Monday, 24 September 2012

भास्कराचार्य (द्वितीय) प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी थे। इनके द्वारा रचित पुस्तक अंक गणित में सिद्धान्त शिरोमणि तथा लीलावती प्रसिद्ध है। ये अपने समय के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ थे। यह उज्जैन की बेधशाला के अध्यक्ष भी थे।
इनका जन्म में, विज्जडविड नामक गाँव में हुआ था जो आज कल कर्नाटक में है,वे देशष्ठ ब्रह्मिन परिवार में जन्मे थे उन्होंने गणित का ज्ञान अपने सन्त पिता से प्राप्त किया. बाद में ब्रह्मगुप्त की पुस्तकों सेऐसी प्रेरणा मिली कि सारा जीवन उन्होंने गणित के लिए समर्पित कर दिया.इन्होने नियुटन से बहुत पहले ही गुरुत्वाकर्षण के नियम के बारे में बता दिया था,इन्होने पाई का मूल्य भी ३.१४ बता दिया था ,इनकी लिखी हुयी सूर्य सिद्धांत और सिद्धांत शिरोमणि का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत में इनकी लिखी हुयी पुस्तकों से ही गणित पढ़ाया जाता था
भास्कराचार्य द्वितीय महान वैज्ञानिक होने के साथ साथ गणित तथा खगोल शास्त्र के प्रकांड पंडित तथा ज्ञाता थे। उनका जन्म जन्म बीजापुर नामक स्थान पर हुआ था जो आज कल कर्नाटक राज्य में स्थित है। में हुआ था। उनके पिताका नाम महेश्वराचार्य था तथा वे भी गणित के एक महान विद्वान थे।
भास्कराचार्य का कर्म क्षेत्र उज्जैन था जो आज कल मध्य प्रदेश नामक राज्य में स्थित है। वे प्रायः उज्जैन में ही रहा करते थे तथा यहीं रह कर उन्होंने सभी प्रकार के अध्ययन एवं शोध कार्य किए। उज्जैन स्थित ज्योतिषीय वेधशाला के प्रधान के रूप में वेकाफी लम्बे समय तक कार्य करते रहे। इसी स्थान पर रह कर उन्होंने कई ग्रन्थों की रचना की जो काफी लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध हुए।
चूँकि भास्कराचार्य के पिता महेश्वराचार्य एक उच्च कोटि के गणितज्ञ थे अतः उनके सम्पर्क में रहने के कारण भास्कराचार्य की अभिरूचि भी इस विषय के अध्ययनकी ओर जागृत हुई। उन्हें गणित कीशिक्षा मुख्य रूप से अपने पिता से ही प्राप्त हुई। धीरे-धीरे गणित का ज्ञान प्राप्त करने की दिशा में उनकी अभिरूचि काफी बढ़ती गई तथा इस विषय पर उन्होंने काफी अधिक अध्ययन एवं शोध कार्य किया। जब उनकी अवस्था मात्र बत्तीस वर्ष की थी तो उन्होंने अपने प्रथम ग्रन्थ की रचना की। उनकी इस कृति का नाम रखा गया ‘सिद्धान्त शिरोमणि’। उन्होंने इस ग्रन्थ की रचना चार खंडों में की थी। इन चार खण्डों के नाम हैं- पारी गणित, बीज गणित, गणिताध्याय तथा गोलाध्याय। पारी गणित नामक खंड में संख्या प्रणाली, शून्य, भिन्न, त्रैशशिकतथा क्षेत्रमिति इत्यादि विषयों पर प्रकाश डाला गया है। बीज गणित नामक खंड में धनात्मक तथा ऋणात्मक राशियों की चर्चा की गई है तथा इसमें बताया गया है कि धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों प्रकार की संख्याओं के वर्ग का मान धनात्मक ही होता है। इसी खंडमें किसी भी त्रिभुजाकार क्षेत्र के कर्ण की लम्बाई का अनुमान लगाने की विधि को काफी रोचक उदाहरणों के द्वारा बताया गया है। एक उदाहरण इस प्रकार है।एक स्तम्भ के आधार पर स्थित एक बिल के ठीक नौ हाथ ऊपर एक मोर बैठा हुआ है। उस मोर ने २७ हाथ कीदूरी पर एक साँप को उपर्युक्त बिल की ओर आते हुए देखा और तिरछी चाल से उसकी ओर झपटा। अब बताएँ कि मोर ने बिल से कितना दूर पर साँप को पकड़ा होगा?
इस खंड में बताया गया है कि दो ऋणात्मक संख्याओं के गुणनफल का मान धनात्मक होगा। यही बात भाग की क्रिया के लिए भी लागू होती है। अर्थात् किसी एक ऋणात्मक संख्या में किसी दूसरी ऋणात्मक संख्या से भाग देने पर भागफल का मान धनात्मक होगा। भास्कराचार्य ने बताया कि किसी धनात्मक संख्या में किसी ऋणात्मक संख्या से गुणा करने पर गुणनफल का मान ऋणात्मक होगा। इसी प्रकार किसी धनात्मक संख्यामें किसी ऋणात्मक संख्या से भाग देने पर भागफर का मान ऋणात्मक होगा। इसी खंड में बताया गया है कि किसी संख्या में शून्य से भागदेने पर भागफल का मान अनन्त होगा। उन्होंने किसी वृत्त की परिधि तथा उसके व्यास के बीच अनुपात (अर्थात् च) का मान ३.१४१६६ निकाला जो आधुनिक गणितज्ञों द्वारा निर्धारित मान के काफी निकट है।
सिद्धान्त शिरोमणि के गणिताध्याय नामक खंड में ग्रहोंके बीच सापेक्षिक गति तथा ग्रहों की निरपेक्ष गति की चर्चा के साथ-साथ काल, दिशा तथा स्थान सम्बन्धी समस्याओं के समाधान पर प्रकाश डाला गया है। इसके अलावा सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण इत्यादि विषयों की चर्चा की गई है। सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय नामक खंड में विभिन्नग्रहों की गति तथा ज्योतिष सम्बन्धी यन्त्रों की कार्य प्रणाली पर पर प्रकाश डाला गया है। इसी अध्याय में उन यन्त्रों का विवरण दिया गया है जिनके द्वारा भास्कराचार्य ने अनेक प्रकार के खगोलीय पर्यवेक्षण किए थे तथा खगोल विज्ञान सम्बन्धी नियमों का प्रतिपादन किया था।
भास्कराचार्य द्वारा एक अन्य प्रमुख ग्रन्थ की रचना की गई थी जिसका नाम था ‘सूर्य सिद्धान्त’।इस ग्रन्थ में बताया गया है कि हमारी पृथ्वी गोल आकृति की है औरयह सूर्य के चारों ओर एक निश्चितकक्षा में अनवरत परिक्रमा करती रहती है। सूर्य, ग्रह तथा अन्य सभी खगोलीय पिण्ड एक दूसरे को आकर्षित करते रहते हैं तथा इसी आकर्षण बल के सहारे सभी खगोलीय पिण्ड टिके हुए हैं।
भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा एक अन्य प्रमुख ग्रन्थ की रचना की गई जिसका नाम है ‘लीलावती’। इसग्रन्थ में गणित और खगोल विज्ञान सम्बन्धी विषयों पर प्रकाश डाला गया था। उन्होंने ‘करण कुतूहल’ नामक ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ में भी मुख्यतः खगोल विज्ञान सम्बन्धी विषयों की चर्चा की गई है। इस ग्रन्थ में बताया गया है कि जब चन्द्रमा सूर्य को ढक लेता है तोसूर्य ग्रहण तथा जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा को ढक लेती है तो चन्द्र ग्रहण होता है।
भास्कराचार्य द्वारा लिखित ग्रन्थों का अनुवाद अनेक विदेशीभाषाओं में किया जा चुका है।ॐॐ
जय श्री राम कृष्ण परशुराम
 

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