Friday, 6 November 2015

मोदी सरकार के विरुद्ध एक खतरनाक अभियान।

पिछले कई सप्ताह से कुछ घटनाओं को आधार बनाकर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की "बढ़ती असहिषुणता" और "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा" जैसे फैशनेबल मुद्दों पर आलोचना की जा रही है। विरोध करने वाले इस कुनबे में कई लेखक, साहित्यकार और फ़िल्मकार शामिल हैं। यहाँ ये बात गौरतलब है कि सभी विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों में कई बातें सामान हैं जैसे कि अफजल गुरु, याकूब मेनन की दया याचिका पर इनके हस्ताक्षर हैं, श्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते उन्हें अमेरिका का वीसा न मिलने की मांग हेतु अमेरिकी राष्ट्रपति को लिखे पत्र में इनके हस्ताक्षर हैं या फिर इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के NGO हैं जिन्हे फोर्ड फाउंडेशन या ग्रीनपीस जैसी संस्थाओं से राष्ट्रविरोधी कृत्यों के लिए मोटा चंदा प्राप्त होता है। इन "बुद्धिजीवियों" द्वारा पुरस्कार-सम्मान लौटाए जाने का जो खेल खेला जा रहा है वह पूर्ण रूपेण राजनैतिक और प्रधानमंत्री के प्रति द्वेषपूर्ण है। यह गुट 16 मई  2014 के बाद से ही बेचैन है कि उन्होंने जिस व्यक्ति को लगातार 13 साल तक कोसा वह आज देश का प्रधानमंत्री कैसे बन गया। इन "बुद्धजीवियों" के साथ-साथ सेक्युलर राजनीतिज्ञों, मीडिया के वर्ग और मूडीज जैसी अवयस्क संस्थाओं द्वारा ऐसा दुष्प्रचार किया जा रहा है कि पिछले डेढ़ सालों में भारत में बढ़ती असहिष्णुता के कारण अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न हो रहा है और ये परिस्थितियां यूरोप और और अरब देशों के निवेशकों को आकर्षित करने करने की भारत की संभावनाओं पर असर डालेंगी। 
                  देश में पिछले कुछ महीनों में कई ऐसी घटनाएँ घटीं जो दुर्भाग्यपूर्ण हैं, भले ही वो किसी भी समुदाय से सम्बंधित हों। दादरी की घटना भी उतनी ही निंदनीय ही जितनी कर्नाटक में प्रशांत पुजारी की हत्या की घटना। कुछ महीने पहले दिल्ली के चर्च में पत्थर फेंकने की घटना और पश्चिम बंगाल में नन के साथ रेप की घटना पर सेक्युलर जमात द्वारा अतिसंयोक्तिपूर्ण ढंग से शोर मचाया गया और मीडिया के अधिकांश वर्ग का उन्हें समर्थन मिला। इन घटनाओं के अन्तर्राष्टीयकरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है जैसा कि उत्तर प्रदेश के एक मंत्री द्वारा देश में मुसलमानों के हालात पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव को पत्र लिखा गया। भारतीय संविधान द्वारा देश में शासन का संघीय ढांचा है जिसके अनुसार कानून व्यवस्था राज्यों का अंग है। दादरी की घटना समाजवादी पार्टी शासित उत्तर प्रदेश में घटित हुयी, कुलबर्गी और प्रशांत पुजारी की हत्या कांग्रेस शासित कर्नाटक में हुयी, दाभोलकर की हत्या महाराष्ट्र में कांग्रेस शासन के दौरान हुयी थी। पानसरे जिनकी हत्या जनवरी 2015 में हुयी, वो अंधश्रद्धा निर्मूलन के साथ-साथ टोल-टैक्स माफियाओं के भी विरुद्ध आंदोलन चला रहे थे, इस प्रकार उनकी हत्या में पूर्ण रूपेण किसी दक्षिणपंथी संगठन को दोषी ठहराना अनुचित है। चूँकि अधिकांश घटनाएँ गैर-भाजपा शासित राज्यों में घटित हुयी थीं तो तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा उन राज्य सरकारों पर सवाल न उठाकर उल्टा केंद्र सरकार पर असहिष्णु होने का आरोप लगा दिया गया परन्तु भाजपा शासित राज्य हरियाणा में दो दलित बालकों के आग में जिन्दा जलने पर सेक्युलर ब्रिगेड को अचानक याद आ गया कि कानून व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी है और बिना जाँच रिपोर्ट का इंतजार किये हरियाणा सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए सवर्ण समुदाय को दोषी ठहराकर समाज में जातिगत द्वेष फैलाया गया। फॉरेंसिक रिपोर्ट आने पर यह बात प्रमाणित हुयी कि दलित परिवार के घर में आग अंदर से लगी थी परन्तु तब तक मीडिया और सेक्युलर मंडली समाज में वैमनस्तता फ़ैलाने के अपने उद्देश्य में सफल हो चुकी थी। 
                  "बुद्धिजीवियों" और वामपंथ की परिभाषा के अनुसार- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल उसी को है जो वामपंथी-सेक्युलर अथवा मुल्लावाद की बात करे, यदि हिन्दुओं ने प्रतिकार किया तो उसे असहिष्णुता का नाम दे दिया जायेगा। वामपंथ के अनुसार स्वस्थ संवाद केवल तभी तक संभव है जब तक हिन्दू संस्कृति, देवी-देवताओं,परम्पराओं को गाली देने की छूट हो, अरबी-फ़ारसी की बात करना सेक्युलरिज्म है परन्तु संस्कृत भाषा की पैरोकारी घोर सांप्रदायिकता फैलाना है।
                   सेक्युलर वामपंथियों का यह पैटर्न नया नहीं है। कथित असहिष्णु नरेंद्र मोदी को विशाल ह्रदय वाले अटल बिहारी बाजपेई के खिलाफ खड़ा करना एक फैशन बन गया है। जिन लोगों की याददाश्त अच्छी है उन्हें याद होगा कि जो ताकतें आज यह दुष्प्रचार कर रही हैं कि हिन्दू फांसीवाद आने वाला है वही अटल बिहारी बाजपेई के शासनकाल में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी व आदिवासियों के धर्मान्तरण कार्य में लिप्त ग्राहम स्टेंस की उड़ीसा में  हत्या करने वाले लोगों को कथित रूप से प्रोत्साहित करने के लिए बाजपेई के पीछे पड़ी थीं। तब भी यही कहा गया था कि किसी भी ऐसी गठबंधन की सरकार जिसमें जिसमें भाजपा के पास नेतृत्व हो, में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं रहेंगे। यह आज के भारत  दोहराया जा रहा है। हिन्दू असहिष्णुता का आरोप एक बड़ी योजना का हिस्सा है। इस योजना का लक्ष्य यह साबित करना है कि मोदी सरकार का एक छिपा हुआ एजेंडा है। "बुद्धिजीवियों" के इस अभियान का उद्देश्य अंतराष्ट्रीय जगत में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बढ़ाई गयी भारत की साख को गिराना और भारत के सोशल रिकॉर्ड पर दाग लगाना भी है। सेक्युलर जमात द्वारा प्रारम्भ की गयी ये मनोवैज्ञानिक लड़ाई इस सोंच पर आधारित है कि मोदी सरकार की छवि ख़राब करने के लिए सब कुछ किया जाना चाहिए, इसमें प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस और उसके बामपंथी स्लीपर सेल का हाँथ है जिसे विगत 65 वर्षों के कांग्रेस शासन के दौरान पल्लवित-पोषित किया गया। स्वतंत्रता के बाद छः दशकों तक अधिकांश रूप से कांग्रेस और विशेषतः नेहरू-गांधी परिवार का शासन देश पर रहा। प्रशासनिक क्षेत्र में जहाँ कांग्रेस का नियंत्रण रहा और बौद्धिक,अकादमिक प्रतिष्ठानों पर नेहरू के समय से ही वामपंथियों को नियंत्रण प्रदान किया गया जिसके एवज में वामपंथियों द्वारा कांग्रेस का निर्विरोध समर्थन होता रहा। वामपंथियों को चुनाव में कभी पुरे देश में समर्थन नहीं मिला परन्तु कला, संस्कृति और अकादमिक संस्थानों में उन्हें पक्की जगह मिल गयी। मोदी सरकार के महीने बीतने के साथ-साथ कांग्रेस और वामपंथी शनैः-शनैः अपनी आशा खोते जा रहे हैं और उन्हें अपना भविष्य अंधकारपूर्ण नजर आ रहा है। जिसके परिणामस्वरूप ये अपनी गन्दी हरकतों से देश की जनता द्वारा प्रचंड बहुमत से चुनी हुयी  सरकार को गिराने और अंतराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने का षड्यंत्र कर रहे हैं। 1998 से 2004 के बींच अटल बिहारी बाजपेई के नेतृत्व में रही भाजपा सरकार के समय भी इसी प्रकार की परिस्थितियां उत्पन्न की गयी थीं जब मध्य प्रदेश के झबुआ जिले में तीन ईसाई ननों के रेप के मामले में बाजपेई सरकार की छवि को प्रभावित किया गया था। परन्तु बाद में हुयी जाँच से पता चला कि ये घटना 24 पियक्कड़ अपराधियों द्वारा अंजाम दी गयी थी जिसमें से 12 ईसाई और 12 भील जनजातीय थे। नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री रहते जो कुछ हो रहा है वह अटल बिहारी बाजपेई के सत्ता में होने के समय हुयी घटनाओं का पुनर्प्रदर्शन है। मीडिया और सेक्युलर समुदाय मोदी जी के विरोध में वही कर रहा है जो उन्होंने 15 वर्ष पूर्व बाजपेई जी के समय में किया था। 
                 आज भारत में "असहिष्णुता" का हवाला देकर पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों, लेखकों व कलाकारों ने 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गए आपातकाल का समर्थन किया था। अधिकांश सेक्युलर नेता, मीडिया और बुद्धिजीवी भी उनके साथ थे। बामपंथी धड़े के "प्रगतिशील पत्रकार संघ" नें आपातकाल का समर्थन किया था। आपात्कालीन परिस्थितियों में 34 बुद्धिजीवियों ने साहित्य अकादमी पुरस्कारों के सम्मान को स्वीकार किया था उनमें से दो- सर्वपल्ली गोपाल और भीष्म साहनी धर्मनिरपेक्षता की मूर्ति थे। गुलाम नबी ख्याल जिन्हे आपातकाल के समय पुरस्कार मिला था अब उसे फासिज्म के उत्पन्न होने के विरोध में लौटाया है। पिछले महीने ईरानी फिल्म निर्देशक माजिद मजिदी, पैगम्बर मुहम्मद पर अपनी एक फिल्म के प्रचार के लिए भारत आये थे। इस फिल्म में ए आर रहमान नें संगीत दिया है लेकिन दोनों का समूचे मौलवियों और इस्लाम के ठेकेदारों द्वारा प्रतिकार किया गया तब किसी ने भी किसी कोने से इस असहिष्णु कृत्य के विरोध में आवाज नहीं सुनी। तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की झंडाबरदार यह सेक्युलर मण्डली कहाँ थी? 
                 संप्रग शासन के समय ईसाई धर्म प्रचारकों के कार्यों में पूर्ण छूट थी। दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर ईसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासी हिन्दुओं का धर्मान्तरण किया गया। इसके फलवरूप सामाजिक तनाव फैलाव और लोगों के बीच अशांति फैली। मोदी सरकार द्वारा विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले लगभग 15,000 NGO के FCRA लाइसेंस रद्द करने और विदेशी सहायता पर्याप्त करने पर कड़ी निगरानी करने पर सेक्युलर मिडिया, NGO गिरोह में बेचैनी है और वे इसका बदला सरकार के विरुद्ध असहिष्णुता का मिथ्या दुष्प्रचार करके ले रहे हैं। "बुद्धिजीवियों" के मिथ्या दुष्प्रचार का कई अन्य साहित्यकारों, लेखकों और कलाकारों द्वारा विरोध भी किया जा रहा है। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ हर दिन कहीं न कहीं कोई घटना घटित  होती रहती है और हर एक घटना पर प्रधानमंत्री को दोषी ठहराकर उनकी प्रतिक्रिया की मांग करना अनुचित है। सेक्युलर जमात द्वारा प्रधानमंत्री का एकपक्षीय विरोध करके अपने ही द्वेषपूर्ण एजेंडे को उघाड़ दिया गया है जिसकी कलई दिन पर दिन देश की जनता के सामने खुल रही है।       
                  

Friday, 9 October 2015

भारत में अलगाववादी प्रवत्ति की पृष्ठभूमि का पुनरावलोकन|


उत्तर प्रदेश के दादरी के पास बिसहाड़ा गांव में कथित रूप से गाय की हत्या के बाद उपजे असंतोष के फलस्वरूप ग्रामीणों ने समुदाय विशेष के एक पिता-पुत्र की पिटाई कर दी जिसमें पिता की मृत्यु हो गयी और पुत्र गंभीर रूप से घायल हो गया। भारत में गौहत्या का पुराना इतिहास रहा है । मुगलकाल से ही मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दुओं को नीचा दिखने और उनपर बलपूर्वक अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए हथियार के तौर पर गौहत्या का उपयोग होता रहा है, जबकि धार्मिक दृष्टि से इस्लामिक पुस्तकों में कहीं पर भी गाय खाने का जिक्र नहीं हैं। वर्त्तमान में भारत के मुस्लमान चूँकि स्वयं को मुस्लिम आक्रमणकारियों के असली वंशज और सच्चा प्रतिनिधि मानते हैं इसलिए वे उनके अनैतिक कार्यकलापों को भी दोहराते हुए बहुसंख्यकों को नीचा दिखाने का प्रयास करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। जिन्हे आजकल 'खाने के अधिकार' या 'खाने की स्वतंत्रता' के नाम पर कुछ छद्मसेक्युलरिस्टों और घोर हिन्दू विरोधी वामपंथियों का प्रखर समर्थन मिलता है।इन सेक्युलरिस्टों और वामपंथियों का मुख्य उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण हिन्दू संस्कृति, भारतीय मान्यताओं व परम्पराओं पर कुठाराघात करके विदेशी आयातित संस्कृति को ऊँचा दिखाना होता है। 

           1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर के समय ही भारत के मुसलमानों में अपने पूर्वजों के इस्लामिक शासन के स्वर्णिम अतीत को पुनर्स्थापित करने की ललक रही है और वे उसी शासनकाल के आधार पर स्वयं को हिन्दुओं से श्रेष्ठ समझने का प्रयास करते हैं। मुस्लिमों की इसी प्रवत्ति का फायदा अंग्रेजों ने उठाया और उनके बीच अलगाववाद की आग को हवा दी। इसी अलगाववाद की प्रवत्ति के चलते और अपनी इस्लामिक विरासत को समृद्ध करने और आगे बढ़ाने की महत्वाकांक्षा के फलस्वरूप सन 1877 में सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की जिसने पाकिस्तान आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी, फिर उसी कड़ी में आगे 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की गयी। 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना के बाद सर सैयद ने मुसलमानों को आदेश दिया कि वे कांग्रेस में सम्मिलित हों। अपने इस आदेश के समर्थन में उन्होंने 28 दिसंबर 1887 को लखनऊ में, 14 मार्च 1888 को मेरठ में दिए भाषण में कहा- "भारत में एक नहीं, दो राष्ट्र हैं, जो इंग्लैंड और स्काटलैंड के समान घुल मिलकर एक नहीं हुए हैं। अगर अंग्रेज गये तो सत्ता की खाली कुर्सी पर कौन बैठेगा? दोनों तो नहीं बैठ सकते। कौन बैठे इसका फैसला कैसे होगा?"पाकिस्तानी विश्वविद्यालयों में मान्यता प्राप्त "ए शार्ट हिस्ट्री आफ पाकिस्तान" के खंड 4 के नौवे अध्याय में मुस्लिम राष्ट्रवाद का आरंभ बिन्दु 1857 के युद्ध में असफलता की प्रतिक्रिया को बताया गया है। इस अध्याय में बहुत विस्तार से बताया गया है कि भावी खतरे को सबसे पहले सैयद अहमद खान ने पहचाना। मुसलमानों के प्रति ब्रिाटिश आक्रोश को कम करने और ब्रिाटिश सरकार व मुसलमानों के बीच सहयोग का पुल बनाने के लिए उन्होंने योजनाबद्ध प्रयास आरंभ किया। ब्रिाटिश आक्रोश को कम करने के लिए उन्होंने 1858 में "रिसाला अस बाब-ए-बगावत ए हिंद" (भारतीय विद्रोह की कारण मीमांसा) शीर्षक पुस्तिका लिखी, जिसमें उन्होंने प्रमाणित करने की कोशिश की कि इस क्रांति के लिए मुसलामन नहीं, हिन्दू जिम्मेदार थे। सर सैयद की इसी विचारधारा का प्रवाह सैयद से जिन्ना तक निरंतर बहता रहा। यही विचारधारा 16 अगस्त 1945 को कोलकाता की खूनी "सीधी कार्रवाई" और 5 मार्च 1947 को रावलपिंडी के नरमेध के रूप में हमारे सामने आई।

              अलगाववाद की प्रवत्ति और द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मानने वालों के चलते धर्म आधार पर जिन्ना के नेतृत्व में अलग देश पाकिस्तान का निर्माण हुआ काफी संख्या में मुसलमानों ने भारत में ही रहना स्वीकार किया। कई दशकों से संविधान द्वारा प्रदत्त विशेष अधिकारों का उपयोग करने के बाद भी उन्होंने परष्पर भाईचारा के सिद्धांत को मानने से इंकार कर दिया है जो कि संविधान की प्रस्तावना का भाग है। मुसलमान किसी भी भौगोलिक राष्ट्रीयता को नहीं मानता और वे यह स्वीकार करते हैं हैं कि वे मुस्लिम पहले हैं और भारतीय बाद में। भारत के संविधान निर्माताओं द्वारा भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने और सभी धर्मों को सामान अधिकार देने के बाद अल्पसंख्यकों को कुछ विशेष अधिकार भी दिए गए। 1969 में मुस्लिम लीग के दबाव में केरल में मालापुरम के मुस्लिम बहुल इलाकों को कुछ अन्य जिलों की भौगोलिक सीमाओं का पुनर्गठन कर मज़हबी आधार पर एक नया जिला बनाया गया।

               स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में देश में अल्पसंख्यकवाद के नाम पर एक मुस्लिम वोटबैंक का निर्माण हुआ जिसके प्रलोभन में समस्त राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं ने अपने चुनावी घोषणापत्रों और योजनाओं को उनके अनुरूप बनाया। मोरारजी देसाई के शासनकाल में 'अल्पसंख्यक आयोग' का निर्माण हुआ और 17 मई 1992 को कांग्रेस शासन के दौरान संसद ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक एक्ट पारित करके इसे संवैधानिक रूप दे दिया गया। अल्पसंख्यक वोटबैंक की राजनीति के चलते 1991 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और जनता दल नें अल्पसंख़्यकों के लिए सरकारी सेवाओं और सशस्त्र सेनाओं में आरक्षण का वादा किया। मुस्लिमों के लिए 9 प्रतिशत आरक्षण की बात को 2004 चुनाओं में अटल बिहारी बाजपेई द्वारा उठाया गया और उसके एवज में बुखारी ने उनका समर्थन करने की घोषणा की।
         
                   संविधान के नीति निर्देशक तहत अनुच्छेद 44 में वर्णित 'समान नागरिक संहिता' के प्रस्ताव का केवल मुस्लिम ही नहीं अपितु इसे भी विरोध करते हैं और पारिवारिक मामलों हेतु क्रमशः शरीयत आधारित 'मुस्लिम पर्सनल कानून' और 'कैनन ला' का अनुपालन करते हैं। अनुच्छेद 44 का उद्देश्य देश में भाईचारा, एकता और अखंडता की स्थापना करना है जो कि न केवल संविधान की प्रस्तावना में प्रस्तावना में प्रतिस्थापित है बल्कि अनुच्छेद 51(A ) के तहत मूल कर्तव्यों में भी इनका समर्थन किया गया है। अनुच्छेद 44 में वर्णित 'समान नागरिक संहिता' का किसी भी व्यक्ति द्वारा विरोध अनुच्छेद 51(A) में वर्णित नागरिकों के मूल कर्तव्यों का उल्लंघन हैं और यदि सरकार भी ऐसा आचरण करती है तो वह भी संविधान के उल्लंघन की जिम्मेदार है।
             
               वोटबैंक की राजनीति के चलते विभिन्न पार्टियों द्वारा सेक्युलरिज्म के नाम पर मुस्लिमों के तुष्टिकरण की नीति अपनाई गयी है फिर भी उनकी मांगें सुरसा के मुख की तरह लगातार बढ़ती ही जा रही हैं। 1955 में नेहरू द्वारा केवल हिन्दुओं के पारिवारिक और उत्तराधिकार मामलों के लिए 'हिन्दू कोड बिल' का निर्माण किया गया परन्तु डा. अम्बेडकर जी की 'समान नागरिक संहिता' की मांग को नेहरू द्वारा यह कहकर ठुकरा दिया गया कि अभी इसे लागू करने का उचित समय नहीं आया है। नेहरू की परिपाटी पर चलते हुए राजीव गांधी नें 'शाहबानो' के ग़ुजराभत्ता मामले में सर्वोच्च न्यायलय के फैसले को पलटकर देश के एक संप्रदाय की अलगाववादी प्रवत्ति के सामने घुटने टेक दिए गए और उसे संरक्षण प्रदान किया गया। स्वतन्त्र भारत के इतिहास में इस प्रकरण के बाद पहली बार अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकों के लिए राज्य द्वारा अपनाये जा रहे अलग-अलग रवैये के फलस्वरूप उनके बीच की खाई और चौड़ी हो गयी और सेक्युलरिज्म ने नाम पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण करने की नीतियों को प्रश्रय मिला। इसी कड़ी में नए आयाम जोड़ते हुए कई सरकारों ने बहुसंख्यकों की भावनाओं का अनादर करते हुए ऐसे कई फैसले लिए गए जिन्होंने अल्पसंख्यकों की उन्मादी विचारधारा को खाद-पानी प्रदान किया। 2002 में टीएमए पाई फाउंडेशन बनाम यूनियन ऑफ़ इन्डिया के मामले में सर्वोच्च न्यायलय नें बहुसंख्यकों को भी अनुछेद 19(1)(g) में प्रदत्त व्यवसाय के अधिकार के तहत शिक्षण संस्थानों की स्थापना और सञ्चालन का अधिकार दे दिया परन्तु उसके बाद 2005 में यूपीए सरकार ने 93वां संविधान संसोधन करके देश के सभी शिक्षण संस्थानों में हस्तक्षेप और उनके बारे में नियम बनाने व सामाजिक ,आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू करने का अधिकार प्राप्त कर लिया और अल्पसंख्यक शिक्षण शिक्षा संस्थानों चाहे वो राज्य द्वारा वित्तपोषित भी हों उन्हे आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया जो संविधान में प्रदत्त नागरिकों के मूल अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।

                 भारत में छह सौ सालों के इस्लामिक शासन और स्वतंत्रता के बाद किये गए तुष्टिकरण के फलस्वरूप मुस्लिमों के मन ऐसी विघटनकारी प्रवत्ति विकसित हो चुकी है जो कि बहुसंख्यकों के साथ किसी भी प्रकार का सामंजस्य बिठा पाने की स्थिति में है। अगर कही पर भी मुस्लिमों द्वारा भाईचारा या सहिष्णुणता का प्रदर्शन होता है तो या तो उनकी व्यापारिक मजबूरियां होती हैं या उनकी संख्या दस फीसदी से कम होती है। अल्पसंख्यकों द्वारा भारत को बिना पितृभूमि और पुण्यभूमि माने अलगाववाद की प्रवत्ति का नाश होना असंभव है। जब तक वोटबैंक की राजनीति के चलते अल्पसंख्यक समुदाय के तुष्टीकरण का कार्य चलेगा तब तक भारतीय समाज में स्थाई शांति, स्थिरता और बंधुत्व की भावना का पनपना मुश्किल है। 

Monday, 24 August 2015

संविधान का अनुच्छेद 30- हिन्दुओं के साथ का प्रत्यक्ष भेदभाव।

एक संदिग्ध अवधारणा- 'अल्पसंख्यकों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रबंधन', जिसका अनुमोदन विभाजन के समय 'चिंतित' मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के लिये सद्भावपूर्ण द्वष्टि से किया गया था, उसने आज भारत में ऐसी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि ये हिन्दुओं के साथ असमानता और भेदभाव का मुख्य का कारण  बन गया है। 
सविधान का अनुच्छेद-30 दो प्रकार के अल्पसंख्यकों को  परिभाषित करता है- भाषाई और धार्मिक। सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय के अनुसार 'अल्पसंख्यक कौन है' इसका निर्णय लिए राज्य भौगोलिक इकाई होगा(न कि अखिल भारत) जिसकी जनसंख्या के आधार पर वहां के अल्पसंख्यकों व बहुसंख्यकों का निर्धारण होगा। इनके बीच सविधान और न्यायलय नें ऐसे दुराग्रही परिणाम सुनिश्चित किये कि अब प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान 'अल्पसंख्यक संस्थान' का दर्जा चाहता है जिससे कि वह राज्य के हस्ताक्षेप से कुछ हद तक स्वाययत्तता पा सके, जिसके कुछ असंगत व विकृत परिणाम इस प्रकार हैं-

1. यदि आप तेलगू संस्थान हैं तो आपके पास आंध्र प्रदेश में  स्वाययत्तता नहीं है तो राज्य के हस्तक्षेप से बचने के लिए सर्वश्रेष्ठ रास्ता है कि इसे दिल्ली या गुजरात में स्थापित करें। गुजरती संस्थान महाराष्ट्र में और मराठी संस्थान कर्नाटक में अधिक खुश रहेगा। संक्षेप में, एक सही अवस्थिति के साथ कोई भी संस्थान स्वयं को अल्पसंक्यक घोषित कर सकता है, इसी ने वास्तव में कानून का मज़ाक बना दिया है।
2. अल्पसंख़्यकों को बिना किसी सुनिश्चित  संख्याबल के निर्देश के निर्धारित किया गया है और संविधान  में कहीं पर भी परिभाषित नहीं  किया गया है। क्या पारसी अल्पसंख्यक हैं? निश्चित रूप से क्यूंकि उनकी संख्या कुछ हजार में हैं। क्या मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं? जबकि देश में उनकी संख्या 25 करोड़ के आसपास है जो कि भारत को विश्व में दूसरा सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश बनाता है? मौलाना अबुल कलाम आज़ाद मुस्लिमों को अल्पसंख्यक नहीं मानते थे, उन्होंने मुस्लिमों को भारत का दूसरा बहुसंक्यक कहा था। 

3. चूँकि राज्य अल्पसंख्यक संस्थानों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता परन्तु बहुसंक्यक संस्थानों में कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप सभी बहुसंख्यक संस्थान राजनेताओं और नौकरशाहों का आसान शिकार बन गए हैं। इस प्रकार से कुछ दक्षिणी राज्यों में मन्दिरों का धन राज्य के खजाने के साथ मिला दिया गया है, जबकि वह धन राज्य से सम्बद्ध नहीं है। 
           भारत का सबसे धनी  मंदिर 'तिरुमाला  देवस्थानम' जिसके पास दस हजार करोड़ रुपये नकद है और सालाना 600 करोड़ रुपये का चढ़ावा आता है, इसका संचालन श्रद्धालुओं द्वारा नहीं बल्कि आंध्र सरकार के मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा किया जाता है। 
अनुच्छेद 30 का उद्देश्य अब लोगों द्वारा अपनी इच्छा के संस्थानों के प्रबंधन करने के अधिकार से होकर प्रायः बहुसंख्य्कों द्वारा वही विकल्प अपनाने से रोकना हो गया है। 
2002 में सर्वोच्च न्यायलय की 11 जजों के बेंच  द्वारा टीएमए पाई फाउंडेशन मामले में अनुच्छेद 19-1(g) के तहत  गैर-अल्पसंख़्यक शैक्षणिक संस्थानों को भी अल्पसंख़्यक संस्थानों के सामान अधिकार दिए गए परन्तु कांग्रेस सरकार द्वारा 2005 में किये गए 93वें संविधान संसोधन द्वारा एक अनुच्छेद 15(5) जोड़कर अल्पसंख़्यक संस्थानों को राज्य के किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से बाहर कर दिया गया। 
अनुच्छेद -30 के अनुसार- "अल्पसंख्यकों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना व प्रबंधन का अधिकार"
(i) सभी अल्पसंख्यक(धार्मिक व भाषाई) को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना व प्रबंधन का अधिकार होगा। 
(ii) राज्य शैक्षणिक संस्थानों को वित्तीय सहायता देने में इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि इसका प्रबंधन अल्पसंख़्यकों द्वारा किया जा रहा है, चाहे वो धार्मिक हो या भाषाई। 
        अनुच्छेद 30 का वास्तविक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव न हो और न ही उन्हें समान व्यवहार से वंचित किया जाये। परन्तु व्यवहारिक रूप से इसका तात्पर्य यह हो गया है कि गैर-अल्पसंख्यकों  को अपने हिसाब 'शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना  प्रबंधन' के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। 
         अनुच्छेद 30 और इससे सम्बंधित न्यायालयों के निर्णय जैसे कि सर्वोच्च न्यायलय द्वारा बिना सरकारी सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों में  'शिक्षा का अधिकार' के तहत गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से छूट  प्रदान की गयी। जिसे निरस्त करने या फिर से लिखने की आवश्यकता है।  2014 में मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा फेडरेशन कैथोलिक फेथफुल बनाम तमिल राज्य के मामले में सरकारी सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थान को भी आरक्षण से छूट प्रदान की गयी। 
           अनुच्छेद 30 को इस सामान्य का कारण  से निरस्त किया जा सकता है की अल्पसंख़्यकों द्वारा संस्थानों की स्थापना का अधिकार 'मानवाधिकार' और 'नागरिक अधिकार' के अंतर्गत पहले से ही समाहित हैं। चूँकि कोई भी भारतीय नागरिक कानून के दायरे में शैक्षणिक संस्थान स्थापित कर सकता है। स्वायत्तता का परिमाण राज्य द्वारा सहायता की मात्र पर निर्भर होना चाहिए।  
        यह भी महत्वपूर्ण ध्यान देने वाली बात है कि हिंदुत्व रूढ़िवादी नहीं है जिसे किसी परंपरागत धार्मिक सन्दर्भ की परिभाषा में बांधा जाये। भाषाई रूप से हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोली जाती है परन्तु अखिल भारत स्तर पर इसका भी बहुमत नहीं है। सांस्कृतिक दृष्टि से हम अल्पसंख़्यकों और विविधताओं वाले राष्ट्र हैं, हमें अल्पसंख़्यक अधिकारों से नहीं बल्कि सार्वभौमिक अधिकारों से संचालित होना चाहिए। 

Wednesday, 13 May 2015

अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के कारण भारत के विखंडन का प्रयास।

अल्पसंख्यक शब्द का अर्थ होता है कम संख्या में और संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा भी कुल जनसँख्या के 10 फीसदी वाले समुदाय को ही अल्पसंख्यक मानती है, लेकिन क्या भारतीय समाज के धार्मिक ताने-बाने में मुस्लिम समुदाय के लिए यह शब्द सटीक बैठता है? क्या वाकई भारत में जहां मुस्लिमों और अन्य धर्म के लोगों को अल्पसंख्यक माना जाता है, उन्हें अल्पसंख्यक कहना उचित है?
अल्‍पसंख्‍यक’ शब्‍द की परिभाषा हमारे  संविधान में नही हैं बेशक इसका विवरण संविधान की धाराओं में शामिल है पूर्व यूपीए नीत केंद्र सरकार ने यह स्वीकारोक्ति संसद में एक लिखित उत्तर में की हुई है।  तत्कालीन अल्‍पसंख्‍यक कार्य मंत्रालय राज्‍य मंत्री श्री निनॉन्‍ग ईरिंग ने एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया था कि भारतीय संविधान में ‘अल्‍पसंख्‍यक’ शब्‍द का विवरण धारा 29 से लेकर 30 तक और 350ए से लेकर 350बी तक शामिल है। इसकी परिभाषा कहीं भी नहीं दी गई है। भारतीय संविधान की धारा 29 में ‘अल्‍पसंख्‍यक’ शब्‍द को इसके सीमांतर शीर्षक में शामिल तो किया गया किंतु इसमें बताया गया है कि यह नागरिकों का वह हिस्‍सा है, जिसकी भाषा, लिपि अथवा संस्‍कृति भिन्‍न हो यह एक पूरा समुदाय हो सकता है, जिसे सामान्‍य रूप से एक अल्‍पसंख्‍यक अथवा एक बहुसंख्‍यक समुदाय के एक समूह के रूप में देखा जाता है।
भारतीय संविधान की धारा-30 में विशेष तौर पर अल्‍पसंख्‍यकों की दो श्रेणियों – धार्मिक और भाषायी, का उल्‍लेख किया गया है। शेष दो धाराएं – 350ए और 350बी केवल भाषायी अल्‍पसंख्‍यकों से ही संबंधित हैं।संविधान निर्माताओं को अल्पसंख्यक आयोग गठन की जरूरत नहीं महसूस हुई राजनीति को इसकी जरूरत थी, सो सरकार ने 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का कानून पारित करवाया ,इस कानून में भी अल्पसंख्यक की मजेदार परिभाषा है-
अल्पसंख्यक वह समुदाय है जो केंद्रीय सरकार अधिसूचित करे.
अर्थात अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार सरकार ने खुद अपने हाथ में ले लिया।  किसी जाति समूह को अनुसूचित जाति या जनजाति घोषित करने की विधि (अनु. 341 व 342) बड़ी जटिल है यह काम संसद ही कर सकती है लेकिन अल्पसंख्यक घोषित करने का काम सरकारी दफ्तर से ही होने का प्रावधान है। 
भारत सरकार द्वारा 23 अक्टूबर 1993 को अधिसूचना जारी कर अल्पसंख्यक समुदायों के तौर पर पांच धार्मिक समुदाय यथा मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध तथा पारसी समुदायों को अधिसूचित किया गया था।  2001 की जनगणना के अनुसार देश की जनसंख्या में पांच धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिशत 18.42 है फिर अचानक 27 जनवरी 2014 को केंद्र सरकार ने राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक आयोग कानून 1992 की धारा 2 के अनुच्‍छेद (ग) के अंतर्गत प्राप्‍त अधि‍कारों का उपयोग करते हुए, जैन समुदाय को भी अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के रूप में अधि‍सूचि‍त कर दि‍या।
वस्तुत: वोट और दल की जिस ब्रिटिश राजनीतिक प्रणाली को हमने अपनाया है, उसमें से भिन्न परिणाम निकलना ही नहीं था।  उस प्रणाली में से निकले राजनीतिक नेतृत्व का विघटनवाद और पृथकतावाद में निहित स्वार्थ पैदा हो गया है, उसी स्वार्थ को सामने रखकर सब संस्थाओं का निर्माण किया जा रहा है, उदाहरण के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नामक संस्था का विचार कीजिए इस आयोग की स्थापना जनता पार्टी के शासनकाल (1977-79) में हुई थी।  इस आयोग का मुख्य उद्देश्य था अल्पसंख्यक कहाने वाले वर्गों को क्रमश: एकात्म राष्ट्रीय समाज का अभिन्न अंग बनाना, पर उसने इस दायित्व को निभाने की बजाय अल्पसंख्यकवाद को और गहरा किया और  पृथकतावाद की दिशा में धकेला।  यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री आर.एस. लाहोटी ने एक निर्णय में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को भंग करने का सुझाव दिया था और वैसे भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना के बाद ही अल्पसंख्यक आयोग की संवैधानिक व कानूनी प्रासंगिकता ही समाप्त हो जाती है। हमारे संविधान के अनुसार देश की कुल जनसंख्या के 5 प्रतिशत से अधिक वाले समुदाय या वर्ग को अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता तो किस आधार पर हमारी सरकारें मुस्लिमों को अल्पसंख्यक मान उन्हें विशेष रियायत देती हैं?
यह मुद्दा सिर्फ मुस्लिम के साथ ही नहीं बौद्ध, ईसाई पर भी लागू होता है जिन्हें सरकार अल्पसंख्यक मानती है क्योंकि बौद्ध तो हिंदू धर्म अनुसार जातिप्रथा ढो रहे हैं और मनुवाद के नाम पर ब्राह्मणों, सवर्णों को विदेशी कह खुद को मूलनिवासी कह रहे हैं वहीं नेपाल खुद को बुद्ध की जन्मस्थली कह रहा है तो हम अब करें क्या?
मुसलमान, ईसाई, बौद्ध ये सारे मूलतः विदेशी लोग संविधान की नहीं बल्कि हमारी कमजोरियों का भी भरपूर फायदे ले रहे हैं।  यूँ 100 रू. का स्टांप पर शपथ घोषणापत्र में पूर्व धर्म हिंदू और हिंदू नाम ही लिखवा कर, लिखने व काम लेने की इजाजतें देकर न्यायालय, व्यवस्था और संविधान इन बौद्धों और विशेषकर 'नवबौद्धों' को पूर्ण रूप से अल्पसंख्यक भी नहीं बनने देता है और ना बहुसंख्यक ही रहने देता है क्योंकि इसका निर्धारण मतलबों आरक्षण तथा धार्मिक धोखाधड़ी के लिये किया जाता है। 
क्या इस देश में अब “अल्पसंख्यक” शब्दावली को बदलने की जरूरत है?

Friday, 8 May 2015

भारत में 200 वर्ष पहले आँखों की सर्जरी होती थी| Eye Surgery in India Two Centuries Ago.

भारत के दक्षिण में स्थित है तंजावूर. छत्रपति शिवाजी महाराज ने यहाँ सन 1675 में मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी तथा उनके भाई वेंकोजी को इसकी कमान सौंपी थी. तंजावूर में मराठा शासन लगभग अठारहवीं शताब्दी के अंत तक रहा. इसी दौरान एक विद्वान राजा हुए जिनका नाम था "राजा सरफोजी". इन्होंने भी इस कालखंड के एक टुकड़े 1798 से 1832 तक यहाँ शासन किया. राजा सरफोजी को "नयन रोग" विशेषज्ञ माना जाता था.  चेन्नई के प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सालय "शंकरा नेत्रालय" के नयन विशेषज्ञ चिकित्सकों एवं प्रयोगशाला सहायकों की एक टीम ने डॉक्टर आर नागस्वामी (जो तमिलनाडु सरकार के आर्कियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष तथा कांचीपुरम विवि के सेवानिवृत्त कुलपति थे) के साथ मिलकर राजा सरफोजी के वंशज श्री बाबा भोंसले से मिले. भोंसले साहब के पास राजा सरफोजी द्वारा उस जमाने में चिकित्सा किए गए रोगियों के पर्चे मिले जो हाथ से मोड़ी और प्राकृत भाषा में लिखे हुए थे. इन हस्तलिखित पर्चों को इन्डियन जर्नल ऑफ औप्थैल्मिक में प्रकाशित किया गया|


प्राप्त रिकॉर्ड के अनुसार राजा सरफोजी "धनवंतरी महल" के नाम से आँखों का अस्पताल चलाते थे जहाँ उनके सहायक एक अंग्रेज डॉक्टर मैक्बीन थे. शंकर नेत्रालय के निदेशक डॉक्टर ज्योतिर्मय बिस्वास ने बताया कि इस वर्ष दुबई में आयोजित विश्व औपथेल्मोलौजी अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हमने इसी विषय पर अपना रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया और विशेषज्ञों ने माना कि नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में सारा क्रेडिट अक्सर यूरोपीय चिकित्सकों को दे दिया जाता है जबकि भारत में उस काल में की जाने वाले आई-सर्जरी को कोई स्थान ही नहीं है|



डॉक्टर बिस्वास एवं शंकरा नेत्रालय चेन्नई की टीम ने मराठा शासक राजा सरफोजी के कालखंड की हस्तलिखित प्रतिलिपियों में पाँच वर्ष से साठ वर्ष के 44 मरीजों का स्पष्ट रिकॉर्ड प्राप्त किया. प्राप्त अंतिम रिकॉर्ड के अनुसार राजा सर्फोजी ने 9 सितम्बर 1827 को एक ऑपरेशन किया था, जिसमें किसी "विशिष्ट नीले रंग की गोली" का ज़िक्र है. इस विशिष्ट गोली का ज़िक्र इससे पहले भी कई बार आया हुआ है, परन्तु इस दवाई की संरचना एवं इसमें प्रयुक्त रसायनों के बारे में कोई नहीं जानता. राजा सरफोजी द्वारा आँखों के ऑपरेशन के बाद इस नीली गोली के चार डोज़ दिए जाने के सबूत भी मिलते हैं|

प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार ऑपरेशन में बेलाडोना पट्टी, मछली का तेल, चौक पावडर तथा पिपरमेंट के उपयोग का उल्लेख मिलता है. साथ ही जो मरीज उन दिनों ऑपरेशन के लिए राजी हो जाते थे, उन्हें ठीक होने के बाद प्रोत्साहन राशि एवं ईनाम के रूप में "पूरे दो रूपए" दिए जाते थे, जो उन दिनों भारी भरकम राशि मानी जाती थी|

Saturday, 10 January 2015

'पीके' का ईसाई सम्पर्क देने चला है हिन्दू धर्म को सीख|






'पीके' कोई ऐसी चलचित्र (मूवी) नहीं है जिसकी कहानी लिखी, कलाकार बुक किये, निर्देशन में एक्टिंग करवाई, समादित (एडिटिंग) किया, और रिलीज़ कर दिया| अपितु यह एक विवादास्पद मूवी है जिसने सीधे सीधे धार्मिक अधिकता एवं अन्धता को लक्षित किया है|

पहले यह जानते है कि आज के समय में एक सुपरहिट मूवी बनाने के लिए किन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है| एक बेहतरीन कहानी जिसमें सच्चाई भी हो, तड़का भी, और एक सामाजिक सन्देश भी| कहानी ऐसी होनी चाहिए जो देखे वो याद रखे| इसके अलावा किरदार को निभाने के लिए एक बेहतरीन सुपरस्टार कलाकार जो उस कहानी को फिल्म में जीवंत कर सके| पीके की कहानी कुछ ऐसे ही दो तथ्यों का शुद्ध मिश्रण है|


अब्राहम थॉमस कोवूर – पीके का प्रथम ईसाई संपर्क-
अब्राहम थॉमस कोवूर – एक ऐसा नाम जो जिसे सभी व्यक्तियों ने पहले कभी नहीं सुना होगा, मगर यह नाम पीके फिल्म बनाने वाले कलाकारों एवं निर्माताओं के लिए नया नहीं है| जानते हैं क्यूँ? क्यूंकि पीके के कहानी इन श्रीमान अब्राहम थॉमस कोवूर के जीवनचरित पर आधारित हैं| अब जानते हैं कि ये श्रीमान हैं कौन? अब्राहम थॉमस कोवूर एक थिरुवाल्ला, केरल के थॉमस क्रिस्चियन परिवार में जन्मे एक प्रोफेसर थे| इनका पूरा जीवन ईसाई धर्म की सेवा और विस्तार में अपना पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया था| सेवानिर्वित होने के बाद अब्राहम थॉमस कोवूर ने भारत तथा श्रीलंका के कई अन्धविश्वास फ़ैलाने वाले बाबाओं का पर्दाफ़ाश करना शुरू कर दिया था| मगर इन सभी में एक बात समान थी और वो यह कि सभी लक्षित बाबा लोग एक ही धर्म के थे, हाँ आप सही हैं| हिन्दू धर्म ही उनका एकमात्र लक्ष्य था तथा उनका मानना था कि यह धर्म मूर्तिपूजकों का है जो अन्धविश्वास और डर से उन देवताओं की पूजा करते हैं जो हैं ही नहीं| इन जनाब ने कुछ चुनातियाँ तैयार करी थी जिनको पूरा करने पर एक लाख श्रीलंकन रुपये का इनाम था| थॉमस कोवूर ने सत्य साईं बाबा, पन्दरिमलाई स्वमिगल, नीलकंठ तथाजी, महेश योगी, हज़रत अली आदि सभी मौजूदा सिद्ध योगियों को आमंत्रित किया था मगर आजतक उनकी चुनोतियाँ कोई पूरी नहीं कर सका| कोवूर ने कुछ किताबें भी लिखी जैसेकि बेगोने गॉडमेन, गोडस डेमन्स एंड स्पिरिट्स, तथा युक्तिचिंता| इन पुस्तकों के हिंदी तथा मलयालम सहित कई भाषाओँ में अनुवाद हुए| जिसने भी ये किताबें पढ़ी उनका एक ही लक्ष्य बन गया हिन्दू धर्म का विरोध| अब्राहम थॉमस कोवूर ने अपने जीवन, कार्यों, तथा किताबों से का उपयोग ईसाई धर्म धर्मांतरण में किया| प्रकाश सिंह बादल, पंजाब के 2008 में मुख्यमंत्री ने गोडस डेमन्स एंड स्पिरिट्स के पंजाबी अनुवाद को निषेध (बैन) कर दिया| इसका अनुवाद मेघ राज मित्र कर रहे थे| आप समझ सकते हैं कि अब्राहम थॉमस कोवूर के कार्य एवं किताबें कितनी विवादस्पद हैं| अब्राहम थॉमस कोवूर कि सितम्बर 1978 में मृत्यु के पश्चात् ईसाई धर्म के पैरोकार उनके कार्यों एवं साहित्य का इस्तेमाल ईसाई धर्मान्तरण में कर रहे हैं|
अब्राहम थॉमस कोवूर ने कुछ मुक़दमे भी थे तथा उनकी केस डायरी पर कुछ फ़िल्में भी बनीं थी जैसेकि ‘पुनर्जनम’ मलयालम फिल्म, ‘मरू पिरावी’ तमिल फिल्म, ‘निन्थाकथा’ तेलुगु फिल्म| और अब पीके जैसी विवादस्पद फिल्म इन्हीं कोवूर पर बनी है|
अन्य तथ्य
आमिर खान एक बेहतरीन सुपरस्टार हैं जिन्हें परफेक्शनिस्ट खान भी कहा जाता है| मगर क्या पीके जैसी फिल्म बिना किसी उच्च अधिकारी के हस्तक्षेप के बन सकती है| नहीं कतई नहीं क्यूंकि सेंसर बोर्ड के पास अधिकार होते हैं कि वो किसी विवादस्पद फिल्म को रोक सकें या उस फिल्म के विवादास्पद दृश्य काट सकें| पीके के रिलीज़ में यही मदद करी लीला सेमसन ने| यह जानने से पहले कि क्या किन्हीं और फिल्मों के दृश्य भी कटे हैं इससे पूर्व लीला सेमसन के जीवन परिचय पर थोडा प्रकाश डालते हैं|

लीला सेमसन – पीके का द्वितीय ईसाई संपर्क-

राजीव मल्होत्रा       अपनी पुस्तक ब्रेकिंग इंडिया (हिंदी में – भारत विखंडन) में पृष्ठ 143 पर लिखते हैं कि लीला सेमसन ने अपने कार्यकारी जीवन की शुरुआत भरतनाट्यम से की थी| उन्होंने रुक्मिणी देवी से नृत्य सिखा था|

रुक्मिणी देवी अरुंडेल का देश को योगदान-

रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने भरतनाट्यम के उत्थान में सर्वोपरि भूमिका निभाई थी| उनसे पहले भरतनाट्यम को तुच्छ दृष्टि से देखा जाता है| जॉर्ज अरुंडेल से विवाह के पश्चात उन्होंने भरतनाट्यम के क्षेत्र में कदम रखा और उस समय की प्रमुख कलाकार ई कृष्णा इयेर से नृत्य सिखा था| रुक्मिणी देवी ने निजी मंचों से बाहर निकलकर बरगद के पेड़ के नीचे अन्नत अंधकार के प्रतीक कपडे के सामने भरतनाट्यम करना आरम्भ किया| वो रुक्मिणी देवी अरुंडेल ही थीं जिन्होंने भरतनाट्यम में सर्वप्रथम पारंपरिक मंदिरों पर आधरित पारंपरिक वेशभूषा तथा देवियों जैसे आभूषणों का प्रयोग किया था| इतना ही नहीं भरतनाट्यम में हिन्दू धर्म को उतरने का श्रेय भी रुक्मिणी जी को ही जाता है| महर्षि वाल्मीकि जी की रामायण, जयदेव रचित ‘गीत गोविन्द’, कुमार संभवं, तथा उषा परिनायम से प्रेरणा लेकर उन्होंने भरतनाट्यम में सीता स्वंयवर, श्रीराम वन्गामनाम, पादुका पट्टाभिषेकम, शबरी मोक्षं, तथा अन्य नाटकों का मंचन किया| इन्होने ने ही जनवरी 1936 में अपने पति जॉर्ज अरुंडेल के साथ मिलकर कलाक्षेत्र की स्थापना की थी|

लीला सेमसन की लीलाएं-

ऐसे उज्जवल गुणों से परिपूर्ण रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने बाल्यकाल में उनके कलाक्षेत्र में प्रवेश पाने आई लीला सेमसन को प्रवेश देने से लगभग मना ही कर दिया था| कारण यह था कि भरतनाट्यम पूर्णरूपेण हिन्दू धर्म से ओतप्रोत है परन्तु दूसरी ओर लीला सेमसन पूर्ण तरह कैथोलिक क्रिस्चियन पृष्ठभूमि से आती थीं| पता नहीं, किस अनपेक्षित दबाव के कारण रुक्मिणी देवी को लीला सेमसन को अपने कलाक्षेत्र में प्रवेश देना पड़ा| समय के साथ लीला सेमसन ने काफी अच्छा भरतनाट्यम सिखा तथा अपनी मेहनत के परिणामस्वरूप लीला सेमसन को 2005 में कलाक्षेत्र का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था| इन लीला की लीला तो देखिये, शिव के नटराज रूप को पहले तो कलाक्षेत्र से हटाया फिर उसके बाद गणेश वंदना भी पूरी तरह से हटा दी गई| कलाक्षेत्र से भगवान् गणेश की कई मूर्तियाँ हटा दी गयीं थी| हिन्दू वोईस अख़बार के विरोध करने के बाद भगवान् गणेश की सिर्फ एक मूर्ति वहां रखी गयी थी| स्वयं श्री श्री रविशंकर जी ने इस बात का विरोध किया था|
इसके अलावा रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने नार्थाना विन्याकर के साथ मिलकर कलाक्षेत्र का जो प्रमाणपात्र बनवाया था उसमें भगवान् शिव का चित्र था जिन्हें लीला सेमसन ने हटवा दिया था| इसी तरह लीला ने कलाक्षेत्र के चिन्ह (लोगो) को भी बदल दिया और उसमें से भगवान् गणेश जी का चित्र हटा दिया था|


इतना ही नहीं लीला सेमसन शिव, पार्वती, गणेश, हनुमान आदि हिन्दू देवताओं की सुपरमैन, बैटमैन, कैटवुमन आदि काल्पनिक कलाकारों से करती थी तथा कहती थी कि भगवान् है ही नहीं| एक सुबह उन्होंने कलाक्षेत्र के विद्यार्थियों से कहा था कि वो मूर्तिपूजा ना करें क्यूंकि यह अन्धविश्वास है|

लीला सेमसन के अन्य योगदान-

सिर्फ धार्मिक विवाद ही नहीं अपितु जब कलाक्षेत्र के एक कर्मचारी टी थॉमस ने आर०टी०आई० दर्ज करी तो वितीय अनिमिताओं का भी खुलासा हुआ| लीला सेमसन ने 2011 में कथाम्ब्लम ऑडिटोरियम में आर्किटेक्चर और साउंड का 62 लाख का ठेका सभी नियमों को ना मानते हुए एक ठेकेदार को दिया तथा उसका कोई भी हिसाब किताब नहीं प्रस्तुत किया| इसी तरह लीला ने लगभग आठ करोड़ रुपये के ठेके नियमों की अवेहलना करते हुए दिए जिनका कोई भी उचित हिसाब किताब नहीं दिया गया था| इनके साथ ही विडियो बनाने का 3 करोड़ का ठेका एक निजी कंपनी मेसर्स मधु अम्बाट को दिया गया| भारत सरकार के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सी०ए०जी०) ने जांच में पाया कि विवादित कंपनी को ऐसे किसी भी काम का अनुभव नहीं है| सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा जाने के बाद लीला सेमसन को कलाक्षेत्र के निदेशक (डायरेक्टर) के पद से 2012 में इस्तीफा देना पड़ा परन्तु लीला 2014 तक संगीत नाटक एकादमी की अध्यक्ष बनी रहीं|
इसके साथ ही सी०ए०जी० रिपोर्ट ने उल्लेखित किया कि लीला ने आने सात साल के कार्यकाल में कलाक्षेत्र ऑडिटोरियम के मंदिर रूपी निर्माण को नवीनीकरण के नाम पर तुडवाया तथा दुबारा बनवाया जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी क्यूंकि पुराना भवन अत्यधिक मजबूत तथा नए ढांचे की अपेक्षा अधिक महतवपूर्ण था| इसके अलावा लीला ने 16 से अधिक पदों पर गलत नियुक्तियां की थीं एवं खुद लीला सेमसन ने खुद अपनी योग्यता के झूठे प्रमाणपत्र दिए थे|

लीला सेमसन का भरतनाट्यम को पुरस्कार-

आश्चर्यजनक बात यह है कि लीला सेमसन 1 अप्रैल 2011 से 2012 तक भारत में एक साथ तीन महत्तवपूर्ण संस्थाओं के डायरेक्टर के पद पर आसीन थीं – कलाक्षेत्र, संगीत नाटक अकादमी, और सेंसर बोर्ड| अभी भी वो सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा हैं और उनकी ईसाई समर्थक कार्यशैली किसी से छुपी नहीं है| आप पूछेंगे कि क्या नुकसान हुआ लीला सेमसन की वजह से? तो दो टूक सुनिए –
ईसाई पति के होने के बाद भी रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने भरतनाट्यम में निहित हिंदुत्व को अधिक बढ़ावा दिया था| परन्तु लीला सेमसन ने तो वह किया जो कोई अन्य ना कर सका| भगवे रूपी हिन्दू भरतनाट्यम को श्वेत वस्त्रधारी ईसाई बनाने में अपना योगदान दिया|
 पहले रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने श्रीराम, भगवान् शिव तथा माता पार्वती से जुड़ी कथाओं तथा भावभंगिमाओं को शामिल किया था परन्तु उनकी शिष्या लीला सेमसन ने भरतनाट्यम में इन सभी को हटाकर पहले तो भरतनाट्यम को तटस्थ किया था| इसके साथ ही भरतनाट्यम का ईसाई धर्मांतरण करने में लीला सेमसन का हाथ था| जैसेकि भरतनाट्यम में ईसाईयत मुद्राएँ जैसेकि जीसस का जन्म, जीसस का उदेश देना, जीसस का सलीब पर चढना, तथा जीसस का पुनः अवतरित होना|
जानते हैं कि लीला सेमसन ऐसा करने में कामयाब कैसे हुयी तथा कैसे झूठे दस्तावेजों एवं वितीय अनिमिताओं के बावजूद भी उन पर कोई कार्यवाही क्यूँ नहीं हुयी? क्यूंकि लीला सेमसन प्रियंका गाँधी वाड्रा की नृत्य अध्यापिका (डांस टीचर) थीं और उन पर श्रीमती सोनिया गाँधी का वरदहस्त का होना माना जाता है|

सेंसर बोर्ड के गलत मापदंड-

जब लीला सेमसन के सामने पीके आई तो उन्होंने इसे तुरंत ही पास कर दिया मगर 2012 में आई ‘कमाल धमाल मालामाल’ में असरानी जी के उन दृश्यों को काट दिया था जिनमें वो एक ईसाई पादरी बने हुए पैसों की माला लिए हुए हैं|

कमाल धमाल मालामाल बनाम पीके-

अब आप ही निम्न दृश्य देख कर बताएं कि यदि ईसाईयों की भावनाएं पैसों की माला से आहात हो सकती हैं तो क्या हिन्दुओं की भावनाएं भगवान् शिव से बदतमीज़ी के दृश्य से आहत नहीं होगी|
objectionable scene of PK controversial scene 2 of Kamaal Dhamaal Maalamal
objectionable scene of PK controversial scene 2 of Kamaal Dhamaal Maalamal
पीके के वह दृश्य जो विवादास्पद तो है मगर हटाये नहीं गए हैं|चित्र स्त्रोत –kemmanu.comकमाल धमाल मालामाल का वह दृश्य जो विवादास्पद थे और जिन्हें हटा दिया गया था|चित्र स्त्रोत – etcpb.com

विश्वरूपम का उदहारण-

इसी तरह 2013 में आई कमल हसन की फिल्म विश्वरूपम फिल्म में से कई दृश्य हटाये गए जैसेकि कुरान की कुछ आयतें जिन्हें डायलॉग के रूप में प्रयोग किया गया था, एक दृश्य जिसमें एक अमेरिकी व्यक्ति को क़त्ल करते हुए आतंकवादी अल्लाह की बड़ाई करता है आदि आदि| क्या यह दृश्य गलत हैं जो हटा दिए गए?
यदि हाँ तो उपरोक्त लगे हुए दृश्य कौन से सही हैं| क्या भगवान् शिव वास्तव में इस तरह किसी मानव से डरकर भागते हैं या भगवान् शिव का किरदार निभाने वाले नाटककार अपने शिवरूपी वस्त्र और अलंकर के साथ सुलभ शौचालय जाते हैं और उनके साथ कोई इस तरह दुर्व्यवहार करता है?

‘रंग दे बसंती’ का बदला ‘पीके’ से

आमिर खान की 2006 में एक फिल्म आई थी – ‘रंग दे बसंती’ जिसके कुछ दृश्य विवादस्पद थे तथा सेंसर बोर्ड ने वह दृश्य रिलीज़ होने से पूर्व ही काट दिए थे| क्या आमिर खान ने ‘रंग दे बसंती’ का बदला जानबूझकर ‘पीके’ से निकाला है? आमिर खान ऐसे कलाकार हैं जिन्हें अगर फिल्म का निर्देशन पसंद नहीं आता तो वह स्वयं करते हैं जैसाकि उन्होंने ‘तारे जमीन पर’ फिल्म के निर्माण के दौरान किया था| जब तक एक दृश्य उनके हिसाब से उत्तम गुणता का ना हो| तो क्या आमिर खान को इन विवादास्पद दृश्यों को तुरंत ही शूटिंग के समय ही नहीं हटा देना चाहिए था|

शर्मिला टैगोर बनाम लीला सेमसन

श्रीमती शर्मिला टैगोर खान पटौदी 13 अक्टूबर 2004 से 31 मार्च 2014 तक सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा थीं| उन्होंने अपना कार्यभार पूरी ईमानदारी से निभाया तथा हर फिल्म को तार्किक दृष्टिकोण से तोला| जहाँ एक तरफ उन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए फिल्मों में धूम्रपान तथा शराब के सेवन का आरम्भिक विरोध किया परन्तु बाद में स्वीकार किया था वहीँ दूसरी और उन्होंने ‘कमीने’ एवं ‘ये साली ज़िन्दगी’ जैसी फिल्मों के नामों पर भी अपनी चिंताएं मुक्त रूप से व्यक्त कीं थी| परन्तु इन फिल्मों को मंजूरी दी गयी क्यूंकि यह फ़िल्में कुछ गलत नहीं दिखाती थीं तथा ना ही किसी समुदाय की भावनाएं आहत करती थीं| उल्लेखनीय हैं कि उन्होंने ‘रंग दे बसंती’ के कुछ दृश्य खुद ही प्राम्भिक परिक्षण में काट दिए थे तथा इन्हें भारत की वायुसेना को भी दिखाया था ताकि कोई सुरक्षा संदेह ना रह जाए|
दूसरी और लीला सेमसन 1 अप्रैल 2014 में सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा बनीं| उन्हीं के शासनकाल में ‘कमाल धमाल मालामाल’, ‘विश्वरूपम’, तथा हाल ही में रिलीज़ हुयी कन्नड़ फिल्म ‘शिवम’ के दृश्य काटे गए| ‘शिवम्’ तथा ‘विश्वरूपम’ के दृश्य मुस्लिम समुदाय तथा ‘कमाल धमाल मालामाल’ के दृश्य ईसाई समुदाय की आपत्ति की वजह से हटाये गए थे| क्या हिन्दू धर्म के लोगों की आपत्ति के कोई मायने तथा महत्व नहीं है?
लीला सेमसन से अनुरोध है कि फ़िल्में यदि सिर्फ मनोरंजन के लिए हैं तो किसी भी फिल्म से दृश्य काटने बंद करें| अगर समुदायों तथा धर्मों की आपत्ति सुनती हैं तो पीके के दृश्य भी काटें? यदि नहीं तो आप अपना कार्य ईमानदारी से नहीं कर रही हैं|