देशद्रोही वामपंथी इतिहासकारों ने वीर सावरकर पर द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का आरोप लगाया है, उन्हें सर्वप्रथम "राष्ट्र" और "राज्य" शब्द में अंतर समझने की आवश्यकता है।एक राज्य में अलग-अलग विचारधारायुक्त अनेक राष्ट्र हो सकते हैं, राष्ट्र कोई भौगोलिक शब्द नहीं है। राष्ट्र अनेक सभ्यता, संस्कृतियों और विचारधाराओं का मेल होता है । 1937 में हिन्दू महासभा के 19 वें राष्ट्रिय अधिवेशन कर्णावती (अहमदाबाद) में सावरकर द्वारा दिए गए भाषण का स्पष्टीकरण उन्होंने नागपुर में 15 अगस्त 1943 को मराठी पत्र "आदेश" के कार्यालय पर पत्रकारों को दिया था। जो कि "आदेश"के 28 अगस्त 1943 के अंक में प्रकाशित हुआ था।-"यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मुस्लमान एक राष्ट्र हैं और इस्लाम भी एक सैद्धांतिक राष्ट्र है जो कि कुरान की शिक्षाओं पर आधारित है।यह राष्ट्र किसी राज्य की भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानता। कुरान के अनुसार धरती दो राज्यों में विभाजित है, दारुल इस्लाम और दारुल हरब। हिन्दूराष्ट्र ने अनेक स्थानों पर मुस्लिमराष्ट्र को पराजित करके हिन्दुओं की रक्षा करके हिन्दू पदपादशाही की स्थापना की । मुख्यतः हिन्दुओं के तबके ने कांग्रेस पर सवार होकर यह कहने का प्रयास किया कि भौगोलिक रूप से एक हिंदुस्तान में रहने के कारण हिन्दू और मुस्लिम एक राष्ट्र हैं मुसलमानों ने अपने अलग सैद्धांतिक राष्ट्रवाद को नहीं छोड़ा।"
सावरकर पर द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा का आरोप जड़ने से पहले 1988 में सर सैयद अहमद और कांग्रेस अध्यक्ष बदरुद्दीन अहमद के बयान पढ़ना आवश्यक है-"यह समझना कि भारत में रह रहे अलग-अलग जातियों व धर्मों के लोग एक राष्ट्र हैं या एक राष्ट्र हो सकते हैं,यह असंभव है।" "मुझे जानकारी नहीं है कि कोई भारत को एक राष्ट्र समझता है, भारत में अनेक समुदाय और राष्ट्र हैं ।" वीर सावरकर और हिन्दू महासभा द्वारा अंतिम समय तक विभाजन का विरोध किया गया इस बात का उल्लेख महामानव डा. अम्बेडकर नें अपनी पुस्तक "पाकिस्तान-द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया" में भी किया गया है।
वामपंथी इतिहासकारों द्वारा वीर सावरकर द्वारा 14 नवम्बर 1913 को गृह मंत्रालय, भारत सरकार को लिखे गए पत्र के आधार पर उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाये जाते है।उस पत्र में सावरकर नें नियमों के विरुद्ध उन पर हो रही ज्यत्तियों का उल्लेख किया है। पत्र में कहीं भी पश्चाताप या क्षमायाचना का भाव नहीं है न ही अंग्रेजों की प्रशंसा का एक शब्द है।अंग्रेजी में किसी भी अधिकारी को पत्र लिखने पर उसके प्रति सम्मान दिखने की यह पद्धति है न की समर्पण या पश्चाताप।ब्रिटिश अधिकारी रेनाल्ड क्रैडॉक ने स्वयं ब्रिटिश सरकार को लिखा था कि सावरकर के पत्र में सरकार की कोई प्रशंसा नहीं की गयी है, न तो पश्चाताप का कोई भाव नहीं है न ही सावरकर ने ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगी है। वीर सावरकर एक सच्चे कर्मयोगी थे जिन्होंने अपने कर्तव्यपथ का निर्वहन बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के किया। वीर सावरकर का मानना था कि मरकर कोई जंग नहीं जीती जाती इसलिए शिवाजी महाराज का अनुसरण करते हुए उनका पत्र एक दूरगामी कूटनीति थी।
1925 में संघ की स्थापना के बाद ही हिन्दू महासभा के पूर्व अध्यक्ष डा. मुंजे के मित्र व ब्रिटेन के दुश्मन मुसोलिनी द्वारा संघ को आर्थिक सहायता दी जाती थी तो संघ व हिन्दू महासभा पर अंग्रेजों का सहयोगी होने का आरोप पूर्णतयः हास्यास्पद है।अगर वामपंथी यह कहते हैं की संघ नें 1942 में गांधी का साथ नहीं दिया था इस वजह से आज़ादी नहीं मिल पायी तो फिर जब गांधी इतना जनाधारविहीन व्यक्ति था तो उसके सर पर 1947 की आज़ादी का सेहरा बांधना लाखों ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों के साथ अन्याय है। २२ जून 1940 को बंबई में फॉरवर्ड ब्लॉक के सम्मलेन में भाग लेने के बाद नेताजी-सावरकर की ऐतिहासिक भेंट सावरकर सदन,बंबई में हुयी। वीर सावरकर की प्रेरणा व सहयोग से नेताजी जर्मनी व जापान गए जहाँ पर जापान हिन्दू महासभा अध्यक्ष रासबिहारी बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का गठन किया था, उसकी कमान नेताजी को सौप दी गयी। सावरकर द्वारा "राजनीती का हिन्दुकरण और हिन्दुओं का सैनिकीकरण" के आह्वान के बाद हजारों हिन्दू युवाओं नें ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर शस्त्र शिक्षा ली। ब्रिटिश सेना में हिन्दू सैनिकों की संख्या 30 प्रतिशत से बढ़कर 70 प्रतिशत हो गयी। उसी सेना द्वारा बम्बई में नेवी बिद्रोह होने पर अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा जिसका वर्णन 1946 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटनी द्वारा विपक्ष के नेता चर्चिल के प्रश्न के जवाब में हाउस ऑफ़ कॉमन्स में किया गया था।
"विभाजन मेरी लाश पर होगा" ऐसा झूठा आश्वासन देने वाले अंग्रेजो के एजेंट तथाकथित राष्ट्रपिता द्वारा 14 जून 1947 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सदस्यों को विभाजन के पक्ष में मत करने के लिए मज़बूर किया गया और विभाजन का कम्युनिस्टों द्वारा पूर्ण समर्थन किया गया। विभाजन की विभीषिका के बाद पश्चिमी पाकिस्तान से लुट-पिटकर आने वाले असहाय हिन्दू-सिखों की संघ स्वयंसेवकों द्वारा की गयी सेवा व सहायता सर्वविदित है।
किसी भी इतिहास का अध्ययन पूर्ण सन्दर्भ में करना आवश्यक होता है है जिससे की पक्ष व विपक्ष के पहलुओं का सामान रूप से अवलोकन किया सके।

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