Saturday, 20 April 2013

युग-काल का विधान.



हमारे पूर्वजों ने केवल पृथ्वी की समय गणना का विधान ही नहीं बनाया था, बल्कि उन्हों ने सृष्टि की युग गणना का विधान भी बनाया था जिस के आँकडों को आज विज्ञान भी स्वीकारनें पर मजबूर हो रहा है।

भारतीय गणना के अनुसार चार युगों का ऐक चतुर्युग होता है। यह वह समय है जो ‘हमारा सूर्यमण्डल’ अपने से बडे महासूर्य मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। यह गणना मन-घडन्त नहीं अपितु ऋगवेद के 10800 पद्धो तथा 432000 स्वरों में दी गयी है।

सतयुग, त्रेता, दूापर, और कलियुग चार युग माने जाते हैं। चार युगों से ऐक चतुर्युग बनता है। चतुर्युग के अन्दर युगों के अर्न्तकाल का अनुपात 4:3:2:1 होता है। अतः प्रत्येक युग की अवधि इस प्रकार हैः-

सतयुग – 17 लाख 28 हज़ार वर्ष
त्रेता युग – 12 लाख 96 हज़ार वर्ष
दूापर युग – 8 लाख 64 हज़ार वर्ष
कलियुग – 4 लाख 32 हज़ार वर्ष (कुल जोड – 432000 वर्ष)
71 चतुर्युगों से ऐक मनवन्तर बनता है (30 करोड 67 लाख 20 हज़ार वर्ष) यह वह समय है जो महासूर्य मण्डल अपने से भी अधिक विस्तरित सौर मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। इस से आगे भी बडे सूर्य मण्डल हैं जिन की परिकर्मा हो रही है तथा वह अनगिनित हैं।

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन का चक्र निरन्तर निर्विघ्न चलता रहता है। सर्जन 4.32 करोड वर्ष (ऐक चतुर्युग) तक चलता है जिस के पश्चात उतने ही वर्ष विसर्जन होता है। सृष्टि-कल्प वह समय है जब ब्रह्मा सृष्ठि की रचना करते हैं । इसी के बराबर समय का प्रलय-कल्प भी होता है। प्रलय-कल्प में सृष्ठि का विसर्जन होता है । सृष्ठि और प्रलय ऐक दूसरे के पीछे चक्र की तरह चलते रहते हैं जैसे हमारे दिनों के पीछे रातें आती है। सर्जन-विसर्जन के समय का जोड 8.64 करोड वर्ष होता है जिसे ब्रह्मा का ऐक दिवस (अहरोत्रा) माना गया है। ऐसे 360 अहरोत्रों से ब्रह्मा का ऐक वर्ष बनता है जो हमारे 3110.4 केटि वर्षों के बराबर है।

हिन्दू शास्त्रों ने ऐक कल्प को 14 मनुवन्तरों में विभाजित किया है। प्रत्येक मनुवन्तर में 30844800 वर्ष होते हैं अथवा 308.448 लाख वर्ष होते हैं।

हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार वर्तमान सृष्टि की रचना श्वेतावराह कल्प में 1.972 करोड वर्ष पूर्व हुई थी। उस के पश्चात छः मनुवन्तर बीत चुके हैं और सातवाँ वैभास्वत मनुवन्तर अभी चल रहा है। पिछले मनुवन्तर जो बीत चुके हैं उन के नाम स्वयंभर, स्वारोचिश, ओत्तमी, तमस, रविवत तथा चक्षाक्ष थे।

सातवें मनुवन्तर के 28 चतुर्युग भी बीत चुके हैं और हम 29वें चतुर्युग के कलियुग में इस समय (2012 ईसवी) जी रहे हैं । वर्तमान कलियुग के भी 5004 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं

भागवत पुराण के अनुसार भक्त ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद स्वयंभर मनु के युग में हुये थे जो आज (2012 ईसवी) से 1.99 करोड वर्ष पूर्व है। पाश्चात्य वैज्ञानिक इन गणाओं की अनदेखी करते रहे लेकिन जब अमेरिकन शोधकर्ता माईकल ए क्रामो ने कहा कि मानव आज से 2 करोड वर्ष पूर्व धरती पर आये तो भागवत पूराण के कथन की पुष्टि हो गयी।

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि यह काल गणना खगौलिक है। इस गणना के अनुसार आज की मानवी घटनाओं को जोडना उचित नहीं होगा। जैसे हाथी तोलने वाले माप दण्डों से स्वर्ण को नहीं तोला जाता उसी प्रकार किसी व्यक्ति की आयु का आंकलन ‘लाईट-यीर्स’ या ‘नैनो-सैकिण्डस ’ में नहीं किया जाता।

भारतीय कैलैण्डर की उपेक्षा

अंग्रेज़ी पद्धति अनुसार प्रशिक्षित भारतीय युवा अपने गौरवशाली पूर्वजों की उपलब्धियों को भूल कर अपने आप में ही गर्वित रहते हैं। जो कुछ अंग्रेज़ थूकते रहै मैकाले प्रशिक्षित भारतीय उसे खुशी से चाटते रहै हैं। आज से केवल पचास वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज घटनाओं को भारत के देसी महीनों के माध्यम से याद रखते थे किन्तु वह प्रथा अब लुप्त होती जा रही है। भारत के अंगेजी प्रशक्षित आधुनिक युवा देसी महीनों के नाम भी क्रमवार नहीं बता सकते। कदाचित वह समझते हैं कि भारत का अपना कोई कैलेण्डर ही नहीं था और रोमन कैलेण्डर के बिना हम प्रगति ही नहीं कर सकते। अपनी मनोविकृति के कारण हम आदि हो चुके हैं कि सत्य वही होता है जिसे पाश्चात्य वैज्ञानिक माने। अभी कुछ ही वर्ष पूर्व पश्चिम के वैज्ञानिक ऐक स्वर में बोल रहे थे कि चन्द्रमां पर जल नहीं है। परन्तु जब भारत के चन्द्रयान ने चाँद की धरती पर जल के प्रमाण दिये तो अमेरिकी नासा ने भी पुनः खोज कर के भारत के कथन की पुष्टि कर दी।

अंतरीक्ष की भारतीय समय सारणी को भी आज के विज्ञान के माध्यम से परखा जा सकता है। यदि यह काम विदेशी ना करें तो भारत के वैज्ञानिकों को स्वयं करना चाहिये। हमारी उपलब्धियों को स्वीकृति ना देना पाश्चात्य देशों के स्वार्थ हित में है क्यों कि उन्हों ने भारत की उपलब्धियों को हडप कर अपना बनाया हुआ है। लेकिन हम किस कारण अपने पूर्वजों की धरोहर उन्हें हथियाने दें ? हम अपनी उपलब्दधियों की प्रमाणिक्ता पाने के लिये पाश्चात्य देशों के आगे हाथ क्यों फैलाते रहते हैं ?

वर्णव्यवस्था विषय


चार वर्णों के गुण-कर्म
सब मनुष्यों की एक जाति है, अर्थात मनुष्य - जाति l
मनुष्य-जाति चार-वर्णों में विभक्त होती है - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र l
इनका नाम 'वर्ण' इसलिए है कि जैसे जिसके गुण-कर्म हों वैसा ही उसको अधिकार देना चाहिए l

गुण-कर्मों के अनुसार ही वर्ण 'वरा' जाता है, वेदाध्ययन और परमेश्वर की उपासना के साथ वर्तमान तथा विद्या आदि उत्तम गुणों से युक्त पुरुष को ब्राह्मण कहते हैं l
एश्वर्य, बल, वीर्य, शौर्य आदि गुणों से सम्पन्न पुरुष को क्षत्रिय कहते हैं l
लेन -देन, व्यापार, पशु-पालन तथा कृषि आदि के कर्मों में सकुशल मनुष्य को वैश्य तथा शिल्पविद्या के जानने वाले तथा सेवा क्षेत्रों में कुशल अज्ञानी मनुष्य को शुद्र कहते हैं l

*मनुष्य जाती के दो भेद *
मनुष्य जाति के दो भेद अन्य प्रकार से भी किये हैं - आर्य और दस्यु l
श्रेष्ठ मनुष्यों को आर्य कहते हैं और दुष्ट स्वभाव से डाकू आदि को दस्यु कहते हैं l
इन्हें ही देव और असुर भी कहते हैं अर्थात आर्यों को देव तथा दस्युओं को असुर कहते हैं l

*वर्ण-परिवर्तन *
*शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम l
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विध्याद्वैश्यात्त्थैव च ll
*मनु-स्मृति (अध्याय 10, श्लोक 65)
अर्थात शूद्र ब्राह्मण हो जाता है, और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है अर्थात गुण-कर्मों के अनुसार ब्राह्मण हो तो वह ब्राह्मण रहता है और ब्राह्मण यदि क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के गुनोंवाला हो तो वह क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र हो जाता है l वैसे शूद्र भी मुर्ख हो तो वह शूद्र रहता है और जो उत्तम गुणों से युक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है l
इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य के विषय में भी जान लेना चाहिए l

जो शूद्र को वेदादि पढने का अधिकार न होता तो वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के अधिकार को कैसे प्राप्त हो सकता था ?
महर्षि विश्वामित्र और महर्षि वाल्मीकि जैसे अनेकों उदाहरण हैं शास्त्रों का अध्ययन करें तो l
वेदादि शास्त्रों के पढने-पढ़ाने, सुनने-सुनाने में सब मनुष्यों का अधिकार है,जो-जो पदार्थ ईश्वर ने रचे हैं वे सबके उपकारार्थ हैं l
मुर्ख का नाम शूद्र और अतिमूर्ख का नाम अतिशूद्र है, इनमे विध्याग्रहण की बुद्धि ही नही होती l
स्त्रियों को भी वेदादि शास्त्रों को पढने-सुनने का समान अधिकार है l
यजुर्वेद 26/2 में लिखा है :
यथेमा वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य: l
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च ll

अर्थात वेदों को पढने का अधिकार सब मनुष्यों को है, और विद्वानों को पढ़ाने का भी अधिकार है l
ईश्वर आज्ञा देते हैं कि हे मनुष्य लोगों! जिस प्रकार मैं (परमेश्वर) तुमको चारों वेदों का उपदेश देता हूँ उसी प्रकार तुम भी उनको पढ़कर सब मनुष्यों को पढ़ाया और सुनाया करो, क्योंकि वह वेदरूपी वाणी सबका कल्याण करनेवाली है l
वेदाधिकार जैसा ब्राह्मण के लिए है वैसा ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, पुत्र, भृत्य और अतिशूद्र के लिए भी बराबर है l
वर्णपरिवर्तन के सम्बन्ध में यह निश्चितरूप से जान लेना चाहिए कि 25वें वर्ष में वर्णों का अधिकार ठीक-ठाक होता है, क्योंकि 25 वर्षों तक बुद्धि बढती है, इसलिए उसी समय गुण-कर्मों कि ठीक-ठाक परीक्षा करके वर्णाधिकार होना उचित है l

ब्राह्मण :- ब्राह्मण को बुद्धिजीवी माना जाता है, जो अपनी विद्या, ज्ञान और विचार शक्ति द्वारा जनता एवं समाज का नेतृत्व कर उन्हें सन्मार्ग पर चलने का आदेश देता है, ये बुद्धि से ही समाज पर आधिपत्य जमाते हैं। ये बुद्धिर्यस्य बलं तस्य में विश्वास रखते हैं। ऐसे व्यक्तियों के मन की तरंगों का रंग श्वेत
होता है। इन्हें ब्राह्मण अथवा विप्र वर्ण का माना जाता है।

क्षत्रिय :- क्षत्रिय वह है जो बाहुबल द्वारा समाज में व्यवस्था रखकर उन्हें उच्छृंखल होने से रोकता है, जो नाश से रक्षा करे वह क्षत्रिय है। राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना है। वे साहसी और पराक्रमी होते हैं। ये शारीरिक शक्ति से समाज पर आधिपत्य जमाते हैं। ये पारिवारिक परंपराओं के प्रति सजग होते हैं। ऐसे व्यक्तियों की मानसिक तरंगों का रंग लाल होता है। इन्हें क्षत्रिय वर्ण की संज्ञा दी गई है।

वैश्य :- खेती, गौ पालन और व्यापार के द्वारा जो समाज को सुखी और देश को समृद्ध बनाता है, अर्थ व्यवस्था में दक्ष होता है। धन संग्रह तथा दान आदि ही इनका ध्येय होता है। ये अर्थ द्वारा ही समाज पर नियंत्रण करते हैं। इनका जीवन मूल्य अर्थ प्रधान होता है। ऐसी मनोवृत्ति के लोगों के मन की तरंगों का रंग पीला होता है। इन्हें वैश्य वर्ण का माना जाता है।

शूद्र :- उपरोक्त तीनों वर्णों की सेवा करना शूद्र का कार्य था, इस वर्ण में व्यक्ति केवल शारीरिक श्रम करने की ही योग्यता रखता है, शारीरिक श्रम ही जिसके जीवन का आधार होता है। शारीरिक श्रम, स्वामी-भक्ति इमानदारी, कर्तव्यनिष्ठ, सहनशीलता आदि इनके गुण होते हैं l भोजन प्राप्ति ही जिसके जीवन की ध्येय होता है तथा जिसमें प्रशासनिक योग्यता नहीं होती। ऐसे व्यक्ति की मानसिक तरंगों का रंग काला होता है। वर्ण व्यवस्था के आधार पर ऐसे ही व्यक्ति को शुद्र की संज्ञा दी गई है। इस वर्ण का भी उतना ही महत्त्व था जितना अन्य तीनों वर्णों
का था। यह वर्ण ना हो तो शेष तीनों वर्णों की जीवन व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाए।

आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः । (वशिष्ठ स्मृति)
आचरण हीन को वेद भी पवित्र नहीं करते ।

'आपस्तम्बधर्मसूत्र' (प्रश्न 2, पटल 5, खंड 11, सूक्त 10-11) यह श्लोक देखें
धर्मचर्यया जघन्यो वर्ण: पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तो l
अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णों जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तो ll
अर्थात धर्माचरण से नीचे के वर्ण पूर्व-पूर्व वर्ण के अधिकार को प्राप्त होते हैं और अधर्मआचरण करके पूर्व-पूर्व वर्ण नीचे के वर्णों के अधिकारों को प्राप्त होते हैं l

यह व्यवस्था समाज के संतुलन के लिए थी।
समस्त ऋषियों ने भी समाज को चार वर्णों में विभाजित करना अनिवार्य बताया है।
अन्य धर्मों में भी इस प्रकार की वर्ण व्यवस्था की गयी थी।
प्रत्येक व्यवस्था गुणों और कर्मों के आधार पर थी।

जय श्री राम कृष्ण परशुराम ॐ