उत्तर प्रदेश के दादरी के पास बिसहाड़ा गांव में कथित रूप से गाय की हत्या के बाद उपजे असंतोष के फलस्वरूप ग्रामीणों ने समुदाय विशेष के एक पिता-पुत्र की पिटाई कर दी जिसमें पिता की मृत्यु हो गयी और पुत्र गंभीर रूप से घायल हो गया। भारत में गौहत्या का पुराना इतिहास रहा है । मुगलकाल से ही मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दुओं को नीचा दिखने और उनपर बलपूर्वक अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए हथियार के तौर पर गौहत्या का उपयोग होता रहा है, जबकि धार्मिक दृष्टि से इस्लामिक पुस्तकों में कहीं पर भी गाय खाने का जिक्र नहीं हैं। वर्त्तमान में भारत के मुस्लमान चूँकि स्वयं को मुस्लिम आक्रमणकारियों के असली वंशज और सच्चा प्रतिनिधि मानते हैं इसलिए वे उनके अनैतिक कार्यकलापों को भी दोहराते हुए बहुसंख्यकों को नीचा दिखाने का प्रयास करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। जिन्हे आजकल 'खाने के अधिकार' या 'खाने की स्वतंत्रता' के नाम पर कुछ छद्मसेक्युलरिस्टों और घोर हिन्दू विरोधी वामपंथियों का प्रखर समर्थन मिलता है।इन सेक्युलरिस्टों और वामपंथियों का मुख्य उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण हिन्दू संस्कृति, भारतीय मान्यताओं व परम्पराओं पर कुठाराघात करके विदेशी आयातित संस्कृति को ऊँचा दिखाना होता है।
1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर के समय ही भारत के मुसलमानों में अपने पूर्वजों के इस्लामिक शासन के स्वर्णिम अतीत को पुनर्स्थापित करने की ललक रही है और वे उसी शासनकाल के आधार पर स्वयं को हिन्दुओं से श्रेष्ठ समझने का प्रयास करते हैं। मुस्लिमों की इसी प्रवत्ति का फायदा अंग्रेजों ने उठाया और उनके बीच अलगाववाद की आग को हवा दी। इसी अलगाववाद की प्रवत्ति के चलते और अपनी इस्लामिक विरासत को समृद्ध करने और आगे बढ़ाने की महत्वाकांक्षा के फलस्वरूप सन 1877 में सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की जिसने पाकिस्तान आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी, फिर उसी कड़ी में आगे 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की गयी। 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना के बाद सर सैयद ने मुसलमानों को आदेश दिया कि वे कांग्रेस में सम्मिलित हों। अपने इस आदेश के समर्थन में उन्होंने 28 दिसंबर 1887 को लखनऊ में, 14 मार्च 1888 को मेरठ में दिए भाषण में कहा- "भारत में एक नहीं, दो राष्ट्र हैं, जो इंग्लैंड और स्काटलैंड के समान घुल मिलकर एक नहीं हुए हैं। अगर अंग्रेज गये तो सत्ता की खाली कुर्सी पर कौन बैठेगा? दोनों तो नहीं बैठ सकते। कौन बैठे इसका फैसला कैसे होगा?"पाकिस्तानी विश्वविद्यालयों में मान्यता प्राप्त "ए शार्ट हिस्ट्री आफ पाकिस्तान" के खंड 4 के नौवे अध्याय में मुस्लिम राष्ट्रवाद का आरंभ बिन्दु 1857 के युद्ध में असफलता की प्रतिक्रिया को बताया गया है। इस अध्याय में बहुत विस्तार से बताया गया है कि भावी खतरे को सबसे पहले सैयद अहमद खान ने पहचाना। मुसलमानों के प्रति ब्रिाटिश आक्रोश को कम करने और ब्रिाटिश सरकार व मुसलमानों के बीच सहयोग का पुल बनाने के लिए उन्होंने योजनाबद्ध प्रयास आरंभ किया। ब्रिाटिश आक्रोश को कम करने के लिए उन्होंने 1858 में "रिसाला अस बाब-ए-बगावत ए हिंद" (भारतीय विद्रोह की कारण मीमांसा) शीर्षक पुस्तिका लिखी, जिसमें उन्होंने प्रमाणित करने की कोशिश की कि इस क्रांति के लिए मुसलामन नहीं, हिन्दू जिम्मेदार थे। सर सैयद की इसी विचारधारा का प्रवाह सैयद से जिन्ना तक निरंतर बहता रहा। यही विचारधारा 16 अगस्त 1945 को कोलकाता की खूनी "सीधी कार्रवाई" और 5 मार्च 1947 को रावलपिंडी के नरमेध के रूप में हमारे सामने आई।
अलगाववाद की प्रवत्ति और द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मानने वालों के चलते धर्म आधार पर जिन्ना के नेतृत्व में अलग देश पाकिस्तान का निर्माण हुआ काफी संख्या में मुसलमानों ने भारत में ही रहना स्वीकार किया। कई दशकों से संविधान द्वारा प्रदत्त विशेष अधिकारों का उपयोग करने के बाद भी उन्होंने परष्पर भाईचारा के सिद्धांत को मानने से इंकार कर दिया है जो कि संविधान की प्रस्तावना का भाग है। मुसलमान किसी भी भौगोलिक राष्ट्रीयता को नहीं मानता और वे यह स्वीकार करते हैं हैं कि वे मुस्लिम पहले हैं और भारतीय बाद में। भारत के संविधान निर्माताओं द्वारा भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने और सभी धर्मों को सामान अधिकार देने के बाद अल्पसंख्यकों को कुछ विशेष अधिकार भी दिए गए। 1969 में मुस्लिम लीग के दबाव में केरल में मालापुरम के मुस्लिम बहुल इलाकों को कुछ अन्य जिलों की भौगोलिक सीमाओं का पुनर्गठन कर मज़हबी आधार पर एक नया जिला बनाया गया।
स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में देश में अल्पसंख्यकवाद के नाम पर एक मुस्लिम वोटबैंक का निर्माण हुआ जिसके प्रलोभन में समस्त राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं ने अपने चुनावी घोषणापत्रों और योजनाओं को उनके अनुरूप बनाया। मोरारजी देसाई के शासनकाल में 'अल्पसंख्यक आयोग' का निर्माण हुआ और 17 मई 1992 को कांग्रेस शासन के दौरान संसद ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक एक्ट पारित करके इसे संवैधानिक रूप दे दिया गया। अल्पसंख्यक वोटबैंक की राजनीति के चलते 1991 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और जनता दल नें अल्पसंख़्यकों के लिए सरकारी सेवाओं और सशस्त्र सेनाओं में आरक्षण का वादा किया। मुस्लिमों के लिए 9 प्रतिशत आरक्षण की बात को 2004 चुनाओं में अटल बिहारी बाजपेई द्वारा उठाया गया और उसके एवज में बुखारी ने उनका समर्थन करने की घोषणा की।
संविधान के नीति निर्देशक तहत अनुच्छेद 44 में वर्णित 'समान नागरिक संहिता' के प्रस्ताव का केवल मुस्लिम ही नहीं अपितु इसे भी विरोध करते हैं और पारिवारिक मामलों हेतु क्रमशः शरीयत आधारित 'मुस्लिम पर्सनल कानून' और 'कैनन ला' का अनुपालन करते हैं। अनुच्छेद 44 का उद्देश्य देश में भाईचारा, एकता और अखंडता की स्थापना करना है जो कि न केवल संविधान की प्रस्तावना में प्रस्तावना में प्रतिस्थापित है बल्कि अनुच्छेद 51(A ) के तहत मूल कर्तव्यों में भी इनका समर्थन किया गया है। अनुच्छेद 44 में वर्णित 'समान नागरिक संहिता' का किसी भी व्यक्ति द्वारा विरोध अनुच्छेद 51(A) में वर्णित नागरिकों के मूल कर्तव्यों का उल्लंघन हैं और यदि सरकार भी ऐसा आचरण करती है तो वह भी संविधान के उल्लंघन की जिम्मेदार है।
वोटबैंक की राजनीति के चलते विभिन्न पार्टियों द्वारा सेक्युलरिज्म के नाम पर मुस्लिमों के तुष्टिकरण की नीति अपनाई गयी है फिर भी उनकी मांगें सुरसा के मुख की तरह लगातार बढ़ती ही जा रही हैं। 1955 में नेहरू द्वारा केवल हिन्दुओं के पारिवारिक और उत्तराधिकार मामलों के लिए 'हिन्दू कोड बिल' का निर्माण किया गया परन्तु डा. अम्बेडकर जी की 'समान नागरिक संहिता' की मांग को नेहरू द्वारा यह कहकर ठुकरा दिया गया कि अभी इसे लागू करने का उचित समय नहीं आया है। नेहरू की परिपाटी पर चलते हुए राजीव गांधी नें 'शाहबानो' के ग़ुजराभत्ता मामले में सर्वोच्च न्यायलय के फैसले को पलटकर देश के एक संप्रदाय की अलगाववादी प्रवत्ति के सामने घुटने टेक दिए गए और उसे संरक्षण प्रदान किया गया। स्वतन्त्र भारत के इतिहास में इस प्रकरण के बाद पहली बार अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकों के लिए राज्य द्वारा अपनाये जा रहे अलग-अलग रवैये के फलस्वरूप उनके बीच की खाई और चौड़ी हो गयी और सेक्युलरिज्म ने नाम पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण करने की नीतियों को प्रश्रय मिला। इसी कड़ी में नए आयाम जोड़ते हुए कई सरकारों ने बहुसंख्यकों की भावनाओं का अनादर करते हुए ऐसे कई फैसले लिए गए जिन्होंने अल्पसंख्यकों की उन्मादी विचारधारा को खाद-पानी प्रदान किया। 2002 में टीएमए पाई फाउंडेशन बनाम यूनियन ऑफ़ इन्डिया के मामले में सर्वोच्च न्यायलय नें बहुसंख्यकों को भी अनुछेद 19(1)(g) में प्रदत्त व्यवसाय के अधिकार के तहत शिक्षण संस्थानों की स्थापना और सञ्चालन का अधिकार दे दिया परन्तु उसके बाद 2005 में यूपीए सरकार ने 93वां संविधान संसोधन करके देश के सभी शिक्षण संस्थानों में हस्तक्षेप और उनके बारे में नियम बनाने व सामाजिक ,आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू करने का अधिकार प्राप्त कर लिया और अल्पसंख्यक शिक्षण शिक्षा संस्थानों चाहे वो राज्य द्वारा वित्तपोषित भी हों उन्हे आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया जो संविधान में प्रदत्त नागरिकों के मूल अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
भारत में छह सौ सालों के इस्लामिक शासन और स्वतंत्रता के बाद किये गए तुष्टिकरण के फलस्वरूप मुस्लिमों के मन ऐसी विघटनकारी प्रवत्ति विकसित हो चुकी है जो कि बहुसंख्यकों के साथ किसी भी प्रकार का सामंजस्य बिठा पाने की स्थिति में है। अगर कही पर भी मुस्लिमों द्वारा भाईचारा या सहिष्णुणता का प्रदर्शन होता है तो या तो उनकी व्यापारिक मजबूरियां होती हैं या उनकी संख्या दस फीसदी से कम होती है। अल्पसंख्यकों द्वारा भारत को बिना पितृभूमि और पुण्यभूमि माने अलगाववाद की प्रवत्ति का नाश होना असंभव है। जब तक वोटबैंक की राजनीति के चलते अल्पसंख्यक समुदाय के तुष्टीकरण का कार्य चलेगा तब तक भारतीय समाज में स्थाई शांति, स्थिरता और बंधुत्व की भावना का पनपना मुश्किल है।
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