Monday, 11 January 2016

अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक मंत्रालय के नाम पर तुष्टिकरण का खेल ।




भारत के गृह मंत्रालय के संकल्प दिनांक 12.1.1978 की परिकल्पना के तहत जनता पार्टी सरकार द्वारा अल्पसंख्यक आयोग(जिसका सविधान में कोई वर्णन नहीं है) की स्थापना की गई थी। इस आयोग का मुख्य उद्देश्य था अल्पसंख्यक कहाने वाले वर्गों को क्रमश: एकात्म राष्ट्रीय समाज का अभिन्न अंग बनाना पर, उसने इस दायित्व को निभाने की बजाय अल्पसंख्यकवाद को और गहरा किया, पृथकतावाद की दिशा में धकेला|वर्ष 1984 में कुछ समय के लिए अल्पसंख्यक आयोग को गृह म़ंत्रालय से अलग कर दिया गया था तथा कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत नए रूप में गठित किया गया। कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा बिना संसद से कानून बनाये 23 अक्टूबर,1993 को अधिसूचना जारी कर अल्पसंख्यक समुदायों के तौर पर पांच धार्मिक समुदाय यथा मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध तथा पारसी समुदायों को अधिसूचित किया गया था। अल्पसंख्यक आयोग में एक अध्यक्ष, पांच सदस्य और एक सचिव होते हैं जिनका प्रत्येक का वेतन 80 ,000 प्रति महीना है। अन्य लगभग 60 कर्मचारियों का वेतन 20,000 से 70,000 रुपये प्रति महीना होता है। वैसे तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना के बाद ही अल्पसंख्यक आयोग की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है परन्तु फिर भी तुष्टिकरण की राजनीति के चलते विभिन्न पार्टियों की सरकारों द्वारा इसे प्रश्रय प्रदान किया जा रहा है।


                  2005 में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री आर.एस. लाहोटी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने एक निर्णय में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को भंग करने का सुझाव दिया था। बेंच ने अल्पसंख्यक आयोग को सामाजिक परिस्थितियां विकसित करने के तरीकों को बतलाने के लिए कहा था जिससे कि निर्धारित अल्पसंख्यकों की सारणी को कम किया जा सके और साथ ही साथ उन्हें खतम किया जा सके। भाषाई अल्पसंख्यकों के साथ एक राज्य के अंदर अलग- अलग व्यवहार समझा जा सकता है परन्तु यदि वैसा ही व्यवहार धार्मिक आधार पर बढ़ावा दिया जाता है तो देश में जहाँ कि पहले से ही विघटनकारी शक्तियों के कारण वर्गगत और सामाजिक टकराव मौजूद हैं वहां आगे भी धार्मिक विभिन्नता के आधार पर विभाजन की रेखा खिंचेगी। धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान करने से समाज अन्य वर्गों में भी सवैधानिक गारंटी के भाग के चलते सामाजिक सुरक्षा और विशेषाधिकारों की चाहत बढ़ेगी। इन विखंडनपूर्ण प्रवत्तियों को बढ़ावा देना भारत के पंथनिरपेक्ष संवैधानिक गणतंत्र के लिए एक गंभीर आघात है। पंथनिरपेक्षता का आशय है कि-"राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा और राज्य सभी धर्मों और धार्मिक समूहों के साथ उनके व्यक्तिगत धार्मिक अधिकारों, विश्वास और पूजा पद्धतियों के मामलों में बिना हस्तक्षेप करते हुए समान व्यवहार करेगा।"

                राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जोड़क के बजाय तोड़क की भूमिका अपना रहा है जबकि इसका उद्देश्य भारत के विभिन्न वर्गों में बहुराष्ट्रवादिता की भावना को पनपने से रोंकने वाला होना चाहिए। इन आयोगों की अध्यक्षता व सदस्यता को सत्तारूढ़ दल के अनुग्रह के रूप में देखा जाता है, इसलिए उस दल केस्वार्थों को पूरा करना आयोग का लक्ष्य बन जाता है। संविधान का उद्देश्य था कि ऐसी सामाजिक परिस्थितियां विकसित हों जिससे कि अल्पसंख्यक या बहुसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता न हो।

              2006 में कांग्रेस सरकार द्वारा अलग से एक अल्पसंख्यक मंत्रालय की स्थापना की गयी थीजिसमें 29 जनवरी 2006 को ए. आर. अंतुले को अल्पसंख्यक मामलों का मंत्री फिर 19 जनवरी 2009 से 28 अक्टूबर 2012 तक सलमान खुर्शीद अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री रहे जिन्होंने एक करोड़ अल्पसंख्यक बच्चों को छात्रवृत्तियां बांटकर मुस्लिम तुष्टिकरण का नया कीर्तिमान स्थापित किया। इसके बाद 16 मई 2014 तक के. रहमान खान अल्पसंख्यक मंत्री रहे। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 26 मई, 2014 क़ो भाजपा सरकार बनने पर अल्पसंख्यक मंत्रालय को समाप्त करने के बजाय इसे जारी रखते हुए नजमा हेपतुल्ला को अल्पसंख्यक मामलों का मंत्री बनाया गया। फिर 11 नवम्बर 2014 को मुख़्तार अब्बास नकवी के भी अल्पसंख्यक मंत्रालय में राज्यमंत्री बनने पर पहली बार इस मंत्रालय में दो पूर्णकालिक मंत्री हो गए हैं।

              भारत की जनता द्वारा गाढ़ी कमाई से दिए हुए टैक्स के पैसे को अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा तुष्टिकरण करतेहुए लुटाया जा रहा है और यहाँ तक कि विश्वबैंक तक से 300 करोड़ का कर्ज लेकर अल्पसंख़्यकों के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। भारत में वोटबैंक की चाहत के चलते रीढ़विहीन नेताओं द्वारा छद्मराष्ट्रवाद का नकाब ओढ़े अनवरत रूप से अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण किया जा रहा है जिसके फलस्वरूप विभिन्न वर्गों के बींच सामाजिक विद्वेष की खाई लगातार बढ़ते हुए सामाजिक परिस्थितियां आज विध्वंशक स्थिति तक पहुँच चुकी हैं।

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