'पीके' कोई ऐसी चलचित्र (मूवी) नहीं है जिसकी कहानी लिखी, कलाकार बुक किये, निर्देशन में एक्टिंग करवाई, समादित (एडिटिंग) किया, और रिलीज़ कर दिया| अपितु यह एक विवादास्पद मूवी है जिसने सीधे सीधे धार्मिक अधिकता एवं अन्धता को लक्षित किया है|
पहले यह जानते है कि आज के समय में एक सुपरहिट मूवी बनाने के लिए किन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है| एक बेहतरीन कहानी जिसमें सच्चाई भी हो, तड़का भी, और एक सामाजिक सन्देश भी| कहानी ऐसी होनी चाहिए जो देखे वो याद रखे| इसके अलावा किरदार को निभाने के लिए एक बेहतरीन सुपरस्टार कलाकार जो उस कहानी को फिल्म में जीवंत कर सके| पीके की कहानी कुछ ऐसे ही दो तथ्यों का शुद्ध मिश्रण है|
अब्राहम थॉमस कोवूर – पीके का प्रथम ईसाई संपर्क-
अब्राहम थॉमस कोवूर – एक ऐसा नाम जो जिसे सभी व्यक्तियों ने पहले कभी नहीं सुना होगा, मगर यह नाम पीके फिल्म बनाने वाले कलाकारों एवं निर्माताओं के लिए नया नहीं है| जानते हैं क्यूँ? क्यूंकि पीके के कहानी इन श्रीमान अब्राहम थॉमस कोवूर के जीवनचरित पर आधारित हैं| अब जानते हैं कि ये श्रीमान हैं कौन? अब्राहम थॉमस कोवूर एक थिरुवाल्ला, केरल के थॉमस क्रिस्चियन परिवार में जन्मे एक प्रोफेसर थे| इनका पूरा जीवन ईसाई धर्म की सेवा और विस्तार में अपना पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया था| सेवानिर्वित होने के बाद अब्राहम थॉमस कोवूर ने भारत तथा श्रीलंका के कई अन्धविश्वास फ़ैलाने वाले बाबाओं का पर्दाफ़ाश करना शुरू कर दिया था| मगर इन सभी में एक बात समान थी और वो यह कि सभी लक्षित बाबा लोग एक ही धर्म के थे, हाँ आप सही हैं| हिन्दू धर्म ही उनका एकमात्र लक्ष्य था तथा उनका मानना था कि यह धर्म मूर्तिपूजकों का है जो अन्धविश्वास और डर से उन देवताओं की पूजा करते हैं जो हैं ही नहीं| इन जनाब ने कुछ चुनातियाँ तैयार करी थी जिनको पूरा करने पर एक लाख श्रीलंकन रुपये का इनाम था| थॉमस कोवूर ने सत्य साईं बाबा, पन्दरिमलाई स्वमिगल, नीलकंठ तथाजी, महेश योगी, हज़रत अली आदि सभी मौजूदा सिद्ध योगियों को आमंत्रित किया था मगर आजतक उनकी चुनोतियाँ कोई पूरी नहीं कर सका| कोवूर ने कुछ किताबें भी लिखी जैसेकि बेगोने गॉडमेन, गोडस डेमन्स एंड स्पिरिट्स, तथा युक्तिचिंता| इन पुस्तकों के हिंदी तथा मलयालम सहित कई भाषाओँ में अनुवाद हुए| जिसने भी ये किताबें पढ़ी उनका एक ही लक्ष्य बन गया हिन्दू धर्म का विरोध| अब्राहम थॉमस कोवूर ने अपने जीवन, कार्यों, तथा किताबों से का उपयोग ईसाई धर्म धर्मांतरण में किया| प्रकाश सिंह बादल, पंजाब के 2008 में मुख्यमंत्री ने गोडस डेमन्स एंड स्पिरिट्स के पंजाबी अनुवाद को निषेध (बैन) कर दिया| इसका अनुवाद मेघ राज मित्र कर रहे थे| आप समझ सकते हैं कि अब्राहम थॉमस कोवूर के कार्य एवं किताबें कितनी विवादस्पद हैं| अब्राहम थॉमस कोवूर कि सितम्बर 1978 में मृत्यु के पश्चात् ईसाई धर्म के पैरोकार उनके कार्यों एवं साहित्य का इस्तेमाल ईसाई धर्मान्तरण में कर रहे हैं|
अब्राहम थॉमस कोवूर ने कुछ मुक़दमे भी थे तथा उनकी केस डायरी पर कुछ फ़िल्में भी बनीं थी जैसेकि ‘पुनर्जनम’ मलयालम फिल्म, ‘मरू पिरावी’ तमिल फिल्म, ‘निन्थाकथा’ तेलुगु फिल्म| और अब पीके जैसी विवादस्पद फिल्म इन्हीं कोवूर पर बनी है|
अन्य तथ्य
अन्य तथ्य
आमिर खान एक बेहतरीन सुपरस्टार हैं जिन्हें परफेक्शनिस्ट खान भी कहा जाता है| मगर क्या पीके जैसी फिल्म बिना किसी उच्च अधिकारी के हस्तक्षेप के बन सकती है| नहीं कतई नहीं क्यूंकि सेंसर बोर्ड के पास अधिकार होते हैं कि वो किसी विवादस्पद फिल्म को रोक सकें या उस फिल्म के विवादास्पद दृश्य काट सकें| पीके के रिलीज़ में यही मदद करी लीला सेमसन ने| यह जानने से पहले कि क्या किन्हीं और फिल्मों के दृश्य भी कटे हैं इससे पूर्व लीला सेमसन के जीवन परिचय पर थोडा प्रकाश डालते हैं|
लीला सेमसन – पीके का द्वितीय ईसाई संपर्क-
राजीव मल्होत्रा अपनी पुस्तक ब्रेकिंग इंडिया (हिंदी में – भारत विखंडन) में पृष्ठ 143 पर लिखते हैं कि लीला सेमसन ने अपने कार्यकारी जीवन की शुरुआत भरतनाट्यम से की थी| उन्होंने रुक्मिणी देवी से नृत्य सिखा था|
रुक्मिणी देवी अरुंडेल का देश को योगदान-
रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने भरतनाट्यम के उत्थान में सर्वोपरि भूमिका निभाई थी| उनसे पहले भरतनाट्यम को तुच्छ दृष्टि से देखा जाता है| जॉर्ज अरुंडेल से विवाह के पश्चात उन्होंने भरतनाट्यम के क्षेत्र में कदम रखा और उस समय की प्रमुख कलाकार ई कृष्णा इयेर से नृत्य सिखा था| रुक्मिणी देवी ने निजी मंचों से बाहर निकलकर बरगद के पेड़ के नीचे अन्नत अंधकार के प्रतीक कपडे के सामने भरतनाट्यम करना आरम्भ किया| वो रुक्मिणी देवी अरुंडेल ही थीं जिन्होंने भरतनाट्यम में सर्वप्रथम पारंपरिक मंदिरों पर आधरित पारंपरिक वेशभूषा तथा देवियों जैसे आभूषणों का प्रयोग किया था| इतना ही नहीं भरतनाट्यम में हिन्दू धर्म को उतरने का श्रेय भी रुक्मिणी जी को ही जाता है| महर्षि वाल्मीकि जी की रामायण, जयदेव रचित ‘गीत गोविन्द’, कुमार संभवं, तथा उषा परिनायम से प्रेरणा लेकर उन्होंने भरतनाट्यम में सीता स्वंयवर, श्रीराम वन्गामनाम, पादुका पट्टाभिषेकम, शबरी मोक्षं, तथा अन्य नाटकों का मंचन किया| इन्होने ने ही जनवरी 1936 में अपने पति जॉर्ज अरुंडेल के साथ मिलकर कलाक्षेत्र की स्थापना की थी|
लीला सेमसन की लीलाएं-
ऐसे उज्जवल गुणों से परिपूर्ण रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने बाल्यकाल में उनके कलाक्षेत्र में प्रवेश पाने आई लीला सेमसन को प्रवेश देने से लगभग मना ही कर दिया था| कारण यह था कि भरतनाट्यम पूर्णरूपेण हिन्दू धर्म से ओतप्रोत है परन्तु दूसरी ओर लीला सेमसन पूर्ण तरह कैथोलिक क्रिस्चियन पृष्ठभूमि से आती थीं| पता नहीं, किस अनपेक्षित दबाव के कारण रुक्मिणी देवी को लीला सेमसन को अपने कलाक्षेत्र में प्रवेश देना पड़ा| समय के साथ लीला सेमसन ने काफी अच्छा भरतनाट्यम सिखा तथा अपनी मेहनत के परिणामस्वरूप लीला सेमसन को 2005 में कलाक्षेत्र का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था| इन लीला की लीला तो देखिये, शिव के नटराज रूप को पहले तो कलाक्षेत्र से हटाया फिर उसके बाद गणेश वंदना भी पूरी तरह से हटा दी गई| कलाक्षेत्र से भगवान् गणेश की कई मूर्तियाँ हटा दी गयीं थी| हिन्दू वोईस अख़बार के विरोध करने के बाद भगवान् गणेश की सिर्फ एक मूर्ति वहां रखी गयी थी| स्वयं श्री श्री रविशंकर जी ने इस बात का विरोध किया था|
इसके अलावा रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने नार्थाना विन्याकर के साथ मिलकर कलाक्षेत्र का जो प्रमाणपात्र बनवाया था उसमें भगवान् शिव का चित्र था जिन्हें लीला सेमसन ने हटवा दिया था| इसी तरह लीला ने कलाक्षेत्र के चिन्ह (लोगो) को भी बदल दिया और उसमें से भगवान् गणेश जी का चित्र हटा दिया था|
इतना ही नहीं लीला सेमसन शिव, पार्वती, गणेश, हनुमान आदि हिन्दू देवताओं की सुपरमैन, बैटमैन, कैटवुमन आदि काल्पनिक कलाकारों से करती थी तथा कहती थी कि भगवान् है ही नहीं| एक सुबह उन्होंने कलाक्षेत्र के विद्यार्थियों से कहा था कि वो मूर्तिपूजा ना करें क्यूंकि यह अन्धविश्वास है|
लीला सेमसन के अन्य योगदान-
सिर्फ धार्मिक विवाद ही नहीं अपितु जब कलाक्षेत्र के एक कर्मचारी टी थॉमस ने आर०टी०आई० दर्ज करी तो वितीय अनिमिताओं का भी खुलासा हुआ| लीला सेमसन ने 2011 में कथाम्ब्लम ऑडिटोरियम में आर्किटेक्चर और साउंड का 62 लाख का ठेका सभी नियमों को ना मानते हुए एक ठेकेदार को दिया तथा उसका कोई भी हिसाब किताब नहीं प्रस्तुत किया| इसी तरह लीला ने लगभग आठ करोड़ रुपये के ठेके नियमों की अवेहलना करते हुए दिए जिनका कोई भी उचित हिसाब किताब नहीं दिया गया था| इनके साथ ही विडियो बनाने का 3 करोड़ का ठेका एक निजी कंपनी मेसर्स मधु अम्बाट को दिया गया| भारत सरकार के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सी०ए०जी०) ने जांच में पाया कि विवादित कंपनी को ऐसे किसी भी काम का अनुभव नहीं है| सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा जाने के बाद लीला सेमसन को कलाक्षेत्र के निदेशक (डायरेक्टर) के पद से 2012 में इस्तीफा देना पड़ा परन्तु लीला 2014 तक संगीत नाटक एकादमी की अध्यक्ष बनी रहीं|
इसके साथ ही सी०ए०जी० रिपोर्ट ने उल्लेखित किया कि लीला ने आने सात साल के कार्यकाल में कलाक्षेत्र ऑडिटोरियम के मंदिर रूपी निर्माण को नवीनीकरण के नाम पर तुडवाया तथा दुबारा बनवाया जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी क्यूंकि पुराना भवन अत्यधिक मजबूत तथा नए ढांचे की अपेक्षा अधिक महतवपूर्ण था| इसके अलावा लीला ने 16 से अधिक पदों पर गलत नियुक्तियां की थीं एवं खुद लीला सेमसन ने खुद अपनी योग्यता के झूठे प्रमाणपत्र दिए थे|
लीला सेमसन का भरतनाट्यम को पुरस्कार-
आश्चर्यजनक बात यह है कि लीला सेमसन 1 अप्रैल 2011 से 2012 तक भारत में एक साथ तीन महत्तवपूर्ण संस्थाओं के डायरेक्टर के पद पर आसीन थीं – कलाक्षेत्र, संगीत नाटक अकादमी, और सेंसर बोर्ड| अभी भी वो सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा हैं और उनकी ईसाई समर्थक कार्यशैली किसी से छुपी नहीं है| आप पूछेंगे कि क्या नुकसान हुआ लीला सेमसन की वजह से? तो दो टूक सुनिए –
ईसाई पति के होने के बाद भी रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने भरतनाट्यम में निहित हिंदुत्व को अधिक बढ़ावा दिया था| परन्तु लीला सेमसन ने तो वह किया जो कोई अन्य ना कर सका| भगवे रूपी हिन्दू भरतनाट्यम को श्वेत वस्त्रधारी ईसाई बनाने में अपना योगदान दिया|
पहले रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने श्रीराम, भगवान् शिव तथा माता पार्वती से जुड़ी कथाओं तथा भावभंगिमाओं को शामिल किया था परन्तु उनकी शिष्या लीला सेमसन ने भरतनाट्यम में इन सभी को हटाकर पहले तो भरतनाट्यम को तटस्थ किया था| इसके साथ ही भरतनाट्यम का ईसाई धर्मांतरण करने में लीला सेमसन का हाथ था| जैसेकि भरतनाट्यम में ईसाईयत मुद्राएँ जैसेकि जीसस का जन्म, जीसस का उदेश देना, जीसस का सलीब पर चढना, तथा जीसस का पुनः अवतरित होना|
जानते हैं कि लीला सेमसन ऐसा करने में कामयाब कैसे हुयी तथा कैसे झूठे दस्तावेजों एवं वितीय अनिमिताओं के बावजूद भी उन पर कोई कार्यवाही क्यूँ नहीं हुयी? क्यूंकि लीला सेमसन प्रियंका गाँधी वाड्रा की नृत्य अध्यापिका (डांस टीचर) थीं और उन पर श्रीमती सोनिया गाँधी का वरदहस्त का होना माना जाता है|
सेंसर बोर्ड के गलत मापदंड-
जब लीला सेमसन के सामने पीके आई तो उन्होंने इसे तुरंत ही पास कर दिया मगर 2012 में आई ‘कमाल धमाल मालामाल’ में असरानी जी के उन दृश्यों को काट दिया था जिनमें वो एक ईसाई पादरी बने हुए पैसों की माला लिए हुए हैं|
कमाल धमाल मालामाल बनाम पीके-
अब आप ही निम्न दृश्य देख कर बताएं कि यदि ईसाईयों की भावनाएं पैसों की माला से आहात हो सकती हैं तो क्या हिन्दुओं की भावनाएं भगवान् शिव से बदतमीज़ी के दृश्य से आहत नहीं होगी|
| पीके के वह दृश्य जो विवादास्पद तो है मगर हटाये नहीं गए हैं|चित्र स्त्रोत –kemmanu.com | कमाल धमाल मालामाल का वह दृश्य जो विवादास्पद थे और जिन्हें हटा दिया गया था|चित्र स्त्रोत – etcpb.com |
विश्वरूपम का उदहारण-
इसी तरह 2013 में आई कमल हसन की फिल्म विश्वरूपम फिल्म में से कई दृश्य हटाये गए जैसेकि कुरान की कुछ आयतें जिन्हें डायलॉग के रूप में प्रयोग किया गया था, एक दृश्य जिसमें एक अमेरिकी व्यक्ति को क़त्ल करते हुए आतंकवादी अल्लाह की बड़ाई करता है आदि आदि| क्या यह दृश्य गलत हैं जो हटा दिए गए?
यदि हाँ तो उपरोक्त लगे हुए दृश्य कौन से सही हैं| क्या भगवान् शिव वास्तव में इस तरह किसी मानव से डरकर भागते हैं या भगवान् शिव का किरदार निभाने वाले नाटककार अपने शिवरूपी वस्त्र और अलंकर के साथ सुलभ शौचालय जाते हैं और उनके साथ कोई इस तरह दुर्व्यवहार करता है?
‘रंग दे बसंती’ का बदला ‘पीके’ से
आमिर खान की 2006 में एक फिल्म आई थी – ‘रंग दे बसंती’ जिसके कुछ दृश्य विवादस्पद थे तथा सेंसर बोर्ड ने वह दृश्य रिलीज़ होने से पूर्व ही काट दिए थे| क्या आमिर खान ने ‘रंग दे बसंती’ का बदला जानबूझकर ‘पीके’ से निकाला है? आमिर खान ऐसे कलाकार हैं जिन्हें अगर फिल्म का निर्देशन पसंद नहीं आता तो वह स्वयं करते हैं जैसाकि उन्होंने ‘तारे जमीन पर’ फिल्म के निर्माण के दौरान किया था| जब तक एक दृश्य उनके हिसाब से उत्तम गुणता का ना हो| तो क्या आमिर खान को इन विवादास्पद दृश्यों को तुरंत ही शूटिंग के समय ही नहीं हटा देना चाहिए था|
शर्मिला टैगोर बनाम लीला सेमसन
श्रीमती शर्मिला टैगोर खान पटौदी 13 अक्टूबर 2004 से 31 मार्च 2014 तक सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा थीं| उन्होंने अपना कार्यभार पूरी ईमानदारी से निभाया तथा हर फिल्म को तार्किक दृष्टिकोण से तोला| जहाँ एक तरफ उन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए फिल्मों में धूम्रपान तथा शराब के सेवन का आरम्भिक विरोध किया परन्तु बाद में स्वीकार किया था वहीँ दूसरी और उन्होंने ‘कमीने’ एवं ‘ये साली ज़िन्दगी’ जैसी फिल्मों के नामों पर भी अपनी चिंताएं मुक्त रूप से व्यक्त कीं थी| परन्तु इन फिल्मों को मंजूरी दी गयी क्यूंकि यह फ़िल्में कुछ गलत नहीं दिखाती थीं तथा ना ही किसी समुदाय की भावनाएं आहत करती थीं| उल्लेखनीय हैं कि उन्होंने ‘रंग दे बसंती’ के कुछ दृश्य खुद ही प्राम्भिक परिक्षण में काट दिए थे तथा इन्हें भारत की वायुसेना को भी दिखाया था ताकि कोई सुरक्षा संदेह ना रह जाए|
दूसरी और लीला सेमसन 1 अप्रैल 2014 में सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा बनीं| उन्हीं के शासनकाल में ‘कमाल धमाल मालामाल’, ‘विश्वरूपम’, तथा हाल ही में रिलीज़ हुयी कन्नड़ फिल्म ‘शिवम’ के दृश्य काटे गए| ‘शिवम्’ तथा ‘विश्वरूपम’ के दृश्य मुस्लिम समुदाय तथा ‘कमाल धमाल मालामाल’ के दृश्य ईसाई समुदाय की आपत्ति की वजह से हटाये गए थे| क्या हिन्दू धर्म के लोगों की आपत्ति के कोई मायने तथा महत्व नहीं है?
लीला सेमसन से अनुरोध है कि फ़िल्में यदि सिर्फ मनोरंजन के लिए हैं तो किसी भी फिल्म से दृश्य काटने बंद करें| अगर समुदायों तथा धर्मों की आपत्ति सुनती हैं तो पीके के दृश्य भी काटें? यदि नहीं तो आप अपना कार्य ईमानदारी से नहीं कर रही हैं|
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