सनातन धर्म में प्राचीन काल से ही वर्ण व्यवस्था रही है ...किन्तु जातिया नहीं थी ..... वर्ण व्यवस्था भी विभिन्न श्रेणी के कार्यो के विभाजन की दृष्टि से लागू थी ... यह व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के सिद्धांत पर आधारित थी .... वर्ण व्यवस्था के आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा नहीं समझा जाता था
.... जैसे कि वाल्मीकि जी शूद्रकर्म करते थे किन्तु कर्म-परिवर्तन के पश्चात वर्ण व्यवस्था के ही आधार पर वह ब्राह्मणो के समान पूज्यनीय हो महर्षि के पद पर प्रतिष्ठित हुये ... और जब श्री राम सहित चारों भाइयो का विवाह हुआ तब वाल्मीकि जी को भी अन्य ब्राह्मणो के साथ विशेष निमंत्रण दिया गया था और उच्च स्थान पर विराजित किया गया था ।
शास्त्र इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण है परदा-प्रथा, जात-पात, छूया-छूत प्राचीन काल में थी ही नहीं न ही सनातन धर्म में कभी रही है ....
यह प्रथा आई कहा से इसके कुछ तथ्य प्रस्तुत करते है ... आप स्वयं निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं -
इस्लाम धर्म के स्थापन समय से ही मुसलमानो में परदा प्रथा अपने चरम पर रही है...मुस्लिम महिलाओ सिर्फ घरो में कैद रहा करती थी ... यहा तक कि शौच के लिए भी उन्हे बाहर नहीं जाने दिया जाता था .... वह घर में ही मल-त्याग किया करती थी जिसे कि घर से दूर फेंक कर आने के लिए व्यक्ति विशेष तौर पर तैनात किए गए थे ... अब जाहीर है कि जो व्यक्ति मल-मूत्र के फेकने के लिए ही विशेष तौर पर नियुक्त किए गए थे उनसे घर के अन्य खान-पान संबंधी कार्य नहीं कराये जाते है ... उन्हे नीच तथा अछूत समझा जाता था ।
और प्रखर प्रकाशित सूर्य के समान सत्य यह है कि प्राचीन काल से ही सनातन धर्मी हिन्दू समाज में घर में शौच नहीं किया जाता था तो उसे घर से बाहर फेक कर आने के लिए कोई व्यक्ति तैनात करने का प्रश्न ही नहीं उठता ..
यहा तक कि सनातन धर्मग्रंथ घर तो क्या घर के आस पास भी शौच करने की आज्ञा नहीं देते ....
पनैऋत्यामिषुविक्षेपमतीत्याभ्यधिकमभुवः I
" यदि खुली जगह मिले तो गाँव से नैऋत्यकोण (दक्षिण और पश्चिम के बीच) की ओर कुछ दूर जाएँ."
दिवा संध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उद्न्मुखः I
कुर्यान्मूत्रपुरीषे तु रात्रौ च दक्षिणामुखः II
अब इतिहास को थोड़ा पहले से देखते हुये आगे बढ़ते है कि मुस्लिम आक्रांताओ ने किस तरह इन नीचताओ को हिन्दू धर्म में प्रविष्ट किया ...इस्लाम का परिचय भारतवर्ष को युद्धभूमि में ही हुआ था ..अल्लाह के वाशिंदों द्वारा 'दीन' के नाम पर भारतवर्ष पर आक्रमण करके जो भीषण,घोर निंदनीय अत्याचार किए है उनकी गाथा बहुत मार्मिक है ... इनका पहला निशाना क्षत्रिय ही होते थे क्यो कि उस समय के भारतवर्ष में क्षत्रिय अधिक बलशाली,पोरुषवान होते थे तथा वर्ण-व्यवस्था के अनुसार भी किसी आपदा के समय रक्षा करना उनका कर्तव्य होता था .... मुस्लिमो द्वारा सरलहदय हिन्दुओ पर आक्रमण किए गए .....
भारत माता की कुलवधुओ के ,ललनाओ के ,हिन्दुओ की माँ बहनो के बलात्कार किए गए खुली सड़कों पर .... कुछ कन्याओ को उठाकर ले जाते थे ताकि उनके बलात्कार के घिनोने कृत्य को विश्राम न मिल पाये .... खाद्य-पदार्थ की तरह देवियो को मिल-बांटकर भोगा जाता था ...


हजारों क्षत्राणिय अपने शील सम्मान एवं सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि कुंडो में कूँद पड़ती थी .... हिन्दुओ को इस्लाम अपनाने के लिए घोर ,अमानुषीय यातनाए दी जाती थी .... जो लोग टूट जाते थे वे मुस्लिम बनकर मोहम्म्द की औलादों के सिपाही बन जाते थे .... और सनातन धर्म के शत्रु ....इन आक्रांताओ द्वारा आक्रमण के पश्चात हिन्दुओ के साथ क्या किया जाता था इसे देखिये

- जो वीर अपनी आन ,मान ,धर्म को न त्यागकर इस्लाम को ठुकरा देते थे ...उन्हे बड़ी ही बेरहमी से मृत्यु दे दी जाती थी वो घृणित अधर्म को स्वीकार न कर मोक्ष के अधिकारी हुये .... दूसरे दोगले हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर इन आक्रमणकारियों के साथ मिल जाते थे और हिन्दू कन्याओ को उठवाने तथा हिन्दुओ को कटवाने में इनका सहयोग करते थे...... और सबसे मार्मिक व्यथा घटित होती थी उन असहाय बेबस लाचार हिन्दू वीरो के आगे जो कि इन मुस्लिम आक्रांताओ द्वारा कैद कर लिए जाते थे ...धर्म परिवर्तन न करने पर अडिग रहने के कारण मुस्लिमो द्वारा उनके समक्ष घृणित प्रस्ताव पेश कर दिया जाता कि उन्हे अपने परिवार सहित केवल मुस्लिमो के मल,विष्ठा आदि उठाने का कार्या ही करना पड़ेगा.... क्यो कि इन लाचार हिन्दू वीरो के ऊपर अपने परिवार की रक्षा का दायित्व भी था ...इसलिए विष का घूट पी इसे अपनी नियति मानते हुये और राम पर भरोसा रखते हुये इनहोने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया ..
.कुछ पीढ़िया गुजरने के पश्चात मुस्लिम दुष्टो की देखादेखी अधिकांशतः मूर्ख हिन्दुओ को भी घर के भीतर शौच करना सुविधाजनक लगने लगा ... जिसके फलस्वरूप वो वीर हिन्दू मुस्लिमो के साथ साथ हिन्दुओ के घरो से भी विष्ठा उठाने लगे .... इस प्रकार समाज की रक्षा करने वाले वीर क्षत्रिय ही मुस्लिम आक्रमणकारियो के घ्राणित दुश्चक्र के फलस्वरूप हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजो के लिए अछूत बन गए ... इसका एक प्रमाण ये भी है कि .... गोत्र जो आजकल दलित बंधुओ द्वारा प्रयुक्त किए जाते है .... वो प्रारम्भ से ही क्षत्रियो में भी मिलते है जैसे कि चंदेल, चौहान, कटारिया, कश्यप, मालवण, नाहर, कुंगर, धालीवाल, माधवानी, मुदई, भाटी, सिसोदिया, दहिया, चोपड़ा, राठौर, सेंगर, टांक, तोमर और भी बहुत है .... इससे ये सिद्ध हो जाता है कि ये सभी बंधु एक ही वंशावली से जुड़े है ...
ये दलित बंधु वही वीर हिन्दू है जिंहोने धर्म की खातिर ,धर्म रक्षा के लिए पल पल अपमानित होना स्वीकार कर लिया था ... अगर ये भी अन्य दोगले हिन्दुओ की तरह मुस्लिम आक्रांताओ से मिल जाते तो धर्म और हिन्दू समाज की क्या स्थिति होती ? इनका ये त्याग भीष्म,दधीचि आदि से बिलकुल कम नहीं है ....






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