Saturday, 26 May 2012

हज़रत मोहम्मद के चाचा, उमर बिन-ए-हश्शाम (जिन्हें अबू हाकम अर्थात ज्ञान का पिता के नाम से भी जाना जाता है) एक प्रसिद्ध अरबी कवि थे। इन्होंने भगवान शिव की स्तुती में एक अरबी कविता लिखी है, जिसे सायर-अल-ओकुल में भी शामिल किया गया है। 

इस अरबी कविता को नई दिल्ली के लक्ष्मीनारायण मन्दिर के पीछे स्थित बगीचे में अग्नि मण्डप के एक शिलालेख पर देखा जा सकता है… 

इस अरबी कविता का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है --

1) वह मनुष्य जिसने अपना जीवन काम, क्रोध, पाप और अधर्म में बिताया हो, अपने जीवन को नष्ट किया हो…
2) यदि अन्त में उसे पश्चाताप हो और वह भलाई की ओर लौटना चाहे तो क्या उसका कल्याण हो सकता है?…
3) एक बार भी वह सच्चे हृदय से महादेव की पूजा करे तो धर्म के मार्ग में उच्च स्तर को पा सकता है…
4) हे प्रभु, मेरा समस्त जीवन लेकर मुझे सिर्फ़ एक दिन के लिए भारत में निवास दे दो, क्योंकि उस भूमि पर पहुँचकर व्यक्ति जीवन-मुक्त हो जाता है…
5) भारत की यात्रा से सारे शुभ कर्मों की प्राप्ति होती है और आदर्श गुरुजनों का सत्संग मिलता है… 

 उल्लेखनीय है कि इन अबू हाकम को तत्कालीन मुसलमानों ने हज़रत साहब के विरोध की वजह से "अबू जिहल" करार दिया, यह उमर बिन हश्शाम एक युद्ध में मुसलमानों से लड़ते हुए मारा गया…

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(स्रोत : - प्रसिद्ध अरबी काव्य ग्रन्थ, "साईर-अल-ओकुल", पृष्ठ 235)

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