचार्य भारद्वाजजीने ६०० वर्ष इ.स.पूर्व विमानशास्त्र के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण संशोधन किया । एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर उडान भरनेवाले, एक विश्वसे दूसरे विश्व उडान भरने वाले वायुयान की खोज, साथ ही वायुयान को अदृश्य कर देना इस प्रकार का विचार पश्चिमी शोधकर्ता भी नहीं कर सकते । यह खोज आचार्य भारद्वाजजी ने कर दिखाया । पश्चिमी वैज्ञानिकोंको महत्वहीन सिद्ध करनेवाले खोज, हमारे ऋषि-मुनियोंने सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही कर दिखाया था । वे ही सच्चे शोधकर्ता हैं । *

गर्ग मुनि कौरव-पांडव काल में तारों के जगत के विशेषज्ञ गर्गमुनिजी ने नक्षत्रों की खोज की । गर्गमुनिजी ने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के जीवन के संदर्भ में जो कुछ भी बताया वह शत प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआ । कौरव-पांडवों का भारतीय युद्ध मानव संहारक रहा, क्योंकि युद्धके प्रथम पक्षमें तिथि क्षय होनेके तेरहवें दिन अमावस थी । इसके द्वितीय पक्षमें भी तिथि क्षय थी । पूर्णिमा चौदहवें दिन पड गई एवं उसी दिन चंद्रग्रहण था, यही घोषणा गर्गमुनिजी ने भी की थी । ।। जयतु संस्‍कृतम् । जयतु भारतम् ।।