Wednesday, 13 August 2014

लोकतंत्र में सोशल मीडिया का महत्त्व व भूमिका।

मीडिया भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है। यह केवल बाजार में बिकने वाला माल न होकर बल्कि जनता की राय भी बदलता है। पिछले कुछ वर्षों में २४ घंटे के न्यूज़ चैनलों के प्रसारण के बाद टी आर पी की होड़ में चैंनलों के स्वरूप,चरित्र  व गुणवत्ता में काफी परिवर्तन आया है। पहले जो समाचार पत्र या न्यूज़ चैनेल निष्पक्ष पत्रकारिता में विश्वास रखते थे आज उनमें से अधिकतर स्वार्थवश या अपने आकाओं को खुश रखने के प्रयासों में पत्रकारिता की मर्यादाएं भी लांघ रहे हैं। जिसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय जनमानष का विश्वास दिन प्रतिदिन मीडिया चैनलों पर कम होता जा  रहा है।
मीडिया की तुलना सीधे तौर पर बाजार में बिकने वाली औषधि से की जा सकती है जिसकी गुणवत्ता पर रोगी का स्वस्थ होना या न होना निर्भर करता है।
जब औषधि की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगें तो बाजार में नई औषधि की आवश्यकता उठना लाजमी है। अभी हाल के कुछ वर्षों में सुचना क्रांति व इंटरनेट क्रांति के प्रसार के बाद एक बहुत बड़ी संख्या में युवा वर्ग सोशल मीडिया से जुड़ा है। यह युवा वर्ग स्वतन्त्र विचारों का समर्थक है और हर एक विषय पर बेबाकी से अपनी राय रखता है। सोशल मीडिया के प्रादुर्भाव से पहले जनता को न्यूज़ चैनलों व अखबारों की खबरों पर पूर्ण रूपेण निर्भर रहना पड़ता था जिनकी तटस्थता पर भी सवाल उठते रहे हैं। सोशल मीडिया हर व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपनी बात बेबाकी से रखने का मौका देता है।
अगर बात 2014 के लोकसभा चुनाव की करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रचार अभियान व उनकी विजय में सोशल मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है। मुख्यधारा मीडिया द्वारा कई बार सोशल मीडिया पर प्रश्नचिह्न लगाने का भी प्रयास किया गया परन्तु येसे सारे प्रयास विफल हुए आज सोशल मीडिया लोकतंत्र के पाँचवे स्तम्भ के रूप में अपनी जगह मजबूत कर चूका है।
विगत वर्षों में चाहे अकबरुद्दीन ओवैसी द्वारा हिन्दुओं के प्रति घ्रणित भाषण का मामला हो या देश के विभिन्न हिस्सों जैसे कि असाम, केरल व पश्चिम बंगाल व अन्य राज्यों में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार का मामला हो सोशल मीडिया नें मजबूती के साथ सच्चाई सामने लेन का प्रयास किया और मुख्यधरा मीडिया को उन खबरों को दिखाने व उनपर चर्चा करने को मजबूर कर दिया। संगठित रूप से सोशल मीडिया पर अनेक ग्रुप कार्य कर रहे हैं जिनमें से प्रमुख नाम हिन्दू डिफेंस लीग, शंखनाद, नीति सेंट्रल, बीइंग हिन्दू, अखिल भारतीय नवयुवक संघ,आई बी टी एल,राष्ट्रिय रक्षा दल, हिन्दू सेना हैं। सोशल मीडिया के इन धुरंधरों को कई बार मुख्यधारा मीडिया व तथाकथित सेक्युलर ताकतों द्वारा 'इन्टरनेट हिन्दू' की संज्ञा भी दी गयी। तमाम आलोचनाओं को स्वीकार करते हुए ये इन्टरनेट हिन्दू अपनी बातों को निष्पक्ष रूप से रख रहे हैं जिससे भारतीय जनमानस पर भी पड़ रहा है।
सोशल मीडिया की उपयोगिता को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सभी मंत्रालयों को सोशल मीडिया के माध्यम से जनता से सीधे जुड़ने का निर्देश दिया। आज भारत के दूर-दराज के गाँव का व्यक्ति भी सोशल मीडिया के माध्यम से देश-विदेश में कहीं भी संपर्क साध सकता है और अपनी बात रख सकता है।
अभी हाल की कुछ घटनाओं जैसे कि मुजफ्फरनगर दंगे व मेरठ कांड पर नजर डालें तो मुख्यधारा मीडिया नें बिना सत्य की प्रमाणिकता किये दंगों का आरोप भी सोशल मीडिया के मत्थे मढ़ दिया। सोशल मीडिया की गलती यह थी कि उसने निष्पक्षता से व तथ्यात्मक रूप से दंगों की सच्चाई जनता के सामने लायी और दंगा के कारणों लव जिहाद व जबरन धर्म परिवर्तन को उजागर किया। ज्यादातर दंगों के कारक एक"विशेष समुदाय" के व्यक्ति होते हैं यह बात जगजाहिर है। मेरठ में हिन्दू लड़की के मदरसे में किये गए धर्म परिवर्तन की बात सोशल मीडिया के माध्यम से उजागर होने पर मुख्यधारा मीडिया द्वारा सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक उन्माद फ़ैलाने का आरोप लगाया गया। हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में ओसामा सलमान नामक व्यक्ति नें लेख लिखकर हिन्दू डिफेंस लीग सहित सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक सदभाव बिगाड़ने का आरोप लगाया। आई बी एन सेवेन चैनेल ने एक कदम आगे बढ़ते हुए मदरसों की सच्चाई सामने लाने वाले हिन्दू डिफेंस लीग सहित सोशल मीडिया पर दंगा भड़काने व तथ्यों को गलत रूप में पेश करने का आरोप लगा डाला।
आखिर मुख्यधारा मीडिया इस बात को क्यों नहीं समझना चाहता कि निष्पक्षता व विचारों की स्वतंत्रता के चलते युवा वर्ग सोशल मीडिया से जुड़ा है और हर एक नागरिक संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुए अपनी बात को रखने के लिए स्वतन्त्र है।
निश्चित तौर पर यह माना जा सकता है की सोशल मीडिया के उपयोग हेतु कुछ दिशानिर्देश हो सकते हैं परन्तु उसकी व्यापकता और प्रसार को देखते हुए नियंत्रण असंभव है और न ही नागरिकों के विचारों पर पाबन्दी लोकतंत्र के लिए श्रेयस्कर है। सोशल मीडिया जिस प्रकार समाज के हर वर्ग को जोड़ते हुए जागरूकता, ज्ञानवर्धन, पारस्परिक संवाद व परामर्श का कार्य कर रहा है वह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के लिए अत्यंत हितकर है।

वीर सावरकर-एक महामानव

देशद्रोही वामपंथी इतिहासकारों ने वीर सावरकर पर द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत  का आरोप लगाया है, उन्हें सर्वप्रथम "राष्ट्र" और "राज्य" शब्द में अंतर समझने की आवश्यकता है।एक राज्य में अलग-अलग विचारधारायुक्त अनेक  राष्ट्र हो सकते हैं, राष्ट्र कोई भौगोलिक शब्द नहीं है। राष्ट्र अनेक सभ्यता, संस्कृतियों और विचारधाराओं का मेल होता है । 1937 में  हिन्दू महासभा के 19 वें राष्ट्रिय अधिवेशन कर्णावती (अहमदाबाद) में सावरकर द्वारा दिए गए भाषण का स्पष्टीकरण उन्होंने नागपुर में 15  अगस्त 1943 को मराठी पत्र "आदेश" के कार्यालय पर पत्रकारों को दिया था। जो कि "आदेश"के 28 अगस्त 1943 के अंक में प्रकाशित हुआ था।-"यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मुस्लमान एक राष्ट्र हैं और इस्लाम भी एक सैद्धांतिक राष्ट्र है जो कि  कुरान की शिक्षाओं पर आधारित है।यह राष्ट्र किसी राज्य की भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानता। कुरान के अनुसार धरती दो राज्यों में विभाजित है, दारुल इस्लाम और दारुल हरब। हिन्दूराष्ट्र ने अनेक स्थानों पर मुस्लिमराष्ट्र को पराजित करके हिन्दुओं की रक्षा करके हिन्दू पदपादशाही की स्थापना की । मुख्यतः हिन्दुओं के तबके ने कांग्रेस पर सवार होकर यह कहने का प्रयास किया कि भौगोलिक रूप से एक हिंदुस्तान में रहने के कारण हिन्दू और मुस्लिम एक राष्ट्र हैं  मुसलमानों ने अपने अलग सैद्धांतिक राष्ट्रवाद को  नहीं छोड़ा।"
सावरकर पर द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा का आरोप जड़ने से पहले 1988 में  सर सैयद  अहमद और कांग्रेस अध्यक्ष बदरुद्दीन अहमद के बयान पढ़ना आवश्यक है-"यह समझना कि भारत में रह रहे अलग-अलग जातियों व धर्मों के लोग एक राष्ट्र हैं या एक राष्ट्र हो सकते  हैं,यह  असंभव है।" "मुझे जानकारी नहीं है कि कोई भारत को एक राष्ट्र समझता है, भारत में अनेक समुदाय और राष्ट्र हैं ।" वीर सावरकर और हिन्दू महासभा द्वारा अंतिम समय तक विभाजन का विरोध किया गया इस बात का उल्लेख महामानव डा. अम्बेडकर नें अपनी पुस्तक "पाकिस्तान-द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया" में भी किया गया है 
वामपंथी इतिहासकारों द्वारा वीर सावरकर द्वारा 14 नवम्बर 1913 को  गृह मंत्रालय, भारत सरकार को लिखे गए पत्र के आधार पर उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाये जाते है।उस पत्र में सावरकर नें नियमों के विरुद्ध उन पर हो रही ज्यत्तियों का उल्लेख किया है पत्र में कहीं भी पश्चाताप या क्षमायाचना का भाव नहीं है न ही अंग्रेजों की प्रशंसा का एक शब्द है।अंग्रेजी में किसी भी अधिकारी को पत्र लिखने पर उसके प्रति सम्मान दिखने की यह पद्धति है न की समर्पण या पश्चातापब्रिटिश अधिकारी रेनाल्ड क्रैडॉक ने स्वयं ब्रिटिश सरकार को लिखा था कि सावरकर के पत्र में सरकार की कोई प्रशंसा नहीं की गयी है, न तो पश्चाताप का कोई भाव नहीं है न ही सावरकर ने ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगी है। वीर सावरकर एक सच्चे कर्मयोगी थे जिन्होंने अपने कर्तव्यपथ का निर्वहन बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के किया वीर सावरकर का मानना था कि मरकर कोई जंग नहीं जीती जाती इसलिए शिवाजी महाराज का अनुसरण करते हुए उनका पत्र एक दूरगामी  कूटनीति थी 
1925 में  संघ की स्थापना के बाद ही हिन्दू महासभा के पूर्व अध्यक्ष डा. मुंजे के मित्र व  ब्रिटेन के दुश्मन मुसोलिनी द्वारा संघ को आर्थिक सहायता दी जाती थी तो संघ व हिन्दू महासभा पर अंग्रेजों का सहयोगी होने का आरोप पूर्णतयः हास्यास्पद हैअगर वामपंथी यह कहते हैं की संघ नें 1942 में गांधी का साथ नहीं दिया था इस वजह से आज़ादी नहीं मिल पायी तो फिर जब गांधी इतना जनाधारविहीन व्यक्ति था तो उसके सर पर 1947 की आज़ादी का सेहरा बांधना लाखों ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों के साथ अन्याय है २२ जून 1940 को बंबई  में फॉरवर्ड ब्लॉक के सम्मलेन में भाग लेने के बाद नेताजी-सावरकर की ऐतिहासिक भेंट सावरकर सदन,बंबई में हुयी वीर सावरकर की प्रेरणा व सहयोग से नेताजी जर्मनी व जापान गए जहाँ पर जापान हिन्दू महासभा अध्यक्ष रासबिहारी बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का गठन किया था, उसकी कमान नेताजी को सौप दी गयी सावरकर द्वारा "राजनीती का हिन्दुकरण और हिन्दुओं का सैनिकीकरण" के आह्वान के बाद हजारों  हिन्दू युवाओं नें  ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर शस्त्र शिक्षा ली। ब्रिटिश सेना में हिन्दू सैनिकों की संख्या 30  प्रतिशत से बढ़कर 70  प्रतिशत हो गयी  उसी सेना द्वारा बम्बई में नेवी बिद्रोह होने पर अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा जिसका वर्णन 1946  में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटनी द्वारा विपक्ष के नेता चर्चिल के प्रश्न के जवाब में हाउस ऑफ़ कॉमन्स में किया गया था   
"विभाजन मेरी लाश पर होगा" ऐसा झूठा आश्वासन देने वाले अंग्रेजो के एजेंट तथाकथित राष्ट्रपिता द्वारा 14 जून 1947 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सदस्यों को विभाजन के पक्ष में मत करने के लिए मज़बूर किया गया और विभाजन का कम्युनिस्टों द्वारा पूर्ण समर्थन किया गया  विभाजन की विभीषिका के बाद पश्चिमी पाकिस्तान से लुट-पिटकर आने वाले असहाय  हिन्दू-सिखों की संघ स्वयंसेवकों द्वारा की गयी सेवा व सहायता सर्वविदित है 
किसी भी इतिहास का अध्ययन पूर्ण  सन्दर्भ में करना आवश्यक होता है है जिससे की पक्ष व विपक्ष के पहलुओं का सामान रूप से अवलोकन किया सके

Tuesday, 5 August 2014

प्रश्नोत्तरी ( मानव और राष्ट्र इतिहास विषय ) :-

प्रश्न :- आधुनिक विज्ञान के अनुसार मनुष्य तो केवल कुछ एक लाख वर्ष पूर्व का ही सिद्ध होता है तो आप किस आधार पर ये इतनी बड़ी संख्या कह रहे हैं ?

उत्तर :- वैदिक काल गणना के अनुसार मानव को पृथिवी पर आए आज से 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हज़ार 115 वर्ष ( 1960853115 वर्ष अब विक्रमी सम्वत् 2071 तक ) हो चुके हैं । लेकिन पहले विज्ञान लाख वर्ष तक पहुँचा फिर धीरे धीरे ये लोग मिले मानव के प्राचीन अवशेषों के आधार पर उससे पीछे होते चले गए । Radio Carbon Dating नामक प्रणाली की सहायता से 60 लाख वर्ष पुराना मनुष्य का सिला हुआ जूता मिला है ( Theosophical Path, August 1923 ) । और इसी प्रकार 12 करोड़ वर्ष पुराने एक गुफा में बनाए हुए चित्र मिले हैं जो कि स्पष्ट है मानव ही बना सकता है पशु नहीं । तो ऐसे ही हमें आशा है और सशक्त अनुसंधान से विज्ञान की गणना 12 करोड़ से भी और पीछे होते होते वैदिक गणना तक पहुँच ही जाएगी ।

प्रश्न :- मनुष्यों की उत्पत्ति तिब्बत पर ही क्यों हुई ? कहीं और क्यों नहीं हुई ?
उत्तर :- क्योंकि तिब्बत का हिमालय क्षेत्र ही मनुष्यों के रहने योग्य अनुकूल जलवायु वाला क्षेत्र था और बाकी के द्वीप जल में डूबे हुए थे और हिमालय की ऊँचाई भी उस समय बहुत कम थी ।

प्रश्न :- मनुष्यों ने प्रथम किस देश को बसाया ?
उत्तर :- मनुष्यों ने प्रथम आर्यवर्त देश को बसाया ।

प्रश्न :- आर्यवर्त देश की सीमाएँ वर्तमान स्थिती के अनुसार कहाँ तक थीं ?
उत्तर :- यह उत्तर में हिमालय, विन्ध्याचल, पश्चिम में सिन्धु नदी, पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी, दक्षिण में कटक नदी । इन नदीयों के बीच में जितना देश है उसको आर्यवर्त कहते हैं ।

प्रश्न :- देशों के नाम किस आधार पर रखे गए हैं ?
उत्तर :- देशों के नाम मनुष्य जातीयों के आधार पर रखे गए हैं ।

प्रश्न :- आर्यवर्त देश का नाम कैसे पड़ा ?
उत्तर :- आर्यवर्त देश का नाम आर्य लोगों के इस देश को निवास स्थान बनाने पर पड़ा है ।

प्रश्न :- आर्य लोग कौन हैं ?
उत्तर :- श्रेष्ठ और धर्मपूर्वक आचरण करने वाले मनुष्यों को ही आर्य कहा जाता है,जो सृष्टि के प्रथम उत्पन्न हुए और तिब्बत के हिमालय से उतर कर इस देश को अपना निवास स्थान बनाया और आर्यवर्त का नाम दिया ।

प्रश्न :- मनुष्य कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :- मनुष्य मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं, आर्य और दस्यु ( दुष्ट स्वभाव से युक्त ) । इन्हीं को देव और असुर भी कहा जाता है ।

प्रश्न :- प्रथम सृष्टि में मनुष्य कैसे थे ?
उत्तर :- प्रथम सृष्टि में मनुष्य केवल आर्य ही थे । दस्यु स्वभाव के नहीं थे ।

प्रश्न :- मनुष्यों का विस्तार पूरे आर्यवर्त देश में कैसे हुआ और कैसे मानव ने प्रथम आर्यवर्त को बसाया ?

उत्तर :- पहले हिमालय का स्तर बहुत कम था और समस्त द्वीप जल में डूबे हुए थे । धीरे धीरे समय बीतने पर जल स्तर कम होता गया और हिमालय ऊपर होता गया और मनुष्यों ने तिब्बत से नेपाल होते होते समय के साथ धीरे धीरे आर्यवर्त के दूसरे भागों में प्रवेश करना शुरू किया । पहले उत्तर प्रदेश फिर पंजाब नेपाल से होते हुए असम ब्रह्मपुत्र नदी के तट तक और मध्य भारत के भाग तक । सिन्धू नदी के तट तक आर्यवर्त बसता चला गया । मनुष्यों की आबादी भी बढ़ने लगी थी और वह भूमी पर विस्तार करता गया । मानव भूमी में खेती करने लगा । नगर और ग्राम बसाने लगा । नदियों के किनारे ग्राम बसाए जाने लगे । पर्वतों और नदीयों के पास ही शिक्षा के लिए गुरूकुल खोले जाने लगे । उस समय भूमी बहुत उपजाऊ हुआ करती थी । वृक्षों पर फल भरे रहते थे । वृक्ष कई कई मील की ऊँचे थे जिनके अवशेष अब Discovery वालों द्वारा पाए गए हैं । इस प्रकार धीरे धीरे समय के साथ मानव पूरी भूमी पर फैलता चला गया ।

प्रश्न :- आर्यवर्त में वैदिक काल कैसा था ?

उत्तर :- गुरू शिष्य परम्परा के होने से शिष्य गुरू के पास जाकर सभ्यता सीखता था,मानव बुद्धि असाधारण हुआ करती थी । समाज में वैदिक चतुर वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी । समाज समृद्धिशाली था । रोग अति न्यून था । समय समय पर यदि रोग बढ़ता भी था तो ऋषियों नें अनेकों आयुर्वेद शास्त्रों की रचना करके समाज का महान उपकार भी किया था और रोगों की चिकित्साएँ की थीं । समाजिक अर्थव्यवस्था में धन का प्रयोग न होकर सामान का आदान प्रदान होता था, परिश्रम का आदान प्रदान होता था । पुत्र और पुत्रीयाँ आज्ञाकारी होते थे । जब कोई वृद्ध आता था तो सभी छोटे खड़े होकर प्रेम पूर्वक नमस्ते करते थे । पत्नी और पती में सदाचार और शिष्टाचार का स्तर उच्च हुआ करता था । निंदा चुगली नहीं हुआ करती थी । सभी अपना ज्ञान वृद्धि के लिए प्रयत्न किया करते थे । बिगप कारण के वाद विवाद नहीं हुआ करते थे । पुरुष बलशाली और पराक्रमी होते थे, स्त्रीयाँ सुन्दर और सुशील होती थीं । स्वच्छता का विषेश ध्यान रखा जाता था ।व्याभिचार न के बराबर था । कोई चोर, ठग, और लम्पटी नहीं होता था । तो ऐसी ही आर्यवर्त की वैदिक व्यवस्था थी । शुद्र समाज भी बहुत विनयशील और सदाचारी होता था । आम जन भी संस्कृत में बातें करते थे । धर्म का पालन करना सबके लिए आवश्यक था । स्त्री पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करते थे ।

प्रश्न :- आर्यवर्त का पतन कैसे हुआ ?

उत्तर :- समय के साथ संस्कृतियों में शिथिलता आने लगती है । जो ओजस्विता का सामर्थ्य पूरे आर्यवर्त में उमड़ रहा था । वह समय आने के साथ शिथिल होने लगा । शैथिल्य का कालचक्र आरम्भ हो चुका था । कुछ जनसंख्या का बढ़ना भी अपना प्रभाव दिखा रहा था । व्यभिचार का फैलना आरम्भ हो चला था । बलशाली लोग निर्बलों पर अत्याचार करने लगे । प्रजा में चारों ओर त्राही त्राही होने लगी थी । समाज में वैदिक मर्यादाएँ भंग होने लगीं थीं । और जिसका असर अब दिखने लगा था ।

प्रश्न :- तो इस आर्यवर्त के पतन को रोकने के लिए आर्यों ने क्या किया ?

उत्तर :- जब आर्य इस पतन को ताड़ गए तो उन्होंने इसे रोकने का उपाय किया और सर्वविद्या में सम्पूर्ण और वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता धर्म के धुरंधर महर्षि वैवस्वत मनु के पास जाकर निवेदन किया गया कि आर्यवर्त को पतन से रोकने के लिए कोई दण्ड विधान बनाएँ और कोई ऐसी शासन पद्धति तैय्यार करें जिससे कि प्रजा का महान उपकार हो सके और आप इस आर्यवर्त के प्रथम राजा बनें । पर ऋषि मनु नहीं माने क्योंकि ऋषियों को संसार के शासन से मोह नहीं होता है, परन्तु देवों के बार बार अनुरोध करने पर प्रजा के उपकार के लिए महर्षि मनु ने आर्यवर्त का शासन करना स्विकार किया और राष्ट्र के प्रथम राजा बने । और एक महान ग्रन्थ वैदिक वर्ण व्यवस्था के आधार पर रचा जिसे हम मनु स्मृति के नाम से जानते हैं । जिसमें उन्होंने वैदिक व्यवस्था को भंग करने वालों के लिए कढ़े नियमों का उपादान किया । कारागार और जुर्माने भी लगाए जाते थे । गाली गलौच या अपशब्द करने वाले की जीह्वा काट दी जाती थी । हिंसा करने वाले को अग्नि भेंट कर दिया जाता था । जिससे कि आर्यवर्त में फिर से सुख और स्मृद्धि आने लगी । प्रायश्चित करने के लिए भी कड़े नियम थे जिससे कि मनुष्य सभ्य समाज में पुनः प्रवेश कर सकता था और वही सम्मान प्राप्त कर सकता था । परन्तु सबसे कठोर दण्ड था समाज से बहिष्कृत किया जाना , ये दण्ड मृत्यु से भी बढ़कर था और बहुत बुरा समझा जाता था । जब कोई वैदिक मर्यादाओं को भंग करता था तो उनको आर्य समाज से निकाल कर चतुर्वर्ण से बाहर कर दूर दक्षिण के अरण्यों ( जंगलों ) में भेज दिया जाता था । यदि वो वापिस दस्यु से आर्य बनना चाहे तो उसको मनु के नियमों के अनुसार दण्ड भोग करके पुनः वह आर्य समाज में प्रवेश कर सकता था ।

प्रश्न :- तो ऐसी व्यवस्था करने से परिणाम क्या हुआ ?

उत्तर :- समय के साथ साथ ये जाती बहिष्कार करने का कार्य बहुत उग्र हो चला था । अब वैदिक नियम भंग करने वालों को चुन चुन कर आर्य समाज से बहिष्कृत किया जाने लगा । और देश निकाल लेकर ये लोग दूर दक्षिण भारत के अरण्यों में या उससे भी दूर दूर के द्वीपों पर जा कर बसने लगे । और वहाँ उन स्थानों को अपनी अपनी जाती के नाम से बसाने लगे । कुछ लोग तो दण्ड व्यवस्था का पालन कर पुनः वैदिक आर्य समाज में प्रवेश पा लेते थे परन्तु बहुधा लोग तो आर्यों से ईर्ष्या द्वेष की भावना रखने लगे । और कभी कभी तो ये दस्यु लोग अपनी सेनाएँ लेकर आर्यों से युद्ध भी करते रहे हैं । इन्हीं को संस्कृत के ग्रन्थों में अब देवासुर संग्राम कहा जाता है । और ऐसे ही बहिष्कृत दस्यु लोग आर्यवर्त से हो होकर दूर देशों में बसते चले गए हैं, और उन देशों को अपनी जाती के नाम पर बसाते चले गए हैं । तो ऐसे ही समग्र मानव जाती अपने आर्यत्व से पतित हो होकर पूरी पृथिवी पर फैली है । और इन बहिष्कृत दस्युओं की जातीयों के नाम इनके गुण, कर्म, स्वभाव या इनके नयन नक्षों के आधार पर रखे गए हैं ।

प्रश्न :- दक्षिण में कौन कौन से देश बसे ?

उत्तर :- दक्षिण में मुख्य रूप से कर्णाटक, केरल, आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, द्रविड़, सिंहल आदि देश बसे हैं ।

प्रश्न :- अरब देश कैसे बसा ?

उत्तर :- ईरान के पास अरब देश हैं , आर्यवर्त से ही जाती ''बहिष्कृत ब्राह्मणों'' की एक जाती जिसको कि शैख जाती के नाम से जाना जाता था वहाँ जाकर बसी है । और वह स्थान जहाँ घोड़े बहुत उत्तम नसल के पाए जाते हैं । ऐसे देश को शैखों ने बसाया है । संस्कृत में घोड़े को अर्वन् कहा जाता है और वह स्थान जहाँ घोड़े पाए जाते हों उस स्थान को अर्व कहा जाता है । तो ये शैखों ने ऐसे अर्व देश को बसाया जो समय बीतने पर अर्व से अरब बन गया और शैख लोग शेख बन गए । आज भी अरबी गल्फ देशों में घोड़े दुनिया में सबसे उत्तम नसल के होते हैं । इन शैख ब्राह्मणों को अपने मूल आर्य पूरवजों से घृणा हो चुकी थी जिस कारण इन्होंने अपनी भाषा को भी उलटी दिशा से लिखना शुरू किया । अरब में यहूदी मत आते आते इनकी भाषा अरबी हो चुकी थी । और फिर ये अरब का रेगिस्तान ईसाई और बाद में ईस्लाम हुआ ।

प्रश्न :- द्रविड़, पाण्ड्य, चोल आदि देश किस जातीयों ने बसाए ?

उत्तर :- चोल देश ( तमिलनाडु के नीचे वाला भाग और वर्तमान केरल का कुछ भाग ) आर्यवर्त से बहिष्कृत चोल जाती ने बसाया, संस्कृत में चोरी करने वालों को चौर बोला जाता है, और यही जो चौर स्वभाव वाले लोग थे जिनको इनके स्वभाव के कारण जाती बहिष्कार के दण्ड दिए गए और एक समान मिलजाने पर इनकी एक अलग से दस्यु जाती हो गई जिसको यह चौर शब्द को भ्रष्ट करके चौल या बाद में चोल कहने लगे । तो दक्षिण भारत में यही चोल जाती के लोगों ने चोल प्रदेश को बसाया है । और एसे ही व्यापारियों को आर्य लोग पणिक या वणिक कहते थे, जो कुछ धर्म भ्रष्ट होकर के धन लोलुप हो गए और ऐसे ही लोगों ने समाजिक बहिष्कार के बाद आकर दक्षिण में डेरा डाला और वही पणिक से पाण्ड्य लोग कहलाने लगे और अपने नाम से देश को बसाया । ठीक इसी प्रकार किसी कारण वश दूसरी क्षत्रीय जातीयाँ जैसे द्रविड़, कर्णाटक, केरल और आन्ध्र जातीयों ने दक्षिण भारत में देश प्रदेश अपने अपने नाम से बसाए हैं । यही लोग हैं जिनकी भाषाएँ समय बीतने के साथ ही संस्कृत से भ्रष्ट हो होकर ही तमिल, मलयालम, तेलुगु , कन्नड़ आदि हुई हैं ।

प्रश्न :- सिंहल देश किसने बसाया है ?

उत्तर :- आर्यवर्त के उत्तर में सिंह का शिकार करने वाले क्षत्रीयों को सिंहल कहा जाता था । जैसे वृष या वृष्भ ( बैल ) का शिकार करने वाले क्षत्रीयों को वृषल कहा जाता था । और संस्कृत में सिंह कहते हैं Lion को । तो यही सिंहली क्षत्रीय जाती द्रविड़ आदी प्रदेश को लांघ कर जिस द्वीप पर जाकर बसी उसे ही सिंहल द्वीप के नाम से बसाया है । इसी कारण राजपूताना और महाराष्ट्र के राजपूत क्षत्रीयों को भी सिंहली कहा जाताथा और सम के साथ यह शब्द छोटा होकर सिंह बन गया और क्षत्रीयों के नाम केपीछे लगने लगा । मुख्य रूप से ये क्षत्रीय बंगाल से ही जाकर सिंहल द्वीप पर बसे हैं । और यह सिंहल शब्द ही बिगड़ कर अंग्रेज़ी में Cylon हुआ है । जहाँ आज के श्रीलंका में भी ये दोप्रकार के लोग पाए जाते हैं , सिंहली और तमिल, और इसी कारण लंका के ध्वज पर सिंह का चित्र है जिसने कृपाण को पकड़ रखा है । यह ध्यान रहे कि जो वर्तमान श्रीलंका है वह प्राचीन सिंहल द्वीप का एक छोटा सा ही भाग था समय आने पर लंका की शंका की शेष भूमी अब जल में डूब चुकी है । और सिंहल में पहले सिंहली और बाद में द्रविड़ी जाकर बसे हैं तो ये दोनों ही आर्यों की पतित शाखाएँ ही हैं । और यह लंका भूमी को सुर्वण भूमी भी कहा जाता है । खोजों से पता लगता है कि इस भूमी में बहुत सा सोना निकलता था । और यह बात सत्य है कि यहाँ के सिंहली राजा भी अपने राज्य महलों को सुवर्ण से बनाते रहे हैं । रामायण काल का राजा रावण इसी का उदहारण है । जिसकी लंका में सुवर्ण महल थे । ये बात मनघड़ंत नहीं है । और सिंहल का जो बाकी बचा हुआ भाग था उसमें ये सात द्वीप आते थे :- अंगद्वीप, यवद्वीप, मलयद्वीप, शंखद्वीप, कुशद्वीप, वराहद्वीप आदि भारतवर्ष के अनुद्वीप ही हैं जो कि दर दूर तक फैले थे । जिनमें से कुछ द्वीप जल में डूब चुके हैं और बाकी कुछ अभी भी हैं , जैसे मलयद्वीप ( मलेशिया ) जिसपर द्रविड़ी लोग जाकर बसे जो कि मलयालम भाषा का अधिकतर प्रयोग करते थे । तो यही मलयाली लोगों ने मलेशिया , और ऐसे ही आगे जाकर बलिद्वीप ( इंडोनेशिया ) को बसाया है । तो ऐसे ही पतित आर्यों की शाखाएँ ही विस्तृत हो होकर पूरे विश्व में फैली हैं । ( प्रमाण :- Historical History of the world Vol 1, p.536 )

प्रश्न :- आन्ध्र को किसने बसाया ?

उत्तर :- आन्ध्र को विशाखापट्टनम के तट पर आर्यों में क्षत्रीय महाराज विश्वामित्र के पतित पुत्रों की जाती के आन्ध्र लोगों ने बसाया है ,और आगे यही आन्ध्र लोगों ने द्वीपों को लांघते हुए एक विशाल द्वीप को बसाया जो चारों ओर जल से घिरा हुआ था उसका नाम रखा गया आन्ध्रालय जो समय के साथ विकृत होकर अस्ट्रेलिया देश कहा जाने लगा । अस्ट्रेलिया के मूल निवासीयों को इण्डियन कहा जाता है भारत के लोगों की भांती उनमें भी छुआछूत की प्रथा है वे दूसरों के हाथ का छुआ नहीं खाते हैं । ( प्रमाण :- Hamsworth History of the world p.5675 )

प्रश्न :- चीन देश कैसे बसा और किसने बसाया ?

उत्तर :- महाभारत में भी चीन या फिर महाचीन का उल्लेख आता है जिसका राजा भगदत युधिष्ठिर द्वारा किए राजसूय यज्ञ में आया था । तो इस चीन देश को लगभग 9 करोड़ वर्ष पहले ही तिब्बत के पार आर्यों में से ही निकली सूर्यवंशी क्षत्रीय चीना नाम की जाती ने अपने नाम से बसाया है । चीना शब्द का संस्कृत में अर्थ है तेज़ स्वास्थ्य वाले लोग । तो यही लोग जब हिमालय के दूसरी ओर में जाकर बसे तो इनकी भाषा और संस्कृती बदलती चली गई । लेकिन कुछ बातें इस जाती ने संजो कर रखी जैसे कि चीनी लिप्पी , प्रचीन ब्राह्मी लिप्पी ( जिसमें पहले संस्कृत लिखी जाती थी ) की तर्ज़ पर चित्रलिप्पी है जिसे चित्र बना कर समझाया जाता है । आज इसी चीना जाती को मंगोल जाती के नाम से जाना जाता है जो चीन में फैली और समय के साथ फिर दूर के द्वीपों पर विस्तृत होती गई , मंगोलिया, जापान, कोरिया आदि देशों तक यही पतित क्षत्रीयों का विस्तार हुआ है । ( प्रमाण :- Rigvedic India, p 180 - 181 )

प्रश्न :- अफगानिस्तान कैसे बसा ?

उत्तर :- आर्यों की एक पतित चन्द्रवंशी क्षत्रीय जाती जिसको प्रतिष्ठान कहा जाता था । तो यहाँ इस खैबर पख्तूनख्वा ( पाकिस्तान ) और आगे जो अफगानिस्तान है यहाँ की सत्ता को गणराज्य कहा जाता था । और ऐसे ही सात गणराज्य पूरी अफगानिस्तान की धरती पर फैले थे जिसको महाभारत में पाण्डवों ने जीत भी लिया था । जिनको सप्तगणों का नाम किसी काल में दिया गया था, और प्रतिष्ठानों ने आगे चलकर इसे उपगण या फिर अपगण के नाम से राज्य स्थापित किया है । जो ईस्लाम के आने से पहले अपगणस्थान ही कहलाता रहा है और शब्दों के समय के साथ भ्रष्ट होने के बाद बिगड़ बिगड़ कर ये अफगानिस्तान कहा जाने लगा । और प्रतिष्ठान नामक जाती ( पठान )के नाम से जानी जाने लगी । और ये अफ्रीदी लोग उस समय के गण लोग ही हैं । आज भी किसी समय के प्रतिष्ठान गणराजा महाराजा गजराज सिंह का बसाया हुआ शहर गजनी आज भी उसी नाम से जाना जाता है और महाभारत के प्रतिष्ठान गण राजा शकुनी के राज्य गान्धार का नाम आज कान्धार के नाम से जाना जाता है। ( प्रमाण :- Chips from german workshop, p. 235 )

प्रश्न :- बालोचिस्तान देश कैसे बसा ?

उत्तर :- किरात नामक क्षत्रीय जाती जिस स्थान पर बसी उस स्थान को ही बल में उच्च स्थान का नाम दिया गयप क्योंकि किरात लोग अपने पराक्रम के नाम से जाने जाते रहे हैं । और बल में उच्च होने के कारण देश को नाम दिया गया बल्ल उच्च स्थान , जो समय के साथ भ्रष्ट होकर बालोचिस्तान बन गया ।

प्रश्न :- ईरान देश कैसे बसा ?

उत्तर :- आर्यों के ही पतित रूप पारसी जो कि गण राज्यों से आगे निकल गए वहाँ उस देश को अपनी पूर्व जाती के नाम से बसाया जिसका नाम आर्यान रखा, जो कि समय पड़ने के साथ साथ ही ईरान हो गया । और ये पारसी लोग आर्यवर्त से ही नदियों के नाम भी लगे , जिससे कि इन्होंने अपने देश आर्यान की नदियों के नाम को रखा , जैसे कि हरहवती जो कि सरस्वति नदि का अपभ्रंश रूप है । और एक नदी का नाम सरयू के स्थान पर हरयू नदी रखा । ये वही सरयू नदी है जो उत्तर प्रदेश में बहती है । तो ऐसे ही ईरान देश बसा ।


प्रश्न :- मिस्त्र देश कैसे बसा ?

उत्तर :- मिस्त्र देश जिसको कि आजकल Egypt भी कहते हैं । अफ्रीका और एशिया को स्वेज़ नामक नहर ने प्रचीन काल से अलग कर रखा है । इस नहर को लांघकर ही आर्यों ने मिस्त्र देश को बसाया है । क्योंकि जैसे प्राचीन काल से ही नगरों को नदी के किनारे पर बसाने की प्रथा रही है ठीक वैसे ही आर्यों से पतित द्रविड़ियों और पणिकों ने नील नामक नदी के किनारे मिस्त्र देश को बसाया है । ये लोग Persian Gulf से होते हुए वहाँ अफ्रीकी देश मिस्त्र को गए हैं । मिस्त्र देश के तीन नाम हैं कमित, हपि और मिस्त्र । कुमृत् शब्द संस्कृत का है जिसका अर्थ है काली मिट्टी, तो जिस देश की मिट्टी काली है जो नील नदी के किनारे बसा है वह कुमृत् हुआ और समय के बीतने से ये नाम विकृत होकर कमित बन गया । अप का अर्थ है पानी नील नदी दुनिया में सबसे बड़ी है जिसके जल को अप और नदी को अपि जो समय के साथ बिगड़ कर हपि हो गया है । तीसरा शब्द है मिस्त्र जिसका संस्कृत में अर्थ हुआ मिश्रित तो यह नाम किस आधार पर पड़ा यह कहना कठिन है । और ये मिस्त्र निवासी ममीयों की कब्रों के लिए इमली की लकड़ीयों का प्रयोग करते रहे हैं । तो यह इमली की लकड़ी मद्रास प्रांत से ही वहाँ गई है जिससे सिद्ध है कि वे लोग आर्यों की शाखा हैं । इनके पिरामिडों की लिप्पीयों से पता चला है कि ये लोग अपने को सूर्यवंशी मानते थे और सूर्य की पूजा करते थे, और मनु को ही अपना मूल पुरुष समझते रहे हैं । जिससे कि ये लोग आर्य ही सिद्ध होते हैं । ( प्रमाण :- India in Greece p.178 )

प्रश्न :- अफ्रीका के बाकी देश कैसे बसे ?

उत्तर :- आर्यों की ही एक पतिति क्षत्रीय जाती थी झल्ल जिसने मिस्त्र पार करके अफ्रीका को बसाया है यही झल्ल लोगों को समय के साथ जुलू कहा जाने लगा । और अधिकतर ये लोग काले होते हैं । ऐतरेय ब्राह्मण के ३१ अध्याय के अन्त में मन्त्र आता है जिसमें लिखा है कि दुष्यन्त के पुत्र राजा भरत ने मष्णार नामक देश में सुवर्ण अलंकारों से युक्त बड़े बड़े श्वेत दाँतों वाले हाथीयों के एक सौ सात वृंद दान में दिए । और साथ ही इस मंत्र में लिखा है कि राजा भरत से पहले या बाद में ऐसा किसी और ने नहीं किया है । अब प्रश्न ये उठता है कि ये मष्णार देश है कहाँ पर ? Menual Of Geography देखने पर पता चलता है कि ये अफ्रीकाखण्ड में दक्षिणी रोडेशिया देश है, जहाँ मष्णा नामक स्थान है । पूर्व काल में यहाँ बहुत सोना होता था और हाथीयों की बहुतायात थी ऐसा वहाँ पर विद्यमान प्रचीन खण्डरों से पता लगा है । तो यही मष्णा नामक देश वही मष्णार है । जिसके बारे में ऐतरेय ब्राह्मण लिखता है । एक और प्रमाण इस प्रकार है कि भविष्य पुराण में आता है कि ( रथक्रान्ते नराः कृष्णाः प्रायशो विकृताननाः । आममांसभुजाः सर्वे शूराः कुंचितमूर्द्धजाः ) जिसका अर्थ है कि यहाँ मष्णार में रहने वाले लोग काले, विकृत मूँह वाले, कच्चा माँस खाने वाले और सिर से घुंघराले बाल वाले होते हैं । यही स्थिति आजकल सभी अफ्रीका वासीयों की है जिनको हम Nigros कहते हैं । तो ये लोग भी इसी प्रकार आर्यवर्त से यहाँ आकर किसी काल में बसे हैं ।

प्रश्न :- तो क्या सारी मानव जाती ही ऐसे आर्यवर्त से जा जाकर दूर देश में बसी है ?

उत्तर :- अवश्य ही ऐसा है कि आबादी बढ़ने के साथ साथ और ऐसे ही कुछ जाती बहिष्कार के दण्ड से ही मानव पूरी भूमी पर फैल गया है । और ऐसे ही अफ्रीका से युरोप देशों तक मानव का विस्तार हो गया है । तो ऐसे में पूरी मानव जाती एक ही सिद्ध होती है ।

प्रश्न :- लेकिन आर्य लोग तो बाहर के देशों से आए हम तो ऐसा मानते हैं और यहाँ के मूल निवासी तो तोई और हैं, क्ता ये बात गलत है ?

उत्तर :- आर्य लोग ही आर्यवर्त के मूल निवासी हैं, और बाहर किसी देश से आने का प्रश्न नहीं बल्की आर्य ही बाहर जाकर किसी दूसरे देशों में बसे हैं जैसे हमने कुछ देशों के उदाहरणों से आपको ऊपर सिद्ध किया है । हाँ आर्य लोग बाहर विदेशों में जाकर बसते रहे हैं और कुछ लोग वापिस घूम फिर कर अपने देश में आए हों तो बात मानने वाली हैं । तो मूल निवासी तो पूरी पृथिवी का मनुष्य एक ही है । आर्यों के बाहर विदेशों से आने की बातें तो ईसाईयों और अम्बेदकर वादीयों ने आर्यों से घृणा और द्वेष फैलाने के । उद्देश्य से लिखी हैं । क्योंकि उनकी बातें पक्षपात पूर्ण और तार्किक वैज्ञानिक आधार पर कहीं ठहरती नहीं हैं । और ये अम्बेदकर के पुत्रों का मान्सिक स्तर बिगड़ा हुआ है , जब इनसे पूछो कि आर्य लोग किस देश से आकर बसे थे ? तो पहले तो ये लोग उत्तर में ब्राह्मण ब्राह्मण चिल्ला कर आपको माँ बहन की गंदी गालीयाँ देंगे, और फिर कोई बोलेगा कि आर्य ईरान से आए ,कोई कहेगा युरोप से आए । तो ऐसे मूर्खतापूर्वक कुतर्क करके ये बौद्ध अम्बेदकरवादी अपने माता पिता के संस्कारों का प्रदर्शन करते रहते हैं ।

मानव जाती एक है ,अतः आर्यों लौट चलो वेदों की ओर ।।