पिछले कई सप्ताह से कुछ घटनाओं को आधार बनाकर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की "बढ़ती असहिषुणता" और "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा" जैसे फैशनेबल मुद्दों पर आलोचना की जा रही है। विरोध करने वाले इस कुनबे में कई लेखक, साहित्यकार और फ़िल्मकार शामिल हैं। यहाँ ये बात गौरतलब है कि सभी विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों में कई बातें सामान हैं जैसे कि अफजल गुरु, याकूब मेनन की दया याचिका पर इनके हस्ताक्षर हैं, श्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते उन्हें अमेरिका का वीसा न मिलने की मांग हेतु अमेरिकी राष्ट्रपति को लिखे पत्र में इनके हस्ताक्षर हैं या फिर इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के NGO हैं जिन्हे फोर्ड फाउंडेशन या ग्रीनपीस जैसी संस्थाओं से राष्ट्रविरोधी कृत्यों के लिए मोटा चंदा प्राप्त होता है। इन "बुद्धिजीवियों" द्वारा पुरस्कार-सम्मान लौटाए जाने का जो खेल खेला जा रहा है वह पूर्ण रूपेण राजनैतिक और प्रधानमंत्री के प्रति द्वेषपूर्ण है। यह गुट 16 मई 2014 के बाद से ही बेचैन है कि उन्होंने जिस व्यक्ति को लगातार 13 साल तक कोसा वह आज देश का प्रधानमंत्री कैसे बन गया। इन "बुद्धजीवियों" के साथ-साथ सेक्युलर राजनीतिज्ञों, मीडिया के वर्ग और मूडीज जैसी अवयस्क संस्थाओं द्वारा ऐसा दुष्प्रचार किया जा रहा है कि पिछले डेढ़ सालों में भारत में बढ़ती असहिष्णुता के कारण अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न हो रहा है और ये परिस्थितियां यूरोप और और अरब देशों के निवेशकों को आकर्षित करने करने की भारत की संभावनाओं पर असर डालेंगी।
देश में पिछले कुछ महीनों में कई ऐसी घटनाएँ घटीं जो दुर्भाग्यपूर्ण हैं, भले ही वो किसी भी समुदाय से सम्बंधित हों। दादरी की घटना भी उतनी ही निंदनीय ही जितनी कर्नाटक में प्रशांत पुजारी की हत्या की घटना। कुछ महीने पहले दिल्ली के चर्च में पत्थर फेंकने की घटना और पश्चिम बंगाल में नन के साथ रेप की घटना पर सेक्युलर जमात द्वारा अतिसंयोक्तिपूर्ण ढंग से शोर मचाया गया और मीडिया के अधिकांश वर्ग का उन्हें समर्थन मिला। इन घटनाओं के अन्तर्राष्टीयकरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है जैसा कि उत्तर प्रदेश के एक मंत्री द्वारा देश में मुसलमानों के हालात पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव को पत्र लिखा गया। भारतीय संविधान द्वारा देश में शासन का संघीय ढांचा है जिसके अनुसार कानून व्यवस्था राज्यों का अंग है। दादरी की घटना समाजवादी पार्टी शासित उत्तर प्रदेश में घटित हुयी, कुलबर्गी और प्रशांत पुजारी की हत्या कांग्रेस शासित कर्नाटक में हुयी, दाभोलकर की हत्या महाराष्ट्र में कांग्रेस शासन के दौरान हुयी थी। पानसरे जिनकी हत्या जनवरी 2015 में हुयी, वो अंधश्रद्धा निर्मूलन के साथ-साथ टोल-टैक्स माफियाओं के भी विरुद्ध आंदोलन चला रहे थे, इस प्रकार उनकी हत्या में पूर्ण रूपेण किसी दक्षिणपंथी संगठन को दोषी ठहराना अनुचित है। चूँकि अधिकांश घटनाएँ गैर-भाजपा शासित राज्यों में घटित हुयी थीं तो तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा उन राज्य सरकारों पर सवाल न उठाकर उल्टा केंद्र सरकार पर असहिष्णु होने का आरोप लगा दिया गया परन्तु भाजपा शासित राज्य हरियाणा में दो दलित बालकों के आग में जिन्दा जलने पर सेक्युलर ब्रिगेड को अचानक याद आ गया कि कानून व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी है और बिना जाँच रिपोर्ट का इंतजार किये हरियाणा सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए सवर्ण समुदाय को दोषी ठहराकर समाज में जातिगत द्वेष फैलाया गया। फॉरेंसिक रिपोर्ट आने पर यह बात प्रमाणित हुयी कि दलित परिवार के घर में आग अंदर से लगी थी परन्तु तब तक मीडिया और सेक्युलर मंडली समाज में वैमनस्तता फ़ैलाने के अपने उद्देश्य में सफल हो चुकी थी।
"बुद्धिजीवियों" और वामपंथ की परिभाषा के अनुसार- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल उसी को है जो वामपंथी-सेक्युलर अथवा मुल्लावाद की बात करे, यदि हिन्दुओं ने प्रतिकार किया तो उसे असहिष्णुता का नाम दे दिया जायेगा। वामपंथ के अनुसार स्वस्थ संवाद केवल तभी तक संभव है जब तक हिन्दू संस्कृति, देवी-देवताओं,परम्पराओं को गाली देने की छूट हो, अरबी-फ़ारसी की बात करना सेक्युलरिज्म है परन्तु संस्कृत भाषा की पैरोकारी घोर सांप्रदायिकता फैलाना है।
सेक्युलर वामपंथियों का यह पैटर्न नया नहीं है। कथित असहिष्णु नरेंद्र मोदी को विशाल ह्रदय वाले अटल बिहारी बाजपेई के खिलाफ खड़ा करना एक फैशन बन गया है। जिन लोगों की याददाश्त अच्छी है उन्हें याद होगा कि जो ताकतें आज यह दुष्प्रचार कर रही हैं कि हिन्दू फांसीवाद आने वाला है वही अटल बिहारी बाजपेई के शासनकाल में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी व आदिवासियों के धर्मान्तरण कार्य में लिप्त ग्राहम स्टेंस की उड़ीसा में हत्या करने वाले लोगों को कथित रूप से प्रोत्साहित करने के लिए बाजपेई के पीछे पड़ी थीं। तब भी यही कहा गया था कि किसी भी ऐसी गठबंधन की सरकार जिसमें जिसमें भाजपा के पास नेतृत्व हो, में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं रहेंगे। यह आज के भारत दोहराया जा रहा है। हिन्दू असहिष्णुता का आरोप एक बड़ी योजना का हिस्सा है। इस योजना का लक्ष्य यह साबित करना है कि मोदी सरकार का एक छिपा हुआ एजेंडा है। "बुद्धिजीवियों" के इस अभियान का उद्देश्य अंतराष्ट्रीय जगत में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बढ़ाई गयी भारत की साख को गिराना और भारत के सोशल रिकॉर्ड पर दाग लगाना भी है। सेक्युलर जमात द्वारा प्रारम्भ की गयी ये मनोवैज्ञानिक लड़ाई इस सोंच पर आधारित है कि मोदी सरकार की छवि ख़राब करने के लिए सब कुछ किया जाना चाहिए, इसमें प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस और उसके बामपंथी स्लीपर सेल का हाँथ है जिसे विगत 65 वर्षों के कांग्रेस शासन के दौरान पल्लवित-पोषित किया गया। स्वतंत्रता के बाद छः दशकों तक अधिकांश रूप से कांग्रेस और विशेषतः नेहरू-गांधी परिवार का शासन देश पर रहा। प्रशासनिक क्षेत्र में जहाँ कांग्रेस का नियंत्रण रहा और बौद्धिक,अकादमिक प्रतिष्ठानों पर नेहरू के समय से ही वामपंथियों को नियंत्रण प्रदान किया गया जिसके एवज में वामपंथियों द्वारा कांग्रेस का निर्विरोध समर्थन होता रहा। वामपंथियों को चुनाव में कभी पुरे देश में समर्थन नहीं मिला परन्तु कला, संस्कृति और अकादमिक संस्थानों में उन्हें पक्की जगह मिल गयी। मोदी सरकार के महीने बीतने के साथ-साथ कांग्रेस और वामपंथी शनैः-शनैः अपनी आशा खोते जा रहे हैं और उन्हें अपना भविष्य अंधकारपूर्ण नजर आ रहा है। जिसके परिणामस्वरूप ये अपनी गन्दी हरकतों से देश की जनता द्वारा प्रचंड बहुमत से चुनी हुयी सरकार को गिराने और अंतराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने का षड्यंत्र कर रहे हैं। 1998 से 2004 के बींच अटल बिहारी बाजपेई के नेतृत्व में रही भाजपा सरकार के समय भी इसी प्रकार की परिस्थितियां उत्पन्न की गयी थीं जब मध्य प्रदेश के झबुआ जिले में तीन ईसाई ननों के रेप के मामले में बाजपेई सरकार की छवि को प्रभावित किया गया था। परन्तु बाद में हुयी जाँच से पता चला कि ये घटना 24 पियक्कड़ अपराधियों द्वारा अंजाम दी गयी थी जिसमें से 12 ईसाई और 12 भील जनजातीय थे। नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री रहते जो कुछ हो रहा है वह अटल बिहारी बाजपेई के सत्ता में होने के समय हुयी घटनाओं का पुनर्प्रदर्शन है। मीडिया और सेक्युलर समुदाय मोदी जी के विरोध में वही कर रहा है जो उन्होंने 15 वर्ष पूर्व बाजपेई जी के समय में किया था।
आज भारत में "असहिष्णुता" का हवाला देकर पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों, लेखकों व कलाकारों ने 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गए आपातकाल का समर्थन किया था। अधिकांश सेक्युलर नेता, मीडिया और बुद्धिजीवी भी उनके साथ थे। बामपंथी धड़े के "प्रगतिशील पत्रकार संघ" नें आपातकाल का समर्थन किया था। आपात्कालीन परिस्थितियों में 34 बुद्धिजीवियों ने साहित्य अकादमी पुरस्कारों के सम्मान को स्वीकार किया था उनमें से दो- सर्वपल्ली गोपाल और भीष्म साहनी धर्मनिरपेक्षता की मूर्ति थे। गुलाम नबी ख्याल जिन्हे आपातकाल के समय पुरस्कार मिला था अब उसे फासिज्म के उत्पन्न होने के विरोध में लौटाया है। पिछले महीने ईरानी फिल्म निर्देशक माजिद मजिदी, पैगम्बर मुहम्मद पर अपनी एक फिल्म के प्रचार के लिए भारत आये थे। इस फिल्म में ए आर रहमान नें संगीत दिया है लेकिन दोनों का समूचे मौलवियों और इस्लाम के ठेकेदारों द्वारा प्रतिकार किया गया तब किसी ने भी किसी कोने से इस असहिष्णु कृत्य के विरोध में आवाज नहीं सुनी। तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की झंडाबरदार यह सेक्युलर मण्डली कहाँ थी?
संप्रग शासन के समय ईसाई धर्म प्रचारकों के कार्यों में पूर्ण छूट थी। दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर ईसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासी हिन्दुओं का धर्मान्तरण किया गया। इसके फलवरूप सामाजिक तनाव फैलाव और लोगों के बीच अशांति फैली। मोदी सरकार द्वारा विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले लगभग 15,000 NGO के FCRA लाइसेंस रद्द करने और विदेशी सहायता पर्याप्त करने पर कड़ी निगरानी करने पर सेक्युलर मिडिया, NGO गिरोह में बेचैनी है और वे इसका बदला सरकार के विरुद्ध असहिष्णुता का मिथ्या दुष्प्रचार करके ले रहे हैं। "बुद्धिजीवियों" के मिथ्या दुष्प्रचार का कई अन्य साहित्यकारों, लेखकों और कलाकारों द्वारा विरोध भी किया जा रहा है। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ हर दिन कहीं न कहीं कोई घटना घटित होती रहती है और हर एक घटना पर प्रधानमंत्री को दोषी ठहराकर उनकी प्रतिक्रिया की मांग करना अनुचित है। सेक्युलर जमात द्वारा प्रधानमंत्री का एकपक्षीय विरोध करके अपने ही द्वेषपूर्ण एजेंडे को उघाड़ दिया गया है जिसकी कलई दिन पर दिन देश की जनता के सामने खुल रही है।