Saturday, 26 May 2012

हज़रत मोहम्मद के चाचा, उमर बिन-ए-हश्शाम (जिन्हें अबू हाकम अर्थात ज्ञान का पिता के नाम से भी जाना जाता है) एक प्रसिद्ध अरबी कवि थे। इन्होंने भगवान शिव की स्तुती में एक अरबी कविता लिखी है, जिसे सायर-अल-ओकुल में भी शामिल किया गया है। 

इस अरबी कविता को नई दिल्ली के लक्ष्मीनारायण मन्दिर के पीछे स्थित बगीचे में अग्नि मण्डप के एक शिलालेख पर देखा जा सकता है… 

इस अरबी कविता का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है --

1) वह मनुष्य जिसने अपना जीवन काम, क्रोध, पाप और अधर्म में बिताया हो, अपने जीवन को नष्ट किया हो…
2) यदि अन्त में उसे पश्चाताप हो और वह भलाई की ओर लौटना चाहे तो क्या उसका कल्याण हो सकता है?…
3) एक बार भी वह सच्चे हृदय से महादेव की पूजा करे तो धर्म के मार्ग में उच्च स्तर को पा सकता है…
4) हे प्रभु, मेरा समस्त जीवन लेकर मुझे सिर्फ़ एक दिन के लिए भारत में निवास दे दो, क्योंकि उस भूमि पर पहुँचकर व्यक्ति जीवन-मुक्त हो जाता है…
5) भारत की यात्रा से सारे शुभ कर्मों की प्राप्ति होती है और आदर्श गुरुजनों का सत्संग मिलता है… 

 उल्लेखनीय है कि इन अबू हाकम को तत्कालीन मुसलमानों ने हज़रत साहब के विरोध की वजह से "अबू जिहल" करार दिया, यह उमर बिन हश्शाम एक युद्ध में मुसलमानों से लड़ते हुए मारा गया…

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(स्रोत : - प्रसिद्ध अरबी काव्य ग्रन्थ, "साईर-अल-ओकुल", पृष्ठ 235)

वर्ण व्यवस्था के आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा नहीं समझा जाता था



सनातन धर्म में प्राचीन काल से ही वर्ण व्यवस्था रही है ...किन्तु जातिया नहीं थी ..... वर्ण व्यवस्था भी विभिन्न श्रेणी के कार्यो के विभाजन की दृष्टि से लागू थी ... यह व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के सिद्धांत पर आधारित थी .... वर्ण व्यवस्था के आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा नहीं समझा जाता था

 .... जैसे कि वाल्मीकि जी शूद्रकर्म करते थे किन्तु कर्म-परिवर्तन के पश्चात वर्ण व्यवस्था के ही आधार पर वह ब्राह्मणो के समान पूज्यनीय हो महर्षि के पद पर प्रतिष्ठित हुये ... और जब श्री राम सहित चारों भाइयो का विवाह हुआ तब वाल्मीकि जी को भी अन्य ब्राह्मणो के साथ विशेष निमंत्रण दिया गया था और उच्च स्थान पर विराजित किया गया था ।
शास्त्र इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण है परदा-प्रथा, जात-पात, छूया-छूत प्राचीन काल में थी ही नहीं न ही सनातन धर्म में कभी रही है  ....
यह प्रथा आई कहा से इसके कुछ तथ्य प्रस्तुत करते है ... आप स्वयं निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं -

इस्लाम धर्म के स्थापन समय से ही मुसलमानो में परदा प्रथा अपने चरम पर रही है...मुस्लिम महिलाओ सिर्फ घरो में कैद रहा करती थी ... यहा तक कि शौच के लिए भी उन्हे बाहर नहीं जाने दिया जाता था .... वह घर में ही मल-त्याग किया करती थी जिसे कि घर से दूर फेंक कर आने के लिए व्यक्ति विशेष तौर पर तैनात किए गए थे ... अब जाहीर है कि जो व्यक्ति मल-मूत्र के फेकने के लिए ही विशेष तौर पर नियुक्त किए गए थे उनसे घर के अन्य खान-पान संबंधी कार्य नहीं कराये जाते है ... उन्हे नीच तथा अछूत समझा जाता था ।
और प्रखर प्रकाशित सूर्य के समान सत्य यह है कि प्राचीन काल से ही सनातन धर्मी हिन्दू समाज में घर में शौच नहीं किया जाता था तो उसे घर से बाहर फेक कर आने के लिए कोई व्यक्ति तैनात करने का प्रश्न ही नहीं उठता ..
यहा तक कि सनातन धर्मग्रंथ घर तो क्या घर के आस पास भी शौच करने की आज्ञा नहीं देते .... 
पनैऋत्यामिषुविक्षेपमतीत्याभ्यधिकमभुवः I
" यदि खुली जगह मिले तो गाँव से नैऋत्यकोण (दक्षिण और पश्चिम के बीच) की ओर कुछ दूर जाएँ."
दिवा संध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उद्न्मुखः I
कुर्यान्मूत्रपुरीषे तु रात्रौ च दक्षिणामुखः II

अब इतिहास को थोड़ा पहले से देखते हुये आगे बढ़ते है  कि मुस्लिम आक्रांताओ ने किस तरह इन नीचताओ को हिन्दू धर्म में प्रविष्ट किया ...इस्लाम का परिचय भारतवर्ष को युद्धभूमि में ही हुआ था ..अल्लाह के वाशिंदों द्वारा 'दीन' के नाम पर भारतवर्ष पर आक्रमण करके जो भीषण,घोर निंदनीय अत्याचार किए है उनकी गाथा बहुत मार्मिक है ... इनका पहला निशाना क्षत्रिय ही होते थे क्यो कि उस समय के भारतवर्ष में क्षत्रिय अधिक बलशाली,पोरुषवान होते थे तथा वर्ण-व्यवस्था के अनुसार भी किसी आपदा के समय रक्षा करना उनका कर्तव्य होता था .... मुस्लिमो द्वारा सरलहदय हिन्दुओ पर आक्रमण किए गए .....
भारत माता की कुलवधुओ के ,ललनाओ के ,हिन्दुओ की माँ बहनो के बलात्कार किए गए खुली सड़कों पर .... कुछ कन्याओ को उठाकर ले जाते थे ताकि उनके बलात्कार के घिनोने कृत्य को विश्राम न मिल पाये .... खाद्य-पदार्थ की तरह देवियो को मिल-बांटकर भोगा जाता था ...  
हजारों क्षत्राणिय अपने शील सम्मान एवं सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि कुंडो में कूँद पड़ती थी .... हिन्दुओ को इस्लाम अपनाने के लिए घोर ,अमानुषीय यातनाए दी जाती थी .... जो लोग टूट जाते थे वे मुस्लिम बनकर मोहम्म्द की औलादों के सिपाही बन जाते थे .... और सनातन धर्म के शत्रु ....इन आक्रांताओ द्वारा आक्रमण के पश्चात हिन्दुओ के साथ क्या किया जाता था इसे देखिये



 - जो वीर अपनी आन ,मान ,धर्म को न त्यागकर इस्लाम को ठुकरा देते थे ...उन्हे बड़ी ही बेरहमी से मृत्यु दे दी जाती थी वो घृणित अधर्म को स्वीकार न कर मोक्ष के अधिकारी हुये .... दूसरे दोगले हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर इन आक्रमणकारियों के साथ मिल जाते थे और हिन्दू कन्याओ को उठवाने तथा हिन्दुओ को कटवाने में इनका सहयोग करते थे...... और सबसे मार्मिक व्यथा घटित होती थी उन असहाय बेबस लाचार हिन्दू वीरो के आगे जो कि इन मुस्लिम आक्रांताओ द्वारा कैद कर लिए जाते थे ...धर्म परिवर्तन न करने पर अडिग रहने के कारण मुस्लिमो द्वारा उनके समक्ष घृणित प्रस्ताव पेश कर दिया जाता कि उन्हे अपने परिवार सहित केवल मुस्लिमो के मल,विष्ठा आदि उठाने का कार्या ही करना पड़ेगा.... क्यो कि इन लाचार हिन्दू वीरो के ऊपर अपने परिवार की रक्षा का दायित्व भी था ...इसलिए विष का घूट पी इसे अपनी नियति मानते हुये और राम पर भरोसा रखते हुये इनहोने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया ..
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कुछ पीढ़िया गुजरने के पश्चात मुस्लिम दुष्टो की देखादेखी अधिकांशतः मूर्ख हिन्दुओ को भी घर के भीतर शौच करना सुविधाजनक लगने लगा ... जिसके फलस्वरूप वो वीर हिन्दू मुस्लिमो के साथ साथ हिन्दुओ के घरो से भी विष्ठा उठाने लगे .... इस प्रकार समाज की रक्षा करने वाले वीर क्षत्रिय ही मुस्लिम आक्रमणकारियो के घ्राणित दुश्चक्र के फलस्वरूप हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजो के लिए अछूत बन गए ... इसका एक प्रमाण ये भी है कि ....  गोत्र जो आजकल दलित बंधुओ द्वारा प्रयुक्त किए जाते है .... वो प्रारम्भ से ही क्षत्रियो में भी मिलते है जैसे कि चंदेल, चौहान, कटारिया, कश्यप, मालवण, नाहर, कुंगर, धालीवाल, माधवानी, मुदई, भाटी, सिसोदिया, दहिया, चोपड़ा, राठौर, सेंगर, टांक, तोमर और भी बहुत है .... इससे ये सिद्ध हो जाता है कि ये सभी बंधु एक ही वंशावली से जुड़े है ...
ये दलित बंधु वही वीर हिन्दू है जिंहोने धर्म की खातिर ,धर्म रक्षा के लिए पल पल अपमानित होना स्वीकार कर लिया था ... अगर ये भी अन्य दोगले हिन्दुओ की तरह मुस्लिम आक्रांताओ से मिल जाते तो धर्म और हिन्दू समाज की क्या स्थिति होती ? इनका ये त्याग भीष्म,दधीचि आदि से बिलकुल कम नहीं है ....

महर्षि देवल: धर्मान्तरीत हिन्दुओ के पुनरुथ्थान के जनक : -


मुसलमानों का इस्लाम के प्रचार और उनकी पैशाचीक महत्वाकांक्षाओ की पूर्णता हेतु आठवी शताब्दी में मीर कासिम के नेतृत्व में सिंध पर आक्रमण हुआ, जिसमे सिंध के ब्रह्मण वंश के राजा दाहीर के वीरगति के बाद अरबो का सिंध पर शासन प्रस्थापीत हुआ और इसी घटना के साथ सिंध में मुसलमानों द्वारा हिन्दुओ के प्रचंड धर्मांतरण एवं कत्ले -आम की अपेक्षीत शुरुवात हुयी.
लक्षावधि निरपराध ,शस्त्रवीहींन हिन्दू जनता के पाशविक अत्याचारों की शुरुवात हुयी. लाखो हिन्दू स्त्रियों के बलात्कारो से,पुरुषो के शीरच्छेदो से, बुढो और बच्चो के अत्याचारों से सिंध प्रांत में लक्षावधि हिन्दू जनता "दिक्षीत" (धर्मान्तरीत) हुयी.
परन्तु आर्यभूमि ने केवल हाड मांस के पुतलो जन्म नहीं दिया था , उसकी संतानों में मातृभूमि के लिए मरने और मारने वाले 'नर व्याघ्रो' की कोई कमी नहीं थी! कन्नोज में यशोधर्मा और कश्मीर में ललितादित्य मुक्तापीडा के हाथो करारी मात खाने के बाद मीर कासिम को वापस बुलाया गया (खलीफा उम्मीद द्वारा) ,और मुसलमानों का विजयी अभियान सिंध तक सिमट कर समाप्त हुआ. (उसके बाद " Battles of Rajasthan " के युद्धों की श्रुंखला में अरबी आक्रमंकारियो का जिस तरह संहार हुआ ये हर कोई जानता है) उसके बाद मुसलमानों द्वारा स्न्क्रमीत सिंध पर 'मुसलमानों के असली पिताजी श्री बाप्पा रावल ' के बार-बार आक्रमणों में मीर कासिम ने सिंध पर हथियाई हुयी सत्ता मिटटी में मील गयी और सिंध स्वंतंत्र हुआ.
यहातक की जानकारी सर्वश्रुत है ,
राजकीय स्तर पर तो हमने अरबी आक्र्मंकारियो पर सफलता प्राप्त कर ली थी ,पर धार्मिक स्तर पर हम अभी पूर्ण रूप से असफल थे जिसका प्रमुख कारण था - आक्रमणकारी मुसलमानों ने धर्मान्तरीत किये हुए लाखो हिन्दू (नवमुसलमान). ये अभी तक मुसलमान ही थे और चाहकर भी अपने पवित्र हिन्दू धर्म में जा नहीं सकते थे जिसका मुख्य कारण थी हमारे हिन्दू धर्म की तथाकथित "शुद्धिबंदी".

उसी निरर्थक "शुद्धिबंदी ".के आधार पर हिन्दू अपने धर्मान्तरीत भाइयो को वापस अपने धर्म में ले नहीं सकते थे.परिणामस्वरूप एक भीषण संकट का भय सामने आया जो था -हिन्दुओ की संख्या में उठा हुआ प्रचंड घटाव!

इस समस्या के समाधान के लिए कई राजनितिज्ञो ने देवल महर्षि के पास जाने का विचार किया और वे गए .
महर्षि देवल का आश्रम सिन्धु नदी के किनारे था, हिन्दुओ पर आये हुए भीषण संकट से वे चिंतीत थे,उसी क्षण सिंध के प्रमुख राजनीतिग्य वह पहुचे और धर्मान्तरीत हिन्दुओ की समस्या पर समाधान के लिए याचना की.

देवल महर्षि ने गंभीरता से इस समस्या के समाधान के लिए शास्त्रों में खोज आरम्भ की ,और उन्हें मिल गया-एक ऐसा शास्त्र जो किसी भी समय पर किसी भी काल में हमारे कर्मकाण्डो में आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन लेन की अनुमति देता है ! और वो शास्त्र था - आपद्धर्म !

क्रांतिकारी विचारो के धनि महर्षि देवल ने इस 'आपद्धर्म' नामकी वैदिक परियोजना का उपयोग करके प्राचीन श्रुतियो पर भाष्य लिख डाला - देवल स्मृति !

इस देवल स्मृति में उन्होंने धर्मान्तरित हिन्दुओ के पुनः हिन्दू धर्म प्रवेश के लिए विधान बना दिया,इस विधान के अंतर्गत विशिष्ट काल के अंतराल में धर्मान्तरित हिन्दू प्रायाश्चीत के तौर पर एक दीं उपवास करके दुसरे दीं दूध से नहलानेपर पुनरागमन करनेयोग्य है.स्त्री के लिए तो उन्होंने बनायीं हुयी पुनरागमन की परियोजना तो बोहत ही सरल है ,जिसके तहत बलात्कारीत स्त्री के मासिक-धर्म के बाद वो स्त्री पुनरागमन करनेयोग्य है!

बस, राजनितिज्ञो को उनकी समस्या का समाधान मिल गया और फीर दुसरे ही दिन से नव-मुसलमानों का शुद्धिकरण शुरुवात हुआ.

हजारो हिन्दुओ को वापस अपने धर्म लिया गया.सिंध में हिन्दुओ की घटी हुयी संख्या वापस बढ़ गयी, जो की इस्लाम के लिए एक जोरदार झटका था !!!!


अरबी मुसलमानों की दुर्दशा का वर्णन करते हुए खुद मुस्लिम इतिहासकार लिखता है - " काफिर सैनिको के डर से हमारे लोगो का सिंध में जीना हराम हो गया है , हमने जीता हुआ सारा मुलख ये काफिर वापस खा गए है केवल "अल्याह फुजाह" नाम का एकलौता गढ़ हमारे पास है जिसकी पनाह में हमें अल्लाह ने महफूज रखा है ! जिन काफ़िरो को हमने मुसलमान बनाया था वो वापस अलह को न मान ने वाले (हिन्दू) बन गए है "


और इस प्रकार महर्षि देवल ने हिन्दुधर्म का पुनारुथ्थान करने में महत्व पूर्ण योगदान दिया.
महर्षि देवल एवं उनका भाष्य "देवल स्मृति" हिंदुत्व के इए वरदान साबीत हुए !
महर्षि देवल जैसे क्रांतिकारी विचारो के तपस्वियों ने समय समय पर हिन्दू धर्म में कालानुरूप सुधार करके इसे शत प्रतिशत खरा बना दिया है , जो की आज विश्वधर्म कहलाने योग्य है !
आज देवल मुनि को उनके कार्य के लिए मै नमन करता हु !


कृण्वन्तो विश्वमार्यम
जयति अखंड हिन्दू राष्ट्रं
हर हर महादेव
जय हो मैय्या की !

Thursday, 24 May 2012

न्यूटन नहीं ...भास्कराचार्य ने की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज..

जिस समय न्यूटन के पूर्वज जंगली लोग थे, उस समय महर्षि भास्कराचार्य ने प्रथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर एक पूरा ग्रन्थ रच डाला था. किन्तु आज हमें कितना बड़ा झूठ पढ़ना पड़ता है कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज न्यूटन ने की, ये हमारे लिए शर्म की बात है.

भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है।

मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो
विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।।
- सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय - भुवनकोश

आगे कहते हैं-

आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं
गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।
आकृष्यते तत्पततीव भाति
समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।
- सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय - भुवनकोश

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं।

ऐसे ही अगर यह कहा जाय की विज्ञान के सारे आधारभूत अविष्कार भारत भूमि पर हमारे विशेषज्ञ ऋषि मुनियों द्वारा हुए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ! सबके प्रमाण उपलब्ध हैं ! आवश्यकता स्वभाषा में विज्ञान की शिक्षा दिए जाने की है !

लव जेहादी क्या है?????


मेरी पिछली पोस्ट “क्या लव जेहादी अधिक सक्रिय हो गये हैं…” के जवाब में मुझे कई टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं और उससे भी अधिक ई-मेल प्राप्त हुए। जहाँ एक ओर बेनामियों (फ़र्जी नामधारियों) ने मुझे मानसिक चिकित्सक से मिलने की सलाह दे डाली, वहीं दूसरी ओर मेरी कुछ महिला पाठकों ने ई-मेल पर कहा कि मुस्लिम लड़के और हिन्दू लड़की के बारे मेंमेरी इस तरह की सोच “Radical” (कट्टर) और Communal (साम्प्रदायिक) है।ज़ाहिर है कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ और ई-मेल प्राप्त होना एक सामान्य बात है। फ़िर भी मैंने “लव-जेहाद की अवधारणा” तथा “प्रेमी जोड़ों” द्वारा धर्म से ऊपर उठने, अमन-शान्ति की बातें करने आदि की तथाकथित हवाई और किताबी बातों का विश्लेषण करने और इतिहास में झाँकने की कोशिश की, तो ऐसे कई उदाहरण मिले जिसमें मेरी इस सोच को और बल मिला कि भले ही “लव जेहाद” नामक कोई अवधारणा स्पष्ट रूप से परिभाषित न हो, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम के बीच प्यार-मुहब्बत के इस “खेल” में अक्सर मामला या तो इस्लाम की तरफ़ “वन-वे-ट्रैफ़िक” जैसा होता है, अथवा कोई “लम्पट” हिन्दू व्यक्ति अपनी यौन-पिपासा शान्त करने अथवा किसी लड़की को कैसे भी हो, पाने के लिये इस्लाम का सहारा लेते हैं। वन-वे ट्रैफ़िक का मतलब, यदि लड़का मुस्लिम है और लड़की हिन्दू है तो लड़की इस्लाम स्वीकार करेगी (चाहे नवाब पटौदी और शर्मिला टैगोर उर्फ़ आयेशा सुल्ताना हों अथवा फ़िरोज़ घांदी और इन्दिरा उर्फ़ मैमूना बेगम हों), लेकिन यदि लड़की मुस्लिम है और लड़का हिन्दू है, तो लड़के को ही इस्लाम स्वीकार करना पड़ेगा (चाहे वह कम्युनिस्ट इन्द्रजीत गुप्त हों या गायक सुमन चट्टोपाध्याय)… ऊपर मैंने कुछ प्रसिद्ध लोगों के नाम लिये हैं जिनका समाज में उच्च स्थान “माना जाता है”, और ऐसे सेलेब्रिटी लोगों से ही युवा प्रेरणा लेते हैं, आईये देखें “लव जेहाद” के कुछ अन्य पुराने प्रकरण (आपके दुर्भाग्य से यह मेरी कल्पना पर आधारित नहीं हैं…सच्ची घटनाएं हैं)- (1) जेमिमा मार्सेल गोल्डस्मिथ और इमरान खान – ब्रिटेन के अरबपति सर जेम्स गोल्डस्मिथ की पुत्री (21), पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान (42) के प्रेमजाल में फ़ँसी, उससे 1995 में शादी की, इस्लाम अपनाया (नाम हाइका खान), उर्दू सीखी, पाकिस्तान गई, वहाँ की तहज़ीब के अनुसार ढलने की कोशिश की, दो बच्चे (सुलेमान और कासिम) पैदा किये… नतीजा क्या रहा… तलाक-तलाक-तलाक। अब अपने दो बच्चों के साथ वापस ब्रिटेन। फ़िर वही सवाल – क्या इमरान खान कम पढ़े-लिखे थे? या आधुनिक(?) नहीं थे? जब जेमिमा ने इतना “एडजस्ट” करने की कोशिश की तो क्या इमरान खान थोड़ा “एडजस्ट” नहीं कर सकते थे? (लेकिन “एडजस्ट” करने के लिये संस्कारों की भी आवश्यकता होती है)… (2) 24 परगना (पश्चिम बंगाल) के निवासी नागेश्वर दास की पुत्री सरस्वती (21) ने 1997 में अपने से उम्र में काफ़ी बड़े मोहम्मद मेराजुद्दीन से निकाह किया, इस्लाम अपनाया (नाम साबरा बेगम)। सिर्फ़ 6 साल का वैवाहिक जीवन और चार बच्चों के बाद मेराजुद्दीन ने उसे मौखिक तलाक दे दिया और अगले ही दिन कोलकाता हाइकोर्ट के तलाकनामे (No. 786/475/2003 दिनांक 2.12.03) को तलाक भी हो गया। अब पाठक खुद ही अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि चार बच्चों के साथ घर से निकाली गई सरस्वती उर्फ़ साबरा बेगम का क्या हुआ होगा, न तो वह अपने पिता के घर जा सकती थी, न ही आत्महत्या कर सकती थी…अक्सर हिन्दुओं और बाकी विश्व को मूर्ख बनाने के लिये मुस्लिम और सेकुलर विद्वान(?) यह प्रचार करते हैं कि कम पढ़े-लिखे तबके में ही इस प्रकार की तलाक की घटनाएं होती हैं, जबकि हकीकत कुछ और ही है। क्या इमरान खान या नवाब पटौदी कम पढ़े-लिखे हैं? तो फ़िर नवाब पटौदी, रविन्द्रनाथ टैगोर के परिवार से रिश्ता रखने वाली शर्मिला से शादी करने के लिये इस्लाम छोड़कर, बंगाली क्यों नहीं बन गये? यदि उनके “सुपुत्र”(?) सैफ़ अली खान को अमृता सिंह से इतना ही प्यार था तो सैफ़, पंजाबी क्यों नहीं बन गया? अब इस उम्र में अमृता सिंह को बच्चों सहित बेसहारा छोड़कर करीना कपूर से इश्क की पींगें बढ़ा रहा है, और उसे भी इस्लाम अपनाने पर मजबूर करेगा, लेकिन खुद पंजाबी नहीं बनेगा (यही है असली मानसिकता…)। शेख अब्दुल्ला और उनके बेटे फ़ारुख अब्दुल्ला दोनों ने अंग्रेज लड़कियों से शादी की, ज़ाहिर है कि उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करने के बाद, यदि वाकई ये लोग सेकुलर होते तो खुद ईसाई धर्म अपना लेते और अंग्रेज बन जाते…? और तो और आधुनिक जमाने में पैदा हुए इनके पोते यानी कि जम्मू-कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी एक हिन्दू लड़की “पायल” से शादी की, लेकिन खुद हिन्दू नहीं बने, उसे मुसलमान बनाया, तात्पर्य यह कि “सेकुलरिज़्म” और “इस्लाम” का दूर-दूर तक आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है और जो हमें दिखाया जाता है वह सिर्फ़ ढोंग-ढकोसला है। जैसे कि गाँधीजी की पुत्री का विवाह एक मुस्लिम से हुआ, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री का निकाह विदेश सचिव सलमान हैदर के पुत्र से हुआ है, प्रख्यात बंगाली कवि नज़रुल इस्लाम, हुमायूं कबीर (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने भी हिन्दू लड़कियों से शादी की, क्या इनमें से कोई भी हिन्दू बना? अज़हरुद्दीन भी अपनी मुस्लिम बीबी नौरीन को चार बच्चे पैदा करके छोड़ चुके और अब संगीता बिजलानी से निकाह कर लिया, उन्हें कोई अफ़सोस नहीं, कोई शिकन नहीं। ऊपर दिये गये उदाहरणों में अपनी बीवियों और बच्चों को छोड़कर दूसरी शादियाँ करने वालों में से कितने लोग अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे हैं? तब इसमें शिक्षा-दीक्षा का कोई रोल कहाँ रहा? यह तो विशुद्ध लव-जेहाद है। इसीलिये कई बार मुझे लगता है कि सानिया मिर्ज़ा के शोएब के साथ पाकिस्तान जाने पर हायतौबा करने की जरूरत नहीं है, मुझे विश्वास है कि 2-4 बच्चे पैदा करने के बाद “रंगीला रसिया” शोएब मलिक उसे “छोड़” देगा और दुरदुराई हुई सानिया मिर्ज़ा अन्ततः वापस भारत में ही पनाह लेगी, और उस वक्त भी उससे सहानुभूति जताने में नारीवादी और सेकुलर संगठन ही सबसे आगे होंगे। वहीदा रहमान ने कमलजीत से शादी की, वह मुस्लिम बने, अरुण गोविल के भाई ने तबस्सुम से शादी की, मुस्लिम बने, डॉ ज़ाकिर हुसैन (पूर्व राष्ट्रपति) की लड़की ने एक हिन्दू से शादी की, वह भी मुस्लिम बना, एक अल्पख्यात अभिनेत्री किरण वैराले ने दिलीपकुमार के एक रिश्तेदार से शादी की और गायब हो गई। प्रख्यात (या कुख्यात) गाँधी-नेहरु परिवार के मुस्लिम इतिहास के बारे में तो सभी जानते हैं। ओपी मथाई की पुस्तक के अनुसार राजीव के जन्म के तुरन्त बाद इन्दिरा और फ़िरोज़ की अनबन हो गई थी और वह दोनों अलग-अलग रहने लगे थे। पुस्तक में इस बात का ज़िक्र है कि संजय (असली नाम संजीव) गाँधी, फ़िरोज़ की सन्तान नहीं थे। मथाई ने इशारों-इशारों में लिखा है कि मेनका-संजय की शादी तत्कालीन सांसद और वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोहम्मद यूनुस के घर सम्पन्न हुई, तथा संजय गाँधी की मौत के बाद सबसे अधिक फ़ूट-फ़ूटकर रोने वाले मोहम्मद यूनुस ही थे। यहाँ तक कि मोहम्मद यूनुस ने खुद अपनी पुस्तक “Persons, Passions & Politics” में इस बात का जिक्र किया है कि संजय गाँधी का इस्लामिक रिवाजों के मुताबिक खतना किया गया था। इस कड़ी में सबसे आश्चर्यजनक नाम है भाकपा के वरिष्ठ नेता इन्द्रजीत गुप्त का। मेदिनीपुर से 37 वर्षों तक सांसद रहने वाले कम्युनिस्ट (जो धर्म को अफ़ीम मानते हैं), जिनकी शिक्षा-दीक्षा सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज दिल्ली तथा किंग्स कॉलेज केम्ब्रिज में हुई, 62 वर्ष की आयु में एक मुस्लिम महिला सुरैया से शादी करने के लिये मुसलमान (इफ़्तियार गनी) बन गये। सुरैया से इन्द्रजीत गुप्त काफ़ी लम्बे समय से प्रेम करते थे, और उन्होंने उसके पति अहमद अली (सामाजिक कार्यकर्ता नफ़ीसा अली के पिता) से उसके तलाक होने तक उसका इन्तज़ार किया। लेकिन इस समर्पणयुक्त प्यार का नतीजा वही रहा जो हमेशा होता है, जी हाँ, “वन-वे-ट्रेफ़िक”। सुरैया तो हिन्दू नहीं बनीं, उलटे धर्म को सतत कोसने वाले एक कम्युनिस्ट इन्द्रजीत गुप्त “इफ़्तियार गनी” जरूर बन गये। इसी प्रकार अच्छे खासे पढ़े-लिखे अहमद खान (एडवोकेट) ने अपने निकाह के 50 साल बाद अपनी पत्नी “शाहबानो” को 62 वर्ष की उम्र में तलाक दिया, जो 5 बच्चों की माँ थी… यहाँ भी वजह थी उनसे आयु में काफ़ी छोटी 20 वर्षीय लड़की (शायद कम आयु की लड़कियाँ भी एक कमजोरी हैं?)। इस केस ने समूचे भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ पर अच्छी-खासी बहस छेड़ी थी। शाहबानो को गुज़ारा भत्ता देने के लिये सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को राजीव गाँधी ने अपने असाधारण बहुमत के जरिये “वोटबैंक राजनीति” के चलते पलट दिया, मुल्लाओं को वरीयता तथा आरिफ़ मोहम्मद खान जैसे उदारवादी मुस्लिम को दरकिनार किया गया… तात्पर्य यही कि शिक्षा-दीक्षा या अधिक पढ़े-लिखे होने से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता, शरीयत और कुर-आन इनके लिये सर्वोपरि है, देश-समाज आदि सब बाद में…। (यदि इतना ही प्यार है तो “हिन्दू” क्यों नहीं बन गये? मैं यह बात इसलिये दोहरा रहा हूं, कि आखिर मुस्लिम बनाने की जिद क्यों? इसके जवाब में तर्क दिया जा सकता है कि हिन्दू कई समाजों-जातियों-उपजातियों में बँटा हुआ है, यदि कोई मुस्लिम हिन्दू बनता है तो उसे किस वर्ण में रखेंगे? हालांकि यह एक बहाना है क्योंकि इस्लाम के कथित विद्वान ज़ाकिर नाइक खुद फ़रमा चुके हैं कि इस्लाम “वन-वे ट्रेफ़िक” है, कोई इसमें आ तो सकता है, लेकिन इसमें से जा नहीं सकता…(यहाँ देखेंhttp://blog.sureshchiplunkar.com/2010/02/zakir-naik-islamic-propagandist-indian.html)। लेकिन चलो बहस के लिये मान भी लें, कि जाति-वर्ण के आधार पर आप हिन्दू नहीं बन सकते, लेकिन फ़िर सामने वाली लड़की या लड़के को मुस्लिम बनाने की जिद क्योंकर? क्या दोनो एक ही घर में अपने-अपने धर्म का पालन नहीं कर सकते? मुस्लिम बनना क्यों जरूरी है? और यही बात उनकी नीयत पर शक पैदा करती है) एक बात और है कि धर्म परिवर्तन के लिये आसान निशाना हमेशा होते हैं “हिन्दू”, जबकि ईसाईयों के मामले में ऐसा नहीं होता, एक उदाहरण और देखिये – पश्चिम बंगाल के एक गवर्नर थे ए एल डायस (अगस्त 1971 से नवम्बर 1979), उनकी लड़की लैला डायस, एक लव जेहादी ज़ाहिद अली के प्रेमपाश में फ़ँस गई, लैला डायस ने जाहिद से शादी करने की इच्छा जताई। गवर्नर साहब डायस ने लव जेहादी को राजभवन बुलाकर 16 मई 1974 को उसे इस्लाम छोड़कर ईसाई बनने को राजी कर लिया। यह सारी कार्रवाई तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय की देखरेख में हुई। ईसाई बनने के तीन सप्ताह बाद लैला डायस की शादी कोलकाता के मिडलटन स्थित सेंट थॉमस चर्च में ईसाई बन चुके जाहिद अली के साथ सम्पन्न हुई। इस उदाहरण का तात्पर्य यह है कि पश्चिमी माहौल में पढ़े-लिखे और उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले डायस साहब भी, एक मुस्लिम लव जेहादी की “नीयत” समझकर उसे ईसाई बनाने पर तुल गये। लेकिन हिन्दू माँ-बाप अब भी “सहिष्णुता” और “सेकुलरिज़्म” का राग अलापते रहते हैं, और यदि कोई इस “नीयत” की पोल खोलना चाहता है तो उसे “साम्प्रदायिक” कहते हैं। यहाँ तक कि कई लड़कियाँ भी अपनी धोखा खाई हुई सहेलियों से सीखने को तैयार नहीं, हिन्दू लड़के की सौ कमियाँ निकाल लेंगी, लेकिन दो कौड़ी की औकात रखने वाले मुस्लिम जेहादी के बारे में पूछताछ करना उन्हें “साम्प्रदायिकता” लगती है… इस मामले में एक “एंगल” और है, वह है “लम्पट” और बहुविवाह की लालसा रखने वाले हिन्दुओं का… धर्मेन्द्र-हेमामालिनी का उदाहरण तो हमारे सामने है ही कि किस तरह से हेमा से शादी करने के लिये धर्मेन्द्र झूठा शपथ-पत्र दायर करके मुसलमान बने…। दूसरा केस चन्द्रमोहन (चाँद) और अनुराधा (फ़िज़ा) का है, दोनों प्रेम में इतने अंधे और बहरे हो गये थे कि एक-दूसरे को पाने के लिये इस्लाम स्वीकार कर लिया। ऐसा ही एक और मामला है बंगाल के गायक सुमन चट्टोपाध्याय का… सुमन एक गीतकार-संगीतकार और गायक भी हैं। ये साहब जादवपुर सीट से लोकसभा के लिये भी चुने गये हैं। एक इंटरव्यू में वह खुद स्वीकार कर चुके हैं कि वह कभी एक औरत से संतुष्ट नहीं हो सकते, और उन्हें ढेर सारी औरतें चाहिये। अब एक बांग्लादेशी गायिका सबीना यास्मीन से शादी(?) करने के लिये इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया है, यह इनकी पाँचवीं शादी है, और अब इनका नाम है सुमन कबीर। आश्चर्य तो इस बात का है कि इस प्रकार के लम्पट किस्म के और इस्लामी शरीयत कानूनों का अपने फ़ायदे के लिये इस्तेमाल करने वाले लोगों को, मुस्लिम भाई बर्दाश्त कैसे कर लेते हैं? मुझे यकीन है कि, मेरे इस लेख के जवाब में मुझे सुनील दत्त-नरगिस से लेकर रितिक रोशन-सुजैन खान तक के (गिनेचुने) उदाहरण सुनने को मिलेंगे, लेकिन फ़िर भी मेरा सवाल वही रहेगा कि क्या सुनील दत्त या रितिक रोशन ने अपनी पत्नियों को हिन्दू धर्म ग्रहण करवाया? या शाहरुख खान ने गौरी के प्रेम में हिन्दू धर्म अपनाया? नहीं ना? जी हाँ, वही वन-वे-ट्रैफ़िक!!!! सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये कैसा प्रेम है? यदि वाकई “प्रेम” ही है तो यह वन-वे ट्रैफ़िक क्यों है? इसीलिये सभी सेकुलरों, प्यार-मुहब्बत-भाईचारे, धर्म की दीवारों से ऊपर उठने आदि की हवाई-किताबी बातें करने वालों से मेरा सिर्फ़ एक ही सवाल है, “कितनी मुस्लिम लड़कियों (अथवा लड़कों) ने “प्रेम”(?) की खातिर हिन्दू धर्म स्वीकार किया है?” मैं इसका जवाब जानने को बेचैन हूं। मुझे “कट्टर” और Radical साबित करने और मुझे अपनी गलती स्वीकार करने के लिये कृपया आँकड़े और प्रसिद्ध व्यक्तियों के आचरण द्वारा सिद्ध करें, कि “भाईचारे”(?) की खातिर कितने मुस्लिम लड़के अपनी हिन्दू प्रेमिका की खातिर हिन्दू धर्म में आये? यदि आँकड़े और तथ्य आपके पक्ष में हुए तो मैं खुशी-खुशी आपसे माफ़ी माँग लूंगा… मैं इन्तज़ार कर रहा हूं… यदि नहीं, तो हकीकत को पहचानिये और मान लीजिये कि कुछ न कुछ गड़बड़ अवश्य है। अपनी लड़कियों को अच्छे संस्कार दीजिये और अच्छे-बुरे की पहचान करना सिखाईये। सबसे महत्वपूर्ण बात कि यदि लड़की के सच्चे प्रेम में कोई मुसलमान युवक, हिन्दू धर्म अपनाने को तैयार होता है तो उसका स्वागत खुले दिल से कीजिये… (इस लेख में उल्लेखित घटनाएं असली जिन्दगी से सरोकार रखती हैं तथा बंगाली लेखक रबिन्द्रनाथ दत्ता की पुस्तक “The Silent Terror” से ली गई हैं)http://www.faithfreedom.org/islam/why-hindu-or-non-muslim-girl-must-not-marry-muslim-part-3-0


शस्त्र गौरव..

शस्त्र एक ऐसा तत्त्व है , जो किसी भी बिकट परिस्थिति में मनुष्यजाति को तारने की क्षमता रखता है , और जिसे उठाना (समय की मांग को देखते हुए) हर किसी का उत्तरदायित्व !

अहिंसा के अतिरेकियो ने किस तरह हिन्दू समाज को भ्रमित कर ,नपुंसक संस्कारों के प्रभाव में निष्क्रिय पीढियों को जन्म दिया,किस तरह तथाकथित विद्वान हिन्दू अपने ही हिन्दू धर्म के तत्वों को विरोध करके उसे " धर्म-निरपेक्षता (सेकुलारिसम )" नाम देने लगा , ये हर कोई जानता है।
हिन्दुपुत्रो और हिन्दुपुत्रियो धर्म जागरण हेतु आगे आओ और आवश्यकता होने पर शस्त्र भी उठाओ!

माँ भवानी तुम्हारी रक्षा करेगी और तुम्हारे विजय का कारण बनेगी !

जो हिंदू हित कि बात करेगा वाही देश पर राज करेगा! जो हमारे राम का नहीं वो हमारे काम का नहीं! जो हमारी गौ माता का सगा नहीं वो हमारे लिए बेकार है

आओ साथ मिलाकर इस जातिपाती के बंधन को तोड़ दे मैँसिर्फ हिन्दू हूँ ... न मैँ दलित हूँन मैँ सवर्ण हूँ न मैँ काला हूँ न गौरवर्ण हूँ न तो यादव हूँ और न ही जाट हूँ ... न ही अमीर का पलंग और न ही गरीब की खाटहूँ ... मैँ ना तो लोधी ना ठाकुर नतो पंडित ना ही स्वर्णकार मैँ तो हिन्दूस्थानी हूँ जिसकी महिमा अपरम्पार.... आओँ जाति वर्ण काभेद मिटा देँ हर सनातनी को गले लगा लेँ इस राजनीति से अपने राष्ट्र धर्म को बचा लेँ हमक्या हैँ एक बार फिर दुनिया कोदिखा देँ मैँ ही सिख हू मैँ हीहिन्दू हूँ मेरा धर्म है शुद्धसनातन मैँ ही जैन हूँ मैँ हीबोद्ध हूँ मैँ ही विश्वगुरु भारतका के केन्द्र बिन्दू हूँ मैँ हिन्दू हूँ.....जय हिन्दूराष्ट्र......जय श्री राम कृष्ण परशुराम ॐ

हिन्दू धर्म में जनम लिए हुवे किसी भी व्यक्ति से अगर ये पूछा जाए की उसके लिए...**देश बड़ा या धर्म** अगर जिनका भी उत्तर भ्रस्टाचार या अन्य कुरीतियों के कारन **देश** है तो उनसे मैं केवल एक ही प्रश्न पूछना चाहूँगा की.....आज पाकिस्तान भी है बंगलादेश भी है नेपाल भी है.....जो की कभी भारत का ही हिस्सा थे...यानी की जमीन आज भी वही, हवा भी वही, पर्वत नदिया भी वही.....यहाँ तक की वो सारी कुरीतिया भारत से अलग होने पे भी एक बड़े पैमाने पे आज भी वहां मौजूद है.......तो फिर अलग क्या हुवा है??? फिर क्यों हमारे देश के तीन टुकड़े होने का रोना आज भी हम लोग रोते है ???... एक ही तो फर्क हुवा है की आज वहां हिन्दू की जगह मुस्लिम निवास करते है....और बंगलादेश, पाकिस्तान में गलती से बचे खुचे हिन्दुओं पे अत्याचार कहीं किसी से छुपे नहीं ...ऐसा क्यों??? क्यों आज उनको भी अपना ही देश नहीं मानते हो???..... सच बताओ क्या फर्क केवल नाम का है?????.............. किसी भी देश का अस्तित्वा उस देश के प्राचीन धर्म से ही होता है ...ठीक उसी तरह ,जैसे की हम सबके घर के दरवाजे पे लगी नेम प्लेट में लिखा हुवा हमारे पिता या दादा जी का नाम ...जरा सोचो अगर उस नाम की जगह किसी मुस्लिम नाम की नेम प्लेट लगा दी जाये.....तो क्या फर्क पड़ेगा देश को धर्म से ऊपर रखने वालों पे???.....क्योंकि घर की दीवारे भी वही , फर्नीचर भी वही , पेंट भी वही और साजो सामान भी वही.....सांस ले पाओगे उस मुस्लिम मालिक के नाम के अंतर्गत आने वाले सारे कानूनों की हवा में????.....खुद से नज़रे मिला पाओगे अपनी नन्ही गुडिया सी बहन/बेटी की खिलखिलाती हंसी को काले बुर्के में लपेट के????......क्या तुम्हारा जमीर नहीं धिक्कारेगा तुमको हमारी भारत माता को अपशब्दों से सजाने वालों को अपना दाता बनाने में????.....अपनी सगी माँ को केवल एक औरत की नज़र से देखने वाली कौम की नज़रों को सहन कर पाओगे????....आये दिन पूजी जाने वाली अपनी गौ माता को भी मांसाहार मान कर खाना भी शुरू कर दोगे क्या????......राम , लक्ष्मण , भरत , शत्रुघ्न जैसे पात्र मुहम्मद में कैसे स्वीकार कर सकते हो????....स्रष्टि रक्षा हेतु हलाहल विष को ग्रहण करने वाले भोलेनाथ का ये स्वरुप इस्लाम के कौन से नबी में देखना शुरू कर दोगे????.....इतना सब होने के बाद भी तुम्हारे द्वारा धर्म को ताक पे रखने के इस त्याग से क्या तुम्हारे देश /घर की सारी कुरीतिया और भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएँगी, जैसे पाकिस्तान और बंगलादेश की समाप्त हुयी है ????....धर्म को ताक पे रखने के कारन तुम्हारा ही अस्तित्वा सामप्त होने के बाद भी क्या तुम्हारा घर या देश तुम्हारा रह जायेगा.......अगर हाँ........तो कौन सा घर और कौन सा देश ???????...मुझे समझाओ..............


जय हिन्दू राष्ट्र 
जय श्री राम कृष्ण परशुराम ॐ

भारत एवं भारत के वेदों की महानता.

प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’ के 257वें पृष्ठ पर हजरतमोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-

“अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।

व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।

वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।

वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।

यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।

फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।

वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।

फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।

जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।

व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।”

अर्थात-(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वरने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनकेअनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।

अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवंगबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है। ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कवितानयी दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर कालीस्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -

” कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।

कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।

न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।

वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।

व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।

मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।

व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।

व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।

मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।

नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।

अर्थात् – (1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) अदि अन्त में उसको पश्चाताप होऔर भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ? (3) एक बार भीसच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्चपद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहाँ पहुँचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाताहै। (5) वहाँ की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्शगुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है ।

Reference - pravakta.com

Friday, 18 May 2012

गान्धी-वध के कारण..


गान्धी-वध के मुकद्दमें के दौरान न्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर सुनाने की अनुमति माँगी थी और उसे यह अनुमति मिली थी। नाथूराम गोडसे का यह न्यायालयीन वक्तव्य भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध नाथूराम गोडसे के भाई तथा गान्धी-वध के सह-अभियुक्त गोपाल गोडसे ने ६० वर्षों तक वैधानिक लडाई लड़ी और उसके फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबन्ध को हटा लिया तथा उस वक्तव्य के प्रकाशन की अनुमति दी। नाथूराम गोडसे ने न्यायालय के समक्ष गान्धी-वध के जो १५० कारण बताये थे उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: -

  1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (१९१९) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के नायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाये। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से स्पष्ठ मना कर दिया।
  2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था, कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचायें, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया।
  3. ६ मई १९४६ को समाजवादी कार्यकर्ताओं को दिये गये अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।
  4. मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए १९२१ में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग १५०० हिन्दू मारे गये व २००० से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।
  5. १९२६ में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने हत्या कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिये अहितकारी घोषित किया।
  6. गान्धी ने अनेक अवसरों पर शिवाजीमहाराणा प्रताप व गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।
  7. गान्धी ने जहाँ एक ओर कश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह को कश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दू बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।
  8. यह गान्धी ही थे जिन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
  9. कांग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिये बनी समिति (१९३१) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गान्धी की जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
  10. कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टाभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पद त्याग दिया।
  11. लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
  12. १४-१५ १९४७ जून को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
  13. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे; ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और १३ जनवरी १९४८ को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
  14. पाकिस्तान से आये विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
  15. २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउण्टबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को ५५ करोड़ रुपये की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।

Friday, 4 May 2012

इतिहास दृष्टि द डा.सतीश चन्द्र मित्तल भारत विभाजन का षड्यंत्र और कांग्रेस..


यद्यपि भारत के विभाजन को 64 वर्ष हो गए हैं, तथापि तत्कालीन नेताओं के क्रियाकलापों तथा विभिन्न राजनीतिक दलों की भूमिका आज भी  भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार के गुप्त दस्तावेजों में कैद है, जो अब भी शोधकर्ताओं की पहुंच से बाहर हैं। इसके साथ कांग्रेस ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए भारत के वामपंथियों के सहयोग तथा मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति तो अपनाई ही, हिन्दू समाज तथा हिन्दू संगठनों की भूमिका को योजनाबद्ध ढंग से सिर्फ अनदेखा ही नहीं किया बल्कि उन पर "अंग्रेजों के पिट्ठू" "विभाजन के पोषक" "फासिस्ट" "साम्प्रदायिक" आदि झूठे आरोप भी लगाए। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या उस लम्बे राजनीतिक आन्दोलन में भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज मूकदर्शक रहकर भारत का विभाजन देखता रहा? इस दृष्टि से हम यहां केवल एक संस्था-हिन्दू महासभा के कार्यों का अवलोकन कर रहे हैं।
हिन्दू महासभा का उदय
बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों तक हिन्दुओं का अलग से कोई राजनीतिक दल नहीं था। ब्रिटिश सरकार तथा तत्कालीन मुस्लिम नेता भी कांग्रेस को "हिन्दुओं का संगठन" कहते थे। एक-दो अपवाद को छोड़कर प्राय: सभी क्रांतिकारी भी हिन्दू थे। धार्मिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में हिन्दुओं की अनेक संस्थाएं थीं। 1908-09 में पंजाब में हिन्दू सभा की स्थापना हुई थी। 1915 में महामना पं. मदन मोहन मालवीय ने इसे अखिल भारतीय महासभा का स्वरूप देने में बड़ी सहायता की। वे 1923 से 1926 तक इसके अध्यक्ष भी रहे थे। 1920 के दशक में खलीफा आन्दोलन में कांग्रेस की भूमिका, मोपाला और पेशावर के मुस्लिम दंगों में कांग्रेस की निकृष्ट वकालत तथा हिन्दुओं की असहाय अवस्था तथा कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति ने अनेक हिन्दुओं को कांग्रेस से अलग होकर राजनीतिक दल के रूप में प्रवेश के लिए बाध्य किया था। कांग्रेस, ब्रिटिश सरकार के इस कथन से सहमत थी कि मुस्लिमों के सहयोग के बिना भारत एक राष्ट्र के रूप में कभी स्वाधीनता प्राप्त नहीं कर सकता। अब कांग्रेस की पूरी ऊर्जा स्वराज्य की बजाय हिन्दू मुस्लिम एकता पर केन्द्रित हो गई थी। सही बात तो यह है कि देश के 85 प्रतिशत हिन्दू समाज का प्रतिनिधित्व कहीं नहीं था। 1933 में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भाई परमानन्द ने मांग की कि हिन्दुओं को भारत का प्रमुख समुदाय माना जाए।
वीर सावरकर की भूमिका
हिन्दू महासभा को एक सुदृढ़ तथा जीवंत संगठन बनाने में वीर सावरकर का महत्वपूर्ण स्थान है। ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई काला पानी की कठोर यातना सहने के पश्चात उन्हें 21 जनवरी 1921 से 10 मई 1937 तक रत्नागिरी में नजरबंद रखा गया तथा उन पर अनेक प्रतिबंध लगाये गए। इसी कालावधि में उन्होंने हिन्दुत्व, हिन्दू पद पादशाही, अंडमान की गूंज तथा अनेक उपन्यास, नाटक तथा सैकड़ों लेख लिखे। रत्नागिरी में उन्होंने हिन्दू महासभा की स्थापनी की। रत्नागिरी की नजरबन्दी से मुक्त होकर वे देश की राजनीति में खुलकर आए। 30 सितम्बर, 1937 के अमदाबाद अधिवेशन में उन्हें पहली बार हिन्दू महासभा का अध्यक्ष बनाया गया। इसके पश्चात अगले पांच वर्षों तक वे इसके अध्यक्ष रहे। उन्होंने अपने पहले ही अध्यक्षीय भाषण में कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की कटु आलोचना की।
हैदरावाद के निजाम के विरुद्ध अपने अस्तित्व के लिए जब आर्य समाज संघर्ष तथा सत्याग्रह कर रहा था तथा कांग्रेस मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने के लिए उसे साम्प्रदायिक कह रही थी। तब हिन्दू महासभा ने आर्य समाज को पूर्ण सहयोग दिया। इसी काल में बंगाल के प्रसिद्ध नेता डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिन्दू महासभा के सहयोगी बने।
भारत विभाजन का विरोध
हिन्दू महासभा ने कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण तथा भारत के किसी भी भाग के विभाजन की कटु आलोचना की। 1941 में सभा ने पं. जवाहरलाल नेहरू को असम को मुस्लिम बहुसंख्यक प्रांत बनाने पर चेताया। हिन्दू महासभा की एकमात्र ऐसी राजनीतिक संस्था थी जिसने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग का बिना किसी "अगर" या "मगर" के खुलकर विरोध किया। 1941 में हिन्दू महासभा के कानपुर अधिवेशन में भारतीय राजनीति का हिन्दूकरण तथा हिन्दुओं का सैनिकीकरण का उद्घोष किया। सावरकर की प्रेरणा से सुभाषचन्द्र बोस ने फारवर्ड ब्लाक के अन्तर्गत ब्रिटिश मूर्तियों को खण्डित करने की बजाए, दक्षिण-पूर्वी एशिया में जाकर सशस्त्र क्रांति की योजना बढ़ाने को कहा। 1942 में कांग्रेस के भारत छोड़ो आन्दोलन (क्विट इंडिया मूवमेंट) को चेतावनी देते हुए कहा कि कहीं यह भारत विभाजन का आन्दोलन  (स्पिलट इंडिया मूवमेंट) न बन जाए।

इस सन्दर्भ में 8 अगस्त, 1944 को दिल्ली में आयोजित अखण्ड भारत महा सम्मेलन एक ऐतिहासिक अवसर था। इस विशाल सम्मेलन की अध्यक्षता भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार डा. राधाकुमद मुखर्जी ने की थी।
भारत विभाजन के अंतिम दो वर्ष
भारत विभाजन से पूर्व के दो वर्ष (1946-1947) भारतीय राजनीति का परिवर्तनकारी मोड़ थे। इस समय कांग्रेसी नेता चुनाव में वोट मांग रहे थे। इसके जवाब में हिन्दू महासभा के नेता कह रहे थे कि "सावधान! आज कांग्रेसी अखण्ड भारत का नारा लगाकर तुम्हारे वोट मांग रहे हैं, कल चुनाव के पश्चात, पाकिस्तान का समर्थन कर, विश्वासघात करेंगे। वे केवल भारत विभाजन के लिए कार्य करेंगे।" डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वतंत्रता से पूर्व साम्प्रदायिकता के आधार पर राज्यों का गठन, हिन्दुओं और मुसलमानों की बराबरी तथा पाकिस्तान के निर्माण का जबरदस्त विरोध किया। उन्होंने लार्ड वेवल की योजना को अस्वीकार किया। प्रो. क्प्लैण्ड ने स्पष्ट लिखा है कि इसी विरोध के कारण लार्ड वेवल ने शिमला कांफ्रेस में हिन्दू महासभा को आमंत्रित नहीं किया। हिन्दू महासभा ने अपने विलासपुर अधिवेशन में "एक व्यक्ति एक वोट" तथा समान नागरिकता की बात कही, 16 जून, 1946 को हिन्दू महासभा ने अपने प्रस्ताव में एक मजबूत केन्द्रीय शासन तथा जनसंख्या के आधार पर अंतरिम सरकार की स्थापना के लिए कहा। कैबिनेट मिशन के भारत आगमन पर जहां भारत की कम्युनिस्ट पार्टी न केवल पाकिस्तान की मांग का, जिन्ना से भी अधिक समर्थन कर रही थी तथा अपने सुझावों में भारत को 16-17 टुकड़ों में बांटने की बात कर रही थी, तब कांग्रेस पूरी तरह से निष्क्रिय थी। केवल हिन्दू महासभा ही विरोध कर रही थी।
लार्ड माउन्टबेटन की धूत्र्ततापूर्ण वार्ता
भारत विभाजन की योजना तो मार्च 1947 में ही सर्वत्र दिखने लगी थी। लार्ड माउन्टबेटन ने भारत पहुंचते ही मई के प्रथम सप्ताह से अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया था। उसने प्रथम सप्ताह में पं. जवाहरलाल नेहरू से बात की तथा अब वह निश्चिंत हो गया था। उसने पं. नेहरू से पंजाब की जिलानुसार जानकारी भी प्राप्त की थी। अत: भारत का विभाजन तो मई 1947 में ही निश्चित हो गया, बस अब केवल 3 जून को उस पर मोहर लगनी थी। महात्मा गांधी ने मई 1947 में ही इसका विरोध करते कहा था: कांग्रेस ने इसे सिद्धांतत: मान लिया है पर मैं इसका विरोध करता हूं।" (देखें सिविल एण्ड मिलेरटी गजट, 11 मई 1947) डा. राजेन्द्र प्रसाद ने भी कहा "कांग्रेस ने पाकिस्तान को सिद्धांतत: स्वीकार कर लिया है पर मेरा विश्वास है कि कोई भी इसका विभाजन नहीं कर सकता, जबकि परमात्मा ने हमें एक बनाया है।" विभाजन की योजना सुनते ही अमृतसर तथा लाहौर में बैचेनी हो गई। इतना ही नहीं, लाहौर के तांगेवाले, रिक्शावाले तथा गरीब भी बैचेन हो गए। अमृतसर, लाहौर, रावलपिण्डी, गुडगांव, मेवात में भी हिंसा तथा दंगे भड़क उठे। विवादित जिलों के बारे में हिन्दू महासभा ने सिखों को पूर्ण समर्थन किया। (हिन्दू आउटलुक, 20 मई 1947) प्राय: यह निश्चित है कि यदि हिन्दू महासभा कड़ा प्रतिरोध न करती तो कई और जिले पाकिस्तान का भाग होते। 21 मई, 1947 को हिन्दू महासभा के नेता वी.जी. देशपाण्डे ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित विभाजन विनाशकारी होगा। उन्होंने कहा, "मैं नेताओं से ईमानदारी से प्रार्थना करता हूं कि भारत के भविष्य का निर्णय बहुसंख्यक समाज के जनमत संग्रह के बिना न करें।" (सिविल एण्ड मिलेटरी गजट, 21 मई 1947)


3 जून की घोषणा का विरोध

यह उल्लेखनीय है कि भारत विभाजन के निर्णय के विरुद्ध एक भी कांग्रेसी नेता न जेल गया और न ही कोई प्रस्ताव तक पास किया। परन्तु हिन्दू महासभा ने इसका देशव्यापी विरोध किया। इसकी तीव्र भत्र्सना की। भारत के विभाजन को एल.वी. भोपटकर ने राष्ट्र के साथ धोखा बतलाया। हिन्दू महासभा के नेता एन.सी.चटर्जी ने एक प्रस्ताव द्वारा 3 जून की घोषणा को मूर्खतापूर्ण बताया और कहा कि भारत में तब तक शांति न होगी जब तक तथाकथित पाकिस्तान का क्षेत्र भारत में वापस न हो (देखें हिन्दू आउटलुक, 10 जून 1947) डा. गोकुल चंद्र नारंग ने प्रस्ताव का समर्थन किया। तथा उन्होंने 3 जून की योजना को मूर्खतापूर्ण कहा। एल.वी. भोपटकर ने कहा, "जो कांग्रेस 1946 में देश की एकता के प्रचार में सर्वाधिक आगे थी उसने भारत के विभाजन को आसानी से स्वीकार कर लिया। कम से कम उन्होंने जनता से सलाह तो ले ली होती।" दयाल सिंह बेदी ने कहा, "विचित्र संयोग है कि मोतीलाल ने बम्बई से सिंध को अलग करवाया, उसके लड़के ने सिंध को भारत से अलग करवाया.... अगर कांग्रेस को यही मानना ही था तो इसका सर्वनाश तो न होता। इसे कांग्रेस का आत्मसमर्पण तथा मूर्खता का परिणाम" कहा गया। "हिन्दू आउटलुक" के एक लेख में दिया कि पंडित नेहरू ने देश को एक गड्डे में डाल दिया है। वीर सावरकर ने इस पर "काला दिवस" मनाने का संदेश दिया। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्पष्ट रूप से इसकी कटु आलोचना की।
23 जून, 1947 को बंगाल हिन्दू सभा के अध्यक्ष, सोमनाथ चटर्जी के पिता निर्मल चन्द चटर्जी ने दिल्ली के चांदनी चौक में बोलते हुए कहा कि "आज की अवस्था, ब्रिटिश का जिन्ना के साथ षड्यंत्र तथा कांग्रेस की कायरता का परिणाम है।" 15 अगस्त को उन्होंने "शोक दिवस" मनाया। वीर सावरकर ने कहा, कांग्रेस कहती है कि विभाजन स्वीकार कर देश को रक्तपात से बचाया। लेकिन सही तो यह है कि जब तक पाकिस्तान रहेगा, पुन: रक्तपात का खतरा बना रहेगा।
उपरोक्त संक्षिप्त तथ्यपरक वर्णन से किसी भी निष्पक्ष विद्वान के सही विश्लेषण करने पर, हिन्दू महासभा की पूर्ण स्वाधीनता तथा अखण्ड भारत की मांग, उसकी विशिष्ट भूमिका तथा सतत प्रयत्नों को नकार नहीं सकता। यह बात दूसरी है कि अब तक कांग्रेस-कम्युनिस्ट अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं तथा मुस्लिम तुष्टीकरण की चुनावी राजनीति के कारण, भारतीय जनमानस को भ्रमित करने में आंशिक रूप से सफल रहे हों, परन्तु अब ज्यादा देर तक देश की जनता को विशेषकर युवा शक्ति को अंधेरे में न रखा जा सकेगा।

लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मृत्यु..

लाल बहादुर शास्त्री एक ऐसे कांग्रेसी नेता थे, जो अत्यन्त साधारण परिवार में पैदा हुए थे। शिशुपन में ही उनके पिता का देहान्त हो गया था, लेकिन अपने परिश्रम और योग्यता के बल पर वे भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुँच गये थे। कांग्रेस के जिन गिने-चुने नेताओं का मैं अत्यन्त आदर करता हूँ, उनमें डा. राजेन्द्र प्रसाद के बाद शास्त्री जी का ही नाम आता है। नेहरू की मृत्यु के बाद जब 9 जून 1964 को शास्त्री जी को भारत का प्रधानमंत्री चुना गया, तो शीघ्र ही उन्हें पाकिस्तान के आक्रमण का सामना करना पड़ा। 
भारत 1962 में चीन से युद्ध लड़ चुका था और नेहरू की पंचशीली मूर्खता के कारण बुरी तरह पराजित और अपमानित हुआ था। जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान ने सोचा कि इस समय भारत कमजोर है और उसे सरलता से पराजित किया जा सकता है। इसलिए सितम्बर 1965 में उसने भारत पर आक्रमण कर दिया। लेकिन उस समय देश को नेहरू जैसा अयोग्य प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि शास्त्री जी जैसा योग्य और प्रखर देशभक्त प्रधानमंत्री मिला हुआ था। शास्त्री जी ने उचित रूप में अपने देश और सेना का मार्गदर्शन किया, ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया और उनके द्वारा दी गयी प्रेरणा के बल पर ही भारत ने पाकिस्तान को दूसरी बार धूल चटा दी। 
इस युद्ध के बाद शान्ति और समझौते की बातें होने लगीं। रूस नेहरू के समय से ही भारत का मित्र था और उस समय रूस में अलेक्सेई कोसीगिन का शासन था। रूस ने अपनी मित्रता का फायदा उठाते हुए भारत पर पाकिस्तान के साथ शान्ति समझौता करने का सुझाव दिया। प्रारम्भ में शास्त्री जी इसके लिए अनिच्छुक थे, लेकिन कांग्रेस के कई वामपंथी नेताओं द्वारा दबाब डालने पर वे शान्ति समझौते के लिए सहमत हो गये। रूस ने अपने शहर ताशकन्द में शास्त्री जी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खाँ की मुलाकात की व्यवस्था की। 10 जनवरी 1966 को भारत और पाकिस्तान के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुए। अगली ही सुबह अर्थात् 11 जनवरी को शास्त्री जी अपने बिस्तर पर मृत पाये गये। कहा गया कि देर रात्रि को उन्हें हृदयाघात हुआ, जो घातक सिद्ध हुआ।
लेकिन उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने कभी इस बात पर विश्वास नहीं किया। मृत्यु के बाद शास्त्री जी का शरीर नीला पड़ गया था, जिससे इस बात का स्पष्ट पता चलता है कि उनको जहर दिया गया था। वास्तव में एक रूसी रसोइये को इस आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था, लेकिन शीघ्र ही उसे रहस्यमय तरीके से रिहा कर दिया गया। शास्त्री जी के शव का रूस में पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया, जो कि एक अनिवार्य प्रक्रिया है। 
सन् 2009 में एक पत्रकार अनुज धर ने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत प्रधानमंत्री कार्यालय से शास्त्री जी की मृत्यु का कारण सार्वजनिक करने का अनुरोध किया था। इसके उत्तर में प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्वीकार किया कि उनके पास शास्त्री जी की मृत्यु से सम्बंधित एक दस्तावेज है, परन्तु उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, क्योंकि उससे भारत के विदेशों से सम्बंध खराब हो सकते हैं। सरकार ने यह तो स्वीकार किया कि रूस में शास्त्री जी का पोस्टमार्टम नहीं किया गया था, परन्तु इस बात का जबाब आज तक नहीं मिला है कि भारत में शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम हुआ था कि नहीं।
अब सवाल उठता है कि शास्त्रीजी की मृत्यु को इतना रहस्यमय क्यों बनाया गया है। यदि वास्तव में उनका देहान्त दिल के दौरे से हुआ था, तो उसमें छिपाने की क्या बात है? वह कौन सी बात है जिसके सामने आने से भारत के सम्बंध किसी मित्र देश से बिगड़ सकते हैं? लाख टके का ���वाल यह है कि शास्त्री जी की मृत्यु में किसकी रुचि हो सकती है? पाकिस्तान को तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन उसके अलावा ताशकन्द में केवल रूस ही उपस्थित था। तो क्या रूस चाहता था कि शास्त्री जी अपने देश जीवित न लौट सकें? यदि हाँ, तो क्यों? ये ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर देशवासी आज भी चाहते हैं।
कई लोगों का कहना है कि शास्त्रीजी प्रखर देशभक्त होने के कारण रूस की धोंस में नहीं आते थे, जैसा कि नेहरू आया करते थे। इसलिए रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी ने किसी भारतीय नेता या परिवार के इशारे पर शास्त्री जी को रास्ते से हटा दिया और उस नेता या परिवार के शासन के लिए रास्ता खोल दिया। इन आरोपों की सच्चाई तो गहरी जाँच के बाद ही सामने आ सकती है। परन्तु खेद है कि हमारी सरकार उन दस्तावेजों पर कुंडली मारकर बैठी है, जिनसे शास्त्री जी की मृत्यु की सच्चाई का पता लग सकता है।

महात्मा गांधी के बाद उनके परिवार का क्या हुआ?


नाम : मोहनदास करमचंद गांधी। उपनाम : बापू, संत, राष्ट्रपिता, महात्मा गांधी। जन्मतिथि : 2 अक्तूबर 1869। जन्म स्थान : पोरबंदर, गुजरात। विशेष : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंहिसक और शांतिप्रिय प्रमुख क्रांतिकारी, जन्मदिन पर राष्ट्रीय अवकाश, भारतीय मुद्रा पर फोटो, सरकारी कार्यालयों में तस्वीर। बचपन से ही विद्यालयों में बच्चों को बापू के बारे में बताया जाता है और उनकी जीवनी रटाई जाती है। दे दी हमें आजादी बिना खडग़ बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। गाना भी हिंदुस्तानियों की जुबां पर सुना जा सकता है। लेकिन नाम गुम जाएगा चेहरा ये नजर आएगा... कहावत आज बापू पर चरितार्थ होती दिख रही है। बस फर्क इतना है कि नाम गांधी जयंती पर याद आता है और चेहरा कभी कभार नोट को ध्यान से देखने पर दिखता है। इतनी जानकारी आज स्वतंत्र भारत में अधिकांशत : हर पढ़े-लिखे व्यक्ति को पता है।
गांधी की जीवनी बचपने में पढऩे के बाद हर वर्ष 2 अक्तूबर को राष्ट्रीय अवकाश वाले दिन भी गांधी से संबंधित कई लेख पढऩे को मिल जाते हैं। लेकिन महात्मा गांधी के बाद उनके परिवार का क्या हुआ? उनके कितने बच्चे थे? आज उनके परिवार के सदस्य जीवित भी हैं या नहीं? उनके परिवार की कितनी पीढिय़ां आज मौजूद हैं? वे क्या कर रहीं हैं? कहां हैं? कितने सदस्य हैं? जैसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब पढ़े-लिखे तो क्या विशेषज्ञों और पीएचडी धारकों को भी नहीं पता होंगे। लेकिन आज आपको बताते हैं महात्मा गांधी के परिवार की मौजूदा स्थिति के बारे में।

इंटरनेट की एक वेबसाइट की मानें तो बापू के पौत्र, प्रपौत्र और उनके भी आगे के वंशज आज विश्व में छह देशों में निवास कर रहे हैं। जिनकी कुल संख्या 136 सदस्यों की है। हैरानी होगी यह सुनकर कि इनमें से 12 चिकित्सक, 12 प्रवक्ता, 5 इंजीनियर, 4 वकील, 3 पत्रकार, 2 आईएएस, 1 वैज्ञानिक, 1 चार्टड एकाउंटेंट, 5 निजी कंपनियों मे उच्चपदस्थ अधिकारी और 4 पीएचडी धारी हैं। इनमें सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि मौजूदा परिवार में लड़कियों की संख्या लड़कों से काफी ज्यादा है। आज उनके परिवार के 136 सदस्यों में से 120 जीवित हैं। जो भारत के अलावा अमेरीका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और इंग्लैंड में रहते हैं।

बापू के बारे में : महात्मा गांधी के पिता का नाम करमचंद्र और माता का नाम पुतलीबाई था। अपने परिवार में सबसे छोटे बापू की एक सबसे बड़ी बहन और दो बड़े भाई थे। इनकी सबसे बड़ी बहन रलियत, फिर भाई लक्ष्मीदास और भाभी नंद कुंवरबेन, भाई कृष्‍णदास और भाभी गंगा थीं।

बापू का परिवार : सबसे बड़े पुत्र हरिलाल (1888-18 जून 1948) का ब्याह गुलाब से हुआ। जबकि दूसरे पुत्र मणिलाल (28 अक्तूबर 1892- 4 अप्रैल 1956) की पत्नी का नाम सुशीला था। तीसरे पुत्र रामदास (1897-1969) की शादी निर्मला से हुआ। जबकि चौथे और अंतिम पुत्र देवदास (1900-1957) की पत्नी लक्ष्मी थीं।

वंशावली दूसरी पीढ़ी से

- रामिबेन गांधी-कवंरजीत परिख
ए. अनसुया परिख-मोहन परिख
क. राहुल परिख-प्रभा परिख ख. लेखा-नरेन्द्र सुब्रमण्यम
अवनी व अक्षय अमल

2. सुधा वजरिया-व्रजलाल वजरिया
क. मनीषा-राजेश परिख ख. पारुल-निमेष बजरिया
नील व दक्ष अनेरी व सार्थक
ग. रवि वजरिया-शीतल वजरिया
आकाश व वीर

3. प्रबोध परिख-माधवी परिख
क. सोनल-भरत परिख ख. पराग-पूजा परिख
रचना व गौरव प्राची व दर्शन

4. नीलम परिख-योगेन्द्र परिख
क. समीर परिख-रागिनी पारिख
सिद्धार्थ, पार्थ व गोपी

- कांतिलाल गांधी-सरस्वती गांधी
क. शांतिलाल-सुझान गांधी
अंजली, अलका , अनिता व एना

2. प्रदीप गांधी-मंगला गांधी
प्रिया व मेघा

-रसिकलाल गांधी

-मनुबेन गांधी-सुरेन्द्र मशरूवाला
1. उर्मि देसाई-भरत देसाई
क. मृणाल देसाई-आरती देसाई ख. रेणू देसाई

-शांतिलाल गाँधी

-सीता गांधी-शशीकांत धुबेलिया

1. कीर्ति मेनन-सुनील मेनन
सुनीता

2. उमा मिस्त्री-राजेन मिस्त्री
सपना

3. सतीश धुपेलिया-प्रतिभा धुपेलिया
मीशा, शशिका व कबीर

-अरुण गांधी-सुनंदा गांधी
क. तुषार गांधी-सोनल गांधी ख. अर्जना प्रसाद- हरि प्रसाद
विवान व कस्तूरी अनिष व परितोष

-इला गांधी-मेवालाल रामगोबिन
क. कृष गाँधी
ख. आरती रामगोबिन
ग. केदार रामगोबिन-मृणाल रामगोबिन
घ. आशा रामगोबिन
ड़. आशिष रामगोबिन-अज्ञात
मीरा व निखिल

-सुमित्रा गांधी-गजानन कुलकर्णी
1. सोनाली कुलकर्णी

2. श्रीकृष्ण कुलकर्णी-नीलू कुलकर्णी
विष्णु

3. श्रीराम कुलकर्णी-जूलिया कुलकर्णी
शिव

-कहान गांधी-शिव लक्ष्मी गांधी

-उषा गोकाणी-हरीश गोकाणी
1. संजय गोकाणी-मोना गोकाणी
नताशा व अक्षय

2. आनंद गोकाणी-तेजल गोकाणी

करण व अर्जुन

-रामचंद्र गांधी-इंदू गांधी
लीना गाँधी

-तारा भट्टाचार्य-ज्योति भट्टाचार्य

1. विनायक भट्टाचार्य-लूसी भट्टाचार्य
इण्डिया अनन्या, अनुष्का तारा व एंड्रीया लक्ष्मी

2. सुकन्या भरतराम-विवेक भरतनाम
अक्षर विदूर

-राजमोहन गांधी-उषा गांधी
1. देवव्रत गांधी
2. सुप्रिया गाधी

-गोपाल कृष्ण गांधी-तारा गांधी
1. अनिता गांधी
2. दिव्या गांधी
3. रुस्तम मणिया