Monday, 24 August 2015

संविधान का अनुच्छेद 30- हिन्दुओं के साथ का प्रत्यक्ष भेदभाव।

एक संदिग्ध अवधारणा- 'अल्पसंख्यकों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रबंधन', जिसका अनुमोदन विभाजन के समय 'चिंतित' मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के लिये सद्भावपूर्ण द्वष्टि से किया गया था, उसने आज भारत में ऐसी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि ये हिन्दुओं के साथ असमानता और भेदभाव का मुख्य का कारण  बन गया है। 
सविधान का अनुच्छेद-30 दो प्रकार के अल्पसंख्यकों को  परिभाषित करता है- भाषाई और धार्मिक। सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय के अनुसार 'अल्पसंख्यक कौन है' इसका निर्णय लिए राज्य भौगोलिक इकाई होगा(न कि अखिल भारत) जिसकी जनसंख्या के आधार पर वहां के अल्पसंख्यकों व बहुसंख्यकों का निर्धारण होगा। इनके बीच सविधान और न्यायलय नें ऐसे दुराग्रही परिणाम सुनिश्चित किये कि अब प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान 'अल्पसंख्यक संस्थान' का दर्जा चाहता है जिससे कि वह राज्य के हस्ताक्षेप से कुछ हद तक स्वाययत्तता पा सके, जिसके कुछ असंगत व विकृत परिणाम इस प्रकार हैं-

1. यदि आप तेलगू संस्थान हैं तो आपके पास आंध्र प्रदेश में  स्वाययत्तता नहीं है तो राज्य के हस्तक्षेप से बचने के लिए सर्वश्रेष्ठ रास्ता है कि इसे दिल्ली या गुजरात में स्थापित करें। गुजरती संस्थान महाराष्ट्र में और मराठी संस्थान कर्नाटक में अधिक खुश रहेगा। संक्षेप में, एक सही अवस्थिति के साथ कोई भी संस्थान स्वयं को अल्पसंक्यक घोषित कर सकता है, इसी ने वास्तव में कानून का मज़ाक बना दिया है।
2. अल्पसंख़्यकों को बिना किसी सुनिश्चित  संख्याबल के निर्देश के निर्धारित किया गया है और संविधान  में कहीं पर भी परिभाषित नहीं  किया गया है। क्या पारसी अल्पसंख्यक हैं? निश्चित रूप से क्यूंकि उनकी संख्या कुछ हजार में हैं। क्या मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं? जबकि देश में उनकी संख्या 25 करोड़ के आसपास है जो कि भारत को विश्व में दूसरा सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश बनाता है? मौलाना अबुल कलाम आज़ाद मुस्लिमों को अल्पसंख्यक नहीं मानते थे, उन्होंने मुस्लिमों को भारत का दूसरा बहुसंक्यक कहा था। 

3. चूँकि राज्य अल्पसंख्यक संस्थानों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता परन्तु बहुसंक्यक संस्थानों में कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप सभी बहुसंख्यक संस्थान राजनेताओं और नौकरशाहों का आसान शिकार बन गए हैं। इस प्रकार से कुछ दक्षिणी राज्यों में मन्दिरों का धन राज्य के खजाने के साथ मिला दिया गया है, जबकि वह धन राज्य से सम्बद्ध नहीं है। 
           भारत का सबसे धनी  मंदिर 'तिरुमाला  देवस्थानम' जिसके पास दस हजार करोड़ रुपये नकद है और सालाना 600 करोड़ रुपये का चढ़ावा आता है, इसका संचालन श्रद्धालुओं द्वारा नहीं बल्कि आंध्र सरकार के मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा किया जाता है। 
अनुच्छेद 30 का उद्देश्य अब लोगों द्वारा अपनी इच्छा के संस्थानों के प्रबंधन करने के अधिकार से होकर प्रायः बहुसंख्य्कों द्वारा वही विकल्प अपनाने से रोकना हो गया है। 
2002 में सर्वोच्च न्यायलय की 11 जजों के बेंच  द्वारा टीएमए पाई फाउंडेशन मामले में अनुच्छेद 19-1(g) के तहत  गैर-अल्पसंख़्यक शैक्षणिक संस्थानों को भी अल्पसंख़्यक संस्थानों के सामान अधिकार दिए गए परन्तु कांग्रेस सरकार द्वारा 2005 में किये गए 93वें संविधान संसोधन द्वारा एक अनुच्छेद 15(5) जोड़कर अल्पसंख़्यक संस्थानों को राज्य के किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से बाहर कर दिया गया। 
अनुच्छेद -30 के अनुसार- "अल्पसंख्यकों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना व प्रबंधन का अधिकार"
(i) सभी अल्पसंख्यक(धार्मिक व भाषाई) को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना व प्रबंधन का अधिकार होगा। 
(ii) राज्य शैक्षणिक संस्थानों को वित्तीय सहायता देने में इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि इसका प्रबंधन अल्पसंख़्यकों द्वारा किया जा रहा है, चाहे वो धार्मिक हो या भाषाई। 
        अनुच्छेद 30 का वास्तविक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव न हो और न ही उन्हें समान व्यवहार से वंचित किया जाये। परन्तु व्यवहारिक रूप से इसका तात्पर्य यह हो गया है कि गैर-अल्पसंख्यकों  को अपने हिसाब 'शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना  प्रबंधन' के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। 
         अनुच्छेद 30 और इससे सम्बंधित न्यायालयों के निर्णय जैसे कि सर्वोच्च न्यायलय द्वारा बिना सरकारी सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों में  'शिक्षा का अधिकार' के तहत गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से छूट  प्रदान की गयी। जिसे निरस्त करने या फिर से लिखने की आवश्यकता है।  2014 में मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा फेडरेशन कैथोलिक फेथफुल बनाम तमिल राज्य के मामले में सरकारी सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थान को भी आरक्षण से छूट प्रदान की गयी। 
           अनुच्छेद 30 को इस सामान्य का कारण  से निरस्त किया जा सकता है की अल्पसंख़्यकों द्वारा संस्थानों की स्थापना का अधिकार 'मानवाधिकार' और 'नागरिक अधिकार' के अंतर्गत पहले से ही समाहित हैं। चूँकि कोई भी भारतीय नागरिक कानून के दायरे में शैक्षणिक संस्थान स्थापित कर सकता है। स्वायत्तता का परिमाण राज्य द्वारा सहायता की मात्र पर निर्भर होना चाहिए।  
        यह भी महत्वपूर्ण ध्यान देने वाली बात है कि हिंदुत्व रूढ़िवादी नहीं है जिसे किसी परंपरागत धार्मिक सन्दर्भ की परिभाषा में बांधा जाये। भाषाई रूप से हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोली जाती है परन्तु अखिल भारत स्तर पर इसका भी बहुमत नहीं है। सांस्कृतिक दृष्टि से हम अल्पसंख़्यकों और विविधताओं वाले राष्ट्र हैं, हमें अल्पसंख़्यक अधिकारों से नहीं बल्कि सार्वभौमिक अधिकारों से संचालित होना चाहिए। 

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