Monday, 25 November 2013

महापुरुषों के इस्लाम के बारे में विचार ।

विनायक दामोदर सावरकर (२८.५.१८८३-२६.२.१९६६) जी के विचार मुल्लों के बारे में


१. मजहवी धारणा-''सामान्यतः मुसलमान अभी अत्यधिक धार्मिकता और राज्य की मजहबी धारणा के ऐतिहासिक चरण से नहीं उबर पाये हैं। उनकी मजहबी राजनीति मानव-जाति को दो भागों में विभाजित करती है-'मुस्लिम भूमि' और 'शत्रु भूमि' ! वे सभी देश, जिनमें या तोपूर्ण रूप से मुसलमान ही निवास करते हैं अथवा जहाँ मुसलमानों का शासन है, 'मुस्लिम देश' हैं और अन्य देश 'शत्रु देश'।'' (सावरकर एण्ड हिज टाइम, पृ. २३०)

२. मुस्लिम धर्मान्धता-''पारसी-ईसाई आदि भारत के लिए कोई समस्या नहीं है। जब हम स्वतन्त्र हो जायें तब इन्हें बड़ी सरलता से हिन्दी नागरिक की श्रेणी में लाया जा सकेगा। किन्तु ुसलमानों के बारे में बात दूसरी है। जब कभी इंग्लैण्ड भारत से अपनी सत्ता हटा लेगा तब भारतीय राज्य के प्रति देश के मुसलमान भयप्रद सिद्ध हो सकते हैं। हिन्दुस्थान में मुस्लिम राज्य की स्थापना करने की अपनी धर्मान्ध योजना को अपने मन-मस्तिष्क में संजोय रखने की मुस्लिम जगत की नीति आज भी बनी हुई है।' (३० दिसम्बर १९३९ को हिन्दू महासभा का अध्यक्षीय भाषण)

३. ''मुसलमानों में जात-पांत या क्षेत्रीयता का भाव नहीं है, यह कहना सर्वथा भ्रामक है। दुर्रानी मुसलमान व मुगल मुसलमान, दक्खिनी मुसलमान व उत्तरी मुसलमान, शेख मुसलमान व सैयद मुसलमानों के झगड़े का लाभ उठाकर ही मराठों ने मुगलों का तखता पलटा। शिया और सुन्नी दंगे वैष्णव व शैवों के दंगों से हजार गुणा ज्यादा भयंकर है- और बार-बार होते रहते हैं।
काबुलमें सुन्नी मुसलमानों ने अहमदिया मुसलमानों को पत्थरों से मार डाला। बहाई मुसलमान तो अन्य सभी मुसलमानों को इस दुनियां में फांसी और नर्क के योग्य समझते हैं। अस्पृश्यता भी उनमें कम नहीं हैं। भंगी मुसलमान को पानी भी न छूने देने वाली व मस्जिद में नमाज़ के लिए न जाने देने की घटनायें होती ही रहती हैं।'' (मौलाना शौकतअली को लिखे पत्र तीसरा खंड, सावरकर समग्र वांड्‌., पृ. ७५८)

४. मुस्लिम मनोवृत्ति- पिछले पचास वर्षों में, मुसलमानों को प्रसन्न कर व उन्हें एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र में सम्मिलित करके कम से कम इस हेतु प्रेरित करने के लिए कि सर्वप्रथम वे भारतीय हैं व फिर मुसलमान हैं, कांग्रेस के प्रयासों का बुरी तरह असफल होने का क्या कारण था ? ऐसा नहीं है कि मुसलमान एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र नहीं बनाना चाहते किन्तु एकता, राष्ट्रीय एकता की कल्पना उसके प्रादेशिक एकता पर आधारित नही है। इस विषय पर किसी मुसलमान ने यदि स्पष्ट एवं बोधगम्य रूप से अपना मानस व्यक्त किया है तो वह मोपला आन्दोलन के नेता अली मुसलियार ने हजारों हिन्दू महिलाओं, पुरुषों, बच्चों को धर्मान्तरित करने अथवा तलवार के बल पर समाप्त करने के अति दुष्ट अभियानके समर्थन में उसने घोषित किया कि भारत को एक संयुक्त राष्ट्र होना ही चाहिए और हिन्दू मुसलमान की शाश्वत एकता स्थापित करने का केवल एक ही मार्ग हैं और वह है सारे हिन्दुओं का मुसलमान बन जाना।'' (नागपुर में हिन्दू महासभा में अध्यक्षीय भाषण)

५. मुसलमान-मुसलमान, भारतीय कभी नहीं-मुसलमान, मुसलमान प्रथम और अंतिम रूप से मुसलमान रहे, भारतीय कभी नहीं। वे तब तक तटस्थ रहे जब तक कि दिगम्रमित हिन्दुओं ने अंग्रेजी राज से सभी भारतीय के लिए राजनैतिक अधिकार प्राप्त करने का संघर्ष जारी रखा और लाखों की संखया में जेल गये, हजासरों की संखया में अण्डमान गये, सैकड़ों की संखया में फाँसी पर झूल गये और जैसे ही एक ओर कांग्रेसी हिन्दुओं द्वारा चलाये जा रहे निःशस्त्र आन्दोलन एवं दूसरी ओर कांग्रेस से बाहर सशस्त्र हिन्दू क्रान्तिकारियों द्वारा अधिक भयावह एवं प्रवासी जीवन-मृत्यु का संघर्ष चलाये जाने से अंग्रेजी शासन पर पर्याप्त रूप से प्रभाव पड़ा और उन्हें भारतीय को महत्वपूर्ण राजनैतिक शक्ति देने को विवश होना पड़ा, तुरन्त ही मुसलमान चाहरदीवारी से कहने लगे कि वे भी भारतीय हैं, उन्हें भी अपना अधिकार मिलना चाहिए। अंततोगत्वा बातयहाँ तक पहुँची कि भारतवर्ष को 'मुस्लिम भारत' व 'हिन्दू भारत' में विभाजित करने का प्रस्ताव ज़ोरशोर से रखा गया और इस हेतु मुस्लिम लीग जैसी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ने मुस्लिम राष्ट्रों के साथ हिन्दुओं के विरुद्ध मित्रता करने की तत्परता बताई।'' (नागपुर में हिन्दु महासभा में अध्यक्षीय भाषण)

६. वन्द्रमातरम्‌ का विरोध-''मुस्लिम लीग 'वन्देमातरम्‌' को इस्लाम विरोधी घोषित कर चुकी है। राष्ट्रवादी कहे जाने वाले कांग्रेसी मुस्लिम नेता भी 'वन्देमातरम्‌' गाने से इनकार कर अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचय दे चुके हैं। हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित व दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वन्देमातरम्‌ का विरोध कर रहे हैं। कल 'हिन्दुस्थान' या 'भारत' नामों पर एतराज़ करेंगे-इन्हें इस्लाम विरोधी करार देंगे। हिन्दी की जगह उर्दू को राष्ट्रभाषा व देवनागरी की जगह अरबी लिपि का आग्रह करेंगे। उनका एकमात्र उद्‌देश्य ही भारत को 'दारूल इस्लाम' बनाना है। तुष्टीकरण की नीति उनकी भूख और बढ़ाती जायेगी जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना होगा।'' (अहमदाबाद का हिन्दू महासभा का अध्यक्षीय भाषण)

७.हिन्दू का सैनिकीकरण-''जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण नहीं किया जायेगा, तब तक भारत की स्वाधीनता, उसकी सीमायें, उसकी सभ्यता व संस्कृति कदापि सुरक्षित नहीं रह सकेगी। मेरी तो हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा है, यही आदेश है कि वे अधिकाधिक संखया में सेना में भर्ती होकर सैन्य-विद्या का ज्ञान प्राप्त करें, जिससे समय पड़ने पर वे अपने देश का स्वाधीनता की रक्षा में योग दे सकें।'' (१९५५ में जोधपुर में सम्पन्न हिन्दू महासभा अधिवेशन में भाषण)

८. हिन्दुस्थान नाम का विरोध-''हर एक देश का नाम उसके राष्ट्रीय बहुमत वाले नाम से ही पुकारा जाना चाहिए। क्या कभी बलूचिस्तान, वजीरिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्किस्थान आदि नामों पर भी आपत्ति की गयी, जबकि इन देशों में गैर-मुस्लिम अल्पमत बस रहा है ? फिर हिन्दुस्थान या हिन्दू राज्य का नाम लेते ही इनकी साँस क्यों उखड़ने लगती है-जैसे कि उन्हें साँप ने ही काट खाया हो ?'' (विनायक दामोदर सावरकर, पृ. २२२)


सरदार वल्लभ भाई पटेल (३०.१.१८७५-१५.१२.१९५०) जी के विचार मुल्लों के बारे में

१. मुसलमान अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन लाऐं    ''भारत का नया नाष्ट्र किसी भी प्रकार की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सहन नहीं करेगा। यदि फिर वही मार्ग अपनाया जाना है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ, तो जो लोग पुनः विभाजन करना चाहते हैं और फूट के बीज बोना चाहते हैं उनके लिए यहाँ कोई स्थान नहीं होगा, कोई कोना नहीं होगा।........... किन्तु मैं अब देखता हूँ कि उन्हीं युक्तियों को फिर अपनाया जा रहा है जो उस समय अपनायी गयीं थीं जब देश में पृथक्‌ निर्वाचन-मण्डलों की पद्धति लागू की गयी थी। मुस्लिम लीग के वक्ताओं की वाणी में प्रचुर मिठास होने पर भी अपनाये गये उपाय में विषय की भरपूर मात्रा है। सबसे बाद के वक्ता (श्री नजीरुद्‌दीन अहमद) ने कहा है-''यदि हम छोटे भाई का संशोधन स्वीकार नहीं करेंगे तो हम उसके प्यार को गँवा देंगे।'' मैं उसका प्यार गँवाने के लिए तैयार हूँ, अन्यथा बड़े भाई की मृत्यु हो सकती है। आपको अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए, स्वयं को बदली हुई परिस्थितियों के अनुकूल ढालना चाहिए। यह बहाना बनाने से काम नहीं चलेगा कि ''हमारा तो आपसे घना प्यार है।'' हमने आपका प्यार देख लिया है। अब इसकी चर्चा छोड़िए।''

२. हम देश का पुनः विभाजन नहीं चाहते-''आइए, हम वास्तविकताओं का सामना करें। प्रश्न यह है कि आप वास्तव में हमसे सहयोग करना चाहते हैं या तोड़-फोड़ की चालें चलना चाहते हैं। मैं आपसे हृदय-परिवर्तन का अनुरोध करता हूँ। कोरी बातों से काम नहीं चलेगा; उससे कोई लाभ नहीं होगा। आप अपनी प्रवृत्ति पर फिर से विचार करें। यदि आप सोचते हैं कि उससे आपको लाभ होगा तो आप भूल कर रहे हैं....... मेरा आपसे अनुराो है कि बीती को बिसार दें, आगे की सुध लें। आपको मनचाही वस्तु मिल गयी है। और स्मरण रखिए, कि आप ही लोग पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं, पाकिस्तान के वासी नहीं। आप लोग आन्दोलन के अगुआ थे। अब आप क्या चाहते हैं ? हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो।'' (संविधान-सभा में भाषण, दि. २८.८.१९४७)

गुरु नानक देव (१४६९-१५३९) जी के विचार मुल्लों के बारे में


हिन्दुओं को यातनाएं दी गई -''सैय्यद, शेख, मुगल, पठान आदि सभी बहुत निर्देयी हो गए थे और वे हिन्दुओं को भीषण यातनाएं दे रहे थे। उन्होंने हिन्दुओं को गिद्ध आदि मांसभक्षी पक्षिणें के आगे डाल दिया। अनेकों (हिन्दुओं) को उनके शरीरों में कीलें ठोंकर मार डाला गया। अन्य अनेकों को कुत्तों से नुचवाकर मरवा दिया गया। जिन्होंने इस्लाम में धर्मान्तरित होना स्वीकार नहीं किया, उन्हें अन्य अनेकों प्रकार से यातनाएं दी गईं। यज्ञ और हवन करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया और जिन्होंने इस आज्ञा का उललंघन किया उन्हें क्षमा मांगनी पड़ी। हिन्दुओं की सुन्दर स्त्रियों का अपहरण किया गया और उन्हें जबरदस्ती मुसलमानों के घरों में रखा गया। न्यायाधीशों ने रिश्वत लेकर अपने निर्णयों द्वारा सच को झूठ में बदल दिया।''

(नानक प्रकाश तथा प्रेमनाथ जोशी की पुस्तक 'पैन इस्लामिज्म रौलिंग बैक' के पृ. ८० से)

 लाला लाजपतराय (२८.१.१८६५)-१७.११.१९२८) जी के विचार मुल्लों के बारे में

क्या कोई मुस्लिम नेता कुरान और हिदीस के विपरीत जा सकता है ?

''एक बात और है, जो मुझे बहुत दिनों से कष्ट दे रही है, जिसे मैं चाहता हूँ कि आप बहुत ध्यान से सोचें और वह है हिन्दू-मुस्लिम एकता। पिछले ६ महीनों में मैंने अपना अधिकांश समय मुस्लिम इतिहास और मुस्लिम कानून को पढ़ने में लगाया है और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यह न तो सम्भव है और न ही व्यावहारिक है। असहयोग आन्दोलन में मुस्लिम नेताओं की ईमानदारी व निष्ठा को मानते हुए और उसे स्वीकारते हुए, मैं समझता हूं कि उनका धर्म उनके मार्ग में एक किस्म से रुकावट डालता है।

आपको याद होगा हकीम अजमल खां और डॉ. किचलू से उस विषय मेंजो मेरी बातचीत हुई थी, उसकी रिपोर्ट मैंने आपको कलकत्ता में दी थी। हकीम साहेब से बेहतर कोई मुसलमान हिन्दुस्तान में नहीं हे। परन्तु क्या कोई अन्य मुस्लिम नेता कुरान के विपरीत जा सकता है ? मैं तो केवल यही सोचता हूँ कि इस्लामिक कानून के बारे में मेरा ज्ञान सही नहीं है और ऐसा ही सोचकर मुझे राहत मिलती है। परन्तु यदि यह सही हे, तो यह बात साफ़ है कि हम अंग्रेजों के विरुद्ध एक हो सकते हैं, परन्तु ब्रिटिश रूपरेखा के अनुसार हिन्दुस्तान पर शासन चलाने के लिए एक नहीं हो सकते। जम जनतांत्रिक आधार पर हिन्दुस्तान पर शासन चलाने के लिए एक नहीं हो सकते।

फिर उपाय क्या है ?उ मुझे हिन्दुस्तन के सात करोड़ हिन्दुओं का डर नहीं है, परन्तु मैं सोचता हूँ कि हिन्दुस्तान के सात करोड़ मुसलमान और अफ़गानिस्तान,, मध्य एशिया, अरब, मिसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगे। मैं ईमानदारी से हिन्दू-मुस्लिम एकता की आवश्यकता और वांछनीयता में विश्वास करता हूँ। में मुस्लिम नेताओं पर भी पूरी तरह से विश्वास करने को तैयार हूँ, परन्तु कुरान और हदीस की निषेधाज्ञा के बारे में क्या कहें ? ये नेता उनका उल्लंघन नहीं कर सकते। तो क्या हम बर्बाद हो जाएंगे ? मैं ऐसी बात नहीं सोचता। मैं आशा करता हूँ कि सुशिक्षित और बुद्धिमान इस कठिनाई से बच निकलने का कुछ उपाय ढूंढेंगे।''

(सी. आर. दास को लिखे पत्र से, जा बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूण्र वाड्‌मय, खंड १५, के पृ. २७५ पर उद्धृत 

समर्थ गुरू रामदास (१६०८-१६८०) जी के विचार मुल्लों के बारे में

शिवजी महाराज के गुरू प्रसिद्ध संत समर्थ रामदास ने हिन्दुओं की स्थिति जो उन्होंने १६३२-४४ में देखी उसे उन्होंने अपने ग्रन्थ 'दास बोध' में इस प्रकार व्यक्त किया :


(१) ''ऊँची और नीची सभी जातियों की अगणित हिन्दू स्त्रियों को यातनाएं दी गईं और उनका बलात्कार किया गया। अनेकों बंदी बनाई गईं और उन्हें दूर देशों में बेचा गया। अनेक सुन्दर स्त्रियों ने यातनाओं से दुखी होकर आत्महत्या कर ली है।


(२) 'लोगों की धन-सम्पत्ति जब्त कर ली गई है। भय के कारण से अनंकों ने अपने घर बार छोड़ दिए और इस प्रक्रिया में अनेकों मर गए। लोगों को कपड़ा और भाजन प्राप्त नहीं है।''


(३) ''अनेक लोग दुष्कर्मों में ढ़केल दिए गए हैं जबकि अनेक बलात्‌ स्लाम में धर्मान्तरित कर दिए गए हैं। अगणित बच्चे चीख-चीखकर रो रहे हैं क्योंकि उनके माँ-बापों की हत्या कर दी गई या उन्हें बंदी बना कर दूर ले जाया गया है।''


(४) ''अनेकों ने विष खाकर अपना जीवन समाप्त कर लिया। अनेकों ने पानी में डूबकर जान दे दी तथा अनेक जला दिए गए या जिन्दा गाढ़दिए गए।''


(५) ''लोग गहनतम हताशा में डूबे हुए हैं। सभी लोग दयनीय हो गए हैं। उन्हें किसी भी क्षण शान्ति नहीं है।''


(६) ''लोग गहनतम हताशा में डूबे हुए हैं। सभी लोग दयनीय हो गए हैं। उन्हें किसी भी क्षण शान्ति नहीं है।''


(७) ''जब वे भोजन करने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं, यकायक रोने व चीखने की आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं और इन हमले में किसी की पत्नी की बलात्‌ अपहरण हो जाता है, किसी का सामान छीना, झपटा या लूट लिया जाता है।''


(८) ''आक्रमणकारी मुसलमान पशुवत्‌ निर्दयी होते हैं। वे सर्वत्र बहुतायत में हैं। वे पिछले सैकड़ों वर्षों से अपने घृणित कार्य करते चले आ रहे हैं। इसलिए हे राजन्‌ ! (शिवाजी महाराज) सावधान रहना।''


(डॉ. एस. डी. कुलकर्णी कृत 'एंकाटर विद इस्लाम, पृत्र २६७-२६८ से)


स्वामी विवेकानन्द (९.१.१८६२-४.७.१९०२) जी के विचार मुल्लों की बारे में

(समस्त उद्धरण अंग्रेजी के सम्पूर्ण विवेकानन्द वाडऋमय के हिन्दी अनुवाद से हैं, खंड एवं पृष्ठानुसार)
१. मुहम्मद की शिक्षाओं के कारण लाखों मारे गए-''यदि तुम कुरान को पढ़ो तो तुम्हें वहाँ सबसे आश्चर्यपूर्ण सत्य और अंधविश्वास मिलेजुले मिलेंगे। तुम इनकी व्याखया कैसे करोगे ? निःसन्देह वह पुरुष (पैगम्बर मुहम्मद) अन्तःप्रेरित था। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वह अन्तःप्ररेणा मानों उस पर थोपी गई हो। वह कोई एक प्रशिक्षित योगी नहीं था और वह जो कुछ कर रहा था वह उस सबका कारण भी नहीं जानता था। सोचो उस भलाई को जो मुहम्मद ने विश्व के लिए की और उस महान बुराई को भी सोचो जो कि उसकी हठधर्मिता के कारण की गईंज़रा सोचो कि उसकी शिक्षाओं के कारण लाखों मनुष्यों की सामूहिक हत्यायें हुई, मांओं को अपने बच्चों को मौत के कारण खोना पड़ा, बच्चे अनाथ बनाए गए, अनेक देश सम्पूर्ण नष्ट कर दिए गए, लाखों ही लाखों लोगों की हत्या की गई'' (१ : १८४)


२. मुसलमानों के कर्मकाण्ड-''प्रत्येक मुसलमान जो यह सोचता है कि एक गैर-मुसलमान का प्रत्येक कर्मकाण्ड, प्रत्येक आराध्य स्वरूप, प्रत्येक मूर्ति एवं प्रतयेक धार्मिक अनुष्ठान पापपूर्ण है, मगर वह ऐसा नहीं सोचता जब वह अपने ही धर्मस्थल काबा पर आता हैं इस सन्दर्भ में हर एक धार्मिक मुसलमान को, वह जहाँ कहीं भी उपासना करें उसे यह सोचना आवश्यक है कि वह काबा के सामने खड़ा है (इसीलिए विश्व के सारे मुसलमान मक्का की ओर मुंह करके नमाज पढ़ते हैं, अनु.)। जब वह वहाँ की यात्रा करें तो उसे धर्मस्थल की दीवार में लगे 'संगे-अस्वद (काले पत्थर) को चूमना चाहिए। मुसलमानों का विश्वास है कि वे सभी चुम्बनों के निशान जो कि लाखों-ही-लाखों मुसलमानों ने उस पवित्र पत्थर पर किए वे 'आखिरात' यानी 'न्याय के दिन' पर उस धार्मिक व्यक्ति के कल्याण के लिए उठ खड़े होंगे। इसके अलावा वहाँ एक ज़िमज़िम का कुआं है।मुसलमानों का विश्वास है कि जो कोई थोड़ा भी पानी उस कुएं से निकालेगा उसके सभी पाप क्षमा कर दिए जाएंगे और 'कियामत' के दिन के बाद उसे एक नया शरीर मिलेगा तथा वह सदैव रहेगा।'' (२ : ३९)


३. गैर-मुसलमानों को जान से मारो-''मुहम्मदीय मत यानी इस्लाम अपने अनुयायी मुसलमानों को उन सभी लोगों को जान से मारने की अनुमति देता है जो कि उनके मत के नहीं है यानी गैर-मुसलमान हैं। कुरान में यह साफ लिखा हैं कि 'गैर-मुसलमानों की हत्या करो यदि वे मुसलमान नहीं बन जाते हैं।'' उनको आगे में जला देना और तलवार के घाट उतार देना चाहिए।'' (२ : ३३५)


४. गैर-मुसलमानो की हत्या करना जन्नत जाने का सबसे पक्का तरीका-''कोई आदमी जितना अधिक स्वार्थी होता है वह उतना ही अधिक अनैतिक होता हैं इसी प्रकार जो जाति केवल अपने ही स्वार्थ में लिप्त रहती है, वह सारे विश्व में सबसे अधिक निर्दयी और सबसे अधिक अत्याचारी पाई गई है। ऐसा कोई रिलीजन नहीं हुआ है जो इस उपरोक्त द्वेषवाद से अधिक चिपका हुआ हो जितना कि अरेबिया के पैगम्बर (मुहम्मद) द्वारा स्थापित रिलीजन 'इस्लाम' और अन्य कोई रिलीजन ऐसा नहीं हुआ है जिसने इतना खून बहाया ो औरजो अन्य लोगों के प्रति इतना अत्याचारी रहा हो। कुरान में एक उपदेश है जो कि मनुष्य इन शिक्षओं को नहीं मानता है, उसे मार देना चाहिएं उसे मारना एक दयालुता हैं इस्लाम में स्वर्ग (जन्नत), जहाँ कि अत्यन्त सुन्दर 'हूरें' और अन्य सभी प्रकार के इन्द्रिय सुखों एवं आमोद-प्रमोद के साधन हैं, को पाने का सबसे पक्का तरीका गैर-मुसलमानों को मार देने के द्वारा है। ज़रा इस रक्तपात के बारे में सोचो जो कि इस प्रकार के विश्वासों के परिणामस्वरूप हुए हैं।''
(१८ नवम्बर १८९६ को लंदन में दिए गए भाषण से; २ः३५२-५३)


५. एक हाथ में कुरान दूसरे में तलवार-''जरा उन छोटे-छोटे सम्प्रदायों के बारे में सोचो जो पिछले कुछ सैकड़ों वर्षों में चलायमान मानव मस्तिष्क से उपजे हैं और वे ईश्वर के समीप अगणित सत्यों के ज्ञान का हेकड़बाजी से दावा करते हैं। इस मिथ्याभिमान पर जरा ध्यान दीजिए। इससे यदि कुछ सिद्ध होता है तो यही कि ये लोग कितने अहंकारी हैं। और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ऐसे दावे हमेशा झूठे साबित हुए हैं और ईश्वर की कृपा से ऐसे दावों का सदैव असत्य होना निश्चित है। इस विषय (इस्लाम) में मुसलमान सबसे अलग थे। उन्होंने आगे बढ़नेका प्रत्येक कदम तलवार की धार से आगे बढ़ाया यानी कि एक हाथ में कुरान और दूसरे में तलवार, ''कुरान स्वीकार करो या मौत' इसके अलावा अन्य कोई विकलप नहीं है।'' तुम इतिहास से जानते हो कि इससे उनकी कितनी आश्चर्यजनक सफलता रही। छः सौ वर्षों तक उन्हें कोई नहीं रोक सका और इसके बाद एक समय ऐसा आया कि जब उन्हें चिल्ला कर कहना पड़ा कि रुको। अन्य रिलीजनों के साथ भी ऐसा ही होगा, यदि वे ऐसे ही तरीके अपनाएंगे
(२८ जनवरी १९००, में पाडसेना कैलीफोर्निया में दिए गए भाषण से, '१ : ६९-७०)


६. सार्वभौमिक भाईचारा केवल मुसलमानों के लिए-''मुसलमान विश्व व्यापी भाईचारे की बात करते हैं परन्तु वास्तव में इसका मतलब क्या है ? आखिर जो कि मुसलमान नहीं है वह इस सार्वभौमिक भाईचारे में सम्मिलित क्यों नहीं किया जाएगा उसके तो गले काटे जाने की सम्भावना अधिक है।'' (२ : ३८०)


७. मुसलमान मूर्त्तियों की जगह कब्रों को पूजते हैं-''मुसलमान प्रायः मूर्तियों की जगह अपने पीरों और शहीदों की कब्रों का उपयोग करते हैं (यानी पूजते हैं)।'' (३ : ६१)


८. बालक रूप में ईश्वर-''मुसलमानों द्वारा ईश्वर को एक बच्चे के रूप में होने के विचार कोस्वीकार करना असम्भव है। वे इसे मानने से एक भयसहित संकोच करेंगे। लेकिन ईसाई और हिन्दू इसे आसानी से अनुभव कर सकते हैं। क्योंकि उनके मत में बाल स्वरूप ज़ीज़स और बालरूप गोपाल श्री कृष्ण की अवधारण है।'' (३ : ९६)


९. किसी मुस्लिम देश में मंदिर बनाना वर्जित-''ऐसा भारत में ही है कि यहाँ भारतीय (हिन्दू) मुसलमानों और ईसाईयों के लिए पूजा स्थल (मस्जिद, गिरजाघर) बनवाते हैं, अन्यत्र कहीं नहं। अगर आप अन्य देशों में जाओ और मुसलमानों या अन्य मतों के लोगों से कहो कि उन्हें अपने लिए मंदिर बनाने दो तो देखो वे तुम्हारी किस प्रकार मदद करते हैं, अनुमति देने की जगह वे तुम्हें और तुम्हारे मंदिर को ही तोड़ डालने की कोशिश करेंगे, यदि वे ऐसा कर सके।'' ( ३ : ११४)


१०. भारत में रहने वाले भी हिन्दू-''इसलिए यह शब्द (हिन्दू) न केवल वास्तविक हिन्दुओं बल्कि मुसलमानों, ईसाईयों, जैनियों और अन्य लोगों के लिए भी है, जो कि भारत में रहते हैं।'' (३ : ११८)


११. सैकड़ों वर्षों तक 'अल्लाह-हो-अकबर' गूंजता रहा-''बर्बर विदेशी आक्रान्ताओं की एक लहर के बाद दूसरी लहर इस हमारे पवित्र देश पर टकराती रही। वर्षों तक आकश'अल्लाह-हो-अकबर' के नारों से गुंजायमान होता रहा और कोई हिन्दू नहीं जानता था इसका अन्तिम क्षण कौन-सा होगा। विश्वभर के ऐतिहासिक देशों में से भारत ने ही सबसे अधिक यातनाएँ और अपमान सहें हैं फिर भी हम लगभग उसी एक राष्ट्र के रूप में विद्यमान हैं और यदि आवश्यक हुआ तो सभी प्रकार की आपदाओं को बार-बार सामना करने के लिए तैयार हैं। इतना ही नहीं, अभी हाल में ऐसे भी संकेत हैं कि हम न केवल बलवान ही हैं बल्कि बाहर निकलने को तैयार हैं क्योंकि जीवन का अर्थ प्रसार है।'' ( ३ : ३६९ - ७०)


१२. मुसलमानों की तरह न मानने पर हत्या-''अज्ञानी लोग.... अन्य किसी दूसरे मनुष्य को विश्व की समस्याओं का अपने स्वतंत्र चिन्तन के अनुसार व्याखया न करने देने को न केवल मना करते हैं, बल्कि यहाँ तक कहने का साहस करते हैं कि अन्य सभी बिल्कुल गलत हैं और केवल वे ही सही हैं। यदि ऐसे लोगों का विरोध किया जाता है तो वे लड़ने लगते हैं और यहाँ तक कहते हैं कि वे उस आदमी को मार देंगे यदि वह वैसा विश्वास नहीं करता है जैसा कि वे स्वयं करते हैं और अन्य मुसलमान भी करते हैं।'' (४ : ५२)


१३. पैगम्बर व फरिश्तों को पूजने में आपत्तिनहीं-''मुसलमान प्रारम्भ से ही मूर्ति पूजा के विरोधी रहे हैं लेकिन उन्हें पैगम्बरों या उनके संदेशवाहकों को पूजने या उनके प्रति आदर प्रगट करने में कोई आपत्ति नहीं होती हैं, बल्कि वास्तविक व्यवहार में एक पैगम्बर की जगह हज़ारों ही हज़ार पीरों की पूजा की जा रही हे।'' (४ : १२१)


१४. मुसलमान सर्वाधिक सम्प्रदायवादी-''इस (इस्लाम) के विषय में आज मुसलमान सबसे अधिक निर्दयी और सम्प्रदायवादी हैं उनका मुखय सिद्धान्त वाकय है ''ईश्वर (अल्लाह) एक है औ मुहम्मद उसका पैगम्बर है।'' इसके अलावा सभी बातें न केवल बुरी हैं, बल्कि उन्हें फौरन नष्ट कर देना चाहिए। प्रत्येक स्त्री औरपुरुष, जो इस सिद्धान्त को पूरी तरह नहीं मानता है, उसे क्षणभर की चेतावनी के बाद मार देना चाहिए, प्रत्येक वस्तु जो इस प्रकार की पूजाविधि के अनुकूल नहीं है, उसे फौरन नष्ट कर देना चाहिए और प्रत्येक पुस्तक जो इसके अलावा कुछ और बातों की शिक्षा देती है, उसे जला देना चाहिए। पछिले पांच सौ वर्षों में प्रशान्त महासागर से लेकर अंध महासागर तक सारे विश्व में लगातार रतपात होता रहा। यह है मुहम्मदवाद ! फिर भी इन मुसलमानों में से ही, जहाँ कहीं कोई दार्शनिक व्यक्ति हुआ, उसनेनिश्चय ही इन अत्याचारों की निंदा की है।'' (३ फरवरी १९००, कोपासाडेना में रिए गए भाषण से, ४ : १२६)


१५. अल्लाह के लिए लड़ो-''भारत में विदेशी आक्रान्ताओं की, सैकड़ों वर्षों तक लगातार, एक के बाद एक लहर आती रही और भारत को तोड़ती और नष्ट-भ्रष्ट करती रही। यहाँ तलवारें चमकीं और 'अल्लाह के लिए लड़ो और जीतो' के नारों से भारत का आकाश गूंजता रहा। लेकिन ये बाढ़ें भारत के आदर्शों को बिना परिवर्तित किए, स्वतः ही धीरे-धीरे समाप्त होती गई।'' (४ : १५९)


१६. मूर्ति पूजक हिन्दू घृणास्पद-''मुसलमानों के लिए यहूदी और ईसाई अत्यन्त घृणा के पात्र नहीं है। उनकी नज़रों में वे कम-से-कम ईमान के आदमी तो हैं। लेकिन ऐसा हिन्दू के साथ नहीं है। उनके अनुसार हिन्दू मूर्तिपूजक है व घृणास्पद 'काफ़िर' है। इसलिए वह इस जीवन में नृशंस हत्या के योग्य हैं और मरने के बाद उसके लिए शाश्वत नकर तैयार है। मुसलमान सुलतानों ने काफिरों के आध्यात्मिक गुरुओ व पुजारियों के साथ यदि कोई सबसे अधिक ृपा की तो यह कि उन्हें किसी प्रकार अन्तिम सांस लेने तक चुपचाप जी लेने की अनुमति दे दी। यह भी कभी-कभी बड़ी दयालुता मानी गईं यदिकिसी मुस्लिम सुलतान का धार्मिक जोश असामान्य या कुछ अधिक होता तो 'काफिरों' के कत्लेआम रूपी बड़े यज्ञ का फौन ही प्रबन्ध किया जात।'' (४ : ४४६)


१७. यहाँ कत्ले आम मुसलमान लाए-''तुम जानते हो कि हिन्दू धर्म किसी को यातना नहीं देता। यह एक ऐसा देश है जहाँ कि सभी प्रकार के सम्प्रदाय शान्ति और सौहार्द के साथ रह सकते हैं। मुसलमान अपने साथ अत्याचार और कत्ले आम लाए, लेकिन उनके आने से पहले तक यहाँ शान्ति बनी रही थी।'' (५ : १९०)


१८. मुसलमानों ने तलवार का सहारा लिया-''भारत में मुसलमान ही पहले ऐसे लोग थे, जिन्होंने तलवार का सहारा लिया।'' (५ : १९७)


१९. एक हिन्दू कम होने का मतलब एक शत्रु का बढ़ना-''सबसे पुराने इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हमें बताया गया है कि जब सबसे पहले मुसलमान भारत में आये तो यहाँ साठ करोड़ हिन्दू थे और अब केवल बीस करोड़ हैं (यानी चालीस करोड़ हिन्दू मारे और धर्मान्तरित किए गए-अनु.)। और हिन्दू धर्म से एक भी हिन्दू का बाहर जाने का मतलब है एक हिन्दू का कम होना ही नहीं है बल्कि एक दुश्मन का बढ़ जाना है। इसके अलावा इस्लाम और ईसाइयत में धर्मान्तरित अधिकांश हिन्दू तो तलवार के बल पर धर्मान्तरित हुए हैं या उनकी सन्तानें हैं।'' (५ : २३३)


२०. मुहम्मददीय विजय को भारत में पीछे हटना पड़ा-''मुसलमानों के विजय की लहर जिसने सारी पृथ्वी को निगल लिया था, उसे भारत के सामने पीछे हटना पड़ा।'' (५ : ५२८)


२१. हशासिन शब्द 'असेसिन' बन गया-''मुसलमानों का 'हशासिन' शब्द 'असेसिन' बन गया क्योंकि मुहम्मदीय मत का एक पुराना सम्प्रदाय गैर-मुसलमानों को मारने को अपने धर्म का एक अंग मानता था।'' (५ : ४०)


२२. इस्लाम में हिंसा का प्रयोग-''मुसलमानों ने हिंसा का सबसे अधिक प्रयोग किया।'' (७ : २१७)


२३. गैर-मुसलमानों को मार दो-''एक ऐसा रिलीजन भी हो सकता है जो अत्यन्त भयंकर शिक्षाएं देता हो। उदाहरण के लिए मुहम्मदीय मत (इस्लाम) मुसलमानों को उन सबकी हत्या करने की अनुमति देता है जो कि उसके मतानुयायी नहीं हैं। ऐसा कुरान में स्पष्ट लिखा है कि ''अविश्वासियों (गैर-मुसलमानों) को मार दें। यदि वेआ मुहम्मदीय यानी मुसलमान नहीं हो जाते हैं।'' उन्हें अग्नि में झोंक देना और तलवार से काट देना चाहिए। अब यदि हम किसी मुसलमान से कहें कि ऐसा गलत है तो
वह स्वाभाविक तौर पर फौरन पूछेगा कि ''तुम ऐसा कैसे जानते हो ? तुम कैसेजानते हो कि ऐसा ठीक नहीं है ? मेरी धर्म पुस्तक (कुरान) कहती है कि ऐसा ठीक है।''
(१७ नवम्बर १८९९ को लंदन में दिए भाषण में, प्रेक्टीकल वेदान्त, भाग ३ से)


1 comment:

  1. भारत में इस्लामी जिहाद दो नयें रुपों में सामने आया है. पहला लव जिहाद (लंड जिहाद अथवा लिंग जिहाद) और दुसरा गुदा जिहाद (गांड जिहाद) (अश्लील शब्दों के लिए माफी चाहुंगा).
    इनमें से पहला लिंग जिहाद है, जिसमें मुस्लिम युवक हिंदू युवती से येनकेनप्रकारेण दोस्ती बनाकर उससे शादी कर लेता है. शादी के बाद बच्चे पैदा करके उसे सेक्स स्लेव्ह बनाकर अपने दोस्तो, रिश्तेदारों को नज़राने के रुप में पेश करता है. हिंदू लडकी झाँसे में आ भी जाए, किंतु अगर उसके पालक अगर समय रहते जागरुक हुए तो लिंग जिहादी को पुलिस के फटके पड़ने की संभावना तो शत प्रतिशत. उपर से कानूनी सजा मिलना अलग और 5-6 साल जेल की चक्की पिसना नसीब में.
    लेकिन सबसे खतरनाक है गुदा जिहाद. जी हाँ. यह इसलिए बहुत खतरनाक है की, गुदा जिहादी जबतक आपके करीब ना आए और स्वयं को बम से ना उडा़ दे, आप समझ ही नही सकेंगे की वह एक गुदा जिहादी था (अगर आप की मौत ना हुई हो और बच गए या धमाके में अपाहिज हुए, तो.) होता क्या है कि, मुस्लिम कट्टरवादी किसी गरीब मुस्लिम परिवार के 12-15 साल के बच्चे को बहला फुसलाकर, उसका दिमाग ब्रेनवाश करके तथा उसके माँ-बाप को खासी रकम देकर अपने साथ कर लेते हैं. बाद में उसके दिमाग में दीने इस्लाम और जिहाद की बातें इतनी ठूँस-ठूँस कर भरी जाती हैं कि, वह पुर्णरुपेण (सर से पाँव तक) जिहादी बन जाता है. और ऐसा बने भी क्यों ना? क्योंकि कुरान में तन, मन और धन से जिहाद करना जो सिखाया है, जी हाँ जिहाद अपने तन (शरीर), मन (दिमाग) तथा धन (पैसे) से करो. अब 12-15 साल के लड़के के पास ना तो मन (दिमाग) होता है और ना ही धन (पैसा). तो उसके पास जिहाद के लिए बचा क्या? केवल अपना तन (शरीर). और कुरान में यह भी लिखा है की अपने अंगप्रत्यंग (शरीर के सारे भागों से) जिहाद करना फर्ज है. तो इस जिहादी बच्चे के पास बचा क्या? सिर्फ गुदा. और शातीर कट्टरपंथी इसी का फायदा उठाते हैं. पहले उस बच्चे से गुदामैथुन करके अपनी हवस को शांत करते है और साथ ही तबतक उसकी गुदामैथुन करते है जबतक की उसकी गुदा इतनी चौड़ी ना हो जाए कि उसमें आर.डी.एक्स. तथा डिटोनेटर घुस जाएँ. एक बार गुदा के अंदर आर.डी.एक्स., डिटोनेटर वैगराह विस्फोटक सामाग्री फिट कर दी जाये, बाद में उसे रिमोट कंट्रोल से जोडकर उसका रिसिव्हर गुदा जिहादीके पिठ पर बाँध देते हैं. (पिठ पर बाँधने से गुदा जिहादी उसे छु नहीं सकता. और ऐसा इसलिए करते हैं की शायद आगे जाकर गुदा जिहादी बगावत करें तो भी उसके हाथ पिठ में बँधे रिसिवर तक नां पहुँचे और कट्टरपंथियों का उसे विस्फोट करने का अंजाम पूरा हो जाए) आगे गुदा जिहादी किसी भी भिड़भाडवाली जगह पर पहुँच गया तो उसे कट्टरपंथी अपने रिमोट कंट्रोल से उडा देते हैं.
    इसलिए प्रिय भारतीय नागरिकों, अपने आप को सँभालो. मुसलमानों की बस्तियाँ अपने पास ना बनने दें. मुस्लिम युवकों से सदैव सावधान (दोस्ती बनाने का केवल बहाना करें, ना की सचमुचके दोस्त बन जाएँ). अपने नजदिक किसी 12-15 साल के मुसलमान बच्चे को ना आने दें. (हो सकता है वह शायद गुदाजिहादी हो. क्या भरोसा?) अपनें बच्चों को मुसलमान बच्चों के साथ मेलमिलाप नां करने दें और उन्हें हमेशा दूर रखें. सदैव हिंदू सभ्यता का सम्मान, आदर करें. हिंदूराष्ट्र का अभिमान रखें.
    जय हिंद!

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