भारतीय इतिहास और वर्तमान मुस्लिम सूफी,पीर और फकीरों को इस्तेमाल कर
उदारवादी,मध्यममार्गी और हिन्दुओं के निकट चेहरा जानकर उसकी प्रशंसायें की जाती हैं।
उदारवादी,मध्यममार्गी और हिन्दुओं के निकट चेहरा जानकर उसकी प्रशंसायें की जाती हैं।
आज भी भारतीय आम हिन्दू समाज उनको बड़े मन-सम्मान की द्रष्टि से देखता है।
हम लोगों का यह विश्वास है की सूफीवाद भारतीय दर्शनके भक्ति और योग की
इस्लामिक पैदावार है। जबकि सत्य यह है की सूफी पीर-फकीर हिन्दुओं का
इस्लामीकरण करने वाली वैसी ही संस्थाएं है जैसे की चर्च और इसाईयत
सेवा माध्यम से फ़ैलाने वाली ईसाई मिशनरीज।
सूफियों के काले कारनामों पर प्रकाश डालने वाली कई पुस्तकें भी प्रकाशित
हो चुकी है। जिनमें से कुछ हैं- दि हिस्ट्री ऑफ़ सूफिज्म इन इंडिया
(लेखक सैरूयद अथर अब्बास अली रिज़वी),श्राईन एंड कल्ट ऑफ़ मोईनुद्दीन चिस्ती
ऑफ़ अजमेर(लेखक-पी.ऍम.करी),मुस्लिम इन इंडिया(लेखक-अबुल हसन अली नदवी),
इंडियन मुस्लिम हू आर दे तथा लिगेसी ऑफ़ मुस्लिम रूल इन इंडिया
(दोनों के लेखक- डा.के.एस.लाल)आदि।
सूफी मुस्लिम हर प्रकार से कटअर मज़हबी मुसलमन होते हैं जो हिन्दू काफिरों
और मुर्ति पूजकों(बुत परस्तों) का अपने प्रभाव से इस्लामीकरण करना और
उनके मूल धर्म से विमुख करना अपना मूल मज़हबी कर्त्तव्य समझते हैं।
और मुर्ति पूजकों(बुत परस्तों) का अपने प्रभाव से इस्लामीकरण करना और
उनके मूल धर्म से विमुख करना अपना मूल मज़हबी कर्त्तव्य समझते हैं।
११ वीं शताब्दी में विदेशी आक्रमण महमूद गजनवी से प्रारंभ हुआ।
भारत के इस्लामीकरण के उस चरण में अनेक इस्लामी आक्रमणकारी तलवार
और कुरान लेकर भारत में घुसे और उनके वंशजों ने तलवार के दम पर
इस्लाम का विस्तार किया, वहीँ दूसरी ओर उनके साथ-साथ अनेकों पीर-फकीर
और सूफी मुहँ में भजन,कीर्तन,चमत्कार के दावे तथा बगल में तलवार और कुरान
लेकर भारत में घुसते रहे। इनमें से अनेकों ने सूफी के बावजूद आवश्यकता पड़ने पर
हिन्दुओं से तलवार से जेहाद भी लड़े। परन्तु भारतीय इतिहास के विकृतीकरण,
सेक्युलरवाद व् हिन्दू समाज के अन्धश्रद्धावाद के कारण व् बहुदेव मतपंथ के
कारण उनमें से कई आज तक भी पिरो के रूप में पूजनीय बने हुए हैं।
सेक्युलरवाद व् हिन्दू समाज के अन्धश्रद्धावाद के कारण व् बहुदेव मतपंथ के
कारण उनमें से कई आज तक भी पिरो के रूप में पूजनीय बने हुए हैं।
जय श्रीराम कृष्ण परशुराम ॐ
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