Thursday, 22 November 2012
Tuesday, 20 November 2012
लाल किला एक हिन्दू ईमारत...
लाल किला शाहजहाँ से भी कई शताब्दी पहले पृथ्वीराज चौहान के नाना श्री अनंग पाल सिंह तोमर द्वारा बनवाया हुआ लाल कोट है !
क्या कभी किसी ने सोचा है की इतिहास के नाम पर हम झूठ क्यों पढ़ रहे है ? सारे प्रमाण होते हुए भी झूठ को सच क्यों बनाया जा रहा है ?
हम क्षत्रियों की बुद्धि की आज ऐसी दशा हो गयी है की अगर एक आदमी की पीठ मे खंजर मार कर हत्या कर दी गयी हो और उसको आत्महत्या घोषित कर दिया जाए तो कोई भी ये भी सोचने का प्रयास नही करेगा की कोई आदमी खुद की पीठ मे खंजर कैसे मार सकता है...
यही हाल है हम सब का की सच देख कर भी झूठ को सच मान लेना फ़ितरत बना ली है हमने.....
*दिल्ली का लाल किला शाहजहाँ से भी कईशताब्दी पहले प्रथवीराज चौहान द्वाराबनवाया हुआ लाल कोट है*
जिसको शाहजहाँ ने बहुत तोड़ -फोड़ करकेकई बदलाव किया है ताकि वो उसके द्वारा बनाया साबित हो सके.लेकिन सच सामने आ ही जाता है.
* इसके पूरे साक्ष्य प्रथवीराज रासो से मिलता है
*शाहजहाँ से २५० वर्ष पहले १३९८ मे तैमूर लंग ने पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया है .
(जो की शाहजहाँ द्वारा बसाई बताई जातीहै)
* सुवर (वराह) के मूह वेल चार नल अभी भी लाल किले के एक खास महल मे लगे है. क्या ये शाहजहाँ के इस्लाम का प्रतीक चिन्ह है या हमारे सनातन धर्म एवं क्षत्रित्व के प्रमाण ?
* किले के एक द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है राजपूत राजा लोग गज ( हाथियों ) के प्रति अपने प्रेम के लिए विख्यात थे ( इस्लाम मूर्ति का विरोध करता है)
* दीवाने खास मे केसर कुंड नाम से कुंड बना है जिसके फर्श पर सनातनी क्षत्रियो के पूज्य कमल पुष्प अंकित है, केसर कुंड सनातनी शब्दावली है जो की हमारे राजाओ द्वारा केसर जल से भरेस्नान कुंड के लिए प्रयुक्त होती रही है
* मुस्लिमों के प्रिय गुंबद या मीनार का कोई भी अस्तित्व नही है दीवाने खास और दीवाने आम मे.
* दीवाने खास के ही निकट राजा की न्याय तुला अंकित है , अपनी प्रजा मे से ९९% भाग को नीच समझने वाला मुगल कभी भी न्याय तुला की कल्पना भी नही कर सकता, ब्राम्हणों द्वारा उपदेषितराजपूत राजाओ की न्याय तुला चित्र से प्रेरणा लेकर न्याय करना हमारे इतिहास मे प्रसिद्ध है
* दीवाने ख़ास और दीवाने आम की मंडप शैली पूरी तरह से 984 के अंबर के भीतरी महल (आमेर--पुराना जयपुर) से मिलती है जो की राजपूताना शैली मे बनाहुवा है
* लाल किले से कुछ ही गज की दूरी पर बने देवालय जिनमे से एक लाल जैन मंदिरऔर दूसरा गौरीशंकार मंदिर दोनो ही गैर मुस्लिम है जो की शाहजहाँ से कई शताब्दी पहले राजपूत राजाओं ने बनवाएथे .
* लाल किले का मुख्य बाजार चाँदनी चौककेवल सनातन घर्म के अनुयाईयों से घिरा हुवा है, समस्त पुरानी दिल्ली मेअधिकतर आबादी सनातन घर्म के अनुयाईयों की ही है, सनलिष्ट और घूमाओदार शैली के मकान भी सनातन शैली के ही है ..क्या शाहजहा जैसा मुस्लिम व्यक्ति अपने किले के आसपास अरबी, फ़ारसी, तुर्क, अफ़गानी के बजाय हम सनातन घर्म के अनुयाईयों के लिए मकान बनवा कर हमको अपने पास बसाता ?* एक भी इस्लामी शिलालेख मे लाल किले का वर्णन नही है
"गर फ़िरदौस बरुरुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता--अर्थात इस धरती पे अगर कहीं स्वर्ग हैतो यही है, यही है, यही है....इस अनाम शिलालेख को कभी भी किसी भवन का निर्माण कर्ता नही लिखवा सकता .. और नाही ये किसी केनिर्माण कर्ता होने का सबूत देता है
इसके अलावा अनेकों ऐसे प्रमाण है जो की इसके लाल कोट होने का प्रमाण देते है, और ऐसे ही क्षत्रिय राजाओ के सारे प्रमाण नष्ट करके क्षत्रियो का नाम ही इतिहास से हटा दिया गया है,
अगर क्षत्रिय का नाम आता है तो केवल नष्ट होने वाले शिकार के रूप मे.ताकि हम हमेशा ही अहिंसा और शांति का पाठ पढ़ कर इस झूठे इतिहास से प्रेरणा ले सके...सही है ना ?
लेकिन कब तक अपने धर्म को ख़तम करने वालो की पूजा करते रहोगे और खुद के सम्मान को बचाने वाले महान क्षत्रिय शासकों के नाम भुलाते रहोगे..ऐसे ही ?
जागो जागो और इतिहास की सच्चाई को जानो ...मुस्लिम शासको ने ज्यादातर लुट- पाट,तोड़ फोड़ करके हमारे मंदिरों और महलों को परिवर्तित किया है ,बाबरी मस्जिद ( जिसे देश भक्त सनातनी वीरो ने गुलामी के प्रतीक को नेस्तनाबूद कर दिया) धार की भोजशाला जैसे कितने प्रमाण आज भी मौजूद है जो चिल्ला -चिल्ला कर हमसे कह रहे है की देखो इतिहास की सच्चाई .
जय माँ भारती
तक्षशिला विश्वविद्यालय
तक्षशिला विश्वविद्यालय
'तक्षशिला विश्वविद्यालय'वर्तमान पाकिस्तान की राजधानी रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित था। जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाता है कि श्री राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी। यह विश्व का प्रथम विश्विद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे
'तक्षशिला विश्वविद्यालय'वर्तमान पाकिस्तान की राजधानी रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित था। जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाता है कि श्री राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी। यह विश्व का प्रथम विश्विद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे
। यहां 60 से भी अधिक विष
यों को पढ़ाया जाता था। 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था। विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यो ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे। छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ललित कला, हस्त विद्या, अश्व-विद्या, मन्त्र-विद्या, विविद्य भाषाएं, शिल्प आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे। प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट पाठयक्रम था। आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी। शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे। परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी। चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छ: माह का शोध कार्य करना पड़ता था। इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी।
* यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी।
* तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे।
* यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था।
* 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के'चिकित्सा शास्त्र'का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था।
आयुर्वेद विज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र
500 ई. पू. जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परंपरा भी नहीं थी तब तक्षशिला'आयुर्वेद विज्ञान'का सबसे बड़ा केन्द्र था। जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां के स्नातक मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों तक का ऑपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। इसके अतिरिक्त अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था। शिष्य आचार्य के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करते थे। एक आचार्य के पास अनेक विद्यार्थी रहते थे। इनकी संख्या प्राय: सौ से अधिक होती थी और अनेक बार 500 तक पहुंच जाती थी। अध्ययन में क्रियात्मक कार्य को बहुत महत्त्व दिया जाता था। छात्रों को देशाटन भी कराया जाता था।
शुल्क और परीक्षा
शिक्षा पूर्ण होने पर परीक्षा ली जाती थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक होना उससमय अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता था। यहां धनी तथा निर्धन दोनों तरह के छात्रों के अध्ययन की व्यवस्था थी। धनी छात्रा आचार्य को भोजन, निवास और अध्ययन का शुल्क देते थे तथा निर्धन छात्र अध्ययन करते हुए आश्रम के कार्य करते थे। शिक्षा पूरी होने पर वे शुल्क देने की प्रतिज्ञा करते थे। प्राचीन साहित्य से विदित होता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले उच्च वर्ण के ही छात्र होते थे। सुप्रसिद्ध विद्वान, चिंतक, कूटनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री चाणक्य ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूर्ण की थी। उसके बाद यहीं शिक्षण कार्य करने लगे। यहीं उन्होंने अपने अनेक ग्रंथों की रचना की। इस विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसे स्थान पर थी, जहां पूर्व और पश्चिम से आने वाले मार्ग मिलते थे। चतुर्थ शताब्दी ई. पू. से ही इस मार्ग से भारतवर्ष पर विदेशी आक्रमण होने लगे। विदेशी आक्रांताओं ने इस विश्वविद्यालय को काफ़ी क्षति पहुंचाई। अंतत: छठवीं शताब्दी में यह आक्रमणकारियों द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिया।
पाठ्यक्रम
* उस समय विश्वविद्यालय कई विषयों के पाठ्यक्रम उपलब्ध करता था, जैसे - भाषाएं , व्याकरण, दर्शन शास्त्र , चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, कृषि , भूविज्ञान, ज्योतिष, खगोल शास्त्र, ज्ञान-विज्ञान, समाज-शास्त्र, धर्म , तंत्र शास्त्र, मनोविज्ञान तथा योगविद्या आदि।
* विभिन्न विषयों पर शोध का भी प्रावधान था।
* शिक्षा की अवधि 8 वर्ष तक की होती थी।
* विशेष अध्ययन के अतिरिक्त वेद , तीरंदाजी, घुड़सवारी, हाथी का संधान व एक दर्जन से अधिक कलाओं की शिक्षा दी जाती थी।
* तक्षशिला के स्नातकों का हर स्थान पर बड़ा आदर होता था।
* यहां छात्र 15-16 वर्ष की अवस्था में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
स्वाभाविक रूप से चाणक्य को उच्च शिक्षा की चाह तक्षशिला ले आई। यहां चाणक्य ने पढ़ाई में विशेष योग्यता प्राप्त की
जय महाकाल !!
जय जय श्री राम !!
यों को पढ़ाया जाता था। 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था। विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यो ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे। छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ललित कला, हस्त विद्या, अश्व-विद्या, मन्त्र-विद्या, विविद्य भाषाएं, शिल्प आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे। प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट पाठयक्रम था। आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी। शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे। परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी। चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छ: माह का शोध कार्य करना पड़ता था। इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी।
* यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी।
* तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे।
* यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था।
* 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के'चिकित्सा शास्त्र'का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था।
आयुर्वेद विज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र
500 ई. पू. जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परंपरा भी नहीं थी तब तक्षशिला'आयुर्वेद विज्ञान'का सबसे बड़ा केन्द्र था। जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां के स्नातक मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों तक का ऑपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। इसके अतिरिक्त अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था। शिष्य आचार्य के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करते थे। एक आचार्य के पास अनेक विद्यार्थी रहते थे। इनकी संख्या प्राय: सौ से अधिक होती थी और अनेक बार 500 तक पहुंच जाती थी। अध्ययन में क्रियात्मक कार्य को बहुत महत्त्व दिया जाता था। छात्रों को देशाटन भी कराया जाता था।
शुल्क और परीक्षा
शिक्षा पूर्ण होने पर परीक्षा ली जाती थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक होना उससमय अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता था। यहां धनी तथा निर्धन दोनों तरह के छात्रों के अध्ययन की व्यवस्था थी। धनी छात्रा आचार्य को भोजन, निवास और अध्ययन का शुल्क देते थे तथा निर्धन छात्र अध्ययन करते हुए आश्रम के कार्य करते थे। शिक्षा पूरी होने पर वे शुल्क देने की प्रतिज्ञा करते थे। प्राचीन साहित्य से विदित होता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले उच्च वर्ण के ही छात्र होते थे। सुप्रसिद्ध विद्वान, चिंतक, कूटनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री चाणक्य ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूर्ण की थी। उसके बाद यहीं शिक्षण कार्य करने लगे। यहीं उन्होंने अपने अनेक ग्रंथों की रचना की। इस विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसे स्थान पर थी, जहां पूर्व और पश्चिम से आने वाले मार्ग मिलते थे। चतुर्थ शताब्दी ई. पू. से ही इस मार्ग से भारतवर्ष पर विदेशी आक्रमण होने लगे। विदेशी आक्रांताओं ने इस विश्वविद्यालय को काफ़ी क्षति पहुंचाई। अंतत: छठवीं शताब्दी में यह आक्रमणकारियों द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिया।
पाठ्यक्रम
* उस समय विश्वविद्यालय कई विषयों के पाठ्यक्रम उपलब्ध करता था, जैसे - भाषाएं , व्याकरण, दर्शन शास्त्र , चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, कृषि , भूविज्ञान, ज्योतिष, खगोल शास्त्र, ज्ञान-विज्ञान, समाज-शास्त्र, धर्म , तंत्र शास्त्र, मनोविज्ञान तथा योगविद्या आदि।
* विभिन्न विषयों पर शोध का भी प्रावधान था।
* शिक्षा की अवधि 8 वर्ष तक की होती थी।
* विशेष अध्ययन के अतिरिक्त वेद , तीरंदाजी, घुड़सवारी, हाथी का संधान व एक दर्जन से अधिक कलाओं की शिक्षा दी जाती थी।
* तक्षशिला के स्नातकों का हर स्थान पर बड़ा आदर होता था।
* यहां छात्र 15-16 वर्ष की अवस्था में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
स्वाभाविक रूप से चाणक्य को उच्च शिक्षा की चाह तक्षशिला ले आई। यहां चाणक्य ने पढ़ाई में विशेष योग्यता प्राप्त की
जय महाकाल !!
जय जय श्री राम !!
Friday, 16 November 2012
हिंदु विज्ञान
हिंदु वेदोंको मान्यता देते हैं और वेदोंमें
विज्ञान बताया गया है । केवल सौ वर्षों में पृथ्वीको नष्टप्राय बनाने के
मार्ग पर लानेवाले आधुनिक विज्ञान की अपेक्षा, अत्यंत प्रगतिशील एवं एक भी
समाज विघातक शोध न करने वाला प्राचीन ‘हिंदु विज्ञान’ था
।
पूर्वकाल के शोधकर्ता हिंदु ऋषियोंकी बुद्धिकी विशालता देखकर आजके वैज्ञानिकों को अत्यंत आश्चर्य होता है । पाश्चात्त्य वैज्ञानिकों की न्यूनता सिद्ध करनेवाला शो
ध सहस्रों वर्ष पूर्व ही करनेवाले हिंदु ऋषि-मुनि ही खरे वैज्ञानिक शोधकर्ता हैं ।
गुरुत्वाकर्षणका गूढ उजागर करनेवाले भास्कराचार्य भास्कराचार्यजी ने अपने (दूसरे) ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथमें गुरुत्वाकर्षणके विषयमें लिखा है कि, ‘पृथ्वी अपने आकाशका पदार्थ स्व-शक्ति से अपनी ओर खींच लेती हैं । इस कारण आकाश का पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’ । इससे सिद्ध होता है कि, उन्होंने गुरुत्वाकर्षणका शोध न्यूटन से ५०० वर्ष पूर्व लगाया ।
* परमाणुशास्त्रके जनक आचार्य कणाद अणुशास्त्रज्ञ जॉन डाल्टन के २५०० वर्ष पूर्व आचार्य कणादजी ने बताया कि, ‘द्रव्यके परमाणु होते हैं । ’विख्यात इतिहासज्ञ टी.एन्. कोलेबु्रकजीने कहा है कि, ‘अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ युरोपीय शास्त्रज्ञों की तुलना में विश्वविख्यात थे ।’ *
कर्करोग प्रतिबंधित करनेवाला पतंजली ऋषिका योगशास्त्र ‘पतंजली ऋषि द्वारा २१५० वर्ष पूर्व बताया ‘योगशास्त्र’, कर्करोग जैसी दुर्धर व्याधि पर सुपरिणामकारक उपचार है । योगसाधना से कर्करोग प्रतिबंधित होता है ।’ - भारत शासन के ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था’के (‘एम्स’के) ५ वर्षों के शोधका निष्कर्ष ! *
औषधि-निर्मिति के पितामह : आचार्य चरक इ.स. १०० से २०० वर्ष पूर्व काल के आयुर्वेद विशेषज्ञ चरकाचार्यजी । ‘चरकसंहिता’ प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ के निर्माणकर्ता चरकजी को ‘त्वचा चिकित्सक’ भी कहते हैं । आचार्य चरक ने शरीरशास्त्र, गर्भशास्त्र, रक्ताभिसरणशास्त्र, औषधिशास्त्र इत्यादिके विषयमें अगाध शोध किया था ।
मधुमेह, क्षयरोग, हृदयविकार आदि दुर्धररोगों के निदान एवं औषधोपचार विषयक अमूल्य ज्ञानके किवाड उन्होंने अखिल जगत के लिए खोल दिए । चरकाचार्यजी एवं सुश्रुताचार्यजीने इ.स. पूर्व ५००० में लिखे गए अर्थववेद से ज्ञान प्राप्त करके ३ खंड में आयुर्वेद पर प्रबंध लिखे । *
शल्यकर्म में निपुण महर्षि सुश्रुत ६०० वर्ष ईसापूर्व विश्व के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) महर्षि सुश्रुत शल्यचिकित्सा के पूर्व अपने उपकरण उबाल लेते थे । आधुनिक विज्ञानने इसका शोध केवल ४०० वर्ष पूर्व किया ! महर्षि सुश्रुत सहित अन्य आयुर्वेदाचार्य त्वचारोपण शल्यचिकित्सा के साथ ही मोतियाबिंद, पथरी, अस्थिभंग इत्यादि के संदर्भ में क्लिष्ट शल्यकर्म करने में निपुण थे । इस प्रकारके शल्यकर्मों का ज्ञान पश्चिमी देशोंने अभी के कुछ वर्षोंमें विकसित किया है ! महर्षि सुश्रुतद्वारा लिखित ‘सुश्रुतसंहिता' ग्रंथमें शल्य चिकित्सा के विषय में विभिन्न पहलू विस्तृतरूप से विशद किए हैं । उसमें चाकू, सुईयां, चिमटे आदि १२५ से भी अधिक शल्यचिकित्सा हेतु आवश्यक उपकरणोंके नाम तथा ३०० प्रकारके शल्यकर्मोंका ज्ञान बताया है । *
नागार्जुन नागार्जुन, ७वीं शताब्दी के आरंभके रसायन शास्त्र के जनक हैं । इनका पारंगत वैज्ञानिक कार्य अविस्मरणीय है । विशेष रूप से सोने धातु पर शोध किया एवं पारेपर उनका संशोधन कार्य अतुलनीय था । उन्होंने पारे पर संपूर्ण अध्ययन कर सतत १२ वर्ष तक संशोधन किया । पश्चिमी देशों में नागार्जुन के पश्चात जो भी प्रयोग हुए उनका मूलभूत आधार नागार्जुन के सिद्धांत के अनुसार ही रखा गया | *
बौद्धयन २५०० वर्ष पूर्व (५०० इ.स.पूर्व) ‘पायथागोरस सिद्धांत’ की खोज करने वाले भारतीय त्रिकोणमितितज्ञ । अनुमानतः २५०० वर्षपूर्व भारतीय त्रिकोणमितिवितज्ञों ने त्रिकोणमितिशास्त्र में महत्त्वपूर्ण शोध किया । विविध आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोज निकाली । दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करनेपर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्तमें परिवर्तन करना, इस प्रकारके अनेक कठिन प्रश्नों को बौद्धयन ने सुलझाया | *
ऋषि भारद्वाज राइट बंधुओंसे २५०० वर्ष पूर्व वायुयान की खोज करनेवाले भारद्वाज ऋषि ! आचार्य भारद्वाजजीने ६०० वर्ष इ.स.पूर्व विमानशास्त्र के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण संशोधन किया । एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर उडान भरनेवाले, एक विश्वसे दूसरे विश्व उडान भरने वाले वायुयान की खोज, साथ ही वायुयान को अदृश्य कर देना इस प्रकार का विचार पश्चिमी शोधकर्ता भी नहीं कर सकते । यह खोज आचार्य भारद्वाजजी ने कर दिखाया । पश्चिमी वैज्ञानिकोंको महत्वहीन सिद्ध करनेवाले खोज, हमारे ऋषि-मुनियोंने सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही कर दिखाया था । वे ही सच्चे शोधकर्ता हैं । *
गर्ग मुनि कौरव-पांडव काल में तारों के जगत के विशेषज्ञ गर्गमुनिजी ने नक्षत्रों की खोज की । गर्गमुनिजी ने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के जीवन के संदर्भ में जो कुछ भी बताया वह शत प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआ । कौरव-पांडवों का भारतीय युद्ध मानव संहारक रहा, क्योंकि युद्धके प्रथम पक्षमें तिथि क्षय होनेके तेरहवें दिन अमावस थी । इसके द्वितीय पक्षमें भी तिथि क्षय थी । पूर्णिमा चौदहवें दिन पड गई एवं उसी दिन चंद्रग्रहण था, यही घोषणा गर्गमुनिजी ने भी की थी । ।। जयतु संस्कृतम् । जयतु भारतम् ।।
पूर्वकाल के शोधकर्ता हिंदु ऋषियोंकी बुद्धिकी विशालता देखकर आजके वैज्ञानिकों को अत्यंत आश्चर्य होता है । पाश्चात्त्य वैज्ञानिकों की न्यूनता सिद्ध करनेवाला शो
ध सहस्रों वर्ष पूर्व ही करनेवाले हिंदु ऋषि-मुनि ही खरे वैज्ञानिक शोधकर्ता हैं ।
गुरुत्वाकर्षणका गूढ उजागर करनेवाले भास्कराचार्य भास्कराचार्यजी ने अपने (दूसरे) ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथमें गुरुत्वाकर्षणके विषयमें लिखा है कि, ‘पृथ्वी अपने आकाशका पदार्थ स्व-शक्ति से अपनी ओर खींच लेती हैं । इस कारण आकाश का पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’ । इससे सिद्ध होता है कि, उन्होंने गुरुत्वाकर्षणका शोध न्यूटन से ५०० वर्ष पूर्व लगाया ।
* परमाणुशास्त्रके जनक आचार्य कणाद अणुशास्त्रज्ञ जॉन डाल्टन के २५०० वर्ष पूर्व आचार्य कणादजी ने बताया कि, ‘द्रव्यके परमाणु होते हैं । ’विख्यात इतिहासज्ञ टी.एन्. कोलेबु्रकजीने कहा है कि, ‘अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ युरोपीय शास्त्रज्ञों की तुलना में विश्वविख्यात थे ।’ *
कर्करोग प्रतिबंधित करनेवाला पतंजली ऋषिका योगशास्त्र ‘पतंजली ऋषि द्वारा २१५० वर्ष पूर्व बताया ‘योगशास्त्र’, कर्करोग जैसी दुर्धर व्याधि पर सुपरिणामकारक उपचार है । योगसाधना से कर्करोग प्रतिबंधित होता है ।’ - भारत शासन के ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था’के (‘एम्स’के) ५ वर्षों के शोधका निष्कर्ष ! *
औषधि-निर्मिति के पितामह : आचार्य चरक इ.स. १०० से २०० वर्ष पूर्व काल के आयुर्वेद विशेषज्ञ चरकाचार्यजी । ‘चरकसंहिता’ प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ के निर्माणकर्ता चरकजी को ‘त्वचा चिकित्सक’ भी कहते हैं । आचार्य चरक ने शरीरशास्त्र, गर्भशास्त्र, रक्ताभिसरणशास्त्र, औषधिशास्त्र इत्यादिके विषयमें अगाध शोध किया था ।
मधुमेह, क्षयरोग, हृदयविकार आदि दुर्धररोगों के निदान एवं औषधोपचार विषयक अमूल्य ज्ञानके किवाड उन्होंने अखिल जगत के लिए खोल दिए । चरकाचार्यजी एवं सुश्रुताचार्यजीने इ.स. पूर्व ५००० में लिखे गए अर्थववेद से ज्ञान प्राप्त करके ३ खंड में आयुर्वेद पर प्रबंध लिखे । *
शल्यकर्म में निपुण महर्षि सुश्रुत ६०० वर्ष ईसापूर्व विश्व के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) महर्षि सुश्रुत शल्यचिकित्सा के पूर्व अपने उपकरण उबाल लेते थे । आधुनिक विज्ञानने इसका शोध केवल ४०० वर्ष पूर्व किया ! महर्षि सुश्रुत सहित अन्य आयुर्वेदाचार्य त्वचारोपण शल्यचिकित्सा के साथ ही मोतियाबिंद, पथरी, अस्थिभंग इत्यादि के संदर्भ में क्लिष्ट शल्यकर्म करने में निपुण थे । इस प्रकारके शल्यकर्मों का ज्ञान पश्चिमी देशोंने अभी के कुछ वर्षोंमें विकसित किया है ! महर्षि सुश्रुतद्वारा लिखित ‘सुश्रुतसंहिता' ग्रंथमें शल्य चिकित्सा के विषय में विभिन्न पहलू विस्तृतरूप से विशद किए हैं । उसमें चाकू, सुईयां, चिमटे आदि १२५ से भी अधिक शल्यचिकित्सा हेतु आवश्यक उपकरणोंके नाम तथा ३०० प्रकारके शल्यकर्मोंका ज्ञान बताया है । *
नागार्जुन नागार्जुन, ७वीं शताब्दी के आरंभके रसायन शास्त्र के जनक हैं । इनका पारंगत वैज्ञानिक कार्य अविस्मरणीय है । विशेष रूप से सोने धातु पर शोध किया एवं पारेपर उनका संशोधन कार्य अतुलनीय था । उन्होंने पारे पर संपूर्ण अध्ययन कर सतत १२ वर्ष तक संशोधन किया । पश्चिमी देशों में नागार्जुन के पश्चात जो भी प्रयोग हुए उनका मूलभूत आधार नागार्जुन के सिद्धांत के अनुसार ही रखा गया | *
बौद्धयन २५०० वर्ष पूर्व (५०० इ.स.पूर्व) ‘पायथागोरस सिद्धांत’ की खोज करने वाले भारतीय त्रिकोणमितितज्ञ । अनुमानतः २५०० वर्षपूर्व भारतीय त्रिकोणमितिवितज्ञों ने त्रिकोणमितिशास्त्र में महत्त्वपूर्ण शोध किया । विविध आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोज निकाली । दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करनेपर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्तमें परिवर्तन करना, इस प्रकारके अनेक कठिन प्रश्नों को बौद्धयन ने सुलझाया | *
ऋषि भारद्वाज राइट बंधुओंसे २५०० वर्ष पूर्व वायुयान की खोज करनेवाले भारद्वाज ऋषि ! आचार्य भारद्वाजजीने ६०० वर्ष इ.स.पूर्व विमानशास्त्र के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण संशोधन किया । एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर उडान भरनेवाले, एक विश्वसे दूसरे विश्व उडान भरने वाले वायुयान की खोज, साथ ही वायुयान को अदृश्य कर देना इस प्रकार का विचार पश्चिमी शोधकर्ता भी नहीं कर सकते । यह खोज आचार्य भारद्वाजजी ने कर दिखाया । पश्चिमी वैज्ञानिकोंको महत्वहीन सिद्ध करनेवाले खोज, हमारे ऋषि-मुनियोंने सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही कर दिखाया था । वे ही सच्चे शोधकर्ता हैं । *
गर्ग मुनि कौरव-पांडव काल में तारों के जगत के विशेषज्ञ गर्गमुनिजी ने नक्षत्रों की खोज की । गर्गमुनिजी ने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के जीवन के संदर्भ में जो कुछ भी बताया वह शत प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआ । कौरव-पांडवों का भारतीय युद्ध मानव संहारक रहा, क्योंकि युद्धके प्रथम पक्षमें तिथि क्षय होनेके तेरहवें दिन अमावस थी । इसके द्वितीय पक्षमें भी तिथि क्षय थी । पूर्णिमा चौदहवें दिन पड गई एवं उसी दिन चंद्रग्रहण था, यही घोषणा गर्गमुनिजी ने भी की थी । ।। जयतु संस्कृतम् । जयतु भारतम् ।।
Sunday, 7 October 2012
शुल्बसूत्रों (Śulbasūtras) में बौधायन का शुल्बसूत्र सबसे प्राचीन माना जाता है। इन शुल्बसूत्रों का रचना समय १२०० से ८०० ईसा (1200 - 800 BCE) पूर्व माना गया है।
अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग का नियम दिया है-
दीर्घचातुरास्रास्याक्ष्नाय ा रज्जुः पार्च्च्वमानी तिर्यङ्मानीच
यत्पद्ययग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति ।
एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं। यही है पाइथागोरस का प्रमेय (Pythagoras theorem)। स्पष्ट है कि इस प्रमेय की जानकारी भारतीय गणितज्ञों को पाइथागोरस के पहले से थी। दरअसल इस प्रमेय को बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय कहा जाना चाहिए।
शोक की बात है, जिस देश में लोग रोजमर्रा के जरूरतों के लिए लड़ रहें हैं, कौन लड़ेगा वैदिक सत्य के अस्तित्व के लिए ? जितना हो सके इस सत्य का प्रचार करें |
अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग का नियम दिया है-
दीर्घचातुरास्रास्याक्ष्नाय
यत्पद्ययग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति ।
एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं। यही है पाइथागोरस का प्रमेय (Pythagoras theorem)। स्पष्ट है कि इस प्रमेय की जानकारी भारतीय गणितज्ञों को पाइथागोरस के पहले से थी। दरअसल इस प्रमेय को बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय कहा जाना चाहिए।
शोक की बात है, जिस देश में लोग रोजमर्रा के जरूरतों के लिए लड़ रहें हैं, कौन लड़ेगा वैदिक सत्य के अस्तित्व के लिए ? जितना हो सके इस सत्य का प्रचार करें |
Friday, 5 October 2012
:: जानिये सरस्वती नदी का इतिहास ::
सरस्वती नदी पौराणिक हिन्दु ग्रंथों तथा ऋग्वेद में वर्णित मुख्य नदियों में से एक है। ऋग्वेद के नदी सूक्त के एक श्लोक (१०.७५) में सरस्वती नदी को यमुना के पूर्व और सतलुज के पश्चिम में बहती हुए बताया गया है। उत्तर वैदिक ग्रंथों जैसे ताण्डय और जैमिनिय ब्राह्मण में सरस्वती नदी को मरुस्थल में सुखा हुआ बताया गया है, महाभारत भी सरस्वती नदी के मरुस्थल में विनाशन नामक जगह में अदृश्य होने का वर्णन करता है। महाभारत में सरस्वती नदी को प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति, वेदवती आदि नामों से भी बताया गया है.
ऋग्वेद तथा अन्य पौराणिक वैदिक ग्रंथों में दिये सरस्वती नदी के सन्दर्भों के आधार पर कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि हरियाणा से राजस्थान होकर बहने वाली मौजुदा सुखि हुई घग्गर-हकरा नदी प्राचीन वैदिक सरस्वती नदी की एक मुख्य सहायक नदी थी, जो ५००० - ३००० ईसा पूर्व पूरे प्रवाह से बहती थी। उस समय सतलुज तथा यमुना की कुछ धाराए सरस्वती नदी में आकर मिलती थी। इसके अतिरिक्त दो अन्य लुप्त हुई नदियाँ दृष्टावदी और हिरण्यवती भी सरस्वती की सहायक नदियाँ थी,लगभग १९०० ईसा पूर्व तक भूगर्भी बदलाव की वजह से यमुना, सतलुज ने अपना रास्ता बदल दिया तथा दृष्टावदी नदी के भी २६०० ईसा पूर्व सूख जाने के कारण सरस्वती नदी लुप्त हो गयी। ऋग्वेद में सरस्वती नदी को नदीतमा की उपाधि दी गयी है। वैदिक सभ्यता में सरस्वती ही सबसे बड़ी और मुख्य नदी थी। इसरो द्वारा किये गये शोध से पता चला है कि आज भी यह नदी हरियाणा, पंजाब और राजस्थान से होती हुई भूमि के नीचे से होकर बहती है।
सरस्वती एक विशाल नदी थी। पहाड़ों को तोड़ती हुई निकलती थी और मैदानों से होती हुई समुद्र में जाकर विलीन हो जाती थी। इसका वर्णन ऋग्वेद में बार-बार आता है। कई मंडलों में इसका वर्णन है। ऋग्वेद वैदिक काल में इसमें हमेशा जल रहता था। सरस्वती आज की गंगा की तरह उस समय की विशाल नदियों में से एक थी। उत्तर वैदिक काल और महाभारत काल में यह नदी बहुत सूख चुकी थी। तब सरस्वती नदी में पानी बहुत कम था। लेकिन बरसात के मौसम में इसमें पानी आ जाता था। भूगर्भी बदलाव की वजह से सरस्वती नदी का पानी गंगा मे चला गया, कई विद्वान मानते है कि इसी वजह से गंगा के पानी की महिमा हुई, भूचाल आने के कारण जब जमीन ऊपर उठी तो सरस्वती का पानी यमुना में गिर गया। इसलिए यमुना में सरस्वती का जल भी प्रवाहित होने लगा। सिर्फ इसीलिए प्रयाग में तीन नदियों का संगम माना गया जबकि यथार्थ में वहां तीन नदियों का संगम नहीं है। वहाँ केवल दो नदियां हैं। सरस्वती कभी भी इलाहाबाद तक नहीं पहुंची।
ऋग्वेद मे सन्दर्भ: सरस्वती नदी का ऋग्वेद की चौथे पुस्तक छोड़कर सभी पुस्तकों में कई बार उल्लेख किया गया है। केवल यही ऐसी नदी है जिसके लिए ऋग्वेद की छन्द संख्या ६.६१,७.९५ और ७.९६ में पूरी तरह से समर्पित भजन दिये गये है। वैदिक काल में सरस्वती की बड़ी महिमा थी और इसे परम पवित्र नदी माना जाता था, कयोंकि इसके तट के पास रहकर तथा इसी नदी के पानी का सेवन करते हुए ऋषियों ने वेदों को रचा और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया। इसी कारण सरस्वती को विद्या और ज्ञान की देवी के रुप में भी पूजा जाने लगा। ऋग्वेद के नदी सूक्त में सरस्वती का इस प्रकार उल्लेख है कि 'इमं में गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परूष्ण्या असिक्न्या मरूद्वधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमया' सरस्वती ऋग्वेद में केवल 'नदी देवी' के रूप में वर्णित है (इसकी वंदना तीन सम्पूर्ण तथा अनेक प्रकीर्ण मन्त्रों में की गई है), किंतु ब्राह्मण ग्रथों में इसे वाणी की देवी या वाच् के रूप में देखा गया, क्योंकि तब तक यह लुप्त हो चुकी थी परन्तु इसकी महिमा लुप्त नहीं हुई और उत्तर वैदिक काल में सरस्वती को मुख्यत:, वाणी के अतिरिक्त बुद्धि या विद्या की अधिष्ठात्री देवी भी माना गया है और ब्रह्मा की पत्नी के रूप में इसकी वंदना के गीत गाये गए है। ऋग्वेद मे सरस्वती को नदीतमा की उपाधि दी गयी है। उसकी एक शाखा २.४१.१६ मे इसे "सर्वश्रेष्ठ माँ,सर्वश्रेष्ठ नदी,सर्वश्रेष्ठ देवी" कहकर सम्बोधित किया गया है। यही प्रशंसा ऋग्वेद के अन्य छंदों ६.६१,८.८१,७.९६ और १०.१७ मे भी की गयी है। ऋग्वेद के श्लोक ७.९.५२ तथा अन्य जैसे ८.२१.१८ मे सरस्वती नदी को "दूध और घी" से परिपूर्ण बताया गया है। ऋग्वेद के श्लोक ३.३३.१ मे इसे गाय की तरह पालन करने वाली बताया गया है. ऋग्वेद के श्लोक ७.३६.६ मे सरस्वती को सप्तसिंधु नदियों की जननी बताया गया है.अन्य वैदिक ग्रंथो में सन्दर्भ
ऋग्वेद के बाद के वैदिक साहित्यों में सरस्वती नदी के विलुप्त होने का उल्लेख आता हैं ,इसके अतिरिक्त सरस्वती नदी के उद्गम स्थल की प्लक्ष प्रस्रवन के रुप मे पहचान की गयी है जो कि यमुनोत्री के पास ही स्थित है। यजुर्वेदयजुर्वेद की वाजस्नेयी संहिता ३४.११ में कहा गया है कि पांच नदियाँ अपने पूरे प्रवाह के साथ सरस्वती नदी में प्रविष्ट होती हैं, यह पांच नदियाँ पंजाब की सतलुज, रावी, व्यास, चेनाव और दृष्टावती हो सकती हैं वी. एस वाकंकर के अनुसार पांचों नदियों के संगम के सुखे हुए अवशेष राजस्थान के बाड़मेर या जैसलमेर के निकट पंचभद्र तीर्थ पर देखे जा सकते है। रामायणवाल्मीकि रामायण में भरत के केकय देश से अयोध्या आने के प्रसंग में सरस्वती और गंगा को पार करने का वर्णन है- 'सरस्वतीं च गंगा च युग्मेन प्रतिपद्य च, उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारूण्डं प्राविशद्वनम्' सरस्वती नदी के तटवर्ती सभी तीर्थों का वर्णन महाभारत में शल्यपर्व के 35 वें से 54 वें अध्याय तक सविस्तार दिया गया है। इन स्थानों की यात्रा बलराम ने की थी। जिस स्थान पर मरूभूमि में सरस्वती लुप्त हो गई थी उसे विनशन कहते थे।महाभारतमहाभारत में तो सरस्वती नदी का उल्लेख कई बार किया गया है। सबसे पहले तो यह बताया गया है कि कई राजाओं ने इसके तट के समीप कई यज्ञ किये थे। वर्तमान सूखी हुई सरस्वती नदी के समान्तर खुदाई में ५५०० - ४००० वर्ष पुराने शहर मिले है जिनमे कालीबंगा और लोथल भी है यहाँ कई यज्ञ कुण्डों के अवशेष भी मिले है जो महाभारत में कहे तथ्य को प्रमाणित करती है। महाभारत में यह भी वर्णन आता है कि निषादों और मलेच्छों से द्वेष होने के कारण सरस्वती नदी ने इनके प्रदेशों मे जाना बंद कर दिया जो इसके सुखने की प्रथम अवस्था को दर्शाती है, साथ ही यह भी वर्णन मिलता है कि सरस्वती नदी मरुस्थल में विनाशन नामक स्थान पर लुप्त हो फिर पुन किसी स्थान पर प्रकट होती है। महाभारत मे आता है कि ऋषि वसिष्ठ सत्लुज में कुदकर आत्महत्या का प्रयास करते है जिससे नदी १०० धाराओं मे टूट जाती है यह तथ्य सतलुज नदी के अपने पुराने मार्ग को बदलने की घटना को प्रमाणित करता है क्योंकि प्राचिन वैदिक काल में सतलुज नदी सरस्वती में ही जाकर अपना प्रवाह छोड़ती थी। बलराम जी द्वारा इसके तट के समान्तर प्लक्ष पेड़ (प्लक्षप्रस्त्रवण,यमुनोत्र
उद्गम स्थल तथा विलुप्त होने के कारण: महाभारत में मिले वर्णन के अनुसार सरस्वती नदी हरियाणा में यमुनानगर से थोड़ा ऊपर और शिवालिक पहाड़ियों से थोड़ा सा नीचे आदि बद्री नामक स्थान से निकलती थी। आज भी लोग इस स्थान को तीर्थस्थल के रूप में मानते हैं और वहां जाते हैं। किन्तु आज आदि बद्री नामक स्थान से बहने वाली नदी बहुत दूर तक नहीं जाती एक पतली धारा की तरह जगह-जगह दिखाई देने वाली इस नदी को ही लोग सरस्वती कह देते हैं। वैदिक और महाभारत कालीन वर्णन के अनुसार इसी नदी के किनारे ब्रह्मावर्त था, कुरुक्षेत्र था, लेकिन आज वहां जलाशय हैं। जब नदी सूखती है तो जहां-जहां पानी गहरा होता है, वहां-वहां तालाब या झीलें रह जाती हैं और ये तालाब और झीलें अर्ध्दचन्द्राकार शक्ल में पायी जाती हैं। आज भी कुरुक्षेत्र में ब्रह्मसरोवर या पेहवा में इस प्रकार के अर्ध्दचन्द्राकार सरोवर देखने को मिलते हैं, लेकिन ये भी सूख गए हैं। लेकिन ये सरोवर प्रमाण हैं कि उस स्थान पर कभी कोई विशाल नदी बहती थी और उसके सूखने के बाद वहां विशाल झीलें बन गयीं। भारतीय पुरातत्व परिषद् के अनुसार सरस्वती का उद्गम उत्तरांचल में रूपण नाम के हिमनद (ग्लेशियर) से होता था। रूपण ग्लेशियर को अब सरस्वती ग्लेशियर भी कहा जाने लगा है। नैतवार में आकर यह हिमनद जल में परिवर्तित हो जाता था, फिर जलधार के रूप में आदि बद्री तक सरस्वती बहकर आती थी और आगे चली जाती थी।
वैज्ञानिक और भूगर्भीय खोजों से पता चला है कि किसी समय इस क्षेत्र में भीषण भूकम्प आए, जिसके कारण जमीन के नीचे के पहाड़ ऊपर उठ गए और सरस्वती नदी का जल पीछे की ओर चला गया। वैदिक काल में एक और नदी दृषद्वती का वर्णन भी आता हैं। यह सरस्वती नदी की सहायक नदी थी। यह भी हरियाणा से होकर बहती थी। कालांतर में जब भीषण भूकम्प आए और हरियाणा तथा राजस्थान की धरती के नीचे पहाड़ ऊपर उठे, तो नदियों के बहाव की दिशा बदल गई। दृषद्वती नदी, जो सरस्वती नदी की सहायक नदी थी, उत्तर और पूर्व की ओर बहने लगी। इसी दृषद्वती को अब यमुना कहा जाता है, इसका इतिहास 4,000 वर्ष पूर्व माना जाता है। यमुना पहले चम्बल की सहायक नदी थी। बहुत बाद में यह इलाहाबाद में गंगा से जाकर मिली। यही वह काल था जब सरस्वती का जल भी यमुना में मिल गया। ऋग्वेद काल में सरस्वती समुद्र में गिरती थी। प्रयाग में सरस्वती कभी नहीं पहुंची। भूचाल आने के कारण जब जमीन ऊपर उठी तो सरस्वती का पानी यमुना में गिर गया। इसलिए यमुना में यमुना के साथ सरस्वती का जल भी प्रवाहित होने लगा। सिर्फ इसीलिए प्रयाग में तीन नदियों का संगम माना गया जबकि यथार्थ में वहां तीन नदियों का संगम नहीं है। वहां केवल दो नदियां हैं। सरस्वती कभी भी इलाहाबाद तक नहीं पहुंची।
सरस्वती नदी और हड़प्पा सभ्यता: सरस्वती नदी के तट पर बसी सभ्यता को जिसे हड़प्पा सभ्यता या सिन्धु-सरस्वती सभ्यता कहा जाता है, यदि इसे वैदिक ऋचाओं से हटाकर देखा जाए तो फिर सरस्वती नदी मात्र एक नदी रह जाएगी, सभ्यता खत्म हो जाएगी। सभ्यता का इतिहास बताते हैं सरस्वती नदी तट पर बसी बस्तियों से मिले अवशेष त्था इन अवशेषों की कहानी केवल हड़प्पा सभ्यता से जुड़ती है। हड़प्पा सभ्यता की २६०० बस्तियों में से वर्तमान पाकिस्तान में सिन्धु तट पर मात्र 265 बस्तियां है, जबकि शेष अधिकांश बस्तियां सरस्वती नदी के तट पर मिलती हैं। अभी तक हड़प्पा सभ्यता को सिर्फ सिन्धु नदी की देन माना जाता रहा था, लेकिन अब नये शोधों से सिद्ध हो गया है कि सरस्वती का इस सभ्यता में बहुत बड़ा योगदान था।
Wednesday, 3 October 2012
क्या आप जानते हैं कि...... मुस्लिमों द्वारा प्रयुक्त किया जाने वाला अंक 786 क्या है...???
मुस्लिम तथा इस्लाम के पुरोधा 786 अंक को विस्मिल्लाह का रूप बताते हैं.... और, सीधे सीधे इस अंक को अपने अल्लाह से जोड़ते हैं...!
परन्तु आप यह जान कर हैरान हो जायेंगे कि .... इस्लाम का 786 और कुछ नहीं .... बल्कि.... हम हिन्दुओं तथा विश्व का पहला एवं पवित्रम अक्षर ॐ है...!
दरअसल ऐसा इसीलिए है कि....... मुस्लिमों द्वारा अपने अराध्य के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द ""अल्लाह"" भी..... हिन्दुओं के वेद से ही चुराया गया है.... और, जो ""अल्ला"" का अपभ्रंश रूप है..... जिसका अर्थ ""अम्बा, अक्का, अथवा शक्ति होता है"...!
तो.... उन्होंने एक काल्पनिक अल्लाह बना लिया ..... और, वैदिक रीति के अनुसार ही दिन में 5 बार उनकी पूजा(आराधना) सुनिश्चित कर ली........ परन्तु , ""ओंकार"" के उच्चारण के बिना उन्हें अपने हर किये धरे पर पानी फिरता नजर आया..... क्योंकि उन्हें भी यह मालूम था कि.... ॐ ही साश्वत है..... और, अंतिम सत्य है...!
अपनी इस्लाम की इस विसंगति को दूर करने लिए..... उन्हें भी ॐ सरीखा ही कोई ""अदभुत और सर्वशक्तिमान"" अक्षर चाहिए था.... जो कि उन्हें नहीं मिला.... क्योंकि, पूरे ब्रह्माण्ड में ॐ एक ही है...!
इसीलिए उन्होंने..... लाचार होकर हमारे ""अदभुत और सर्वशक्तिमान"" अक्षर ॐ को ही अपना लिया...... परन्तु, उन्होंने ॐ के तीनों भागों को थोडा दूर दूर लिखा (उल्टा कर लिखा .... क्योंकि, अरबी और इस्लाम में सब चीज उल्टा कर ही लिखा जाता है).... जिससे कि..... यह एक अंक ७८६ सरीखा दिखने लगा , जिसे उन्होंने जस के तस अपना लिया......!
इस तरह ...... हम निर्विवाद रूप से यह साबित कर सकते हैं कि........ इस्लाम की पूजा (नमाज) पद्धति, उनका अल्लाह ..... यहाँ तक कि उनका पवित्रतम अंक 786 हमारे वेदों से ही चुरा कर बनाया गया है...... और, इस्लाम कोई नया धर्म अथवा संप्रदाय नहीं है...!
इन सब बातों से..... एक महत्वपूर्ण बात यह भी साबित होती है कि..... इस पूरे ब्रह्माण्ड में हिन्दू सनातन धर्म के अलावा और किसी दूसरे धर्म अथवा संप्रदाय का कोई अस्तित्व नहीं है..... और, सारे के सारे धर्म तथा संप्रदाय ........ हमारे हिन्दू सनातन धर्म से चोरी कर..... अथवा, प्रेरणा लेकर तैयार किये गए हैं....!
यही कारण है कि..... सारे दुनिया के विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा ... लाख प्रयास करने के बावजूद भी..... आज तक कोई हमारे हिन्दू सनातन धर्म का बाल भी बांका नहीं कर पाया है..... और, हम आज भी दुनिया में ....... सबसे सम्मानित तथा आदरणीय धर्म की संज्ञा पाते हैं....!
हमारा हिन्दू सनातन धर्म ही ..... ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ बना है..... और, यही.... अंत तक.... तथा , इसी गौरव के साथ विद्यमान रहेगा...!
बाकी के सारे धर्म धर्म और संप्रदाय.... पानी के बुलबुले की तरह आए हैं..... और, उसी प्रकार विलुप्त भी हो जायेंगे...!
इसीलिए..... गर्व करें कि हम सनातनी हैं ... और , सर्वश्रेष्ठ हिन्दू धर्म का हिस्सा हैं....!
जय महाकाल...!!!
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