Tuesday, 5 August 2014

प्रश्नोत्तरी ( मानव और राष्ट्र इतिहास विषय ) :-

प्रश्न :- आधुनिक विज्ञान के अनुसार मनुष्य तो केवल कुछ एक लाख वर्ष पूर्व का ही सिद्ध होता है तो आप किस आधार पर ये इतनी बड़ी संख्या कह रहे हैं ?

उत्तर :- वैदिक काल गणना के अनुसार मानव को पृथिवी पर आए आज से 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हज़ार 115 वर्ष ( 1960853115 वर्ष अब विक्रमी सम्वत् 2071 तक ) हो चुके हैं । लेकिन पहले विज्ञान लाख वर्ष तक पहुँचा फिर धीरे धीरे ये लोग मिले मानव के प्राचीन अवशेषों के आधार पर उससे पीछे होते चले गए । Radio Carbon Dating नामक प्रणाली की सहायता से 60 लाख वर्ष पुराना मनुष्य का सिला हुआ जूता मिला है ( Theosophical Path, August 1923 ) । और इसी प्रकार 12 करोड़ वर्ष पुराने एक गुफा में बनाए हुए चित्र मिले हैं जो कि स्पष्ट है मानव ही बना सकता है पशु नहीं । तो ऐसे ही हमें आशा है और सशक्त अनुसंधान से विज्ञान की गणना 12 करोड़ से भी और पीछे होते होते वैदिक गणना तक पहुँच ही जाएगी ।

प्रश्न :- मनुष्यों की उत्पत्ति तिब्बत पर ही क्यों हुई ? कहीं और क्यों नहीं हुई ?
उत्तर :- क्योंकि तिब्बत का हिमालय क्षेत्र ही मनुष्यों के रहने योग्य अनुकूल जलवायु वाला क्षेत्र था और बाकी के द्वीप जल में डूबे हुए थे और हिमालय की ऊँचाई भी उस समय बहुत कम थी ।

प्रश्न :- मनुष्यों ने प्रथम किस देश को बसाया ?
उत्तर :- मनुष्यों ने प्रथम आर्यवर्त देश को बसाया ।

प्रश्न :- आर्यवर्त देश की सीमाएँ वर्तमान स्थिती के अनुसार कहाँ तक थीं ?
उत्तर :- यह उत्तर में हिमालय, विन्ध्याचल, पश्चिम में सिन्धु नदी, पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी, दक्षिण में कटक नदी । इन नदीयों के बीच में जितना देश है उसको आर्यवर्त कहते हैं ।

प्रश्न :- देशों के नाम किस आधार पर रखे गए हैं ?
उत्तर :- देशों के नाम मनुष्य जातीयों के आधार पर रखे गए हैं ।

प्रश्न :- आर्यवर्त देश का नाम कैसे पड़ा ?
उत्तर :- आर्यवर्त देश का नाम आर्य लोगों के इस देश को निवास स्थान बनाने पर पड़ा है ।

प्रश्न :- आर्य लोग कौन हैं ?
उत्तर :- श्रेष्ठ और धर्मपूर्वक आचरण करने वाले मनुष्यों को ही आर्य कहा जाता है,जो सृष्टि के प्रथम उत्पन्न हुए और तिब्बत के हिमालय से उतर कर इस देश को अपना निवास स्थान बनाया और आर्यवर्त का नाम दिया ।

प्रश्न :- मनुष्य कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :- मनुष्य मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं, आर्य और दस्यु ( दुष्ट स्वभाव से युक्त ) । इन्हीं को देव और असुर भी कहा जाता है ।

प्रश्न :- प्रथम सृष्टि में मनुष्य कैसे थे ?
उत्तर :- प्रथम सृष्टि में मनुष्य केवल आर्य ही थे । दस्यु स्वभाव के नहीं थे ।

प्रश्न :- मनुष्यों का विस्तार पूरे आर्यवर्त देश में कैसे हुआ और कैसे मानव ने प्रथम आर्यवर्त को बसाया ?

उत्तर :- पहले हिमालय का स्तर बहुत कम था और समस्त द्वीप जल में डूबे हुए थे । धीरे धीरे समय बीतने पर जल स्तर कम होता गया और हिमालय ऊपर होता गया और मनुष्यों ने तिब्बत से नेपाल होते होते समय के साथ धीरे धीरे आर्यवर्त के दूसरे भागों में प्रवेश करना शुरू किया । पहले उत्तर प्रदेश फिर पंजाब नेपाल से होते हुए असम ब्रह्मपुत्र नदी के तट तक और मध्य भारत के भाग तक । सिन्धू नदी के तट तक आर्यवर्त बसता चला गया । मनुष्यों की आबादी भी बढ़ने लगी थी और वह भूमी पर विस्तार करता गया । मानव भूमी में खेती करने लगा । नगर और ग्राम बसाने लगा । नदियों के किनारे ग्राम बसाए जाने लगे । पर्वतों और नदीयों के पास ही शिक्षा के लिए गुरूकुल खोले जाने लगे । उस समय भूमी बहुत उपजाऊ हुआ करती थी । वृक्षों पर फल भरे रहते थे । वृक्ष कई कई मील की ऊँचे थे जिनके अवशेष अब Discovery वालों द्वारा पाए गए हैं । इस प्रकार धीरे धीरे समय के साथ मानव पूरी भूमी पर फैलता चला गया ।

प्रश्न :- आर्यवर्त में वैदिक काल कैसा था ?

उत्तर :- गुरू शिष्य परम्परा के होने से शिष्य गुरू के पास जाकर सभ्यता सीखता था,मानव बुद्धि असाधारण हुआ करती थी । समाज में वैदिक चतुर वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी । समाज समृद्धिशाली था । रोग अति न्यून था । समय समय पर यदि रोग बढ़ता भी था तो ऋषियों नें अनेकों आयुर्वेद शास्त्रों की रचना करके समाज का महान उपकार भी किया था और रोगों की चिकित्साएँ की थीं । समाजिक अर्थव्यवस्था में धन का प्रयोग न होकर सामान का आदान प्रदान होता था, परिश्रम का आदान प्रदान होता था । पुत्र और पुत्रीयाँ आज्ञाकारी होते थे । जब कोई वृद्ध आता था तो सभी छोटे खड़े होकर प्रेम पूर्वक नमस्ते करते थे । पत्नी और पती में सदाचार और शिष्टाचार का स्तर उच्च हुआ करता था । निंदा चुगली नहीं हुआ करती थी । सभी अपना ज्ञान वृद्धि के लिए प्रयत्न किया करते थे । बिगप कारण के वाद विवाद नहीं हुआ करते थे । पुरुष बलशाली और पराक्रमी होते थे, स्त्रीयाँ सुन्दर और सुशील होती थीं । स्वच्छता का विषेश ध्यान रखा जाता था ।व्याभिचार न के बराबर था । कोई चोर, ठग, और लम्पटी नहीं होता था । तो ऐसी ही आर्यवर्त की वैदिक व्यवस्था थी । शुद्र समाज भी बहुत विनयशील और सदाचारी होता था । आम जन भी संस्कृत में बातें करते थे । धर्म का पालन करना सबके लिए आवश्यक था । स्त्री पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करते थे ।

प्रश्न :- आर्यवर्त का पतन कैसे हुआ ?

उत्तर :- समय के साथ संस्कृतियों में शिथिलता आने लगती है । जो ओजस्विता का सामर्थ्य पूरे आर्यवर्त में उमड़ रहा था । वह समय आने के साथ शिथिल होने लगा । शैथिल्य का कालचक्र आरम्भ हो चुका था । कुछ जनसंख्या का बढ़ना भी अपना प्रभाव दिखा रहा था । व्यभिचार का फैलना आरम्भ हो चला था । बलशाली लोग निर्बलों पर अत्याचार करने लगे । प्रजा में चारों ओर त्राही त्राही होने लगी थी । समाज में वैदिक मर्यादाएँ भंग होने लगीं थीं । और जिसका असर अब दिखने लगा था ।

प्रश्न :- तो इस आर्यवर्त के पतन को रोकने के लिए आर्यों ने क्या किया ?

उत्तर :- जब आर्य इस पतन को ताड़ गए तो उन्होंने इसे रोकने का उपाय किया और सर्वविद्या में सम्पूर्ण और वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता धर्म के धुरंधर महर्षि वैवस्वत मनु के पास जाकर निवेदन किया गया कि आर्यवर्त को पतन से रोकने के लिए कोई दण्ड विधान बनाएँ और कोई ऐसी शासन पद्धति तैय्यार करें जिससे कि प्रजा का महान उपकार हो सके और आप इस आर्यवर्त के प्रथम राजा बनें । पर ऋषि मनु नहीं माने क्योंकि ऋषियों को संसार के शासन से मोह नहीं होता है, परन्तु देवों के बार बार अनुरोध करने पर प्रजा के उपकार के लिए महर्षि मनु ने आर्यवर्त का शासन करना स्विकार किया और राष्ट्र के प्रथम राजा बने । और एक महान ग्रन्थ वैदिक वर्ण व्यवस्था के आधार पर रचा जिसे हम मनु स्मृति के नाम से जानते हैं । जिसमें उन्होंने वैदिक व्यवस्था को भंग करने वालों के लिए कढ़े नियमों का उपादान किया । कारागार और जुर्माने भी लगाए जाते थे । गाली गलौच या अपशब्द करने वाले की जीह्वा काट दी जाती थी । हिंसा करने वाले को अग्नि भेंट कर दिया जाता था । जिससे कि आर्यवर्त में फिर से सुख और स्मृद्धि आने लगी । प्रायश्चित करने के लिए भी कड़े नियम थे जिससे कि मनुष्य सभ्य समाज में पुनः प्रवेश कर सकता था और वही सम्मान प्राप्त कर सकता था । परन्तु सबसे कठोर दण्ड था समाज से बहिष्कृत किया जाना , ये दण्ड मृत्यु से भी बढ़कर था और बहुत बुरा समझा जाता था । जब कोई वैदिक मर्यादाओं को भंग करता था तो उनको आर्य समाज से निकाल कर चतुर्वर्ण से बाहर कर दूर दक्षिण के अरण्यों ( जंगलों ) में भेज दिया जाता था । यदि वो वापिस दस्यु से आर्य बनना चाहे तो उसको मनु के नियमों के अनुसार दण्ड भोग करके पुनः वह आर्य समाज में प्रवेश कर सकता था ।

प्रश्न :- तो ऐसी व्यवस्था करने से परिणाम क्या हुआ ?

उत्तर :- समय के साथ साथ ये जाती बहिष्कार करने का कार्य बहुत उग्र हो चला था । अब वैदिक नियम भंग करने वालों को चुन चुन कर आर्य समाज से बहिष्कृत किया जाने लगा । और देश निकाल लेकर ये लोग दूर दक्षिण भारत के अरण्यों में या उससे भी दूर दूर के द्वीपों पर जा कर बसने लगे । और वहाँ उन स्थानों को अपनी अपनी जाती के नाम से बसाने लगे । कुछ लोग तो दण्ड व्यवस्था का पालन कर पुनः वैदिक आर्य समाज में प्रवेश पा लेते थे परन्तु बहुधा लोग तो आर्यों से ईर्ष्या द्वेष की भावना रखने लगे । और कभी कभी तो ये दस्यु लोग अपनी सेनाएँ लेकर आर्यों से युद्ध भी करते रहे हैं । इन्हीं को संस्कृत के ग्रन्थों में अब देवासुर संग्राम कहा जाता है । और ऐसे ही बहिष्कृत दस्यु लोग आर्यवर्त से हो होकर दूर देशों में बसते चले गए हैं, और उन देशों को अपनी जाती के नाम पर बसाते चले गए हैं । तो ऐसे ही समग्र मानव जाती अपने आर्यत्व से पतित हो होकर पूरी पृथिवी पर फैली है । और इन बहिष्कृत दस्युओं की जातीयों के नाम इनके गुण, कर्म, स्वभाव या इनके नयन नक्षों के आधार पर रखे गए हैं ।

प्रश्न :- दक्षिण में कौन कौन से देश बसे ?

उत्तर :- दक्षिण में मुख्य रूप से कर्णाटक, केरल, आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, द्रविड़, सिंहल आदि देश बसे हैं ।

प्रश्न :- अरब देश कैसे बसा ?

उत्तर :- ईरान के पास अरब देश हैं , आर्यवर्त से ही जाती ''बहिष्कृत ब्राह्मणों'' की एक जाती जिसको कि शैख जाती के नाम से जाना जाता था वहाँ जाकर बसी है । और वह स्थान जहाँ घोड़े बहुत उत्तम नसल के पाए जाते हैं । ऐसे देश को शैखों ने बसाया है । संस्कृत में घोड़े को अर्वन् कहा जाता है और वह स्थान जहाँ घोड़े पाए जाते हों उस स्थान को अर्व कहा जाता है । तो ये शैखों ने ऐसे अर्व देश को बसाया जो समय बीतने पर अर्व से अरब बन गया और शैख लोग शेख बन गए । आज भी अरबी गल्फ देशों में घोड़े दुनिया में सबसे उत्तम नसल के होते हैं । इन शैख ब्राह्मणों को अपने मूल आर्य पूरवजों से घृणा हो चुकी थी जिस कारण इन्होंने अपनी भाषा को भी उलटी दिशा से लिखना शुरू किया । अरब में यहूदी मत आते आते इनकी भाषा अरबी हो चुकी थी । और फिर ये अरब का रेगिस्तान ईसाई और बाद में ईस्लाम हुआ ।

प्रश्न :- द्रविड़, पाण्ड्य, चोल आदि देश किस जातीयों ने बसाए ?

उत्तर :- चोल देश ( तमिलनाडु के नीचे वाला भाग और वर्तमान केरल का कुछ भाग ) आर्यवर्त से बहिष्कृत चोल जाती ने बसाया, संस्कृत में चोरी करने वालों को चौर बोला जाता है, और यही जो चौर स्वभाव वाले लोग थे जिनको इनके स्वभाव के कारण जाती बहिष्कार के दण्ड दिए गए और एक समान मिलजाने पर इनकी एक अलग से दस्यु जाती हो गई जिसको यह चौर शब्द को भ्रष्ट करके चौल या बाद में चोल कहने लगे । तो दक्षिण भारत में यही चोल जाती के लोगों ने चोल प्रदेश को बसाया है । और एसे ही व्यापारियों को आर्य लोग पणिक या वणिक कहते थे, जो कुछ धर्म भ्रष्ट होकर के धन लोलुप हो गए और ऐसे ही लोगों ने समाजिक बहिष्कार के बाद आकर दक्षिण में डेरा डाला और वही पणिक से पाण्ड्य लोग कहलाने लगे और अपने नाम से देश को बसाया । ठीक इसी प्रकार किसी कारण वश दूसरी क्षत्रीय जातीयाँ जैसे द्रविड़, कर्णाटक, केरल और आन्ध्र जातीयों ने दक्षिण भारत में देश प्रदेश अपने अपने नाम से बसाए हैं । यही लोग हैं जिनकी भाषाएँ समय बीतने के साथ ही संस्कृत से भ्रष्ट हो होकर ही तमिल, मलयालम, तेलुगु , कन्नड़ आदि हुई हैं ।

प्रश्न :- सिंहल देश किसने बसाया है ?

उत्तर :- आर्यवर्त के उत्तर में सिंह का शिकार करने वाले क्षत्रीयों को सिंहल कहा जाता था । जैसे वृष या वृष्भ ( बैल ) का शिकार करने वाले क्षत्रीयों को वृषल कहा जाता था । और संस्कृत में सिंह कहते हैं Lion को । तो यही सिंहली क्षत्रीय जाती द्रविड़ आदी प्रदेश को लांघ कर जिस द्वीप पर जाकर बसी उसे ही सिंहल द्वीप के नाम से बसाया है । इसी कारण राजपूताना और महाराष्ट्र के राजपूत क्षत्रीयों को भी सिंहली कहा जाताथा और सम के साथ यह शब्द छोटा होकर सिंह बन गया और क्षत्रीयों के नाम केपीछे लगने लगा । मुख्य रूप से ये क्षत्रीय बंगाल से ही जाकर सिंहल द्वीप पर बसे हैं । और यह सिंहल शब्द ही बिगड़ कर अंग्रेज़ी में Cylon हुआ है । जहाँ आज के श्रीलंका में भी ये दोप्रकार के लोग पाए जाते हैं , सिंहली और तमिल, और इसी कारण लंका के ध्वज पर सिंह का चित्र है जिसने कृपाण को पकड़ रखा है । यह ध्यान रहे कि जो वर्तमान श्रीलंका है वह प्राचीन सिंहल द्वीप का एक छोटा सा ही भाग था समय आने पर लंका की शंका की शेष भूमी अब जल में डूब चुकी है । और सिंहल में पहले सिंहली और बाद में द्रविड़ी जाकर बसे हैं तो ये दोनों ही आर्यों की पतित शाखाएँ ही हैं । और यह लंका भूमी को सुर्वण भूमी भी कहा जाता है । खोजों से पता लगता है कि इस भूमी में बहुत सा सोना निकलता था । और यह बात सत्य है कि यहाँ के सिंहली राजा भी अपने राज्य महलों को सुवर्ण से बनाते रहे हैं । रामायण काल का राजा रावण इसी का उदहारण है । जिसकी लंका में सुवर्ण महल थे । ये बात मनघड़ंत नहीं है । और सिंहल का जो बाकी बचा हुआ भाग था उसमें ये सात द्वीप आते थे :- अंगद्वीप, यवद्वीप, मलयद्वीप, शंखद्वीप, कुशद्वीप, वराहद्वीप आदि भारतवर्ष के अनुद्वीप ही हैं जो कि दर दूर तक फैले थे । जिनमें से कुछ द्वीप जल में डूब चुके हैं और बाकी कुछ अभी भी हैं , जैसे मलयद्वीप ( मलेशिया ) जिसपर द्रविड़ी लोग जाकर बसे जो कि मलयालम भाषा का अधिकतर प्रयोग करते थे । तो यही मलयाली लोगों ने मलेशिया , और ऐसे ही आगे जाकर बलिद्वीप ( इंडोनेशिया ) को बसाया है । तो ऐसे ही पतित आर्यों की शाखाएँ ही विस्तृत हो होकर पूरे विश्व में फैली हैं । ( प्रमाण :- Historical History of the world Vol 1, p.536 )

प्रश्न :- आन्ध्र को किसने बसाया ?

उत्तर :- आन्ध्र को विशाखापट्टनम के तट पर आर्यों में क्षत्रीय महाराज विश्वामित्र के पतित पुत्रों की जाती के आन्ध्र लोगों ने बसाया है ,और आगे यही आन्ध्र लोगों ने द्वीपों को लांघते हुए एक विशाल द्वीप को बसाया जो चारों ओर जल से घिरा हुआ था उसका नाम रखा गया आन्ध्रालय जो समय के साथ विकृत होकर अस्ट्रेलिया देश कहा जाने लगा । अस्ट्रेलिया के मूल निवासीयों को इण्डियन कहा जाता है भारत के लोगों की भांती उनमें भी छुआछूत की प्रथा है वे दूसरों के हाथ का छुआ नहीं खाते हैं । ( प्रमाण :- Hamsworth History of the world p.5675 )

प्रश्न :- चीन देश कैसे बसा और किसने बसाया ?

उत्तर :- महाभारत में भी चीन या फिर महाचीन का उल्लेख आता है जिसका राजा भगदत युधिष्ठिर द्वारा किए राजसूय यज्ञ में आया था । तो इस चीन देश को लगभग 9 करोड़ वर्ष पहले ही तिब्बत के पार आर्यों में से ही निकली सूर्यवंशी क्षत्रीय चीना नाम की जाती ने अपने नाम से बसाया है । चीना शब्द का संस्कृत में अर्थ है तेज़ स्वास्थ्य वाले लोग । तो यही लोग जब हिमालय के दूसरी ओर में जाकर बसे तो इनकी भाषा और संस्कृती बदलती चली गई । लेकिन कुछ बातें इस जाती ने संजो कर रखी जैसे कि चीनी लिप्पी , प्रचीन ब्राह्मी लिप्पी ( जिसमें पहले संस्कृत लिखी जाती थी ) की तर्ज़ पर चित्रलिप्पी है जिसे चित्र बना कर समझाया जाता है । आज इसी चीना जाती को मंगोल जाती के नाम से जाना जाता है जो चीन में फैली और समय के साथ फिर दूर के द्वीपों पर विस्तृत होती गई , मंगोलिया, जापान, कोरिया आदि देशों तक यही पतित क्षत्रीयों का विस्तार हुआ है । ( प्रमाण :- Rigvedic India, p 180 - 181 )

प्रश्न :- अफगानिस्तान कैसे बसा ?

उत्तर :- आर्यों की एक पतित चन्द्रवंशी क्षत्रीय जाती जिसको प्रतिष्ठान कहा जाता था । तो यहाँ इस खैबर पख्तूनख्वा ( पाकिस्तान ) और आगे जो अफगानिस्तान है यहाँ की सत्ता को गणराज्य कहा जाता था । और ऐसे ही सात गणराज्य पूरी अफगानिस्तान की धरती पर फैले थे जिसको महाभारत में पाण्डवों ने जीत भी लिया था । जिनको सप्तगणों का नाम किसी काल में दिया गया था, और प्रतिष्ठानों ने आगे चलकर इसे उपगण या फिर अपगण के नाम से राज्य स्थापित किया है । जो ईस्लाम के आने से पहले अपगणस्थान ही कहलाता रहा है और शब्दों के समय के साथ भ्रष्ट होने के बाद बिगड़ बिगड़ कर ये अफगानिस्तान कहा जाने लगा । और प्रतिष्ठान नामक जाती ( पठान )के नाम से जानी जाने लगी । और ये अफ्रीदी लोग उस समय के गण लोग ही हैं । आज भी किसी समय के प्रतिष्ठान गणराजा महाराजा गजराज सिंह का बसाया हुआ शहर गजनी आज भी उसी नाम से जाना जाता है और महाभारत के प्रतिष्ठान गण राजा शकुनी के राज्य गान्धार का नाम आज कान्धार के नाम से जाना जाता है। ( प्रमाण :- Chips from german workshop, p. 235 )

प्रश्न :- बालोचिस्तान देश कैसे बसा ?

उत्तर :- किरात नामक क्षत्रीय जाती जिस स्थान पर बसी उस स्थान को ही बल में उच्च स्थान का नाम दिया गयप क्योंकि किरात लोग अपने पराक्रम के नाम से जाने जाते रहे हैं । और बल में उच्च होने के कारण देश को नाम दिया गया बल्ल उच्च स्थान , जो समय के साथ भ्रष्ट होकर बालोचिस्तान बन गया ।

प्रश्न :- ईरान देश कैसे बसा ?

उत्तर :- आर्यों के ही पतित रूप पारसी जो कि गण राज्यों से आगे निकल गए वहाँ उस देश को अपनी पूर्व जाती के नाम से बसाया जिसका नाम आर्यान रखा, जो कि समय पड़ने के साथ साथ ही ईरान हो गया । और ये पारसी लोग आर्यवर्त से ही नदियों के नाम भी लगे , जिससे कि इन्होंने अपने देश आर्यान की नदियों के नाम को रखा , जैसे कि हरहवती जो कि सरस्वति नदि का अपभ्रंश रूप है । और एक नदी का नाम सरयू के स्थान पर हरयू नदी रखा । ये वही सरयू नदी है जो उत्तर प्रदेश में बहती है । तो ऐसे ही ईरान देश बसा ।


प्रश्न :- मिस्त्र देश कैसे बसा ?

उत्तर :- मिस्त्र देश जिसको कि आजकल Egypt भी कहते हैं । अफ्रीका और एशिया को स्वेज़ नामक नहर ने प्रचीन काल से अलग कर रखा है । इस नहर को लांघकर ही आर्यों ने मिस्त्र देश को बसाया है । क्योंकि जैसे प्राचीन काल से ही नगरों को नदी के किनारे पर बसाने की प्रथा रही है ठीक वैसे ही आर्यों से पतित द्रविड़ियों और पणिकों ने नील नामक नदी के किनारे मिस्त्र देश को बसाया है । ये लोग Persian Gulf से होते हुए वहाँ अफ्रीकी देश मिस्त्र को गए हैं । मिस्त्र देश के तीन नाम हैं कमित, हपि और मिस्त्र । कुमृत् शब्द संस्कृत का है जिसका अर्थ है काली मिट्टी, तो जिस देश की मिट्टी काली है जो नील नदी के किनारे बसा है वह कुमृत् हुआ और समय के बीतने से ये नाम विकृत होकर कमित बन गया । अप का अर्थ है पानी नील नदी दुनिया में सबसे बड़ी है जिसके जल को अप और नदी को अपि जो समय के साथ बिगड़ कर हपि हो गया है । तीसरा शब्द है मिस्त्र जिसका संस्कृत में अर्थ हुआ मिश्रित तो यह नाम किस आधार पर पड़ा यह कहना कठिन है । और ये मिस्त्र निवासी ममीयों की कब्रों के लिए इमली की लकड़ीयों का प्रयोग करते रहे हैं । तो यह इमली की लकड़ी मद्रास प्रांत से ही वहाँ गई है जिससे सिद्ध है कि वे लोग आर्यों की शाखा हैं । इनके पिरामिडों की लिप्पीयों से पता चला है कि ये लोग अपने को सूर्यवंशी मानते थे और सूर्य की पूजा करते थे, और मनु को ही अपना मूल पुरुष समझते रहे हैं । जिससे कि ये लोग आर्य ही सिद्ध होते हैं । ( प्रमाण :- India in Greece p.178 )

प्रश्न :- अफ्रीका के बाकी देश कैसे बसे ?

उत्तर :- आर्यों की ही एक पतिति क्षत्रीय जाती थी झल्ल जिसने मिस्त्र पार करके अफ्रीका को बसाया है यही झल्ल लोगों को समय के साथ जुलू कहा जाने लगा । और अधिकतर ये लोग काले होते हैं । ऐतरेय ब्राह्मण के ३१ अध्याय के अन्त में मन्त्र आता है जिसमें लिखा है कि दुष्यन्त के पुत्र राजा भरत ने मष्णार नामक देश में सुवर्ण अलंकारों से युक्त बड़े बड़े श्वेत दाँतों वाले हाथीयों के एक सौ सात वृंद दान में दिए । और साथ ही इस मंत्र में लिखा है कि राजा भरत से पहले या बाद में ऐसा किसी और ने नहीं किया है । अब प्रश्न ये उठता है कि ये मष्णार देश है कहाँ पर ? Menual Of Geography देखने पर पता चलता है कि ये अफ्रीकाखण्ड में दक्षिणी रोडेशिया देश है, जहाँ मष्णा नामक स्थान है । पूर्व काल में यहाँ बहुत सोना होता था और हाथीयों की बहुतायात थी ऐसा वहाँ पर विद्यमान प्रचीन खण्डरों से पता लगा है । तो यही मष्णा नामक देश वही मष्णार है । जिसके बारे में ऐतरेय ब्राह्मण लिखता है । एक और प्रमाण इस प्रकार है कि भविष्य पुराण में आता है कि ( रथक्रान्ते नराः कृष्णाः प्रायशो विकृताननाः । आममांसभुजाः सर्वे शूराः कुंचितमूर्द्धजाः ) जिसका अर्थ है कि यहाँ मष्णार में रहने वाले लोग काले, विकृत मूँह वाले, कच्चा माँस खाने वाले और सिर से घुंघराले बाल वाले होते हैं । यही स्थिति आजकल सभी अफ्रीका वासीयों की है जिनको हम Nigros कहते हैं । तो ये लोग भी इसी प्रकार आर्यवर्त से यहाँ आकर किसी काल में बसे हैं ।

प्रश्न :- तो क्या सारी मानव जाती ही ऐसे आर्यवर्त से जा जाकर दूर देश में बसी है ?

उत्तर :- अवश्य ही ऐसा है कि आबादी बढ़ने के साथ साथ और ऐसे ही कुछ जाती बहिष्कार के दण्ड से ही मानव पूरी भूमी पर फैल गया है । और ऐसे ही अफ्रीका से युरोप देशों तक मानव का विस्तार हो गया है । तो ऐसे में पूरी मानव जाती एक ही सिद्ध होती है ।

प्रश्न :- लेकिन आर्य लोग तो बाहर के देशों से आए हम तो ऐसा मानते हैं और यहाँ के मूल निवासी तो तोई और हैं, क्ता ये बात गलत है ?

उत्तर :- आर्य लोग ही आर्यवर्त के मूल निवासी हैं, और बाहर किसी देश से आने का प्रश्न नहीं बल्की आर्य ही बाहर जाकर किसी दूसरे देशों में बसे हैं जैसे हमने कुछ देशों के उदाहरणों से आपको ऊपर सिद्ध किया है । हाँ आर्य लोग बाहर विदेशों में जाकर बसते रहे हैं और कुछ लोग वापिस घूम फिर कर अपने देश में आए हों तो बात मानने वाली हैं । तो मूल निवासी तो पूरी पृथिवी का मनुष्य एक ही है । आर्यों के बाहर विदेशों से आने की बातें तो ईसाईयों और अम्बेदकर वादीयों ने आर्यों से घृणा और द्वेष फैलाने के । उद्देश्य से लिखी हैं । क्योंकि उनकी बातें पक्षपात पूर्ण और तार्किक वैज्ञानिक आधार पर कहीं ठहरती नहीं हैं । और ये अम्बेदकर के पुत्रों का मान्सिक स्तर बिगड़ा हुआ है , जब इनसे पूछो कि आर्य लोग किस देश से आकर बसे थे ? तो पहले तो ये लोग उत्तर में ब्राह्मण ब्राह्मण चिल्ला कर आपको माँ बहन की गंदी गालीयाँ देंगे, और फिर कोई बोलेगा कि आर्य ईरान से आए ,कोई कहेगा युरोप से आए । तो ऐसे मूर्खतापूर्वक कुतर्क करके ये बौद्ध अम्बेदकरवादी अपने माता पिता के संस्कारों का प्रदर्शन करते रहते हैं ।

मानव जाती एक है ,अतः आर्यों लौट चलो वेदों की ओर ।।

Monday, 25 November 2013

जय श्री राम ... बनायेंगे मंदिर ।

बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मंदिर, कसम तुम्हारी राम, प्राणों से प्यारा है - 2
अवधपुरी का धाम .. बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मन्दिर ... जय हो


सपना ये पूरा करके रहेंगे, हमने है मन में ठाना,
हर हद को हम पार करेंगे. देखेगा ये जमाना,
हम तेरे हैं दीवाने, आये जलवा दिखाने, मिटने न देंगे तेरा नाम

बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मंदिर, कसम तुम्हारी राम, प्राणों से प्यारा है - 2
अवधपुरी का धाम .. बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मन्दिर ... जय हो

नस नस में जो खून बहे है, खून तुम्हारे नाम का,
हिन्दू धर्म का बच्चा बच्चा, प्रभु तुम्हारे काम का,
अब हमे नही होश, बड़ा दिल में है जोश, चाहे कुछ भी हो अंजाम,

बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मंदिर, कसम तुम्हारी राम, प्राणों से प्यारा है - 2
अवधपुरी का धाम .. बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मन्दिर ... जय हो

जब तक मन्दिर बने न तेरा, चैन से न बैठेंगे,
गोली खंजर कुछ भी चले, हम सीने पर झेलेंगे,
हम सच्चे तेरे भक्त, बड़े इरादों के सख्त, ये पूर्ण कर काम,

बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मंदिर, कसम तुम्हारी राम, प्राणों से प्यारा है - 2
अवधपुरी का धाम .. बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मन्दिर ... जय हो

मर्यादापुरुषोत्तम राम, मर्यादा के होंगे काम, हम हैं दीवाने राम के,
राम जी की डोली चली, बोले बजरंग बली, भक्त अयोध्या धाम के,
रामजी का मन्दिर बने, खुशियों के दीप जलें, होंगे नहीं नाकाम,

बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मंदिर, कसम तुम्हारी राम, प्राणों से प्यारा है - 2
अवधपुरी का धाम .. बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मन्दिर ... जय हो

बढ़ते कदम अब रोकेंगे नहीं, हम पूरा करेंगे काम हम,
मन्दिर बनाएं हम सबको दिखायें हम, चाहे निकल जाए दम,
राम जी के मतवाले, काटेंगे अँधेरे काले, करेंगे नहीं आराम,

बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मंदिर, कसम तुम्हारी राम, प्राणों से प्यारा है - 2
अवधपुरी का धाम .. बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मन्दिर ... जय हो

बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मंदिर, कसम तुम्हारी राम, प्राणों से प्यारा है - 2
अवधपुरी का धाम .. बनायेंगे मंदिर, बनायेंगे मन्दिर ... जय हो

महापुरुषों के इस्लाम के बारे में विचार ।

विनायक दामोदर सावरकर (२८.५.१८८३-२६.२.१९६६) जी के विचार मुल्लों के बारे में


१. मजहवी धारणा-''सामान्यतः मुसलमान अभी अत्यधिक धार्मिकता और राज्य की मजहबी धारणा के ऐतिहासिक चरण से नहीं उबर पाये हैं। उनकी मजहबी राजनीति मानव-जाति को दो भागों में विभाजित करती है-'मुस्लिम भूमि' और 'शत्रु भूमि' ! वे सभी देश, जिनमें या तोपूर्ण रूप से मुसलमान ही निवास करते हैं अथवा जहाँ मुसलमानों का शासन है, 'मुस्लिम देश' हैं और अन्य देश 'शत्रु देश'।'' (सावरकर एण्ड हिज टाइम, पृ. २३०)

२. मुस्लिम धर्मान्धता-''पारसी-ईसाई आदि भारत के लिए कोई समस्या नहीं है। जब हम स्वतन्त्र हो जायें तब इन्हें बड़ी सरलता से हिन्दी नागरिक की श्रेणी में लाया जा सकेगा। किन्तु ुसलमानों के बारे में बात दूसरी है। जब कभी इंग्लैण्ड भारत से अपनी सत्ता हटा लेगा तब भारतीय राज्य के प्रति देश के मुसलमान भयप्रद सिद्ध हो सकते हैं। हिन्दुस्थान में मुस्लिम राज्य की स्थापना करने की अपनी धर्मान्ध योजना को अपने मन-मस्तिष्क में संजोय रखने की मुस्लिम जगत की नीति आज भी बनी हुई है।' (३० दिसम्बर १९३९ को हिन्दू महासभा का अध्यक्षीय भाषण)

३. ''मुसलमानों में जात-पांत या क्षेत्रीयता का भाव नहीं है, यह कहना सर्वथा भ्रामक है। दुर्रानी मुसलमान व मुगल मुसलमान, दक्खिनी मुसलमान व उत्तरी मुसलमान, शेख मुसलमान व सैयद मुसलमानों के झगड़े का लाभ उठाकर ही मराठों ने मुगलों का तखता पलटा। शिया और सुन्नी दंगे वैष्णव व शैवों के दंगों से हजार गुणा ज्यादा भयंकर है- और बार-बार होते रहते हैं।
काबुलमें सुन्नी मुसलमानों ने अहमदिया मुसलमानों को पत्थरों से मार डाला। बहाई मुसलमान तो अन्य सभी मुसलमानों को इस दुनियां में फांसी और नर्क के योग्य समझते हैं। अस्पृश्यता भी उनमें कम नहीं हैं। भंगी मुसलमान को पानी भी न छूने देने वाली व मस्जिद में नमाज़ के लिए न जाने देने की घटनायें होती ही रहती हैं।'' (मौलाना शौकतअली को लिखे पत्र तीसरा खंड, सावरकर समग्र वांड्‌., पृ. ७५८)

४. मुस्लिम मनोवृत्ति- पिछले पचास वर्षों में, मुसलमानों को प्रसन्न कर व उन्हें एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र में सम्मिलित करके कम से कम इस हेतु प्रेरित करने के लिए कि सर्वप्रथम वे भारतीय हैं व फिर मुसलमान हैं, कांग्रेस के प्रयासों का बुरी तरह असफल होने का क्या कारण था ? ऐसा नहीं है कि मुसलमान एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र नहीं बनाना चाहते किन्तु एकता, राष्ट्रीय एकता की कल्पना उसके प्रादेशिक एकता पर आधारित नही है। इस विषय पर किसी मुसलमान ने यदि स्पष्ट एवं बोधगम्य रूप से अपना मानस व्यक्त किया है तो वह मोपला आन्दोलन के नेता अली मुसलियार ने हजारों हिन्दू महिलाओं, पुरुषों, बच्चों को धर्मान्तरित करने अथवा तलवार के बल पर समाप्त करने के अति दुष्ट अभियानके समर्थन में उसने घोषित किया कि भारत को एक संयुक्त राष्ट्र होना ही चाहिए और हिन्दू मुसलमान की शाश्वत एकता स्थापित करने का केवल एक ही मार्ग हैं और वह है सारे हिन्दुओं का मुसलमान बन जाना।'' (नागपुर में हिन्दू महासभा में अध्यक्षीय भाषण)

५. मुसलमान-मुसलमान, भारतीय कभी नहीं-मुसलमान, मुसलमान प्रथम और अंतिम रूप से मुसलमान रहे, भारतीय कभी नहीं। वे तब तक तटस्थ रहे जब तक कि दिगम्रमित हिन्दुओं ने अंग्रेजी राज से सभी भारतीय के लिए राजनैतिक अधिकार प्राप्त करने का संघर्ष जारी रखा और लाखों की संखया में जेल गये, हजासरों की संखया में अण्डमान गये, सैकड़ों की संखया में फाँसी पर झूल गये और जैसे ही एक ओर कांग्रेसी हिन्दुओं द्वारा चलाये जा रहे निःशस्त्र आन्दोलन एवं दूसरी ओर कांग्रेस से बाहर सशस्त्र हिन्दू क्रान्तिकारियों द्वारा अधिक भयावह एवं प्रवासी जीवन-मृत्यु का संघर्ष चलाये जाने से अंग्रेजी शासन पर पर्याप्त रूप से प्रभाव पड़ा और उन्हें भारतीय को महत्वपूर्ण राजनैतिक शक्ति देने को विवश होना पड़ा, तुरन्त ही मुसलमान चाहरदीवारी से कहने लगे कि वे भी भारतीय हैं, उन्हें भी अपना अधिकार मिलना चाहिए। अंततोगत्वा बातयहाँ तक पहुँची कि भारतवर्ष को 'मुस्लिम भारत' व 'हिन्दू भारत' में विभाजित करने का प्रस्ताव ज़ोरशोर से रखा गया और इस हेतु मुस्लिम लीग जैसी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ने मुस्लिम राष्ट्रों के साथ हिन्दुओं के विरुद्ध मित्रता करने की तत्परता बताई।'' (नागपुर में हिन्दु महासभा में अध्यक्षीय भाषण)

६. वन्द्रमातरम्‌ का विरोध-''मुस्लिम लीग 'वन्देमातरम्‌' को इस्लाम विरोधी घोषित कर चुकी है। राष्ट्रवादी कहे जाने वाले कांग्रेसी मुस्लिम नेता भी 'वन्देमातरम्‌' गाने से इनकार कर अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचय दे चुके हैं। हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित व दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वन्देमातरम्‌ का विरोध कर रहे हैं। कल 'हिन्दुस्थान' या 'भारत' नामों पर एतराज़ करेंगे-इन्हें इस्लाम विरोधी करार देंगे। हिन्दी की जगह उर्दू को राष्ट्रभाषा व देवनागरी की जगह अरबी लिपि का आग्रह करेंगे। उनका एकमात्र उद्‌देश्य ही भारत को 'दारूल इस्लाम' बनाना है। तुष्टीकरण की नीति उनकी भूख और बढ़ाती जायेगी जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना होगा।'' (अहमदाबाद का हिन्दू महासभा का अध्यक्षीय भाषण)

७.हिन्दू का सैनिकीकरण-''जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण नहीं किया जायेगा, तब तक भारत की स्वाधीनता, उसकी सीमायें, उसकी सभ्यता व संस्कृति कदापि सुरक्षित नहीं रह सकेगी। मेरी तो हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा है, यही आदेश है कि वे अधिकाधिक संखया में सेना में भर्ती होकर सैन्य-विद्या का ज्ञान प्राप्त करें, जिससे समय पड़ने पर वे अपने देश का स्वाधीनता की रक्षा में योग दे सकें।'' (१९५५ में जोधपुर में सम्पन्न हिन्दू महासभा अधिवेशन में भाषण)

८. हिन्दुस्थान नाम का विरोध-''हर एक देश का नाम उसके राष्ट्रीय बहुमत वाले नाम से ही पुकारा जाना चाहिए। क्या कभी बलूचिस्तान, वजीरिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्किस्थान आदि नामों पर भी आपत्ति की गयी, जबकि इन देशों में गैर-मुस्लिम अल्पमत बस रहा है ? फिर हिन्दुस्थान या हिन्दू राज्य का नाम लेते ही इनकी साँस क्यों उखड़ने लगती है-जैसे कि उन्हें साँप ने ही काट खाया हो ?'' (विनायक दामोदर सावरकर, पृ. २२२)


सरदार वल्लभ भाई पटेल (३०.१.१८७५-१५.१२.१९५०) जी के विचार मुल्लों के बारे में

१. मुसलमान अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन लाऐं    ''भारत का नया नाष्ट्र किसी भी प्रकार की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सहन नहीं करेगा। यदि फिर वही मार्ग अपनाया जाना है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ, तो जो लोग पुनः विभाजन करना चाहते हैं और फूट के बीज बोना चाहते हैं उनके लिए यहाँ कोई स्थान नहीं होगा, कोई कोना नहीं होगा।........... किन्तु मैं अब देखता हूँ कि उन्हीं युक्तियों को फिर अपनाया जा रहा है जो उस समय अपनायी गयीं थीं जब देश में पृथक्‌ निर्वाचन-मण्डलों की पद्धति लागू की गयी थी। मुस्लिम लीग के वक्ताओं की वाणी में प्रचुर मिठास होने पर भी अपनाये गये उपाय में विषय की भरपूर मात्रा है। सबसे बाद के वक्ता (श्री नजीरुद्‌दीन अहमद) ने कहा है-''यदि हम छोटे भाई का संशोधन स्वीकार नहीं करेंगे तो हम उसके प्यार को गँवा देंगे।'' मैं उसका प्यार गँवाने के लिए तैयार हूँ, अन्यथा बड़े भाई की मृत्यु हो सकती है। आपको अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए, स्वयं को बदली हुई परिस्थितियों के अनुकूल ढालना चाहिए। यह बहाना बनाने से काम नहीं चलेगा कि ''हमारा तो आपसे घना प्यार है।'' हमने आपका प्यार देख लिया है। अब इसकी चर्चा छोड़िए।''

२. हम देश का पुनः विभाजन नहीं चाहते-''आइए, हम वास्तविकताओं का सामना करें। प्रश्न यह है कि आप वास्तव में हमसे सहयोग करना चाहते हैं या तोड़-फोड़ की चालें चलना चाहते हैं। मैं आपसे हृदय-परिवर्तन का अनुरोध करता हूँ। कोरी बातों से काम नहीं चलेगा; उससे कोई लाभ नहीं होगा। आप अपनी प्रवृत्ति पर फिर से विचार करें। यदि आप सोचते हैं कि उससे आपको लाभ होगा तो आप भूल कर रहे हैं....... मेरा आपसे अनुराो है कि बीती को बिसार दें, आगे की सुध लें। आपको मनचाही वस्तु मिल गयी है। और स्मरण रखिए, कि आप ही लोग पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं, पाकिस्तान के वासी नहीं। आप लोग आन्दोलन के अगुआ थे। अब आप क्या चाहते हैं ? हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो।'' (संविधान-सभा में भाषण, दि. २८.८.१९४७)

गुरु नानक देव (१४६९-१५३९) जी के विचार मुल्लों के बारे में


हिन्दुओं को यातनाएं दी गई -''सैय्यद, शेख, मुगल, पठान आदि सभी बहुत निर्देयी हो गए थे और वे हिन्दुओं को भीषण यातनाएं दे रहे थे। उन्होंने हिन्दुओं को गिद्ध आदि मांसभक्षी पक्षिणें के आगे डाल दिया। अनेकों (हिन्दुओं) को उनके शरीरों में कीलें ठोंकर मार डाला गया। अन्य अनेकों को कुत्तों से नुचवाकर मरवा दिया गया। जिन्होंने इस्लाम में धर्मान्तरित होना स्वीकार नहीं किया, उन्हें अन्य अनेकों प्रकार से यातनाएं दी गईं। यज्ञ और हवन करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया और जिन्होंने इस आज्ञा का उललंघन किया उन्हें क्षमा मांगनी पड़ी। हिन्दुओं की सुन्दर स्त्रियों का अपहरण किया गया और उन्हें जबरदस्ती मुसलमानों के घरों में रखा गया। न्यायाधीशों ने रिश्वत लेकर अपने निर्णयों द्वारा सच को झूठ में बदल दिया।''

(नानक प्रकाश तथा प्रेमनाथ जोशी की पुस्तक 'पैन इस्लामिज्म रौलिंग बैक' के पृ. ८० से)

 लाला लाजपतराय (२८.१.१८६५)-१७.११.१९२८) जी के विचार मुल्लों के बारे में

क्या कोई मुस्लिम नेता कुरान और हिदीस के विपरीत जा सकता है ?

''एक बात और है, जो मुझे बहुत दिनों से कष्ट दे रही है, जिसे मैं चाहता हूँ कि आप बहुत ध्यान से सोचें और वह है हिन्दू-मुस्लिम एकता। पिछले ६ महीनों में मैंने अपना अधिकांश समय मुस्लिम इतिहास और मुस्लिम कानून को पढ़ने में लगाया है और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यह न तो सम्भव है और न ही व्यावहारिक है। असहयोग आन्दोलन में मुस्लिम नेताओं की ईमानदारी व निष्ठा को मानते हुए और उसे स्वीकारते हुए, मैं समझता हूं कि उनका धर्म उनके मार्ग में एक किस्म से रुकावट डालता है।

आपको याद होगा हकीम अजमल खां और डॉ. किचलू से उस विषय मेंजो मेरी बातचीत हुई थी, उसकी रिपोर्ट मैंने आपको कलकत्ता में दी थी। हकीम साहेब से बेहतर कोई मुसलमान हिन्दुस्तान में नहीं हे। परन्तु क्या कोई अन्य मुस्लिम नेता कुरान के विपरीत जा सकता है ? मैं तो केवल यही सोचता हूँ कि इस्लामिक कानून के बारे में मेरा ज्ञान सही नहीं है और ऐसा ही सोचकर मुझे राहत मिलती है। परन्तु यदि यह सही हे, तो यह बात साफ़ है कि हम अंग्रेजों के विरुद्ध एक हो सकते हैं, परन्तु ब्रिटिश रूपरेखा के अनुसार हिन्दुस्तान पर शासन चलाने के लिए एक नहीं हो सकते। जम जनतांत्रिक आधार पर हिन्दुस्तान पर शासन चलाने के लिए एक नहीं हो सकते।

फिर उपाय क्या है ?उ मुझे हिन्दुस्तन के सात करोड़ हिन्दुओं का डर नहीं है, परन्तु मैं सोचता हूँ कि हिन्दुस्तान के सात करोड़ मुसलमान और अफ़गानिस्तान,, मध्य एशिया, अरब, मिसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगे। मैं ईमानदारी से हिन्दू-मुस्लिम एकता की आवश्यकता और वांछनीयता में विश्वास करता हूँ। में मुस्लिम नेताओं पर भी पूरी तरह से विश्वास करने को तैयार हूँ, परन्तु कुरान और हदीस की निषेधाज्ञा के बारे में क्या कहें ? ये नेता उनका उल्लंघन नहीं कर सकते। तो क्या हम बर्बाद हो जाएंगे ? मैं ऐसी बात नहीं सोचता। मैं आशा करता हूँ कि सुशिक्षित और बुद्धिमान इस कठिनाई से बच निकलने का कुछ उपाय ढूंढेंगे।''

(सी. आर. दास को लिखे पत्र से, जा बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूण्र वाड्‌मय, खंड १५, के पृ. २७५ पर उद्धृत 

समर्थ गुरू रामदास (१६०८-१६८०) जी के विचार मुल्लों के बारे में

शिवजी महाराज के गुरू प्रसिद्ध संत समर्थ रामदास ने हिन्दुओं की स्थिति जो उन्होंने १६३२-४४ में देखी उसे उन्होंने अपने ग्रन्थ 'दास बोध' में इस प्रकार व्यक्त किया :


(१) ''ऊँची और नीची सभी जातियों की अगणित हिन्दू स्त्रियों को यातनाएं दी गईं और उनका बलात्कार किया गया। अनेकों बंदी बनाई गईं और उन्हें दूर देशों में बेचा गया। अनेक सुन्दर स्त्रियों ने यातनाओं से दुखी होकर आत्महत्या कर ली है।


(२) 'लोगों की धन-सम्पत्ति जब्त कर ली गई है। भय के कारण से अनंकों ने अपने घर बार छोड़ दिए और इस प्रक्रिया में अनेकों मर गए। लोगों को कपड़ा और भाजन प्राप्त नहीं है।''


(३) ''अनेक लोग दुष्कर्मों में ढ़केल दिए गए हैं जबकि अनेक बलात्‌ स्लाम में धर्मान्तरित कर दिए गए हैं। अगणित बच्चे चीख-चीखकर रो रहे हैं क्योंकि उनके माँ-बापों की हत्या कर दी गई या उन्हें बंदी बना कर दूर ले जाया गया है।''


(४) ''अनेकों ने विष खाकर अपना जीवन समाप्त कर लिया। अनेकों ने पानी में डूबकर जान दे दी तथा अनेक जला दिए गए या जिन्दा गाढ़दिए गए।''


(५) ''लोग गहनतम हताशा में डूबे हुए हैं। सभी लोग दयनीय हो गए हैं। उन्हें किसी भी क्षण शान्ति नहीं है।''


(६) ''लोग गहनतम हताशा में डूबे हुए हैं। सभी लोग दयनीय हो गए हैं। उन्हें किसी भी क्षण शान्ति नहीं है।''


(७) ''जब वे भोजन करने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं, यकायक रोने व चीखने की आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं और इन हमले में किसी की पत्नी की बलात्‌ अपहरण हो जाता है, किसी का सामान छीना, झपटा या लूट लिया जाता है।''


(८) ''आक्रमणकारी मुसलमान पशुवत्‌ निर्दयी होते हैं। वे सर्वत्र बहुतायत में हैं। वे पिछले सैकड़ों वर्षों से अपने घृणित कार्य करते चले आ रहे हैं। इसलिए हे राजन्‌ ! (शिवाजी महाराज) सावधान रहना।''


(डॉ. एस. डी. कुलकर्णी कृत 'एंकाटर विद इस्लाम, पृत्र २६७-२६८ से)


स्वामी विवेकानन्द (९.१.१८६२-४.७.१९०२) जी के विचार मुल्लों की बारे में

(समस्त उद्धरण अंग्रेजी के सम्पूर्ण विवेकानन्द वाडऋमय के हिन्दी अनुवाद से हैं, खंड एवं पृष्ठानुसार)
१. मुहम्मद की शिक्षाओं के कारण लाखों मारे गए-''यदि तुम कुरान को पढ़ो तो तुम्हें वहाँ सबसे आश्चर्यपूर्ण सत्य और अंधविश्वास मिलेजुले मिलेंगे। तुम इनकी व्याखया कैसे करोगे ? निःसन्देह वह पुरुष (पैगम्बर मुहम्मद) अन्तःप्रेरित था। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वह अन्तःप्ररेणा मानों उस पर थोपी गई हो। वह कोई एक प्रशिक्षित योगी नहीं था और वह जो कुछ कर रहा था वह उस सबका कारण भी नहीं जानता था। सोचो उस भलाई को जो मुहम्मद ने विश्व के लिए की और उस महान बुराई को भी सोचो जो कि उसकी हठधर्मिता के कारण की गईंज़रा सोचो कि उसकी शिक्षाओं के कारण लाखों मनुष्यों की सामूहिक हत्यायें हुई, मांओं को अपने बच्चों को मौत के कारण खोना पड़ा, बच्चे अनाथ बनाए गए, अनेक देश सम्पूर्ण नष्ट कर दिए गए, लाखों ही लाखों लोगों की हत्या की गई'' (१ : १८४)


२. मुसलमानों के कर्मकाण्ड-''प्रत्येक मुसलमान जो यह सोचता है कि एक गैर-मुसलमान का प्रत्येक कर्मकाण्ड, प्रत्येक आराध्य स्वरूप, प्रत्येक मूर्ति एवं प्रतयेक धार्मिक अनुष्ठान पापपूर्ण है, मगर वह ऐसा नहीं सोचता जब वह अपने ही धर्मस्थल काबा पर आता हैं इस सन्दर्भ में हर एक धार्मिक मुसलमान को, वह जहाँ कहीं भी उपासना करें उसे यह सोचना आवश्यक है कि वह काबा के सामने खड़ा है (इसीलिए विश्व के सारे मुसलमान मक्का की ओर मुंह करके नमाज पढ़ते हैं, अनु.)। जब वह वहाँ की यात्रा करें तो उसे धर्मस्थल की दीवार में लगे 'संगे-अस्वद (काले पत्थर) को चूमना चाहिए। मुसलमानों का विश्वास है कि वे सभी चुम्बनों के निशान जो कि लाखों-ही-लाखों मुसलमानों ने उस पवित्र पत्थर पर किए वे 'आखिरात' यानी 'न्याय के दिन' पर उस धार्मिक व्यक्ति के कल्याण के लिए उठ खड़े होंगे। इसके अलावा वहाँ एक ज़िमज़िम का कुआं है।मुसलमानों का विश्वास है कि जो कोई थोड़ा भी पानी उस कुएं से निकालेगा उसके सभी पाप क्षमा कर दिए जाएंगे और 'कियामत' के दिन के बाद उसे एक नया शरीर मिलेगा तथा वह सदैव रहेगा।'' (२ : ३९)


३. गैर-मुसलमानों को जान से मारो-''मुहम्मदीय मत यानी इस्लाम अपने अनुयायी मुसलमानों को उन सभी लोगों को जान से मारने की अनुमति देता है जो कि उनके मत के नहीं है यानी गैर-मुसलमान हैं। कुरान में यह साफ लिखा हैं कि 'गैर-मुसलमानों की हत्या करो यदि वे मुसलमान नहीं बन जाते हैं।'' उनको आगे में जला देना और तलवार के घाट उतार देना चाहिए।'' (२ : ३३५)


४. गैर-मुसलमानो की हत्या करना जन्नत जाने का सबसे पक्का तरीका-''कोई आदमी जितना अधिक स्वार्थी होता है वह उतना ही अधिक अनैतिक होता हैं इसी प्रकार जो जाति केवल अपने ही स्वार्थ में लिप्त रहती है, वह सारे विश्व में सबसे अधिक निर्दयी और सबसे अधिक अत्याचारी पाई गई है। ऐसा कोई रिलीजन नहीं हुआ है जो इस उपरोक्त द्वेषवाद से अधिक चिपका हुआ हो जितना कि अरेबिया के पैगम्बर (मुहम्मद) द्वारा स्थापित रिलीजन 'इस्लाम' और अन्य कोई रिलीजन ऐसा नहीं हुआ है जिसने इतना खून बहाया ो औरजो अन्य लोगों के प्रति इतना अत्याचारी रहा हो। कुरान में एक उपदेश है जो कि मनुष्य इन शिक्षओं को नहीं मानता है, उसे मार देना चाहिएं उसे मारना एक दयालुता हैं इस्लाम में स्वर्ग (जन्नत), जहाँ कि अत्यन्त सुन्दर 'हूरें' और अन्य सभी प्रकार के इन्द्रिय सुखों एवं आमोद-प्रमोद के साधन हैं, को पाने का सबसे पक्का तरीका गैर-मुसलमानों को मार देने के द्वारा है। ज़रा इस रक्तपात के बारे में सोचो जो कि इस प्रकार के विश्वासों के परिणामस्वरूप हुए हैं।''
(१८ नवम्बर १८९६ को लंदन में दिए गए भाषण से; २ः३५२-५३)


५. एक हाथ में कुरान दूसरे में तलवार-''जरा उन छोटे-छोटे सम्प्रदायों के बारे में सोचो जो पिछले कुछ सैकड़ों वर्षों में चलायमान मानव मस्तिष्क से उपजे हैं और वे ईश्वर के समीप अगणित सत्यों के ज्ञान का हेकड़बाजी से दावा करते हैं। इस मिथ्याभिमान पर जरा ध्यान दीजिए। इससे यदि कुछ सिद्ध होता है तो यही कि ये लोग कितने अहंकारी हैं। और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ऐसे दावे हमेशा झूठे साबित हुए हैं और ईश्वर की कृपा से ऐसे दावों का सदैव असत्य होना निश्चित है। इस विषय (इस्लाम) में मुसलमान सबसे अलग थे। उन्होंने आगे बढ़नेका प्रत्येक कदम तलवार की धार से आगे बढ़ाया यानी कि एक हाथ में कुरान और दूसरे में तलवार, ''कुरान स्वीकार करो या मौत' इसके अलावा अन्य कोई विकलप नहीं है।'' तुम इतिहास से जानते हो कि इससे उनकी कितनी आश्चर्यजनक सफलता रही। छः सौ वर्षों तक उन्हें कोई नहीं रोक सका और इसके बाद एक समय ऐसा आया कि जब उन्हें चिल्ला कर कहना पड़ा कि रुको। अन्य रिलीजनों के साथ भी ऐसा ही होगा, यदि वे ऐसे ही तरीके अपनाएंगे
(२८ जनवरी १९००, में पाडसेना कैलीफोर्निया में दिए गए भाषण से, '१ : ६९-७०)


६. सार्वभौमिक भाईचारा केवल मुसलमानों के लिए-''मुसलमान विश्व व्यापी भाईचारे की बात करते हैं परन्तु वास्तव में इसका मतलब क्या है ? आखिर जो कि मुसलमान नहीं है वह इस सार्वभौमिक भाईचारे में सम्मिलित क्यों नहीं किया जाएगा उसके तो गले काटे जाने की सम्भावना अधिक है।'' (२ : ३८०)


७. मुसलमान मूर्त्तियों की जगह कब्रों को पूजते हैं-''मुसलमान प्रायः मूर्तियों की जगह अपने पीरों और शहीदों की कब्रों का उपयोग करते हैं (यानी पूजते हैं)।'' (३ : ६१)


८. बालक रूप में ईश्वर-''मुसलमानों द्वारा ईश्वर को एक बच्चे के रूप में होने के विचार कोस्वीकार करना असम्भव है। वे इसे मानने से एक भयसहित संकोच करेंगे। लेकिन ईसाई और हिन्दू इसे आसानी से अनुभव कर सकते हैं। क्योंकि उनके मत में बाल स्वरूप ज़ीज़स और बालरूप गोपाल श्री कृष्ण की अवधारण है।'' (३ : ९६)


९. किसी मुस्लिम देश में मंदिर बनाना वर्जित-''ऐसा भारत में ही है कि यहाँ भारतीय (हिन्दू) मुसलमानों और ईसाईयों के लिए पूजा स्थल (मस्जिद, गिरजाघर) बनवाते हैं, अन्यत्र कहीं नहं। अगर आप अन्य देशों में जाओ और मुसलमानों या अन्य मतों के लोगों से कहो कि उन्हें अपने लिए मंदिर बनाने दो तो देखो वे तुम्हारी किस प्रकार मदद करते हैं, अनुमति देने की जगह वे तुम्हें और तुम्हारे मंदिर को ही तोड़ डालने की कोशिश करेंगे, यदि वे ऐसा कर सके।'' ( ३ : ११४)


१०. भारत में रहने वाले भी हिन्दू-''इसलिए यह शब्द (हिन्दू) न केवल वास्तविक हिन्दुओं बल्कि मुसलमानों, ईसाईयों, जैनियों और अन्य लोगों के लिए भी है, जो कि भारत में रहते हैं।'' (३ : ११८)


११. सैकड़ों वर्षों तक 'अल्लाह-हो-अकबर' गूंजता रहा-''बर्बर विदेशी आक्रान्ताओं की एक लहर के बाद दूसरी लहर इस हमारे पवित्र देश पर टकराती रही। वर्षों तक आकश'अल्लाह-हो-अकबर' के नारों से गुंजायमान होता रहा और कोई हिन्दू नहीं जानता था इसका अन्तिम क्षण कौन-सा होगा। विश्वभर के ऐतिहासिक देशों में से भारत ने ही सबसे अधिक यातनाएँ और अपमान सहें हैं फिर भी हम लगभग उसी एक राष्ट्र के रूप में विद्यमान हैं और यदि आवश्यक हुआ तो सभी प्रकार की आपदाओं को बार-बार सामना करने के लिए तैयार हैं। इतना ही नहीं, अभी हाल में ऐसे भी संकेत हैं कि हम न केवल बलवान ही हैं बल्कि बाहर निकलने को तैयार हैं क्योंकि जीवन का अर्थ प्रसार है।'' ( ३ : ३६९ - ७०)


१२. मुसलमानों की तरह न मानने पर हत्या-''अज्ञानी लोग.... अन्य किसी दूसरे मनुष्य को विश्व की समस्याओं का अपने स्वतंत्र चिन्तन के अनुसार व्याखया न करने देने को न केवल मना करते हैं, बल्कि यहाँ तक कहने का साहस करते हैं कि अन्य सभी बिल्कुल गलत हैं और केवल वे ही सही हैं। यदि ऐसे लोगों का विरोध किया जाता है तो वे लड़ने लगते हैं और यहाँ तक कहते हैं कि वे उस आदमी को मार देंगे यदि वह वैसा विश्वास नहीं करता है जैसा कि वे स्वयं करते हैं और अन्य मुसलमान भी करते हैं।'' (४ : ५२)


१३. पैगम्बर व फरिश्तों को पूजने में आपत्तिनहीं-''मुसलमान प्रारम्भ से ही मूर्ति पूजा के विरोधी रहे हैं लेकिन उन्हें पैगम्बरों या उनके संदेशवाहकों को पूजने या उनके प्रति आदर प्रगट करने में कोई आपत्ति नहीं होती हैं, बल्कि वास्तविक व्यवहार में एक पैगम्बर की जगह हज़ारों ही हज़ार पीरों की पूजा की जा रही हे।'' (४ : १२१)


१४. मुसलमान सर्वाधिक सम्प्रदायवादी-''इस (इस्लाम) के विषय में आज मुसलमान सबसे अधिक निर्दयी और सम्प्रदायवादी हैं उनका मुखय सिद्धान्त वाकय है ''ईश्वर (अल्लाह) एक है औ मुहम्मद उसका पैगम्बर है।'' इसके अलावा सभी बातें न केवल बुरी हैं, बल्कि उन्हें फौरन नष्ट कर देना चाहिए। प्रत्येक स्त्री औरपुरुष, जो इस सिद्धान्त को पूरी तरह नहीं मानता है, उसे क्षणभर की चेतावनी के बाद मार देना चाहिए, प्रत्येक वस्तु जो इस प्रकार की पूजाविधि के अनुकूल नहीं है, उसे फौरन नष्ट कर देना चाहिए और प्रत्येक पुस्तक जो इसके अलावा कुछ और बातों की शिक्षा देती है, उसे जला देना चाहिए। पछिले पांच सौ वर्षों में प्रशान्त महासागर से लेकर अंध महासागर तक सारे विश्व में लगातार रतपात होता रहा। यह है मुहम्मदवाद ! फिर भी इन मुसलमानों में से ही, जहाँ कहीं कोई दार्शनिक व्यक्ति हुआ, उसनेनिश्चय ही इन अत्याचारों की निंदा की है।'' (३ फरवरी १९००, कोपासाडेना में रिए गए भाषण से, ४ : १२६)


१५. अल्लाह के लिए लड़ो-''भारत में विदेशी आक्रान्ताओं की, सैकड़ों वर्षों तक लगातार, एक के बाद एक लहर आती रही और भारत को तोड़ती और नष्ट-भ्रष्ट करती रही। यहाँ तलवारें चमकीं और 'अल्लाह के लिए लड़ो और जीतो' के नारों से भारत का आकाश गूंजता रहा। लेकिन ये बाढ़ें भारत के आदर्शों को बिना परिवर्तित किए, स्वतः ही धीरे-धीरे समाप्त होती गई।'' (४ : १५९)


१६. मूर्ति पूजक हिन्दू घृणास्पद-''मुसलमानों के लिए यहूदी और ईसाई अत्यन्त घृणा के पात्र नहीं है। उनकी नज़रों में वे कम-से-कम ईमान के आदमी तो हैं। लेकिन ऐसा हिन्दू के साथ नहीं है। उनके अनुसार हिन्दू मूर्तिपूजक है व घृणास्पद 'काफ़िर' है। इसलिए वह इस जीवन में नृशंस हत्या के योग्य हैं और मरने के बाद उसके लिए शाश्वत नकर तैयार है। मुसलमान सुलतानों ने काफिरों के आध्यात्मिक गुरुओ व पुजारियों के साथ यदि कोई सबसे अधिक ृपा की तो यह कि उन्हें किसी प्रकार अन्तिम सांस लेने तक चुपचाप जी लेने की अनुमति दे दी। यह भी कभी-कभी बड़ी दयालुता मानी गईं यदिकिसी मुस्लिम सुलतान का धार्मिक जोश असामान्य या कुछ अधिक होता तो 'काफिरों' के कत्लेआम रूपी बड़े यज्ञ का फौन ही प्रबन्ध किया जात।'' (४ : ४४६)


१७. यहाँ कत्ले आम मुसलमान लाए-''तुम जानते हो कि हिन्दू धर्म किसी को यातना नहीं देता। यह एक ऐसा देश है जहाँ कि सभी प्रकार के सम्प्रदाय शान्ति और सौहार्द के साथ रह सकते हैं। मुसलमान अपने साथ अत्याचार और कत्ले आम लाए, लेकिन उनके आने से पहले तक यहाँ शान्ति बनी रही थी।'' (५ : १९०)


१८. मुसलमानों ने तलवार का सहारा लिया-''भारत में मुसलमान ही पहले ऐसे लोग थे, जिन्होंने तलवार का सहारा लिया।'' (५ : १९७)


१९. एक हिन्दू कम होने का मतलब एक शत्रु का बढ़ना-''सबसे पुराने इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हमें बताया गया है कि जब सबसे पहले मुसलमान भारत में आये तो यहाँ साठ करोड़ हिन्दू थे और अब केवल बीस करोड़ हैं (यानी चालीस करोड़ हिन्दू मारे और धर्मान्तरित किए गए-अनु.)। और हिन्दू धर्म से एक भी हिन्दू का बाहर जाने का मतलब है एक हिन्दू का कम होना ही नहीं है बल्कि एक दुश्मन का बढ़ जाना है। इसके अलावा इस्लाम और ईसाइयत में धर्मान्तरित अधिकांश हिन्दू तो तलवार के बल पर धर्मान्तरित हुए हैं या उनकी सन्तानें हैं।'' (५ : २३३)


२०. मुहम्मददीय विजय को भारत में पीछे हटना पड़ा-''मुसलमानों के विजय की लहर जिसने सारी पृथ्वी को निगल लिया था, उसे भारत के सामने पीछे हटना पड़ा।'' (५ : ५२८)


२१. हशासिन शब्द 'असेसिन' बन गया-''मुसलमानों का 'हशासिन' शब्द 'असेसिन' बन गया क्योंकि मुहम्मदीय मत का एक पुराना सम्प्रदाय गैर-मुसलमानों को मारने को अपने धर्म का एक अंग मानता था।'' (५ : ४०)


२२. इस्लाम में हिंसा का प्रयोग-''मुसलमानों ने हिंसा का सबसे अधिक प्रयोग किया।'' (७ : २१७)


२३. गैर-मुसलमानों को मार दो-''एक ऐसा रिलीजन भी हो सकता है जो अत्यन्त भयंकर शिक्षाएं देता हो। उदाहरण के लिए मुहम्मदीय मत (इस्लाम) मुसलमानों को उन सबकी हत्या करने की अनुमति देता है जो कि उसके मतानुयायी नहीं हैं। ऐसा कुरान में स्पष्ट लिखा है कि ''अविश्वासियों (गैर-मुसलमानों) को मार दें। यदि वेआ मुहम्मदीय यानी मुसलमान नहीं हो जाते हैं।'' उन्हें अग्नि में झोंक देना और तलवार से काट देना चाहिए। अब यदि हम किसी मुसलमान से कहें कि ऐसा गलत है तो
वह स्वाभाविक तौर पर फौरन पूछेगा कि ''तुम ऐसा कैसे जानते हो ? तुम कैसेजानते हो कि ऐसा ठीक नहीं है ? मेरी धर्म पुस्तक (कुरान) कहती है कि ऐसा ठीक है।''
(१७ नवम्बर १८९९ को लंदन में दिए भाषण में, प्रेक्टीकल वेदान्त, भाग ३ से)


आखिर क्यूं है ब्रह्मा का सिर्फ 'एक मंदिर', यहां छुपा है 'रहस्य'|

राजस्थान के पुष्कर जिले में बना भगवान ब्रह्मा का मंदिर अपनी एक अनोखी विशेषता की वजह से न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र है. यह ब्रह्मा जी एकमात्र मंदिर है. भगवान ब्रह्मा को हिन्दू धर्म में संसार का रचनाकार माना जाता है.

क्या है इतिहास इस मंदिर का

ऐतिहासिक तौर पर यह माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में हुआ था. लेकिन पौराणिक मान्यता के अनुसार यह मंदिर लगभग 2000 वर्ष प्राचीन है.संगमरमर और पत्थर से बना यह मंदिर पुष्कर झील के पास स्थित है जिसका शिखर लाल रंग से रंग हुआ है. इस मंदिर के केंद्र में भगवान ब्रह्मा के साथ उनकी दूसरी पत्नी गायत्री कि प्रतिमा भी स्थापित है. इस मंदिर का यहाँ की स्थानीय गुर्जर समुदाय से विशेष लगाव है. मंदिर की देख-रेख में लगे पुरोहित वर्ग भी इसी समुदाय के लोग हैं. ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी गायत्री भीगुर्जर समुदाय से थीं|

कैसे नाम पड़ा 'पुष्कर'

हिन्दू धर्मग्रन्थ पद्म पुराण के मुताबिक धरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था. ब्रह्मा जी ने जब उसका वध किया तो उनके हाथों से तीन जगहों पर पुष्प गिरा. इन तीनों जगहों पर तीन झीलें बनी. इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा. इस घटना के बाद ब्रह्मा ने यज्ञ करने का फैसला किया|

पूर्णाहुति के लिए उनके साथ उनकी पत्नी सरस्वती का साथ होना जरुरी था लेकिन उनके न मिलने की वजह से उन्होंने गुर्जर समुदाय की एक कन्या 'गायत्री' से विवाह कर इस यज्ञ को पूर्ण किया. लेकिन उसी दौरान देवी सरस्वती वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गईं. उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद कभी भी उनकी पूजा नहीं होगी. हालाँकि बाद में इस श्राप के असर को कम करने के लिए उन्होंने यह वरदान दिया कि एक मात्र पुष्कर में उनकी उपासना संभव होगी.
चूंकि विष्णु ने भी इस काम में ब्रह्मा जी की मदद की थी इसलिए  देवी सरस्वती ने उन्हें यह श्राप दिया कि उन्हें अपनी पत्नी से विरह का कष्ट सहन करना पड़ेगा. इसी कारण उन्हें मानवरूप में राम का जन्म लेना पड़ा और 14 साल के वनबास के दौरान  उन्हें पत्नी से अलग रहना पड़ा था|

सनातन धर्म का रक्षक महान सम्राट पुष्यमित्र शुंग!

मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पोत्र महान अशोक (?) ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक अगर राजपाठ छोड़कर बौद्ध भिक्षु बनकर धर्म प्रचार में लगता तब वह वास्तव में महान होता । परन्तु अशोक ने एक बौध सम्राट के रूप में लग भाग २० वर्ष तक शासन किया। अहिंसा का पथ अपनाते हुए उसने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया। अत्यधिक अहिंसा के प्रसार से भारत की वीर भूमि बौद्ध भिक्षुओ व बौद्ध मठों का गढ़ बन गई थी। उससे भी आगे जब मोर्य वंश का नौवा अन्तिम सम्राट व्रहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा ,तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, पंजाब व लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था । जब सिकंदर व सैल्युकस जैसे वीर भारत के वीरों से अपना मान मर्दन करा चुके थे, तब उसके लगभग ९० वर्ष पश्चात् जब भारत से बौद्ध धर्म की अहिंसात्मक निति के कारण वीर वृत्ति का लगभग ह्रास हो चुका था, ग्रीकों ने सिन्धु नदी को पार करने का साहस दिखा दिया।
सम्राट व्रहद्रथ के शासनकाल में ग्रीक शासक मिनिंदर जिसको बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है ,ने भारत वर्ष पर आक्रमण की योजना बनाई। मिनिंदर ने सबसे पहले बौद्ध धर्म के धर्म गुरुओं से संपर्क साधा,और उनसे कहा कि अगर आप भारत विजय में मेरा साथ दें तो में भारत विजय के पश्चात् में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लूँगा। बौद्ध गुरुओं ने राष्ट्र द्रोह किया तथा भारत पर आक्रमण के लिए एक विदेशी शासक का साथ दिया।
सीमा पर स्थित बौद्ध मठ राष्ट्रद्रोह के अड्डे बन गए। बोद्ध भिक्षुओ का वेश धरकर मिनिंदर के सैनिक मठों में आकर रहने लगे। हजारों मठों में सैनिकों के साथ साथ हथियार भी छुपा दिए गए।
दूसरी तरफ़ सम्राट व्रहद्रथ की सेना का एक वीर सैनिक पुष्यमित्र शुंग अपनी वीरता व साहस के कारण मगध कि सेना का सेनापति बन चुका था । बौद्ध मठों में विदेशी सैनिको का आगमन उसकी नजरों से नही छुपा । पुष्यमित्र ने सम्राट से मठों कि तलाशी की आज्ञा मांगी। परंतु बौद्ध सम्राट वृहद्रथ ने मना कर दिया।किंतु राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत प्रोत शुंग , सम्राट की आज्ञा का उल्लंघन करके बौद्ध मठों की तलाशी लेने पहुँच गया। मठों में स्थित सभी विदेशी सैनिको को पकड़ लिया गया,तथा उनको यमलोक पहुँचा दिया गया,और उनके हथियार कब्जे में कर लिए गए। राष्ट्रद्रोही बौद्धों को भी ग्रिफ्तार कर लिया गया। परन्तु वृहद्रथ को यह बात अच्छी नही लगी।
पुष्यमित्र जब मगध वापस आया तब उस समय सम्राट सैनिक परेड की जाँच कर रहा था। सैनिक परेड के स्थान पर hi सम्राट व पुष्यमित्र शुंग के बीच बौद्ध मठों को लेकर कहासुनी हो गई।सम्राट वृहद्रथ ने पुष्यमित्र पर हमला करना चाहा परंतु पुष्यमित्र ने पलटवार करते हुए सम्राट का वद्ध कर दिया। वैदिक सैनिको ने पुष्यमित्र का साथ दिया तथा पुष्यमित्र को मगध का सम्राट घोषित कर दिया।
सबसे पहले मगध के नए सम्राट पुष्यमित्र ने राज्य प्रबंध को प्रभावी बनाया, तथा एक सुगठित सेना का संगठन किया। पुष्यमित्र ने अपनी सेना के साथ भारत के मध्य तक चढ़ आए मिनिंदर पर आक्रमण कर दिया। भारतीय वीर सेना के सामने ग्रीक सैनिको की एक न चली। मिनिंदर की सेना पीछे हटती चली गई । पुष्यमित्र शुंग ने पिछले सम्राटों की तरह कोई गलती नही की तथा ग्रीक सेना का पीछा करते हुए उसे सिन्धु पार धकेल दिया। इसके पश्चात् ग्रीक कभी भी भारत पर आक्रमण नही कर पाये। सम्राट पुष्य मित्र ने सिकंदर के समय से ही भारत वर्ष को परेशानी में डालने वाले ग्रीको का समूल नाश ही कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वैदिक सभ्यता का जो ह्रास हुआ,पुन:ऋषिओं के आशीर्वाद से जाग्रत हुआ। डर से बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले पुन: वैदिक धर्म में लौट आए। कुछ बौद्ध ग्रंथों में लिखा है की पुष्यमित्र ने बौद्दों को सताया .किंतु यह पूरा सत्य नही है। सम्राट ने उन राष्ट्रद्रोही बौद्धों को सजा दी ,जो उस समय ग्रीक शासकों का साथ दे रहे थे।
पुष्यमित्र ने जो वैदिक धर्म की पताका फहराई उसी के आधार को सम्राट विक्र्मद्वित्य व आगे चलकर गुप्त साम्रराज्य ने इस धर्म के ज्ञान को पूरे विश्व में फैलाया।

Saturday, 20 April 2013

युग-काल का विधान.



हमारे पूर्वजों ने केवल पृथ्वी की समय गणना का विधान ही नहीं बनाया था, बल्कि उन्हों ने सृष्टि की युग गणना का विधान भी बनाया था जिस के आँकडों को आज विज्ञान भी स्वीकारनें पर मजबूर हो रहा है।

भारतीय गणना के अनुसार चार युगों का ऐक चतुर्युग होता है। यह वह समय है जो ‘हमारा सूर्यमण्डल’ अपने से बडे महासूर्य मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। यह गणना मन-घडन्त नहीं अपितु ऋगवेद के 10800 पद्धो तथा 432000 स्वरों में दी गयी है।

सतयुग, त्रेता, दूापर, और कलियुग चार युग माने जाते हैं। चार युगों से ऐक चतुर्युग बनता है। चतुर्युग के अन्दर युगों के अर्न्तकाल का अनुपात 4:3:2:1 होता है। अतः प्रत्येक युग की अवधि इस प्रकार हैः-

सतयुग – 17 लाख 28 हज़ार वर्ष
त्रेता युग – 12 लाख 96 हज़ार वर्ष
दूापर युग – 8 लाख 64 हज़ार वर्ष
कलियुग – 4 लाख 32 हज़ार वर्ष (कुल जोड – 432000 वर्ष)
71 चतुर्युगों से ऐक मनवन्तर बनता है (30 करोड 67 लाख 20 हज़ार वर्ष) यह वह समय है जो महासूर्य मण्डल अपने से भी अधिक विस्तरित सौर मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। इस से आगे भी बडे सूर्य मण्डल हैं जिन की परिकर्मा हो रही है तथा वह अनगिनित हैं।

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन का चक्र निरन्तर निर्विघ्न चलता रहता है। सर्जन 4.32 करोड वर्ष (ऐक चतुर्युग) तक चलता है जिस के पश्चात उतने ही वर्ष विसर्जन होता है। सृष्टि-कल्प वह समय है जब ब्रह्मा सृष्ठि की रचना करते हैं । इसी के बराबर समय का प्रलय-कल्प भी होता है। प्रलय-कल्प में सृष्ठि का विसर्जन होता है । सृष्ठि और प्रलय ऐक दूसरे के पीछे चक्र की तरह चलते रहते हैं जैसे हमारे दिनों के पीछे रातें आती है। सर्जन-विसर्जन के समय का जोड 8.64 करोड वर्ष होता है जिसे ब्रह्मा का ऐक दिवस (अहरोत्रा) माना गया है। ऐसे 360 अहरोत्रों से ब्रह्मा का ऐक वर्ष बनता है जो हमारे 3110.4 केटि वर्षों के बराबर है।

हिन्दू शास्त्रों ने ऐक कल्प को 14 मनुवन्तरों में विभाजित किया है। प्रत्येक मनुवन्तर में 30844800 वर्ष होते हैं अथवा 308.448 लाख वर्ष होते हैं।

हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार वर्तमान सृष्टि की रचना श्वेतावराह कल्प में 1.972 करोड वर्ष पूर्व हुई थी। उस के पश्चात छः मनुवन्तर बीत चुके हैं और सातवाँ वैभास्वत मनुवन्तर अभी चल रहा है। पिछले मनुवन्तर जो बीत चुके हैं उन के नाम स्वयंभर, स्वारोचिश, ओत्तमी, तमस, रविवत तथा चक्षाक्ष थे।

सातवें मनुवन्तर के 28 चतुर्युग भी बीत चुके हैं और हम 29वें चतुर्युग के कलियुग में इस समय (2012 ईसवी) जी रहे हैं । वर्तमान कलियुग के भी 5004 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं

भागवत पुराण के अनुसार भक्त ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद स्वयंभर मनु के युग में हुये थे जो आज (2012 ईसवी) से 1.99 करोड वर्ष पूर्व है। पाश्चात्य वैज्ञानिक इन गणाओं की अनदेखी करते रहे लेकिन जब अमेरिकन शोधकर्ता माईकल ए क्रामो ने कहा कि मानव आज से 2 करोड वर्ष पूर्व धरती पर आये तो भागवत पूराण के कथन की पुष्टि हो गयी।

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि यह काल गणना खगौलिक है। इस गणना के अनुसार आज की मानवी घटनाओं को जोडना उचित नहीं होगा। जैसे हाथी तोलने वाले माप दण्डों से स्वर्ण को नहीं तोला जाता उसी प्रकार किसी व्यक्ति की आयु का आंकलन ‘लाईट-यीर्स’ या ‘नैनो-सैकिण्डस ’ में नहीं किया जाता।

भारतीय कैलैण्डर की उपेक्षा

अंग्रेज़ी पद्धति अनुसार प्रशिक्षित भारतीय युवा अपने गौरवशाली पूर्वजों की उपलब्धियों को भूल कर अपने आप में ही गर्वित रहते हैं। जो कुछ अंग्रेज़ थूकते रहै मैकाले प्रशिक्षित भारतीय उसे खुशी से चाटते रहै हैं। आज से केवल पचास वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज घटनाओं को भारत के देसी महीनों के माध्यम से याद रखते थे किन्तु वह प्रथा अब लुप्त होती जा रही है। भारत के अंगेजी प्रशक्षित आधुनिक युवा देसी महीनों के नाम भी क्रमवार नहीं बता सकते। कदाचित वह समझते हैं कि भारत का अपना कोई कैलेण्डर ही नहीं था और रोमन कैलेण्डर के बिना हम प्रगति ही नहीं कर सकते। अपनी मनोविकृति के कारण हम आदि हो चुके हैं कि सत्य वही होता है जिसे पाश्चात्य वैज्ञानिक माने। अभी कुछ ही वर्ष पूर्व पश्चिम के वैज्ञानिक ऐक स्वर में बोल रहे थे कि चन्द्रमां पर जल नहीं है। परन्तु जब भारत के चन्द्रयान ने चाँद की धरती पर जल के प्रमाण दिये तो अमेरिकी नासा ने भी पुनः खोज कर के भारत के कथन की पुष्टि कर दी।

अंतरीक्ष की भारतीय समय सारणी को भी आज के विज्ञान के माध्यम से परखा जा सकता है। यदि यह काम विदेशी ना करें तो भारत के वैज्ञानिकों को स्वयं करना चाहिये। हमारी उपलब्धियों को स्वीकृति ना देना पाश्चात्य देशों के स्वार्थ हित में है क्यों कि उन्हों ने भारत की उपलब्धियों को हडप कर अपना बनाया हुआ है। लेकिन हम किस कारण अपने पूर्वजों की धरोहर उन्हें हथियाने दें ? हम अपनी उपलब्दधियों की प्रमाणिक्ता पाने के लिये पाश्चात्य देशों के आगे हाथ क्यों फैलाते रहते हैं ?

वर्णव्यवस्था विषय


चार वर्णों के गुण-कर्म
सब मनुष्यों की एक जाति है, अर्थात मनुष्य - जाति l
मनुष्य-जाति चार-वर्णों में विभक्त होती है - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र l
इनका नाम 'वर्ण' इसलिए है कि जैसे जिसके गुण-कर्म हों वैसा ही उसको अधिकार देना चाहिए l

गुण-कर्मों के अनुसार ही वर्ण 'वरा' जाता है, वेदाध्ययन और परमेश्वर की उपासना के साथ वर्तमान तथा विद्या आदि उत्तम गुणों से युक्त पुरुष को ब्राह्मण कहते हैं l
एश्वर्य, बल, वीर्य, शौर्य आदि गुणों से सम्पन्न पुरुष को क्षत्रिय कहते हैं l
लेन -देन, व्यापार, पशु-पालन तथा कृषि आदि के कर्मों में सकुशल मनुष्य को वैश्य तथा शिल्पविद्या के जानने वाले तथा सेवा क्षेत्रों में कुशल अज्ञानी मनुष्य को शुद्र कहते हैं l

*मनुष्य जाती के दो भेद *
मनुष्य जाति के दो भेद अन्य प्रकार से भी किये हैं - आर्य और दस्यु l
श्रेष्ठ मनुष्यों को आर्य कहते हैं और दुष्ट स्वभाव से डाकू आदि को दस्यु कहते हैं l
इन्हें ही देव और असुर भी कहते हैं अर्थात आर्यों को देव तथा दस्युओं को असुर कहते हैं l

*वर्ण-परिवर्तन *
*शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम l
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विध्याद्वैश्यात्त्थैव च ll
*मनु-स्मृति (अध्याय 10, श्लोक 65)
अर्थात शूद्र ब्राह्मण हो जाता है, और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है अर्थात गुण-कर्मों के अनुसार ब्राह्मण हो तो वह ब्राह्मण रहता है और ब्राह्मण यदि क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के गुनोंवाला हो तो वह क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र हो जाता है l वैसे शूद्र भी मुर्ख हो तो वह शूद्र रहता है और जो उत्तम गुणों से युक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है l
इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य के विषय में भी जान लेना चाहिए l

जो शूद्र को वेदादि पढने का अधिकार न होता तो वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के अधिकार को कैसे प्राप्त हो सकता था ?
महर्षि विश्वामित्र और महर्षि वाल्मीकि जैसे अनेकों उदाहरण हैं शास्त्रों का अध्ययन करें तो l
वेदादि शास्त्रों के पढने-पढ़ाने, सुनने-सुनाने में सब मनुष्यों का अधिकार है,जो-जो पदार्थ ईश्वर ने रचे हैं वे सबके उपकारार्थ हैं l
मुर्ख का नाम शूद्र और अतिमूर्ख का नाम अतिशूद्र है, इनमे विध्याग्रहण की बुद्धि ही नही होती l
स्त्रियों को भी वेदादि शास्त्रों को पढने-सुनने का समान अधिकार है l
यजुर्वेद 26/2 में लिखा है :
यथेमा वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य: l
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च ll

अर्थात वेदों को पढने का अधिकार सब मनुष्यों को है, और विद्वानों को पढ़ाने का भी अधिकार है l
ईश्वर आज्ञा देते हैं कि हे मनुष्य लोगों! जिस प्रकार मैं (परमेश्वर) तुमको चारों वेदों का उपदेश देता हूँ उसी प्रकार तुम भी उनको पढ़कर सब मनुष्यों को पढ़ाया और सुनाया करो, क्योंकि वह वेदरूपी वाणी सबका कल्याण करनेवाली है l
वेदाधिकार जैसा ब्राह्मण के लिए है वैसा ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, पुत्र, भृत्य और अतिशूद्र के लिए भी बराबर है l
वर्णपरिवर्तन के सम्बन्ध में यह निश्चितरूप से जान लेना चाहिए कि 25वें वर्ष में वर्णों का अधिकार ठीक-ठाक होता है, क्योंकि 25 वर्षों तक बुद्धि बढती है, इसलिए उसी समय गुण-कर्मों कि ठीक-ठाक परीक्षा करके वर्णाधिकार होना उचित है l

ब्राह्मण :- ब्राह्मण को बुद्धिजीवी माना जाता है, जो अपनी विद्या, ज्ञान और विचार शक्ति द्वारा जनता एवं समाज का नेतृत्व कर उन्हें सन्मार्ग पर चलने का आदेश देता है, ये बुद्धि से ही समाज पर आधिपत्य जमाते हैं। ये बुद्धिर्यस्य बलं तस्य में विश्वास रखते हैं। ऐसे व्यक्तियों के मन की तरंगों का रंग श्वेत
होता है। इन्हें ब्राह्मण अथवा विप्र वर्ण का माना जाता है।

क्षत्रिय :- क्षत्रिय वह है जो बाहुबल द्वारा समाज में व्यवस्था रखकर उन्हें उच्छृंखल होने से रोकता है, जो नाश से रक्षा करे वह क्षत्रिय है। राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना है। वे साहसी और पराक्रमी होते हैं। ये शारीरिक शक्ति से समाज पर आधिपत्य जमाते हैं। ये पारिवारिक परंपराओं के प्रति सजग होते हैं। ऐसे व्यक्तियों की मानसिक तरंगों का रंग लाल होता है। इन्हें क्षत्रिय वर्ण की संज्ञा दी गई है।

वैश्य :- खेती, गौ पालन और व्यापार के द्वारा जो समाज को सुखी और देश को समृद्ध बनाता है, अर्थ व्यवस्था में दक्ष होता है। धन संग्रह तथा दान आदि ही इनका ध्येय होता है। ये अर्थ द्वारा ही समाज पर नियंत्रण करते हैं। इनका जीवन मूल्य अर्थ प्रधान होता है। ऐसी मनोवृत्ति के लोगों के मन की तरंगों का रंग पीला होता है। इन्हें वैश्य वर्ण का माना जाता है।

शूद्र :- उपरोक्त तीनों वर्णों की सेवा करना शूद्र का कार्य था, इस वर्ण में व्यक्ति केवल शारीरिक श्रम करने की ही योग्यता रखता है, शारीरिक श्रम ही जिसके जीवन का आधार होता है। शारीरिक श्रम, स्वामी-भक्ति इमानदारी, कर्तव्यनिष्ठ, सहनशीलता आदि इनके गुण होते हैं l भोजन प्राप्ति ही जिसके जीवन की ध्येय होता है तथा जिसमें प्रशासनिक योग्यता नहीं होती। ऐसे व्यक्ति की मानसिक तरंगों का रंग काला होता है। वर्ण व्यवस्था के आधार पर ऐसे ही व्यक्ति को शुद्र की संज्ञा दी गई है। इस वर्ण का भी उतना ही महत्त्व था जितना अन्य तीनों वर्णों
का था। यह वर्ण ना हो तो शेष तीनों वर्णों की जीवन व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाए।

आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः । (वशिष्ठ स्मृति)
आचरण हीन को वेद भी पवित्र नहीं करते ।

'आपस्तम्बधर्मसूत्र' (प्रश्न 2, पटल 5, खंड 11, सूक्त 10-11) यह श्लोक देखें
धर्मचर्यया जघन्यो वर्ण: पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तो l
अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णों जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तो ll
अर्थात धर्माचरण से नीचे के वर्ण पूर्व-पूर्व वर्ण के अधिकार को प्राप्त होते हैं और अधर्मआचरण करके पूर्व-पूर्व वर्ण नीचे के वर्णों के अधिकारों को प्राप्त होते हैं l

यह व्यवस्था समाज के संतुलन के लिए थी।
समस्त ऋषियों ने भी समाज को चार वर्णों में विभाजित करना अनिवार्य बताया है।
अन्य धर्मों में भी इस प्रकार की वर्ण व्यवस्था की गयी थी।
प्रत्येक व्यवस्था गुणों और कर्मों के आधार पर थी।

जय श्री राम कृष्ण परशुराम ॐ