Friday, 28 September 2012

महान सम्राट शिवाजी के बारे में परसों बता चूका था अब उनके महान पुत्रके बारे में :पर्ण पढ़े : Shrimant Maharajadhiraj संभाजी छत्रपति शिवाजी राजे भोसले जोकि अपने धर्म के लिए कुर्बान हो गए लेकिन कई यातनाये सहने के बाद भी इस्लाम कबूल नहीं किया .,ये हमारे आदर्श हे " धर्म रक्षक बने" गीता में भी लिखा हे "धर्मो रक्षति रक्षितः" (14 मई 1657 - 11 मार्च १६८९) के ज्येष्ठ बेटे और सम्राट के उत्तराधिकारी था छत्रपति शिवाजी , के संस्थापक मराठा साम्राज्य और उसकी पहली महारानी पत्नी Saibai . संभाजी पुरन्दर किला में पैदा हुआ था . वह 17 साल का था जब उसके पिता शिवाजी ने 1674 में ताज पहनाया गया था. वह अपनी माँ Saibai जो . शिवाजी की पसंदीदा पत्नी थी तो वह अपनी दादी की देखभाल के अंतर्गत था खो दिया है. . संभाजी सुरक्षा के रूप में मुगल सरदार मिर्जा राजा Jayasingh द्वारा लिया गया था जब तक वह उसके साथ जो शिवाजी महाराज पर अपने हमले को रोकने के समझौते के सभी किलों प्राप्तमराठा अपने नियंत्रण के अधीन राज्य. शिवाजी की मृत्यु के बाद, उसकी विधवा Soyarabai मोहिते प्रशासन के विभिन्न मंत्रियों के साथ योजनाओं के लिए अपने बेटे के साथ संभाजी की जगह बनाने शुरू कर दिया राजा राम राज्य के वारिस के रूप में. 21 अप्रैल 1680 में, दस वर्षीय राजा राम सिंहासन में स्थापित किया गया था. समाचार संभाजी पर पहुंच गया जो पन्हाला में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. 27 अप्रैल को, वह कमांडर की हत्या के बाद और 18 जून को किले के कब्जे में ले लिया है, वह रायगढ़ का नियंत्रण हासिल कर ली. शिवाजी महाराज की मृत्यु के तुरंत बाद R.Sambhaji औपचारिक रूप से 20 जुलाई को सिंहासन, जेल में डाल Soyarabai और राजा राम ,मुग़ल साम्राज्य के खिलाफ युद्ध :- शिवाजी की मृत्यु होने पर, 1680 ई. में औरंगजेब के बारे में आधे से एक लाख सैनिकों और 400,000 जानवर, जो उस समय शायद दुनिया में सबसे बड़ी सेना के साथ Dakkhaan आया था. इतने बड़े पैमाने पर सेना की मदद के साथ, वह (विजापुर) आदिलशाह और Qutubshah साम्राज्य (गोलकुंडा) को हराया. औरंगजेब Qutubshahi और आदिलशाही साम्राज्यों से क्रमशः दो जनरलों, Mukarrabkhan और Sarjakhan, का अधिग्रहण किया. हालांकि, वह मराठा साम्राज्य के लिए एक अंत लाने के लिए सक्षम नहीं था. यह सब होश में आय से अधिक लड़ाई थी. औरंगजेब की सेना के बारे में दस बार मराठा सेना थी. संभाजी महाराज बहादुरी औरंगजेब के 8 लाख मजबूत सेना का सामना करना पड़ा है और उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर कर युद्ध के मैदान में कई मुगल सरदारों को हराया. संभाजी नहीं था औरंगजेब प्रमुख जीत जीत. औरंगजेब के कमांडरों ने दावा किया है कि वे निकट Ramshej किला जीत होगी नासिक घंटे के भीतर लेकिन किले के लिए लड़ने के सात साल तक चली.,जंजीर के सिद्दिस के साथ युद्ध : संभाजी उच्चा आरती महत्वा के क्षेत्र पर कब्ज़ा करना चाहते थे , Siddis भी उनके तोपों और जहाजों के साथ जवाबी कार्रवाई की और हार नहीं मानी. संभाजी हमले में एक को तोड़ने का आदेश दिया. अन्य मराठा प्रमुखों नहीं पता था कि संभाजी जंजीरा किले में जासूस लगाया था और वह के लिए उन्हें किले में बारूद की दुकान को उड़ाने के लिए इंतज़ार कर रहा था. दुर्भाग्य से जासूस के रूप में एक महिला नौकर को इस बारे में पता करने के लिए आया था और Siddis सूचित किया पकड़े गए थे. उनमें से एक भागने में कामयाब रहे, लेकिन दूसरों को मारे गए थे.जब संभाजी इस खबर मिली, वह तट से द्वीप किले के पत्थरों का एक पुल का निर्माण करने का फैसला किया. निर्माण बहुत जोखिम भरा है, कठिन और समय भस्म था. जब पुल के बारे में 1/2 का निर्माण किया गया था, समाचार आया कि औरंगजेब के बारे में 100.000 सैनिकों को भेजा था मराठा साम्राज्य नाश.संभाजी जंजीरा छोड़ने के लिए मुगल सेना का मुकाबला करने के लिए किया था...गोवा में पुर्तगालिय के साथ युद्ध :पुर्तगाली और मुग़ल एक दुसरे के मददगार थे इस प्रकार, संभाजी गोवा में पुर्तगाली के खिलाफ एक अभियान चलाया. Chikka देव राय जैसे पुर्तगाली, अहंकार से प्रेरित थे. मराठों गोवा जा पहुंचे और को जीतने पुर्तगाली क्षेत्र और किलों शुरू कर दिया. पुर्तगाली मराठों पर काबू पाने में सक्षम नहीं थे.,औरंगजेब ने पुर्तगालियो की मादा की अपनी सेना भेजकर ,संभाजी ने चेतावनी दी की एसा ना करे ,संभाजी ने २ लाख की मुग़ल सेना क इर से धुल चटा दी , 2 सेना इतनी बुरी तरह से पिटाई की थी कि केवल कुछ सैनिकों मुगल शिविर में लौट सकी इस तरह औरंगजेब ने सोचा की इन्हें बल से नहीं हराया जा सकता छल से हराना चाहिए ,छिका देवराज मैसूर के साथ युद्ध :-सभाजी के दूत का मैसूर में अपमान हुआ इसके परिणाम स्वरुप सभाजी ने वह हमला किया ,उन्होंने आग के गोल को तीर के रूप में इस्तेमाल किया और उन्हें युद्ध में हराया ,मुग़ल से अंतिम लड़ाई :-CE जल्दी 1689 में, संभाजी में संगमेश्वर में एक रणनीतिक बैठक के लिए बुलाया अपने कमांडरोंकोंकण अंतिम झटका औरंगजेब Dakkhan से बेदखल पर फैसला. आदेश में योजना पर अमल करने के लिए जल्द ही, संभाजी आगे भेजा उनके साथियों के अधिकांश और अपने भरोसेमंद पुरुषों के कुछ के साथ वापस आने. Ganoji शिर्के ने हिस्सा लिया, एक संभाजी भाई में ससुराल के एक गद्दार दिया और औरंगजेब के कमांडर मदद Muqarrab खान को खोजने, तक पहुँचने और संगमेश्वर हमला जब संभाजी के बगीचे में था संगमेश्वर , कुछ मुद्दों को हल करने के बारे में शहर छोड़ने के लिए गया था.
संभाजी, कवि कलश और उसके आदमियों के सभी पक्षों से घिरे हुए थे. मराठों अपनी तलवारें बाहर ले, 'हर हर महादेव' गरजे और अभी तक भी कई मुगलों पर pounced. एक खूनी झड़प जगह ले ली और संभाजी 1 फ़रवरी 1689 पर कब्जा कर लिया था.

मराठा सैनिकों और अन्य वफादारों असफल के संभाजी बचाव करने की कोशिश की, लेकिन 3 फ़रवरी 1689 पर मुगलों द्वारा मारे गए.सभाजी को मौत की सजा दी गयी और औरन्जेब ने उनका अपमान किया और इस्लाम में परिवर्तित करने के लिए कई क्रूर यातनाये दी गए जिनका हम ज़िक्र भी नहीं कर सकते ,उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन करवाने से इनकार कर दिया कहा में "धर्म रक्षक हु " और मृत्यु को स्वीकार किया
 

Thursday, 27 September 2012

भारत में विज्ञान,परमाणु बम


आधुनिक भारत में अंग्रेजों के समय से जो इतिहास पढाया जाता है वह चन्द्रगुप्त मौर्य के वंश से आरम्भ होता है। उस से पूर्व के इतिहास को ‘ प्रमाण-रहित’ कह कर नकार दिया जाता है। हमारे ‘देसी अंग्रेजों’ को यदि सर जान मार्शल प्रमाणित नहीं करते तो हमारे ’बुद्धिजीवियों’ को विशवास ही नहीं होना था कि हडप्पा और मोइन जोदडो स्थल ईसा से लग भग 5000 वर्ष पूर्व के समय के हैं और वहाँ पर ही विश्व की प्रथम सभ्यता ने जन्म लिया था।

विदेशी इतिहासकारों के उल्लेख

विश्व की प्राचीनतम् सिन्धु घाटी सभ्यता मोइन जोदडो के बारे में पाये गये उल्लेखों को सुलझाने के प्रयत्न अभी भी चल रहे हैं। जब पुरातत्व शास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोइन जोदडो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्हों ने देखा कि वहाँ की गलियों में नर-कंकाल पडे थे। कई अस्थि पिंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थि पिंजरों ने एक दूसरे के हाथ इस तरह पकड रखे थे मानों किसी विपत्ति नें उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुँचा दिया था।

उन नर कंकालों पर उसी प्रकार की रेडियो -ऐक्टीविटी के चिन्ह थे जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गये थे। मोइन जोदडो स्थल के अवशेषों पर नाईट्रिफिकेशन के जो चिन्ह पाये गये थे उस का कोई स्पष्ट कारण नहीं था क्यों कि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है।

मोइनजोदडो की भूगोलिक स्थिति

मोइन जोदडो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है। उस के चारों ओर दो किलोमीटर के क्षेत्र में तीन प्रकार की तबाही देखी जा सकती है जो मध्य केन्द्र से आरम्भ हो कर बाहर की तरफ गोलाकार फैल गयी थी। पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने पाया कि मिट्टी चूने के बर्तनों के अवशेष किसी ऊष्णता के कारण पिघल कर ऐक दूसरे के साथ जुड गये थे। हजारों की संख्या में वहां पर पाये गये ढेरों को पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने काले पत्थरों ‘बलैक -स्टोन्स’ की संज्ञा दी। वैसी दशा किसी ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे की राख के सूख जाने के कारण होती है। किन्तु मोइन जोदडो स्थल के आस पास कहीं भी कोई ज्वालामुखी की राख जमी हुयी नहीं पाई गयी।

निशकर्ष यही हो सकता है कि किसी कारण अचानक ऊष्णता 2000 डिग्री तक पहुँची जिस में चीनी मिट्टी के पके हुये बर्तन भी पिघल गये । अगर ज्वालामुखी नहीं था तो इस प्रकार की घटना अणु बम के विस्फोट पश्चात ही घटती है।
महाभारत के आलेख

इतिहास मौन है परन्तु महाभारत युद्ध में महा संहारक क्षमता वाले अस्त्र शस्त्रों और विमान रथों के साथ ऐक एटामिक प्रकार के युद्ध का उल्लेख भी मिलता है। महाभारत में उल्लेख है कि मय दानव के विमान रथ का परिवृत 12 क्यूबिट था और उस में चार पहिये लगे थे। देव दानवों के इस युद्ध का वर्णन स्वरूप इतना विशाल है जैसे कि हम आधुनिक अस्त्र शस्त्रों से लैस सैनाओं के मध्य परिकल्पना कर सकते हैं। इस युद्ध के वृतान्त से बहुत महत्व शाली जानकारी प्राप्त होती है। केवल संहारक शस्त्रों का ही प्रयोग नहीं अपितु इन्द्र के वज्र अपने चक्रदार रफलेक्टर के माध्यम से संहारक रूप में प्रगट होता है। उस अस्त्र को जब दाग़ा गया तो ऐक विशालकाय अग्नि पुंज की तरह उस ने अपने लक्ष्य को निगल लिया था। वह विनाश कितना भयावह था इसका अनुमान महाभारत के निम्न स्पष्ट वर्णन से लगाया जा सकता हैः-

“अत्यन्त शक्तिशाली विमान से ऐक शक्ति – युक्त अस्त्र प्रक्षेपित किया गया…धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिस की चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा…वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया…उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे. उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे…बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के बर्तन टूट गए थे और पक्षी सफेद पड़ चुके थे…कुछ ही घण्टों में समस्त खाद्य पदार्थ संक्रमित होकर विषैले हो गए…उस अग्नि से बचने के लिए योद्धाओं ने स्वयं को अपने अस्त्र-शस्त्रों सहित जलधाराओं में डुबा लिया…”

उपरोक्त वर्णन दृश्य रूप में हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोट के दृश्य जैसा दृष्टिगत होता है।

ऐक अन्य वृतान्त में श्री कृष्ण अपने प्रतिदून्दी शल्व का आकाश में पीछा करते हैं। उसी समय आकाश में शल्व का विमान ‘शुभः’ अदृष्य हो जाता है। उस को नष्ट करने के विचार से श्री कृष्ण नें ऐक ऐसा अस्त्र छोडा जो आवाज के माध्यम से शत्रु को खोज कर उसे लक्ष्य कर सकता था। आजकल ऐसे मिस्साईल्स को हीट-सीकिंग और साऊड-सीकरस कहते हैं और आधुनिक सैनाओं दूारा प्रयोग किये जाते हैं।

राजस्थान से भी…
प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट के अन्य और भी अनेक साक्ष्य मिलते हैं। राजस्थान में जोधपुर से पश्चिम दिशा में लगभग दस मील की दूरी पर तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव राख की मोटी सतह पाई जाती है, वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे।

‘लक्ष्मण-रेखा’ प्रकार की अदृष्य ‘इलेक्ट्रानिक फैंस’ तो कोठियों में आज कल पालतु जानवरों को सीमित रखने के लिये प्रयोग की जातीं हैं, अपने आप खुलने और बन्द होजाने वाले दरवाजे किसी भी माल में जा कर देखे जा सकते हैं। यह सभी चीजे पहले आशचर्य जनक थीं परन्तु आज ऐक आम बात बन चुकी हैं। ‘मन की गति से चलने वाले’ रावण के पुष्पक-विमान का ‘प्रोटोटाईप’ भी उडान भरने के लिये चीन ने बना लिया है।

निस्संदेह रामायण तथा महाभारत के ग्रंथकार दो प्रथक-प्रथक ऋषि थे और आजकल की सैनाओं के साथ उन का कोई सम्बन्ध नहीं था। वह दोनो महाऋषि थे और किसी साईंटिफिक – फिक्शन के थ्रिल्लर – राईटर नहीं थे। उन के उल्लेखों में समानता इस बात की साक्षी है कि तथ्य क्या है और साहित्यक कल्पना क्या होती है। कल्पना को भी विकसित होने के लिये किसी ठोस धरातल की आवश्यक्ता होती है।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र जैसे अस्त्र अवश्य ही परमाणु शक्ति से सम्पन्न थे, किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना, हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि, अपने धर्मग्रंथों के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है, पता नहीं हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं।

खुद को भारतीय कहने वालो गर्व करो
 

Wednesday, 26 September 2012

विमान के आविष्कारक- पण्डित शिवकर बापूजी तलपदे......

राइट्स बंधु को हवाई जहाज के आविष्कार के लिए श्रेय दिया जाता है क्योंकि उन्होंने 17 दिसम्बर 1903 हवाई जहाज उड़ाने का प्रदर्शन किया था। किन्तु बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि उससे लगभग 8 वर्ष पहले सन् 1895 में संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित शिवकर बापूजी तलपदे ने “मारुतसखा” या

“मारुतशक्ति” नामक विमान का सफलतापूर्वक निर्माण कर लिया था जो कि पूर्णतः वैदिक तकनीकी पर आधारित था। पुणे केसरी नामक समाचारपत्र के अनुसार श्री तलपदे ने सन् 1895 में एक दिन (दुर्भाग्य से से सही दिनांक की जानकारी नहीं है) बंबई वर्तमान (मुंबई) के चौपाटी समुद्रतट में उपस्थित कई जिज्ञासु व्यक्तियों , जिनमें भारतीय अनेक न्यायविद्/ राष्ट्रवादी सर्वसाधारण जन के साथ ही महादेव गोविंद रानाडे और बड़ौदा के महाराज सायाजी
राव गायकवाड़ जैसे विशिष्टजन सम्मिलित थे, के समक्ष अपने द्वारा निर्मित “चालकविहीन” विमान “मारुतशक्ति” के उड़ान का प्रदर्शन किया था। वहाँ उपस्थित समस्त जन यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि टेक ऑफ करने के बाद “मारुतशक्ति” आकाश में लगभग 1500 फुट की ऊँचाई पर चक्कर लगाने लगा था। कुछ देर आकाश में चक्कर लगाने के के पश्चात् वह विमान धरती पर गिर पड़ा था।
यहाँ पर यह बताना अनुचित नहीं होगा कि राइट बंधु ने जब पहली बार अपने हवाई जहाज को उड़ाया था तो वह आकाश में मात्र 120 फुट ऊँचाई तक ही जा पाया था जबकि श्री तलपदे का विमान 1500 फुट की ऊँचाई तक पहुँचा था। दुःख की बात तो यह है कि इस घटना के विषय में विश्व की समस्त प्रमुख वैज्ञानिको और
वैज्ञानिक संस्थाओं/संगठनों पूरी पूरी जानकारी होने के बावजूद भी आधुनिक हवाई जहाज के प्रथम निर्माण का श्रेय राईट बंधुओं को दिया जाना बदस्तूर जारी है और हमारे देश की सरकार ने कभी भी इस विषय में आवश्यक संशोधन करने/ करवाने के लिए कहीं आवाज नहीं उठाई (हम सदा सन्तोषी और आत्ममुग्ध लोग जो है!)। 
कहा तो यह भी जाता है कि संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित एवं वैज्ञानिक तलपदे जी की यह सफलता भारत के तत्कालीन ब्रिटिश शासकों को फूटी आँख भी नहीं सुहाई थी और उन्होंने बड़ोदा के महाराज श्री गायकवाड़, जो कि श्री तलपदे के
प्रयोगों के लिए आर्थिक सहायता किया करते थे, पर दबाव डालकर श्री तलपदे के प्रयोगों को अवरोधित कर दिया था। महाराज गायकवाड़ की सहायता बन्द हो जाने पर अपने प्रयोगों को जारी रखने के लिए श्री तलपदे एक प्रकार से कर्ज में डूब गए। इसी बीच दुर्भाग्य से उनकी विदुषी पत्नी, जो कि उनके प्रयोगों में उनकी सहायक होने के साथ ही साथ उनकी प्रेरणा भी थीं, का देहावसान हो गया और अन्ततः सन् 1916 या 1917 में श्री तलपदे का भी स्वर्गवास हो गया। बताया जाता है कि श्री तलपदे के स्वर्गवास हो जाने के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने कर्ज से मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से “मारुतशक्ति” के अवशेष को उसकी तकनीक सहित किसी विदेशी संस्थान को बेच दिया था।
श्री तलपदे का जन्म सन् 1864 में हुआ था। बाल्यकाल से ही उन्हें संस्कृत ग्रंथों, विशेषतः महर्षि भरद्वाज रचित “वैमानिक शास्त्र” (Aeronauti cal Science) में अत्यन्त रुचि
रही थी। वे संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। पश्चिम के एक प्रख्यात भारतविद्
स्टीफन नैप (Stephen-K napp) श्री तलपदे के प्रयोगों को अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं। एक अन्य विद्वान श्री रत्नाकर महाजन ने श्री तलपदे के प्रयोगों पर आधारित एक पुस्तिका भी लिखी हैं।श्री तलपदे का संस्कृत अध्ययन अत्यन्त ही विस्तृत था और उनके विमान सम्बन्धित प्रयोगों के आधार निम्न ग्रंथ थेः
महर्षि भरद्वाज रचित् वृहत् वैमानिक शास्त्र
आचार्य नारायण मुन रचित विमानचन्द् रिका
महर्षि शौनिक रचित विमान यन्त्र
महर्षि गर्ग मुनि रचित यन्त्र कल्प
आचार्य वाचस्पति रचित विमान बिन्दु
महर्षि ढुण्डिराज रचित विमान ज्ञानार्क प्रकाशिका
हमारे प्राचीन ग्रंथ ज्ञान के अथाह सागर हैं किन्तु वे ग्रंथ अब लुप्तप्राय -से हो गए हैं। यदि कुछ ग रंथ कहीं उपलब्ध भी हैं तो उनका किसी प्रकार का उपयोग ही नहीं रह गया है क्योंकि हमारी दूषित शिक्षानीति हमें अपने स्वयं की भाषा एवं संस्कृति को हेय तथा पाश्चात्य भाषा एवं संस्कृति को श्रेष्ठ समझना ही सिखाती है। 
वन्दे मातरम... जय हिंद... जय भारत.

Monday, 24 September 2012

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जनक (father of computer programing )

महर्षि पाणिनि के बारे में जाने

पाणिनि (५०० ई पू) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्य

ाकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है ।
एक शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा -

"मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके । इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है । .... अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके ।"

The M L B D News letter ( A monthly of indological
bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first softwear man without hardwear घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था " Sanskrit software for future hardware "
जिसमे बताया गया " प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, परआज भी दुनिया भर में कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।

व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।

NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs.ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs. द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी।
उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों डॉलर खर्च किये गये।

महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।

पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार

"पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है" (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।
"पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय-प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं" (कोल ब्रुक)।
"संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है... यह मानवीय मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है" (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।
"पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा"। (प्रो. मोनियर विलियम्स)

।। जयतु संस्‍कृतम् । जयतु भारतम् ।।
क़ुतुब मीनार का सच ........

1191A.D.में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया ,तराइन के मैदान में पृथ्वी राज चौहान के साथ युद्ध में
गौरी बुरी तरह पराजित हुआ, 1192 में गौरी ने दुबारा आक्रमण में पृथ्वीराज को हरा दिया ,कुतुबुद्दीन, गौरी का सेनापति था
1206 में गौरी ने कुतुबुद्दीन को अपना नायब नियुक्त किया और जब 1206 A.D,में मोहम्मद गौरी की मृत्यु हुई tab वह गद्दी पर बैठा
,अनेक विरोधियों को समाप्त करने में उसे लाहौर में ही दो वर्ष लग गए I
1210 A.D. लाहौर में पोलो खेलते हुए घोड़े से गिरकर उसकी मौत हो गयी
अब इतिहास के पन्नों में लिख दिया गया है कि कुतुबुद्दीन ने
क़ुतुब मीनार ,कुवैतुल इस्लाम मस्जिद और अजमेर में अढाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद भी बनवाई I
अब कुछ प्रश्न .......
अब कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार बनाई, लेकिन कब ?
क्या कुतुबुद्दीन ने अपने राज्य काल 1206 से 1210 मीनार का निर्माण करा सकता था ? जबकि पहले के दो वर्ष उसने लाहौर में विरोधियों को समाप्त करने में बिताये और 1210 में भी मरने
के पहले भी वह लाहौर में था ?......शायद नहीं I
कुछ ने लिखा कि इसे 1193AD में बनाना शुरू किया
यह भी कि कुतुबुद्दीन ने सिर्फ एक ही मंजिल बनायीं
उसके ऊपर तीन मंजिलें उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनाई और उसके ऊपर कि शेष मंजिलें बाद में बनी I
यदि 1193 में कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाना शुरू किया होता तो उसका नाम बादशाह गौरी के नाम पर "गौरी मीनार "या ऐसा ही कुछ होता
न कि सेनापति कुतुबुद्दीन के नाम पर क़ुतुब मीनार I
उसने लिखवाया कि उस परिसर में बने 27 मंदिरों को गिरा कर उनके मलबे से मीनार बनवाई ,अब क्या किसी भवन के मलबे से कोई क़ुतुब मीनार जैसा उत्कृष्ट कलापूर्ण भवन बनाया जा
सकता है जिसका हर पत्थर स्थानानुसार अलग अलग नाप का पूर्व निर्धारित होता है ?
कुछ लोगो ने लिखा कि नमाज़ समय अजान देने के लिए यह मीनार बनी पर क्या उतनी ऊंचाई से किसी कि आवाज़ निचे तक आ भी सकती है ?
उपरोक्त सभी बातें झूठ का पुलिंदा लगती है इनमें कुछ भी तर्क की कसौटी पर सच्चा नहीं lagta
सच तो यह है की जिस स्थान में क़ुतुब परिसर है वह मेहरौली कहा जाता है, मेहरौली वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था जो सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक , और
खगोलशास्त्री थे उन्होंने इस परिसर में मीनार यानि स्तम्भ के चारों ओर नक्षत्रों के अध्ययन
के लिए २७ कलापूर्ण परिपथों का निर्माण करवाया था I
इन परिपथों के स्तंभों पर सूक्ष्म कारीगरी के साथ देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी उकेरी गयीं थीं जो नष्ट किये जाने के बाद भी कहीं कहींदिख जाती हैं I
कुछ संस्कृत भाषा के अंश दीवारों और बीथिकाओं के स्तंभों पर उकेरे हुए मिल जायेंगे जो मिटाए गए होने के बावजूद पढ़े जा सकते हैं I
मीनार , चारों ओर के निर्माण का ही भाग लगता है ,अलग से बनवाया हुआ नहीं लगता,
इसमे मूल रूप में सात मंजिलें थीं सातवीं मंजिल पर " ब्रम्हा जी की हाथ में वेद लिए हुए "मूर्ति थी जो तोड़ डाली गयीं थी ,छठी मंजिल पर विष्णु जी की मूर्ति के साथ कुछ निर्माण थे
we भी हटा दिए गए होंगे ,अब केवल पाँच मंजिलें ही शेष है
इसका नाम विष्णु ध्वज /विष्णु स्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ प्रचलन में थे ,
इन सब का सबसे बड़ा प्रमाण उसी परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ है जिस पर खुदा हुआ ब्राम्ही भाषा का लेख जिसे झुठलाया नहीं जा सकता ,लिखा है की यह स्तम्भ जिसे गरुड़ ध्वज कहा गया है
,सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य (राज्य काल 380-414 ईसवीं) द्वारा स्थापित किया गया था और यह लौह स्तम्भ आज भी विज्ञानं के लिए आश्चर्य की बात है कि आज तक इसमें जंग नहीं लगा .उसी महानसम्राट के दरबार में महान गणितज्ञ आर्य भट्ट,खगोल शास्त्री एवं भवन निर्माण
विशेषज्ञ वराह मिहिर ,वैद्य राज ब्रम्हगुप्त आदि हुए
ऐसे राजा के राज्य काल को जिसमे लौह स्तम्भ स्थापित हुआ तो क्या जंगल में अकेला स्तम्भ बना होगा निश्चय ही आसपास अन्य निर्माण हुए होंगे जिसमे एक भगवन विष्णु का मंदिर था उसी मंदिर के पार्श्व में विशालस्तम्भ वि ष्णुध्वज जिसमे सत्ताईस झरोखे जो सत्ताईस नक्षत्रो व खगोलीय अध्ययन के लिए बनाए गए निश्चय ही वराह मिहिर के निर्देशन में बनाये गए
इस प्रकार कुतब मीनार के निर्माण का श्रेय सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य के राज्य कल में खगोल शाष्त्री वराहमिहिर को जाता है I
कुतुबुद्दीन ने सिर्फ इतना किया कि भगवान विष्णु के मंदिर को विध्वंस किया उसे कुवातुल इस्लाम मस्जिद कह दिया ,विष्णु ध्वज (स्तम्भ ) के हिन्दू संकेतों को छुपाकर उन पर
अरबी के शब्द लिखा दिए और क़ुतुब मीनार बन गया...
 
प्राचीन भारत में (वर्तमान पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित) चिकित्सा एवं सर्जरी प्रौद्योगिकी :

* प्लास्टिक सर्जरी की उत्पत्ति ?

कई लोग प्लास्टिक सर्जरी को अपेक्षाकृत एक नई विधा के रूप में मानते हैं। प्लास्टिक सर्जरी की उत्पत्ति की जड़ें भारत से सिंधु नदी सभ्यता से 4000 से अधिक साल से जुड़ी हैं।
इस सभ्यता से जुड़े श्लोकों(भजनों) को 3000 और 1000 ई॰पू॰ के बीच संस्कृत भाषा में वेदों के रूप में संकलित किया गया है, जो हिंदू धर्म की सबसे पुरानी पवित्र पुस्तकों में हैं। इस युग को भारतीय इतिहास में वैदिक काल (5000 साल ईसा पूर्व) के रूप में जाना जाता है, जिस अवधि के दौरान चारों वेदों, अर्थात् ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद को संकलित किया गया। सभी चारों वेद श्लोक(भजन), छंद, मंत्र के रूप में संस्कृत भाषा संकलित किए गए हैं। 'सुश्रुत संहिता' अथर्ववेद का एक हिस्सा माना जाता है। 

'सुश्रुत संहिता' (सुश्रुत संग्रह), जो भारतीय चिकित्सा में सर्जरी की प्राचीन परंपरा का वर्णन करता है, को भारतीय चिकित्सा साहित्य के सबसे शानदार रत्नों में से एक के रूप में माना जाता है। इस ग्रंथ में महान प्राचीन सर्जन 'सुश्रुत' की शिक्षाओं और अभ्यास का विस्तृत विवरण है, जो आज भी महत्वपूर्ण प्रासंगिक शल्य ज्ञान है। 

प्लास्टिक सर्जरी का मतलब है - "शरीर के किसी हिस्से को ठीक करना।" प्लास्टिक सर्जरी में प्लास्टिक का उपयोग नहीं होता है। सर्जरी के पहले जुड़ा प्लास्टिक ग्रीक शब्द- "प्लास्टिको" से आया है। ग्रीक में "प्लास्टिको" का अर्थ होता है बनाना या तैयार करना। प्लास्टिक सर्जरी में सर्जन शरीर के किसी हिस्से के उत्तकों को लेकर दूसरे हिस्से में जोड़ता है। भारत में सुश्रुत को पहला सर्जन (शल्य चिकित्सक) माना जाता है। आज से करीब 2500 साल पहले सुश्रुत युद्ध या प्राकृतिक विपदाओं में जिनकी नाक खराब हो जाती थी उन्हें ठीक करने का काम करते थे। 'सुश्रुत' प्राचीन भारत के प्रसिद्ध ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। आयुर्वेद की एक संहिता के सुश्रुतसंहिता के प्रणेता। ये ६ठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में पैदा हुए थे। इनको शल्य क्रिया का पितामह माना जाता है।"

* चिकित्सा एवं सर्जरी: 

प्राचीन भारत में ही ऑपरेशन की कला का प्रदर्शन किया गया। जटिल से जटिल ऑपरेशनों को किया गया। इन सभी ऑपरेशनों को एक आश्चर्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए क्यूंकी सर्जरी, प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति (आयुर्वेद) की आठ शाखाओं में से एक है। सर्जरी के क्षेत्र का सबसे प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता (सुश्रुत संग्रह) है। 

सुश्रुत जो काशी में रहते थे, कई भारतीय चिकित्सकों जैसे अत्रि और चरक में से एक थे। उन्होनें सबसे पहले मानव शरीर रचना विज्ञान (Human Anatomy) का अध्ययन किया था। सुश्रुत संहिता में, उन्होनें शरीर रचना विज्ञान के अध्ययन को एक मृत शरीर की सहायता से विस्तार के साथ वर्णित किया है। सुश्रुत को नासासंधान/राइनोंप्लासी (नाक की प्लास्टिक सर्जरी) और नेत्र विज्ञान (मोतियाबिंद के निष्कासन) में दक्षता प्राप्त थी। सुश्रुत ने सर्जरी (शल्य चिकित्सा) में आठ प्रकार की शल्य क्रियाएं का वर्णन किया है: छेद्य (छेदन हेतु), भेद्य (भेदन हेतु), लेख्य (अलग करने हेतु), वेध्य (शरीर में हानिकारक द्रव्य निकालने के लिए), ऐष्य (नाड़ी में घाव ढूंढने के लिए), अहार्य (हानिकारक उत्पत्तियों को निकालने के लिए), विश्रव्य (द्रव निकालने के लिए), सीव्य (घाव सिलने के लिए)। 

योग शारीरिक और मानसिक पोषण के लिए व्यायाम की एक प्रणाली है। योग का मूल पुरातनता और रहस्य में डूबा हुआ है। वैदिक काल के समय हजारों साल पहले योग के सिद्धांतों और अभ्यास का संघनन हुआ था लेकिन 200 ई॰पू॰ के आसपास योग की सभी बुनियादी बातों को 'पतंजलि' द्वारा अपने ग्रंथ "योगसूत्र" में एकत्र किया गया था। पतंजलि ने सर्वप्रथम अनुमान लगाया था कि योग के अभ्यास के माध्यम से शरीर और मन को एक स्वास्थ्यप्रद बनाया जा सकता है। आधुनिक चिकित्सकों का भी मानना है कि उच्च रक्तचाप, अवसाद, भूलने की बीमारी, अम्लता सहित कई बीमारियों को योग के द्वारा नियंत्रण इया जा सकता है। भौतिक चिकित्सा में भी योग के सिद्धांतों को सम्मान और स्वीकृति मिल रही है।

प्राचीन भारत की चिकित्सा व्यवस्था इतनी उन्नत थी की इंग्लैंड की 'रॉयल सोसाइटी ऑफ सर्जन' अपने इतिहास में लिखते हैं की "हमने सर्जरी भारत से सीखी है और उसके बाद पूरे यूरोप को हमने ये सर्जरी सिखायी है।" अंग्रेजों के आने से पहले के भारत के सर्जन या वैद्य कितने योग्य थे इसका अनुमान एक घटना से हो जाता है। सन १७८१ में कर्नल कूट ने हैदर अली पर आक्रमण किया और उससे हार गया। हैदर अली ने कर्नल कूट को मारने के बजाय उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया. भागते, भटकते कूट बेलगाँव नामक स्थान पर पहुंचा तो एक नाई सर्जन को उस पर दया आ गई। उसने कूट की नई नाक कुछ ही दिनों में बना दी। हैरान हुआ कर्नल कूट ब्रिटिश पार्लियामेंट में गया और उसने सबने अपनी नाक दिखा कर बताया कि मेरी कटी नाक किस प्रकार एक भारतीय सर्जन ने बनाई है। नाक कटने का कोई निशान तक नहीं बचा था। उस समय तक दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी की कोई जानकारी नहीं थी। तब इंग्लॅण्ड के चिकित्सक उसी भारतीय सर्जन के पास आये और उससे शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक सर्जरी सीखी। उसके बाद उन अंग्रेजों के द्वारा यूरोप में यह प्लास्टिक सर्जरी पहुंची। 

गर्व से कहो हम भारतीय हैं !
जय हिन्द, जय भारत !!
भास्कराचार्य (द्वितीय) प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी थे। इनके द्वारा रचित पुस्तक अंक गणित में सिद्धान्त शिरोमणि तथा लीलावती प्रसिद्ध है। ये अपने समय के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ थे। यह उज्जैन की बेधशाला के अध्यक्ष भी थे।
इनका जन्म में, विज्जडविड नामक गाँव में हुआ था जो आज कल कर्नाटक में है,वे देशष्ठ ब्रह्मिन परिवार में जन्मे थे उन्होंने गणित का ज्ञान अपने सन्त पिता से प्राप्त किया. बाद में ब्रह्मगुप्त की पुस्तकों सेऐसी प्रेरणा मिली कि सारा जीवन उन्होंने गणित के लिए समर्पित कर दिया.इन्होने नियुटन से बहुत पहले ही गुरुत्वाकर्षण के नियम के बारे में बता दिया था,इन्होने पाई का मूल्य भी ३.१४ बता दिया था ,इनकी लिखी हुयी सूर्य सिद्धांत और सिद्धांत शिरोमणि का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत में इनकी लिखी हुयी पुस्तकों से ही गणित पढ़ाया जाता था
भास्कराचार्य द्वितीय महान वैज्ञानिक होने के साथ साथ गणित तथा खगोल शास्त्र के प्रकांड पंडित तथा ज्ञाता थे। उनका जन्म जन्म बीजापुर नामक स्थान पर हुआ था जो आज कल कर्नाटक राज्य में स्थित है। में हुआ था। उनके पिताका नाम महेश्वराचार्य था तथा वे भी गणित के एक महान विद्वान थे।
भास्कराचार्य का कर्म क्षेत्र उज्जैन था जो आज कल मध्य प्रदेश नामक राज्य में स्थित है। वे प्रायः उज्जैन में ही रहा करते थे तथा यहीं रह कर उन्होंने सभी प्रकार के अध्ययन एवं शोध कार्य किए। उज्जैन स्थित ज्योतिषीय वेधशाला के प्रधान के रूप में वेकाफी लम्बे समय तक कार्य करते रहे। इसी स्थान पर रह कर उन्होंने कई ग्रन्थों की रचना की जो काफी लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध हुए।
चूँकि भास्कराचार्य के पिता महेश्वराचार्य एक उच्च कोटि के गणितज्ञ थे अतः उनके सम्पर्क में रहने के कारण भास्कराचार्य की अभिरूचि भी इस विषय के अध्ययनकी ओर जागृत हुई। उन्हें गणित कीशिक्षा मुख्य रूप से अपने पिता से ही प्राप्त हुई। धीरे-धीरे गणित का ज्ञान प्राप्त करने की दिशा में उनकी अभिरूचि काफी बढ़ती गई तथा इस विषय पर उन्होंने काफी अधिक अध्ययन एवं शोध कार्य किया। जब उनकी अवस्था मात्र बत्तीस वर्ष की थी तो उन्होंने अपने प्रथम ग्रन्थ की रचना की। उनकी इस कृति का नाम रखा गया ‘सिद्धान्त शिरोमणि’। उन्होंने इस ग्रन्थ की रचना चार खंडों में की थी। इन चार खण्डों के नाम हैं- पारी गणित, बीज गणित, गणिताध्याय तथा गोलाध्याय। पारी गणित नामक खंड में संख्या प्रणाली, शून्य, भिन्न, त्रैशशिकतथा क्षेत्रमिति इत्यादि विषयों पर प्रकाश डाला गया है। बीज गणित नामक खंड में धनात्मक तथा ऋणात्मक राशियों की चर्चा की गई है तथा इसमें बताया गया है कि धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों प्रकार की संख्याओं के वर्ग का मान धनात्मक ही होता है। इसी खंडमें किसी भी त्रिभुजाकार क्षेत्र के कर्ण की लम्बाई का अनुमान लगाने की विधि को काफी रोचक उदाहरणों के द्वारा बताया गया है। एक उदाहरण इस प्रकार है।एक स्तम्भ के आधार पर स्थित एक बिल के ठीक नौ हाथ ऊपर एक मोर बैठा हुआ है। उस मोर ने २७ हाथ कीदूरी पर एक साँप को उपर्युक्त बिल की ओर आते हुए देखा और तिरछी चाल से उसकी ओर झपटा। अब बताएँ कि मोर ने बिल से कितना दूर पर साँप को पकड़ा होगा?
इस खंड में बताया गया है कि दो ऋणात्मक संख्याओं के गुणनफल का मान धनात्मक होगा। यही बात भाग की क्रिया के लिए भी लागू होती है। अर्थात् किसी एक ऋणात्मक संख्या में किसी दूसरी ऋणात्मक संख्या से भाग देने पर भागफल का मान धनात्मक होगा। भास्कराचार्य ने बताया कि किसी धनात्मक संख्या में किसी ऋणात्मक संख्या से गुणा करने पर गुणनफल का मान ऋणात्मक होगा। इसी प्रकार किसी धनात्मक संख्यामें किसी ऋणात्मक संख्या से भाग देने पर भागफर का मान ऋणात्मक होगा। इसी खंड में बताया गया है कि किसी संख्या में शून्य से भागदेने पर भागफल का मान अनन्त होगा। उन्होंने किसी वृत्त की परिधि तथा उसके व्यास के बीच अनुपात (अर्थात् च) का मान ३.१४१६६ निकाला जो आधुनिक गणितज्ञों द्वारा निर्धारित मान के काफी निकट है।
सिद्धान्त शिरोमणि के गणिताध्याय नामक खंड में ग्रहोंके बीच सापेक्षिक गति तथा ग्रहों की निरपेक्ष गति की चर्चा के साथ-साथ काल, दिशा तथा स्थान सम्बन्धी समस्याओं के समाधान पर प्रकाश डाला गया है। इसके अलावा सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण इत्यादि विषयों की चर्चा की गई है। सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय नामक खंड में विभिन्नग्रहों की गति तथा ज्योतिष सम्बन्धी यन्त्रों की कार्य प्रणाली पर पर प्रकाश डाला गया है। इसी अध्याय में उन यन्त्रों का विवरण दिया गया है जिनके द्वारा भास्कराचार्य ने अनेक प्रकार के खगोलीय पर्यवेक्षण किए थे तथा खगोल विज्ञान सम्बन्धी नियमों का प्रतिपादन किया था।
भास्कराचार्य द्वारा एक अन्य प्रमुख ग्रन्थ की रचना की गई थी जिसका नाम था ‘सूर्य सिद्धान्त’।इस ग्रन्थ में बताया गया है कि हमारी पृथ्वी गोल आकृति की है औरयह सूर्य के चारों ओर एक निश्चितकक्षा में अनवरत परिक्रमा करती रहती है। सूर्य, ग्रह तथा अन्य सभी खगोलीय पिण्ड एक दूसरे को आकर्षित करते रहते हैं तथा इसी आकर्षण बल के सहारे सभी खगोलीय पिण्ड टिके हुए हैं।
भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा एक अन्य प्रमुख ग्रन्थ की रचना की गई जिसका नाम है ‘लीलावती’। इसग्रन्थ में गणित और खगोल विज्ञान सम्बन्धी विषयों पर प्रकाश डाला गया था। उन्होंने ‘करण कुतूहल’ नामक ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ में भी मुख्यतः खगोल विज्ञान सम्बन्धी विषयों की चर्चा की गई है। इस ग्रन्थ में बताया गया है कि जब चन्द्रमा सूर्य को ढक लेता है तोसूर्य ग्रहण तथा जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा को ढक लेती है तो चन्द्र ग्रहण होता है।
भास्कराचार्य द्वारा लिखित ग्रन्थों का अनुवाद अनेक विदेशीभाषाओं में किया जा चुका है।ॐॐ
जय श्री राम कृष्ण परशुराम