Friday, 23 March 2012

हिन्दू शब्द का रहस्य - ये मुस्लिम आक्रांताओ की देन नहीं..


एक भ्रांति प्रचलित है कि हिन्दू शब्द विदेशी आक्रांताओ की देन है ... सनातन धर्म मे ये शब्द कभी नहीं था ,तथा भौगोलिक स्थिति के आधार पर ही देश का नाम हिंदुस्तान पड़ा ... ये बात सही नहीं है ..हमारे सनातन धर्म के अनेक ग्रंथो में ये शब्द है... हालांकि उस समय ये न के बराबर ही प्रचलित थे किन्तु प्राचीन काल से ही सनातनियो को हिन्दू कहा जाता था , इरानियों तथा आक्रांताओ ने इसे अधिक प्रचलित कर दिया बस ..बात ये है कि आजकल सनातनियो को अपने धर्मशास्त्रो का ज्ञान नगण्य है जिस कारण वो शीघ्र ही बहकावे में आ जाते है अथवा किसी विद्वान के कोई बात कहने पर उसे ही सच मान लेते है ...ऐसी भ्रांतियों के प्रचलित होने का कारण ऐसे ही धर्मगुरु है जो कि वास्तविकता से लोगो को अनभिज्ञ रखते है अथवा स्वयं उन्हे ज्ञान नहीं होता..... अब अगर कोई कहे कि अब तक और कोई इस विषय पर क्यो नहीं बोला तो भैया आधुनिक सभी विद्वानो को पता है कि अललोपनिषद अकबर ने लिखवाया था ... पर इस पर कितने धर्मगुरु बोले ? ऐसे धर्म के ठेकेदारो को सिर्फ अपनी दुकान चलाने से मतलब है ... हिन्दू शब्द के विषय मे कुछ प्रमाण अग्रलिखित है - - -
१-ऋगवेद में एक ऋषि का नाम 'सैन्धव' था जो बाद में " हैन्दाव/ हिन्दव " नाम से प्रचलित हुए

२- ऋगवेद के ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दू शब्द

हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।
( हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं)

३- मेरु तंत्र ( शैव ग्रन्थ) में हिन्दू शब्द
'हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्चते प्रिये'
( जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं)

४- यही मन्त्र शब्द कल्पद्रुम में भी दोहराई गयी है
'हीनं दूषयति इति हिन्दू '

५-पारिजात हरण में "हिन्दू" को कुछ इस प्रकार कहा गया है |
हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टमानसान ।
हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिंदुरभिधियते ।।

६- माधव दिग्विजय में हिन्दू
ओंकारमंत्रमूलाढ्य पुनर्जन्म दृढाशयः ।
गोभक्तो भारतगुरूर्हिन्दुर्हिंसनदूषकः ॥
( वो जो ओमकार को ईश्वरीय ध्वनी माने, कर्मो पर विश्वाश करे, गौ पालक, बुराइयों को दूर रखे वो हिन्दू है )

७- ऋग वेद (८:२:४१) में 'विवहिंदु' नाम के राजा का वर्णन है जिसने ४६००० गएँ दान में दी थी|
विवहिंदु बहुत पराक्रमी और दानी राजा था ऋग वेद मंडल ८ में भी उसका वर्णन है|

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