Thursday, 24 January 2013

नेताजी से सम्बंधित विशेष जानकारी के लिए निम्न तन्तुयो पर आघात कीजिये


Mission Netaji
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हिंदी के लिए



नेताजी सुभाष : सत्य की अनवरत तलाश

“नेताजी से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करे सरकार”

Archive for the 'नेताजी का रहस्य' Category


सोवियत संघ में नेताजी के साथ क्या हुआ?

मगर नेताजी ने आत्म-समर्पण नहीं किया


पहले परिस्थितियाँ:

मुसोलिनी, हिटलर और तोजो- तीनों की पराजय के बाद अब रह गए हैं- नेताजी।

धुरी राष्ट्रों का मकसद चाहे दुनिया पर राज करने का रहा हो, मगर नेताजी ने इनसे मदद ली थी- भारत को आजाद कराने के लिए। इस लिहाज से नेताजी की हैसियत एक “स्वतंत्रता सेनानी” की बनती है- उनपर अन्तर्राष्ट्रीय युद्धापराध का मुकदमा नहीं चलना चाहिए।

मगर अमेरीका के रूख में कोई नर्मी नहीं है- जाहिर है वह नेताजी पर अन्तर्राष्ट्रीय युद्धापराध का मुकदमा चलाकर उन्हें फाँसी के तख्ते पर लटकते देखना चाहता है।

ब्रिटेन मुकदमे के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता- सुभाष चन्द्र बोस इस धरती पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सबसे बड़े शत्रु हैं- वह सुभाष को देखते ही गोली मार देने के पक्ष में है। नेताजी के आग उगलते भाषणों और अदम्य वीरता से भरपूर सैन्य अभियानों ने न केवल भारत, बल्कि सारे विश्व के गुलाम देशों को झकझोर कर जगा दिया है और महान ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। भारत में तो आजाद हिन्द फौज और नेताजी के जिक्र पर पाबन्दी है ही- बी.बी.सी. वालों को भी आजाद हिन्द फौज के समाचार प्रसारित करने से ब्रिटेन ने रोक दिया है- ताकि नेताजी द्वारा सुलगाई गयी बगावत की आग अन्य एशियायी/अफ्रिकी उपनिवेशों तक न फैले।

रहा सोवियत संघ- वह इस संकट की घड़ी में नेताजी को शरण देने के लिए इच्छुक है या नहीं, इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण अब तक तो नहीं मिला है।
(जब तक भारत सहित बाकी चारों देश- ब्रिटेन, अमेरीका, रूस, जापान- नेताजी से जुड़े सभी गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं करते, तब तक कुछ बातें स्पष्ट होंगी भी नहीं! परिस्थितियों को देखते हुए अनुमान ही लगाना पड़ेगा-)
विश्वयुद्ध के अन्तिम दिनों में परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि अमेरीका और ब्रिटेन एकजुट हो गये हैं, जबकि अमेरीका तथा सोवियत संघ के बीच कड़वाहट पैदा हो चुकी है, (जर्मनी का बँटवारा इसका उदाहरण है; इसके अलावे, पूँजीवाद बनाम साम्यवाद का झगड़ा तो सार्वकालिक है ही) इसलिए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘ब्रिटेन तथा अमेरीका को सदा सशंकित बनाये रखने के लिए नेताजी को गुप्त रुप से सोवियत संघ में शरण देने में’ स्तालिन को फायदा ही है!

यहाँ इन दो तथ्यों पर भी ध्यान देने की जरुरत है:-

1. ‘मित्र राष्ट्र’ के तीन प्रमुख सदस्य देश हैं- अमेरीका, ब्रिटेन और सोवियत संघ। इनमें से अमेरीका और ब्रिटेन के खिलाफ नेताजी ने युद्ध की घोषणा कर रखी है, मगर सोवियत संघ के साथ उनकी मित्रता कायम है। युद्ध के दौरान सोवियत संघ का शासनिक-प्रशासनिक ढाँचा साइबेरिया क्षेत्र में स्थानान्तरित हो गया है, इसलिए आजाद हिन्द सरकार का दूतावास भी साइबेरिया के ओम्स्क शहर में है।

2. ‘धुरी राष्ट्र’ के तीन सदस्य देश हैं- जर्मनी, इटली और जापान। इनमें से जर्मनी और इटली के खिलाफ सोवियत संघ ने युद्ध की घोषणा कर रखी है, मगर जापान के साथ उसकी मित्रता कायम है। स्तालिन ने 8 मई 1945 को ‘माल्टा सम्मेलन’ में रूजवेल्ट और चर्चिल को भरोसा दिलाया था कि जापान के खिलाफ वे मोर्चा खोलेंगे, मगर वास्तव में वे ऐसा नहीं करते। जापान पर दो अणुबमों के प्रहार के बाद- जब जापान आत्मसमर्पण के लिए राजी हो जाता है- तब जाकर 10 अगस्त को सोवियत सेना जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा करते हुए मंचुरिया में प्रवेश करती है। मगर यह एक दिखावा या छलावा (Eyewash) है, असली कारण कुछ और है, जिसका जिक्र आगे आयेगा।
ऊपर की परिस्थिति एवं तथ्यों से जाहिर है कि नेताजी अगर कहीं शरण ले सकते हैं, तो वह है- सोवियत संघ, जहाँ वे 1941 में ही जाना चाहते थे- स्तालिन से सैन्य मदद लेने।

हालाँकि नेताजी के पास दो और विकल्प हैं-

1. माउण्टबेटन की सेना से लड़ते हुए वे युद्धभूमि में शहीद हो जायें; या
2. दक्षिण एशिया के जंगलों में वे छुप जायें- जापान ने स्थानीय लोगों से मदद का भरोसा दिया है, और स्थिति सामान्य होने पर भारत में वे फिर से प्रकट हो जायें।

एक और बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि वियेना (ऑस्ट्रिया) में नेताजी की पत्नी एमिली शेंकेल उनकी तीन साल की नन्हीं बेटी- अनिता- के साथ उनका इन्तजार कर रहीं हैं... और इस वक्त नेताजी के लिए सिंगापुर से ऑस्ट्रिया जाने का रास्ता सोवियत संघ होकर ही जाता है। हालाँकि नेताजी ने पत्र लिखकर एमिली को बता दिया है-

“मैं शायद तुम्हें फिर न देख सकूँ। मगर विश्वास करो, तुम सदा मेरे हृदय में, मेरे विचारों में और मेरे सपनों में रहोगी। अगर नियति ने हमें जीवन में अलग कर भी दिया- तो मैं अपने अगले जन्म में तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा.... मेरी परी! मैं तुम्हारा आभारी हूँ कि तुमने मुझे प्यार किया और मुझे तुमसे प्यार करना सिखाया।”

(“May be I shall never see you again, but believe me, you will always live in my heart, in my thoughts and in my dreams. If fate should thus separate us in the life- I shall long for you in my next life… My angel! I thank you for loving me and for teaching me to love you.”- Essential Writings of Netaji Subhash Chandra Bose, Netaji Research Bureau and Oxford University Press, 1997, pp 160-161.)

चूँकि ओम्स्क में आजाद हिन्द सरकार का दूतावास होने के दस्तावेज हाल में उजागर हो गये हैं, इसलिए यहाँ यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि दूतावास के कौन्सुलेट जेनरल ‘काटोकाचु’ ने सोवियत सरकार से नेताजी को शरण देने के बारे में बात की होगी। (‘काटोकाचु’ एक छद्म नाम है, ये वास्तव में एक भारतीय हैं।) स्तालिन शरण देने को राजी होंगे- मगर गुप्त रुप से, ताकि ब्रिटेन और अमेरीका (मित्र राष्ट्र की दुहाई देकर) उनसे नेताजी की माँग न कर सकें। काटोकाचु ने यह सूचना जापान सरकार और नेताजी को दी होगी।

***
और अब घटनाक्रम:
10 अगस्त 1945 की रात।

कुआलालामपुर से मेजर जेनरल इनायत कियानी का सन्देश आता है कि सोवियत संघ ने जापान पर युद्ध की घोषणा कर दी है। नेताजी इस वक्त सिंगापुर के निकट सेरेमबन गेस्ट हाऊस में हैं। उनके साथ हैं- मेजर जेनरल अलगप्पन, कर्नल जी.आर. नागर, कर्नल हबिबुर्रहमान और एस.ए.अय्यर। सभी यहाँ एक संक्षिप्त दौरे पर आये हुए हैं, सो, शॉर्टवेव रेडियो नहीं लाया गया है।

नेताजी इस समाचार से विचलित नहीं होते। उनका मानना है कि इससे उनके अभियान को कोई फर्क नहीं पड़ता।

11 अगस्त।

सेरेमबन में ही आजाद हिन्द फौज के प्रशिक्षण केन्द्र में लम्बी बैठक चलती है, जो रात 10 बजे समाप्त होती है। खाना खाकर जब तक लोग बिस्तर पर जाते हैं, रात्रि के एक बज रहे हैं।

लम्बी दूरी के फोन की घण्टी की आवाज से सभी बिस्तर से बाहर आते हैं।

मलक्का से फोन करने वाला बताता है कि सिंगापुर स्थित आई.आई.एल. मुख्यालय से प्रचार विभाग के प्रधान सचिव डॉ. लक्ष्मैया और कार्यवाहक सचिव श्री गणपति नेताजी से मिलने सेरेमबन पहुँच रहे हैं।

एक बन्द कमरे में नेताजी और एस.ए. अय्यर के सामने लक्ष्मैया और गणपति खबर देते हैं- “जापान ने आत्मसमर्पण का फैसला ले लिया है!”

यूँ तो नेताजी ने 1937 में ही यह लिख दिया था कि अगर जर्मनी और जापान युद्ध को लम्बा खींचते हैं, तो वे ऐंग्लो-अमेरीकन शक्तियों के आगे परास्त हो जायेंगे; मगर जापान इतनी जल्दी आत्मसमर्पण करेगा- यह अनुमान नेताजी को नहीं था। उनका अनुमान था कि जर्मनी के पतन और जापान के आत्मसमर्पण के बीच उन्हें इतना समय मिल जायेगा कि वे आंग-सान की बर्मा डिफेन्स आर्मी को फिर से अँग्रेजों के खिलाफ लाकर उसके साथ आजाद हिन्दी फौज का एक संयुक्त कमान बनाकर अँग्रेजों से लोहा ले सकेंगे। ऐसे में, बर्मा और पूर्वी भारत राष्ट्रवादियों का आधार रहेगा। मगर जापान पर दो अणुबमों के प्रहार के बाद जब जापानी सर्वोच्च सैन्य परिषद में मतभेद उभरता है, तब स्वयं सम्राट हिरोहितो दखल देते हुए आत्मसमर्पण का समर्थन करते हैं।

12 अगस्त।

साढ़े ग्यारह घण्टे की यात्रा करके नेताजी और उनका दल सेरेमबन से सिंगापुर पहुँचता है। जापान के आत्मसमर्पण के प्रभावों को लेकर बैठक होती है और आजाद हिन्द फौज के डिवीजनल कमाण्डरों तथा आई.आई.एल. की शाखाओं के चेयरमैन के लिए जरूरी निर्देश भेजे जाते हैं। सैनिकों- खासकर, झाँसी की रानी रेजीमेण्ट की 500 महिला सैनिकों- की चिन्ता नेताजी के दिमाग में पहले है। स्वयंसेवकों और महिला सैनिकों को समाज में घुल-मिल जाने दिया जाता है।

14 अगस्त।

एक खराब दाँत निकलवाने के बाद डेण्टिस्ट नेताजी को आराम की सलाह देते हैं, मगर वे कम ही आराम कर पाते हैं।

देर रात आजाद हिन्द सरकार के कैबिनेट की महत्वपूर्ण बैठक शुरु होती है। मुद्दा है- नेताजी को सिंगापुर में ही रहकर युद्ध करना चाहिए या नहीं। खुद नेताजी ऐसा चाहते हैं। उनके अनुसार, उनके युद्धबन्दी बनाये जाने या शहीद हो जाने से भारत का स्वतंत्रता संग्राम और तेज होगा। मगर नेताजी के सहयोगी उनसे सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार, नेताजी जीवित रहकर स्वतंत्रता संग्राम को ज्यादा तेज बना सकते हैं।

15 अगस्त।

जापान आधिकारिक रुप से आत्मसमर्पण की घोषणा करता है।

सिंगापुर में उस रात पाँच घण्टों की बैठक के बाद फैसला होता है कि नेताजी सिंगापुर छोड़ देंगे। मगर वे जायेंगे कहाँ- स्याम (थाईलैण्ड), इण्डो-चायना (वियेतनाम), जापान, मंचुकुओ, या... रशिया?- इस प्रश्न पर क्या फैसला हुआ था- इसका जिक्र बैठक में शामिल किसी भी व्यक्ति ने अपने संस्मरण में नहीं किया है। जाहिर है, यहीं से नेताजी को बचाने के रहस्यमयी प्रयासों की शुरुआत हो जाती है। इन्हीं प्रयासों के तहत यह बताया जाता है कि उस बैठक में यह फैसला हुआ था कि अन्तिम सलाह-मशविरे के लिए और जापान को (सहयोग के लिए) धन्यवाद देने के लिए नेताजी टोक्यो जायेंगे। कर्नल हबिबुर्रहमान, कर्नल प्रीतम सिंह, मेजर आबिद हसन, मेजर स्वामी और श्री देबनाथ दास नेताजी के साथ होंगे। ये सभी सायगन होते हुए टोक्यो जायेंगे और फिर वहाँ से किसी ‘अज्ञात’ ठिकाने पर जायेंगे।

यह फैसला भी होता है कि मेजर जेनरल कियानी सिंगापुर में ही रहेंगे और नेताजी की अनुपस्थिति में आजाद हिन्द सरकार/फौज का काम देखेंगे। मेजर जेनरल अलगप्पन और ए.एन. सरकार उनका सहयोग करेंगे।

सारी बातें तय होते-होते भोर के तीन बज जाते हैं।

16 अगस्त।

नेताजी के सहयोगी जिसे ‘अज्ञात’ स्थान बताते हैं, वह सोवियत संघ ही है- इसका प्रमाण है यह टेलीग्राम, जो बैठक समाप्त होने के बाद नेताजी टोक्यो को भेजते हैं:

“मैं अपने कैबिनेट के कुछ विश्वस्त सहयोगियों के साथ सोवियत संघ जाना चाहूँगा। अगर आवश्यकता हुई, तो मैं अकेले ही सोवियत संघ में प्रवेश करूँगा।” (“Along with the trusted persons of my cabinet, I would like to go to the Soviet Union. If it is necessary, I shall enter the Soviet Union alone.” -Leonard A. Gordon: Brothers against the Raj, Page- 538)

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टेलीग्राम पाकर टोक्यो अपने फील्डमार्शल काउण्ट तेराउचि को निर्देश देता है- काटा-काना को सिंगापुर से निकालकर गुप्त रुप से सोवियत संघ पहुँचाने की व्यवस्था की जाय।

सोवियत सैनिक 10 अगस्त को ही मंचुरिया में प्रवेश कर चुके हैं। इन सैनिकों की मदद से काटा-काना को सोवियत संघ में प्रवेश दिलाया जा सकता है।
जापानी सेना के “सोवियत विशेषज्ञ” लेफ्टिनेण्ट जेनरल सिदेयी (दक्षिण-पूर्वी कमान के चीफ ऑव स्टाफ) मनीला में तैनात हैं। तेराउचि तुरन्त उनकी नियुक्ति मंचुरिया के दाईरेन नामक स्थान में करते हैं और उन्हें तत्काल प्रभाव से योगदान देने का निर्देश देते हैं।

हाँ, दाईरेन जाते हुए सायगन में रुककर उन्हें काटा-काना को भी साथ लेना है।
उधर सिंगापुर से काटा-काना भी अपने सहयोगियों के साथ बैंकॉक होते हुए सायगन के लिए रवाना होने वाले हैं।

तेराउचि सायगन में जेनरल ईशोदा को निर्देश देते हैं- काटा-काना को मनीला से आकर ताईपेह होकर दाईरेन जाने वाले विमान में बिठाने की व्यवस्था की जाय।

तेराउचि की योजना की रंगभूमि है- ताईपेह, जो कि फारमोसा का प्रमुख नगर है। (फारमोसा एक टापू है, जिसे अब ताईवान कहते हैं।)

(जापान में नेताजी को “चन्द्र बोस” के नाम से सम्बोधित किया जाता है, जापानी भाषा में- “काटा-काना”।)
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4.4 वह रहस्यमयी विमान यात्रा: सिंगापुर से ताईपेह तक

16 अगस्त 1945। 09:30 (या 10:30) बजे।

एक जापानी बमवर्षक विमान में नेताजी कर्नल हबीबुर्रहमान, कर्नल प्रीतम सिंह, एस.ए. अय्यर और जापानी दुभाषिए श्री निगेशी के साथ बैंकॉक के लिए रवाना होते हैं। उनके मंत्रीमण्डल के अन्य सदस्य- कर्नल गुलजारा सिंह, मेजर आबिद हसन, श्री देबनाथ दास इत्यादि एक दूसरे विमान में हैं।

विमान में कुछ खराबी है, और एक ढीली नली से रिसते पेट्रोल की महक यात्रियों को आती है।

शाम साढ़े तीन बजे विमान बैंकॉक पहुँचते हैं।


कुछ ही मिनटों में नेताजी के आने की खबर फैल जाती है और शाम से लेकर आधी रात के बाद तक नेताजी से मिलने वाले भारतीयों का ताँता लगा रहता है।
इसके बाद ही उन्हें कुछ जरूरी काम निपटाने का समय मिल पाता है।

भोर पाँच बजे नेताजी बिस्तर पर जाते हैं और घण्टे भर आराम करते हैं।
17 अगस्त 1945। 08:00 बजे।

दोनों विमान सभी यात्रियों को लेकर बैंकॉक से उड़ान भरते हैं और तीन घण्टों की संक्षिप्त उड़ान के बाद ग्यारह बजे सायगन के हवाई अड्डे पर उतरते हैं। (सायगन शहर का नाम अब हो-चि-मिन्ह सिटी है। यह वियेतनाम में है, जिसे उन दिनों फ्रेंच इण्डो-चायना कहा जाता था।)

सायगन का वातावरण फ्राँसीसी आक्रमण की अफवाहों से तनावग्रस्त है।
सायगन हवाई अड्डे से दो कारों में बैठकर नेताजी का दल नगर के बाहरी इलाके में स्थित श्री नारायण दास (आई.आई.एल. के आवास विभाग के सचिव) के घर पर जाता है।

मुश्किल से आधा घण्टा ही आराम किया होगा नेताजी ने कि जापानी सम्पर्क अधिकारी कियानो के आगमन के कारण उन्हें जगाया जाता है। कियानो की सूचना है कि सिर्फ नेताजी को लेकर जाने के लिए एक विमान हवाई अड्डे पर तैयार खड़ा है। विमान जा कहाँ रहा है- यह कियानो नहीं बताते। मगर उनका कहना है कि नेताजी को तुरन्त चलना चाहिए- समय बिल्कुल नहीं है।
नेताजी किसी अनजाने गंतव्य स्थान पर जाने के लिए तैयार नहीं हैं।

कियानो भागे-भागे जाते हैं और अपने उच्च अधिकारियों- जेनरल ईशोदा, श्री हाचैया और फील्ड मार्शल तेराउचि के स्टाफ अधिकारी (सम्भवतः कर्नल टाडा) को लेकर आते हैं।

बन्द कमरे में ये सभी नेताजी के साथ बैठक करते हैं- जाहिर है, नेताजी को गुप्त रुप से मंचुरिया पहुँचाने की जो योजना तेराउचि ने बनायी है, उसकी जानकारी नेताजी को दी जाती है। कर्नल हबिब भी बैठक में शामिल हैं।
थोड़ी देर बाद जापानियों को कमरे में छोड़ नेताजी और हबिब बाहर आते हैं। नेताजी ईशारे से हबिब, आबिद, देबनाथ और अय्यर को एक दूसरे कमरे में बुलाते हैं और जापानियों की योजना की जानकारी देते हैं।

“कुछ ही मिनटों में एक विमान उड़ान भरने वाला है,” नेताजी साथियों से पूछते हैं, “जापानियों का कहना है कि उसमें एक ही सीट उपलब्ध है... क्या मुझे अकेले जाना चाहिए?”

थोड़े विचार-विनिमय के बाद तय होता है कि जापानियों से एक और सीट का इन्तजाम करने के लिए कहा जाय। विमान या नेताजी कहाँ जा रहे हैं, इसपर कोई सवाल नहीं उठाता।

“हमने पूछा नहीं और उन्होंने बताया नहीं,” अय्यर अपनी किताब (Unto him a witness) में लिखते हैं, “लेकिन हम जानते थे, और नेताजी भी यह जानते थे कि हम जानते हैं। विमान को मंचुरिया जाना था।”

जापानियों से फिर थोड़ी बातचीत होती है और उसके बाद नेताजी साथियों को सूचित करते हैं- एक और सीट है, और कर्नल हबिब उनके साथ चल रहे हैं।
समय बिल्कुल नहीं है- नेताजी और हबिब कार में बैठकर हवाई अड्डे के लिए रवाना हो जाते हैं।

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सायगन हवाई अड्डा। 17:30 बजे।

जापानी भारी बमवर्षक विमान- मॉडेल 97-2-सैली- उड़ान के लिए तैयार खड़ा है। यह विमान मनीला से आया है। इसके यात्रियों की सूची इस प्रकार है:

1. मेजर ताकिजावा, 3र्ड एयर फोर्स, पायलट
2. वारण्ट ऑफिसर आयोगी, असिस्टेण्ट पायलट
3. सार्जेण्ट ओकिता, नेवीगेटर
4. एक एन.सी.ओ. (नॉन कमीशंड ऑफिसर) तोमिनागा, रेडियो ऑपरेटर
5. एक एन.सी.ओ., जिसका नाम नहीं पता, गन ऑपरेटर
6. लेफ्टिनेण्ट जेनरल सिदेयी, चीफ ऑव स्टाफ, बर्मीज आर्मी कमाण्ड
7. लेफ्टिनेण्ट कर्नल साकाई, स्टाफ ऑफिसर
8. लेफ्टिनेण्ट कर्नल शिरो नोनोगाकी, स्टाफ ऑफिसर, जापान एयर फोर्स
9. मेजर तारो कोनो, स्टाफ ऑफिसर, जापान एयर फोर्स
10. मेजर ईवाओ ताकाहाशी, स्टाफ ऑफिसर
11. कैप्टन केयिकिची अराई, एयर फोर्स इंजीनियर

अब इस सूची में दो नाम और जुड़ जाते हैं:

12. सुभाष चन्द्र बोस, आई.एन.ए. चीफ
13. कर्नल हबिबुर्रहमान खान, एडजुटैण्ट, आई.एन.ए.

विमान में काफी साजो-सामान भी लदा है।

नेताजी और हबिब सहित कुल तेरह लोगों को लेकर विमान सायगन से उड़ान भरता है।

तूरेन। 19:45 बजे।

तूरेन वियेतनाम का ही एक शहर है। विमान यहाँ उतरता है और रात्रि विश्राम करता है।

नेताजी तथा अन्य यात्री होटल मोरिम में ठहरते हैं। (तूरेन शहर का नाम अब दा-नांग है।)

सायगन में एयरबोर्न होने से पहले विमान को पूरे रन-वे का इस्तेमाल करना पड़ा था। जाहिर है, विमान में माल ज्यादा लदा है। सो, तूरेन में 12 मशीनगन तथा कुछ गोला-बारूद उतारकर विमान को 600 किलो हल्का किया जाता है।
18 अगस्त। 05:30 बजे। (या 07:00 बजे?)

सभी 13 यात्रियों को लेकर विमान तूरेन से उड़ान भरता है।

ताईपेह। 14:00 बजे।

बहुत ही अच्छे मौसम में फारमोसा द्वीप के ताईपेह शहर के निकट ताईहोकू हवाई अड्डे पर विमान उतरता है।

विमान में ईंधन भरा जाता है और सभी यात्री सैण्डविच तथा केले का हल्का भोजन करते हैं।


***
इसके बाद के घटनाक्रम के दो संस्करण हैं:

1. गवाहों के बयानों पर आधारित घटनाक्रम, जिसमें विमान को दुर्घटनाग्रस्त और नेताजी को उसमें मृत बताया जाता है; और

2. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित घटनाक्रम, जिसके अनुसार विमान मंचुरिया पहुँचा था और नेताजी (कुछ वर्षों तक) सोवियत संघ में ही थे।

न्याय की दुनिया में कहते हैं कि गवाह कुछ कारणों से झूठ बोल सकते हैं, मगर परिस्थितिजन्य साक्ष्य कभी झूठ नहीं बोलते!

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4.5 वह रहस्यमयी विमान दुर्घटना: गवाह जो कहते हैं

निम्नलिखित घटनाक्रम जापानी सैन्य अधिकारियों, नानमोन सैन्य अस्पताल के डॉक्टरों तथा मुख्यरुप से कर्नल हबिबुर्रहमान के बयानों पर आधारित है:-
10 अगस्त 1945 को सोवियत संघ ने जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और उसके सैनिक मंचुरिया में प्रवेश कर गए। उनसे निपटने के लिए 17 अगस्त को ले. जेनरल सिदेयी तथा कुछ अन्य सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति मंचुरिया के दाईरेन नामक स्थान में की गयी। ये अधिकारी साजो-सामान के साथ मनीला से दाईरेन जा रहे थे।

उधर 15 अगस्त को जापान के आत्मसमर्पण के बाद बदली हुई परिस्थितियों में जापान सरकार से सलाह-मशविरा करने तथा धन्यवाद ज्ञापन के लिए नेताजी को टोक्यो जाना था। इसलिए सिदेयी अपना विमान लेकर मनीला से पहले सायगन आ गये और नेताजी को कर्नल हबिबुर्रहमान के साथ विमान में बिठा लिया गया। अन्तिम रुप से विमान को मंचुरिया से टोक्यो ही जाना था। सायगन से उड़कर और तूरेन में रात्रि विश्राम कर विमान 18 अगस्त को दोपहर

14:00 बजे ताईहोकू हवाई अड्डे पर उतरा।

ताईहोकू हवाई अड्डा

ताईहोकू हवाई अड्डे पर विमान में ईंधन भरा जाता है और यात्रीगण जलपान करते हैं।

उड़ान से पहले पायलट, मेजर कोनो और हवाई अड्डे के अनुरक्षण (मेण्टेनेन्स) अधिकारी कैप्टन नाकामुरा विमान की संक्षिप्त जाँच करते हैं। मेजर कोनो को बाँए इंजन में एक खराबी दीखती है, मगर इसे नजरअन्दाज कर विमान को वे उड़ान भरने योग्य घोषित करते हैं। वैसे भी, सूचना है कि सोवियत सैनिक मंचुरिया के निकट आ रहे हैं, अतः वहाँ यथाशीघ्र पहुँचना है।

सभी 13 यात्री (सूची पिछले अध्याय में है) विमान में सवार होते हैं।

एक बयान के अनुसार, आधा घण्टा रुकने के बाद विमान ने 14:30 या 14:35 पर उड़ान भरी; जबकि एक दूसरे बयान के मुताबिक विमान वहाँ दो घण्टे रुका था, जिससे उड़ने का समय बनता है- 16:00 बजे।

विमान टैक्सिंग करते (पहियों पर चलते) हुए 890 मीटर लम्बी हवाई पट्टी के एक किनारे जाकर वापस मुड़ता है और फिर, वह दौड़ना शुरु करता है।

आम तौर पर भारी बमवर्षक विमान आधी हवाई-पट्टी पर ही हवा में उठ जाते हैं, मगर यह विमान हवाई-पट्टी का तीन-चौथाई पार करके भी जमीन से नहीं उठता है।

फिर विमान हवा में उठता है और खड़ी उड़ान भरते हुए ऊपर जाने लगता है।
अचानक तेज धमाका होता है और विमान बाँयी ओर झुक जाता है। पोर्ट (बाँया) इंजन प्रोपेलर (पंखे) सहित जमीन पर आ गिरता है।

विमान जमीन की ओर गोता खाता है।

हवाई अड्डे की चहारदीवारी के 10 से 20 मीटर की दूरी पर विमान जमीन से टकराता है और विमान में आग लग जाती है।

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नानमोन सैन्य अस्पताल

हवाई अड्डे से कुछ दूरी पर स्थित नानमोन सैन्य अस्पताल को पहले तो सूचना मिलती है और फिर, सभी जले तथा घायल यात्रियों को वहाँ लाया जाता है।

एक अच्छी कद-काठी वाले भारतीय की ओर ईशारा करके चिकित्सा अधिकारी कैप्टन योशिनी को बताया जाता है, “ये काटा-काना हैं, महान भारतीय नेता, इन्हें बचाने की कोशिश की जाय।”

‘काटा-काना’ यानि ‘चन्द्र बोस’ सर से पाँव तक जले हुए हैं।

डॉ. टी सुरुता तथा दर्जन भर जापानी और फारमोसी नर्स डॉ. योशिनि की मदद के लिए अस्पताल में मौजूद हैं। डॉ. सुरुता नेताजी की पट्टियाँ करते हैं और डॉ. योशिनी विटा-कैम्फर की दो खुराक तथा डिजिटामाईन के दो इंजेक्शन देते हैं- उनके हृदय को स्थिर करने के लिए। इंफेक्शन से बचाने के लिए रिंगर सोल्यूशन के 500 सी.सी. के तीन इण्ट्रावेनस इंजेक्शन भी योशिनी नेताजी को देते हैं।

प्रारम्भ में ड्रेसिंग रूम में ही नेताजी को चिकित्सा दी जाती है। बेहतर ईलाज के लिए उन्हें 2 नम्बर वार्ड में रखा जाता है। हबिबुर्रहमान भी उसी वार्ड में हैं।
17:00 बजे अस्पताल के ही एक जापानी सैनिक का खून लेकर नेताजी को चढ़ाया जाता है- ताकि उनके हृदय पर दवाब कम पड़े।

ऐसा लग रहा है कि नेताजी पर ईलाज का असर हो रहा है। वे होश में हैं और कई बार पानी भी माँगते हैं। नेताजी को अस्पताल के स्टाफ के साथ वार्तालाप में आसानी हो, इसके लिए लिए दुभाषिए जुकी नाकामुरा को भी बुला लिया गया है। नाकामुरा नेताजी और हबिब से परिचित हैं। नेताजी ताईपेह में जब भी रुकते थे, नाकामुरा उनके साथ होते थे।

समय 19:30।

डॉ. सुरुता पाते हैं कि नेताजी की नब्ज गिर रही है। तुरन्त वे विटा-कैम्फर और डिजिटामाईन के इंजेक्शन देते हैं; मगर नब्ज का धीमा पड़ना जारी है।

23:00।
नेताजी की मृत्यु हो जाती है।

इस वक्त कमरे में 7 लोग मौजूद हैं- डॉ. योशिनी, डॉ. टी. सुरुता, कर्नल हबिबुर्रहमान, जे. नाकामुरा (दुभाषिया), काजो मित्सुई (चिकित्सा अर्दली) और दो नर्स।

(इस समय को याद कर लीजिये- नेताजी की मृत्यु का यह समय डॉ. योशिनी ने ब्रिटिश जाँच एजेन्सी के सामने दर्ज कराया था- 19 अक्तूबर 1946 को, हाँग-काँग के स्टेनली जेल में।)

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दुर्घटनास्थल

• लेफ्टिनेण्ट जेनरल सिदेयी और पायलट मेजर ताकिजावा की मृत्यु घटनास्थल पर होती है, जबकि नेताजी, को-पायलट वारण्ट ऑफिसर आयोगी तथा दो अन्य (दोनों नन-कमीशण्ड ऑफिसर- रेडियो ऑपरेटर और गनर) की मृत्यु अस्पताल में होती है। (याद रखियेगा- नेताजी के अलावे 5 और लोगों की मृत्यु की बात गवाह बताते हैं।)

• 7 लोग दुर्घटना में जीवित बचते हैं। लेफ्टिनेण्ट कर्नल नोनोगाकी, जो कि टरेट् पर बैठे थे, विमान से बाहर आकर जमीन पर गिरते हैं- बिना चोट खाये। लेफ्टिनेण्ट कर्नल साकाई, मेजर ताकाहाशी और कैप्टन अराई विमान के जमीन से टकराते समय तो बेहोश हो जाते हैं, मगर बाद में उन्हें होश आ जाता है- उन्हें मामूली खरोचें आती हैं और वे मामूली रुप से झुलसते हैं।

• जीवित बचे मेजर कोनो याद करते हैं कि विमान के गिरते समय पेट्रोल टैंक खुल गया था और वह उनके तथा नेताजी के बीच आ गिरा था, जिससे वे नेताजी को नहीं देख पा रहे थे। हाँ, ले. जेनरल सिदेयी को उन्होंने देखा, जिनके सर के पिछले हिस्से पर जख्म था।

• स्टीयरिंग गीयर पर गिरने के कारण मेजर ताकिजावा का चेहरा और कपाल कट गया था, जबकि वारण्ट ऑफिसर आयोगी के सीने पर चोटें आयी थीं।

• कर्नल हबिबुर्रहमान याद करते हैं कि जमीन पर गिरने के बाद विमान का अगला हिस्सा टूट कर अलग हो गया और उसमें आग लग गयी। नेताजी हबिब की ओर मुड़कर बोले, “सामने की ओर से बाहर निकलो, पीछे रास्ता नहीं रहा।” विमान का दरवाजा सामान आदि से जाम हो गया था। सो, नेताजी आग से होकर निकले और हबिब ने उनका अनुसरण किया। नेताजी की पैण्ट में आग लगती है और सारे शरीर में फैल जाती है। हबिब उनके कपड़े हटाने में अपने हाथ जला बैठते हैं। फिर हबिब नेताजी को जमीन लुढ़काते हैं- आग बुझाने के लिए। तब तक नेताजी गम्भीर रुप से जल चुके हैं।

• नेवीगेटर सार्जेण्ट ओकिता की रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचता है। उसकी पीठ पर एक लम्बा जख्म बनता है। अस्पताल में कुछ समय बिताने के बाद उसे सितम्बर’ 47 में छुट्टी मिलती है।

***
दुर्घटना के कारण

• अधिकतम 9 के स्थान पर विमान में 13 लोग सवार थे।
• ताईपेह हवाई अड्डा छोटा था, बाहर ईंट भट्ठी की चिमनियाँ थीं।
• विमान को मंचुरिया पहुँचने की जल्दी थी।
• एक ईंजन की खराबी को नजरअन्दाज किया गया।
• पायलट द्वय ताईहोकू हवाई अड्डे के लिए नये थे।
• (जापान का) फारमोसा आर्मी कमान अव्यवस्थित हो चला था।

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ताईपेह नगरपालिका

जापान सरकार नेताजी की मृत्यु को गुप्त रखने का आदेश देती है- मीडिया को खबर नहीं दी जाती।

22 अगस्त को नेताजी के शव को ताईपेह नगरपालिका लेकर जाया जाता है- अन्तिम संस्कार के लिए अनुमतिपत्र प्राप्त करने के लिए। शव लेकर आये हैं- हबिबुर्रहमान और कुछ जापानी सैन्य अधिकारी। शव अस्पताल के कम्बल से भली-भाँति ढँका हुआ है।

(याद रखियेगा- मृत्यु 18-19 अगस्त की रात हुई थी और अन्तिम संस्कार 22 अगस्त को होने जा रहा है।)

नगरपालिका के स्वास्थ्य एवं स्वच्छता विभाग को ‘शव’ का ‘मृत्यु प्रमाणपत्र’ दिखाया जाता है, जिसपर डॉ. योशिनी और डॉ. सुरुता के हस्ताक्षर हैं।

‘मृत्यु प्रमाणपत्र’ के ब्यौरे इस प्रकार हैं:-

मृतक का नाम- इचिरो ओकुरा
जन्मतिथि- 1900 अप्रैल 9
मृत्यु का कारण- कार्डियाक अरेस्ट
पेशा- सैनिक, टेम्पोररी, ताईवान गवर्नमेण्ट मिलिटरी
मृत्यु की तारीख- 19 अगस्त 4:00 अपरान्ह
अन्तिम संस्कार के लिए अनुमति की तिथि- 21 अगस्त 1945
अन्तिम संस्कार की तिथि- 22 अगस्त 1945

अन्तिम संस्कार के लिए अनुरोधकर्ता- डॉ. थानिओशी योशोमी; चिकित्सक
चूँकि मृत्यु प्रमाणपत्र में कहीं भी “काटा-काना” का जिक्र नहीं है, इसलिए विभाग के अधिकारी इसे गम्भीरता से नहीं लेते और प्रमाणपत्र को दो कर्मचारियों के हवाले कर देते हैं, जिनकी ड्यूटी है- प्रमाणपत्र के हिसाब से ‘शव’ की जाँच करना।

अब इन दोनों मामूली कर्मचारियों को अलग ले जाकर जापानी सैन्य अधिकारी बताते हैं- यह महान भारतीय नेता काटा-काना का शव है, गोपनीय कारणों से इनका अन्तिम संस्कार ‘इचिरो ओकुरा’ के छद्म नाम से किया जा रहा है और जापान सरकार नहीं चाहती है कि इनके शव की जाँच की जाय।
दोनों कर्मचारी मान जाते हैं और (कम्बल हटाकर) शव की जाँच नहीं करते। इस प्रकार अन्तिम संस्कार के लिए ‘अनुमति पत्र’ स्वास्थ्य एवं स्वच्छता विभाग से हासिल कर लिया जाता है।

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शवदाहगृह

शवदाह गृह में भी फारमोसी (ताईवानी) कर्मचारियों को कुछ समझाया जाता है और वे भी शव पर से अस्पताल के कम्बल को नहीं हटाते।

कम्बल में ढके-ढके ही शव को भट्ठी में भेज दिया जाता है।

अगली सुबह ये ही अधिकारी शवदाह गृह में फिर आते हैं और जापानी परम्परा के अनुसार अस्थिभस्म इकट्ठा करते हैं।

बाद में इस भस्म को टोक्यो के रेन्कोजी मन्दिर में रखा जाता है।

सोवियत संघ में नेताजी के साथ क्या हुआ?



1. देश के आजाद हो जाने के बाद, जीवित होने के बावजूद नेताजी भारत वापस क्यों नहीं लौटे और कहाँ रहे?
2. यदि नेताजी आजादी के बाद भारत लौट आए थे तो फिर जनता के समक्ष प्रकट क्यों नहीं हुए और आजाद भारत के उत्थान में योगदान करने के लिए आगे क्यों नहीं आए?
3. यदि नेताजी आजाद भारत के नवनिर्माण के लिए आगे नहीं आए तो फिर वे गुमनाम रहते हुए किस अन्य बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे?
आज का यह लेख उपर्युक्त में से पहली जिज्ञासा पर केन्द्रित है। नेताजी के लापता हो जाने की परिस्थितियों की मुखर्जी आयोग द्वारा छ: वर्षों तक की गई विस्तृत और गहन जाँच से यह तथ्य साफ उजागर हो गया कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान द्वारा घुटने टेक दिए जाने और उस पर अमेरिका और ब्रिटेन का नियंत्रण स्थापित हो जाने की आसन्न परिस्थितियों के मद्देनज़र नेताजी ने गोपनीय तरीके से सोवियत संघ चले जाने और वहाँ से भारत की आजादी का संग्राम जारी रखने की योजना बना ली थी। इस योजना को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए उनके द्वारा बनाई गई रणनीति के अनुरूप जापानी सेना में उनके विश्वस्त उच्च अधिकारियों ने सुनियोजित तरीके से ताइपेई में 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो जाने की अफवाह फैला दी। इस अफवाह के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत विवेचन फिर कभी करेंगे। इस अफवाह पर ना तो ब्रिटिश सरकार ने कभी भरोसा किया, न अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने और ना ही महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेताओं ने। लेकिन नेताजी के संबंध में सबसे पुख्ता जानकारी यदि किसी के पास हो सकती थी तो वह थी तत्कालीन सोवियत संघ की सरकार, क्योंकि उपलब्ध तथ्य यही संकेत करते हैं कि नेताजी 18 अगस्त, 1945 के बाद सोवियत संघ ही गए थे।
मुखर्जी आयोग भी इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि 18 अगस्त, 1945 के बाद नेताजी सोवियत संघ में कुछ वर्ष अवश्य रहे। सोवियत संघ में उनके साथ क्या हुआ, उन्होंने वहाँ रहते हुए क्या किया और वे वहाँ कब तक और किस स्थान पर रहे, यह जानने के लिए भारत सरकार के प्रतिकूल रवैये के बावजूद जस्टिस मुखर्जी ने सितम्बर, 2005 में रूस का दौरा किया। लेकिन वहाँ उन्हें जाँच में अपेक्षित सहयोग नहीं प्रदान किया गया और आवश्यक अभिलेख और दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। लिहाज़ा, उन्हें रूस से कोई ठोस सुराग हासिल किए बगैर वापस लौट आना पड़ा।
इतना तो तय है कि नेताजी से जुड़े रहस्य की गुत्थी का हल इसी प्रश्न के उत्तर में है कि सोवियत संघ में नेताजी के साथ क्या हुआ, क्या वह वहाँ से निकल पाने में कामयाब हो पाए और क्या भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को नेताजी के जीवित होने की जानकारी थी?
इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए दिल्ली स्थित मिशन नेताजी नामक एक संगठन के प्रतिनिधि अनुज धरने 2 अगस्त, 2006 को सूचना के अधिकार का प्रयोग करते हुए भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में लोक सूचना अधिकारी के समक्ष आवेदन दायर करके नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के लापता हो जाने के संबंध में विदेश मंत्रालय और तत्कालीन सोवियत संघ एवं वर्तमान रूस के बीच अब तक हुए पत्राचार की सत्यापित प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराए जाने की मांग की। इसके उत्तर में लोक सूचना अधिकारी ने 25 अगस्त, 2006 को उत्तर दिया कि उक्त पत्राचार की प्रतिलिपियाँ उपलब्ध नहीं कराई जा सकतीं क्योंकि इसमें विदेशी राष्ट्र के साथ संबंध अंतर्ग्रस्त है और सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1) (क) से (च) के उपबंधों के अनुसार यह दी जा सकने वाली ‘सूचना’ के दायरे से बाहर है।
इस उत्तर से असंतुष्ट अनुज धर ने 23 सितम्बर, 2006 को विदेश मंत्रालय में अपीलीय प्राधिकारी के समक्षअपील दायर की, जिसमें उन्होंने पूछा कि
“यह बात न तो मेरी समझ में आती है और न ही भारत की जनता को समझ में आएगी कि नेताजी जैसे राष्ट्रीय नायक के लापता होने के संबंध में, जिनके बारे में सरकार की यह धारणा है कि उनकी मृत्यु 1945 में ही हो चुकी है, आधिकारिक पत्राचार के उजागर होने से देश के सुरक्षा, सामरिक, वैज्ञानिक अथवा आर्थिक हितों को वर्ष 2006 में खतरा कैसे हो सकता है। नेताजी के लापता होने का संबंध जिस विदेशी राष्ट्र से है वह है सोवियत संघ, जिसका वर्षों पूर्व ही विघटन हो चुका है।….मैं यह समझ पाने में भी विफल हूं कि सोवियत संघ के जमाने के पत्राचार के उजागर होने से मौजूदा रूस सरकार के साथ हमारे संबंध प्रतिकूल रूप से कैसे प्रभावित होंगे।”
इस अपील का विदेश मंत्रालय के सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा 6 नवम्बर, 2006 को दिया गया उत्तर निम्नानुसार है:
नेताजी के संबंध में विदेश मंत्रालय का उत्तर
इस उत्तर में मांगी गई सूचना का मजाक उड़ाते हुए कहा गया कि इसमें दंतकथात्मक उत्तर (anecdotal reply) दिए जाने की अपेक्षा की गई है। सोवियत संघ के साथ हुए पत्राचार की प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराए जाने से इन्कार करते हुए फिर से वही बात दोहराई गई कि इसमें विदेशी राष्ट्र के साथ संबंध अंतर्ग्रस्त है, और सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(क)(i) के मुताबिक यह ‘सूचना’ के दायरे से बाहर है। 
इस उत्तर से असंतुष्ट अनुज ने केन्द्रीय सूचना आयोग में 29 नवम्बर, 2006 को अपील दायर की, जिस पर पिछले सप्ताह 23 मार्च, 2007 को सूचना आयुक्त ओ.पी. केजरीवाल की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान विदेश मंत्रालय की ओर से अजय चौधरी, अतिरिक्त सचिव (पी.पी.) और ए.के. नाग, संयुक्त सचिव एवं केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी उपस्थित थे। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा दिए गए आदेश के प्रासंगिक अंश निम्नानुसार हैं:
Decision:
8. The Commission heard both the sides. The main stand of the Respondents to the information sought by the Appellant which is regarding the correspondence between India and the Government of the erstwhile USSR and present day Russia was that this information could not be disclosed as it was likely (to) affect the country’s relationship with another State. The Commission also saw the Respondents’ reply to the Appellant in their letter dated 6 November 2006 where besides the reason stated above, it also said that the information was not being disclosed as it did not fall under the category of “information” as defined in the RTI Act as it seeks “anecdotal” reply. 
The Commission could not see the applicability of this answer at all in the present case. The only ground, therefore, on which the information has been denied is that disclosure of the information is likely to affect “relations with a foreign state”.
On making enquiries from the Respondents, it was clear that this correspondence has neither been seen nor been examined by an expert to come to such a conclusion. Therefore, the Commission feels that the Applicant’s application has been treated very casually and his request dismissed very summarily which goes against the very spirit of the RTI-Act.
9. The Commission, therefore, directs the Respondents to first have this correspondence examined by their own expert/s and if need be, by an outside expert who they can rely on and then take a firm decision. In case the experts come to the conclusion that the applicability of the denial clause is not relevant in the case, the material can be disclosed to the Appellant. However, in case the Respondents come to the conclusion that the relations between the Government of India and the Government of Russia would be affected through the disclosure of this information, the Commission would like the issue to be settled only after a reference has been made to the Government of Russia. The Commission would also like to examine the documents for itself before coming to a firm conclusion about the denial of this piece of information to the Appellant.
10. The Commission, therefore, directs the Respondents to have this correspondence examined as stated above and a reply send to the Appellant together with a copy to the Commission latest by 30 June 2007 on receipt of which, the Appellant is free to approach the Commission.
11. The Commission ordered accordingly.
Sd/-
(O.P. Kejariwal)
Information Commissioner
Sd/-
(Pankaj K.P. Shreyaskar)
Assistant Registrar
जैसा कि उपर्युक्त आदेश में स्पष्ट रूप से आयोग ने दर्ज किया है कि सूचना के अधिकार के तहत किए गए आवेदन पर कार्रवाई करते हुए अपना उत्तर देने से पहले विदेश मंत्रालय ने तत्कालीन सोवियत संघ के साथ हुए पत्राचारों की फाइल को देखने तक की आवश्यकता नहीं महसूस की। किसी विशेषज्ञ द्वारा फाइलों की जांच किए बगैर ही आवेदन को यह कहते हुए निपटा दिया जाना कि मांगी गई सूचना ही ‘दंतकथात्मक’ है और विदेशी राष्ट्र के साथ रिश्ते प्रभावित हो सकने की आशंका के कारण इस तरह के पत्राचार की प्रतिलिपि नहीं उपलब्ध कराई जाएगी, मंत्रालय के लापरवाह रवैये को दर्शाता है और यह सूचना का अधिकार अधिनियम की मूल भावना के विपरीत है।
केन्द्रीय सूचना आयोग ने विदेश मंत्रालय को स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हैं कि पहले तो वह प्रासंगिक विषय पर तत्कालीन सोवियत संघ और वर्तमान रूस की सरकार के साथ हुए पत्राचार की अपने विशेषज्ञों से, और जरूरी होने पर, बाहरी विशेषज्ञों से जाँच कराए और उसके आधार पर किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुँचे। आयोग ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेजों की विशेषज्ञों द्वारा जाँच किए जाने के बाद यदि मंत्रालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि उनको उजागर किए जाने से भारत सरकार और रूस सरकार के बीच आपसी रिश्ते बिगड़ सकते हैं तो इस बारे में रूस सरकार को पत्र लिखने के बाद ही मामले को निपटाया जाए और ऐसी स्थिति में अपीलकर्ता को सूचना दिए जाने से इन्कार करने के निर्णय पर पहुँचने से पहले आयोग खुद भी उन दस्तावेजों की जाँच करना चाहेगा।
हालांकि इस बात की पूरी आशंका है कि केन्द्रीय सूचना आयोग के उपर्युक्त आदेश के बावजूद विदेश मंत्रालय द्वारा 30 जून, 2007 तक जो उत्तर दिया जाने वाला है, उसमें भी संबंधित पत्राचार की प्रतिलिपि देने से एक बार फिर इन्कार कर दिया जाएगा। लेकिन यदि ऐसा हुआ तो हमारी यह धारणा और भी प्रबल हो जाएगी कि सरकार भारतीय जनता की भावनाओं के प्रति गैर-जवाबदेह है। किसी दूसरे देश के साथ संबंध खराब हो सकने की आशंका का बहाना करके करोड़ों देशवासियों की भावनाओं का मजाक उड़ाते हुए नेताजी से संबंधित महत्वपूर्ण सूचना को अवैध रूप से छिपाया जाना निश्चय ही दुर्भाग्यजनक है। अपने महान राष्ट्रनायक के प्रति कृतघ्नता की ऐसी अनोखी मिसाल दुनिया में अन्यत्र मिलना दुर्लभ है!

Tuesday, 22 January 2013

नेताजी - अपनों के ही शडयंत्र का शिकार..

इस बात को यहाँ एक बार फिर रेखांकित किया जा रहा है कि जब तक भारत सरकार खुद प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की गोपनीय आलमारियों में कैद नेताजी से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं करती और रूस तथा जापान सरकारों से ऐसा ही करने का अनुरोध नहीं करती, तब तक बहुत-सी बातें स्पष्ट नहीं होंगी, और तब तक हमें परिस्थितिजन्यसाक्ष्यों के तार्किक विश्लेषण के आधार पर घटनाक्रमों का ‘अनुमान’ ही लगाना पड़ेगा- कोई और चारा नहीं है।वैसे, इस मामले में अब ज्यादा भरोसा रूस और जापान सरकारों पर रह गया है। भारत में हमारे प्रशासनिक अधिकारीगण एक-एक कर नेताजी से जुड़े दस्तावेजों को नष्ट कर रहे हैं। जैसे कि फाइल संख्या ‘12(226)/56, विषय- सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की परिस्थितियाँ’ के बारे में बाकायदे शपथपत्र दाखिल करके अधिकारियों ने ‘मुखर्जी आयोग’ को यह बाताया कि इसे वर्ष 1972 में ही नष्ट कर दिया गया था- वह भी बिना प्रतिलिपि तैयार किये।(जरा सोचिये, उस वक्त ‘खोसला आयोग’ इसी विषय पर जाँच कर रहा था!)इस प्रकार, नेहरूजी के समय के ‘प्रधानमंत्री की विशेष फाइलों’ (PM’s Special Files) में से ज्यादातर को- जो नेताजी से जुड़ी थीं- इन्दिराजी के समय में ‘खो गयीं या नष्ट कर दे गयीं’ बताया जाता है।इन फाइलों को नेहरूजी के निजी सचिव मो. युनूस देखते थे। नेहरूजी ने अपने ये फाइल 1956 में (खुदके द्वारा) गठित ‘शाहनवाज आयोग’ को भी नहीं देखने दिये थे।(सच तो यह है कि इन फाईलों के दस्तावेज अगर प्रकाशित हो जाते, तो आज एक के बाद एक करके तीन जाँच आयोगों के गठन की नौबत ही नहीं आती!)बात निकलती है, तो दूर तलक जाती है। इसे हम भारतवासियों का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि हम आज तक सुभाष चन्द्र बोस ही नहीं, लाल बहादूर शास्त्री और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मौतों पर से भी पर्दा नहीं हटा पाये हैं। खैर, ये बातें फिर कभी।***फिलहाल, वे परिस्थितिजन्य साक्ष्य, जिनसे पता चलता है कि नेताजी को ले जाने वाला विमान सकुशल मंचुरिया पहुँचा था और नेताजी वहाँ से सोवियत संघ में प्रवेश कर गये थे:ब्रिटिश प्रधानमंत्री का निर्णयब्रिटेन में विश्वयुद्ध के बाद हुए चुनाव में युद्ध से त्रस्त ब्रिटिश जनता युद्धकालीन प्रधानमंत्री चर्चिल को नकार देती है और विरोधी पक्ष के क्लिमेण्ट एटली को अपना अगला प्रधानमंत्री चुनती है।23 अगस्त 1945 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय के सर आर.एफ. मुडि ‘नेताजी से कैसे निपटा जाय’ (‘How to deal with Bose’)- विषय पर एक रपट तैयार करते हैं। (अत्यन्त गोपनीय पत्र संख्या- 57, दिनांक- 23 अगस्त 1945।)रपट सर ई. जेनकिन्स को सम्बोधित है।(ब्रिटेन में एक बहुत अच्छा कानून है कि एक निश्चित अन्तराल- 30 वर्ष- के बाद ‘गोपनीय’ दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जा सकता है। 1976 में सार्वजनिक हुए दस्तावेजों से ही यह पता चला था कि ब्रिटेन ने तुर्की स्थित अपने एस.ओ.ई. को ‘नेताजी की हत्या’ कर देने का आदेश दिया था, रंगून से सिंगापुर रवाना होने वाली अपनी सेना को ‘नेताजी से मौके पर निपट लेने’ का निर्देश दिया था, और ब्रिटिश जासूसों ने तेहरान और काबुल के सोवियत दूतावासों के हवाले से खबर दी थी कि बोस रशिया में हैं। ...अपने देश में ऐसे किसी कानून की अपेक्षा वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत तो नहीं ही की जा सकती।)वायसराय इस रपट को ब्रिटेन की संसद में पेश करते हैं।मंत्रीपरिषद इस रपट पर टिप्पणी लिखता है-“रूस ने विशेष परिस्थितियों में बोस को स्वीकार कर लिया होगा। अगर ऐसा है, तो हमें उन्हें वापस नहीं माँगना चाहिए।” (“Russia may accept Bose under special circumstances. If that is the case, we shouldn’t demand him back.”)एटली इस पर निर्णय लेते हैं- “उन्हें वहीं रहने दिया जाय, जहाँ वे हैं।”(“Let him remain where he is now.”) एटली यह निर्णय अक्तूबर 1945 में लेते हैं। यानि नेताजी अक्तूबर’45 तक तो जीवित थे ही।नेहरूजी ने एटली को क्या लिखा और किस आधार पर लिखा?26 या 27 दिसम्बर 1945 को नेहरूजी आसिफ अली के निवास पर बैठकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेण्ट एटली के नाम एक पत्र टाईप करवाते हैं। पत्र का मजमून है-“श्री क्लिमेण्ट एटलीब्रिटिश प्रधानमंत्री10 डाउनिंग स्ट्रीट, लन्दनप्रिय मि. एटली,अत्यन्त भरोसेमन्द स्रोत से मुझे पता चला है कि आपके युद्धापराधी सुभाष चन्द्र बोस को स्तालिन द्वारा रूसी क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दे दी गयी है। यह सरासर धोखेबाजी और विश्वासघात है। रूस चूँकि ब्रिटिश-अमेरीकियों का मित्र है, अतः उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था।कृपया इस पर ध्यान दें और जो उचित तथा सही समझें वह करें।आपका विश्वासी,जवाहर लाल नेहरू”अब देखें कि नेहरूजी के ‘अत्यंत भरोसेमन्द सूत्र’ ने क्या लिखा है। यह एक हस्तलिखित नोट है:“नेताजी विमान द्वारा सायगन से चलकर 23 अगस्त 1945 को दोपहर 1:30 पर मंचुरिया के दाईरेन में पहुँचे। विमान एक जापानी बमवर्षक था। उनके साथ बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और गहने थे। विमान से उतरकर उन्होंने केले खाये और चाय पी। वे तथा चार अन्य व्यक्ति, जिनमें एक जापानी अधिकारी सिदेयी थे, जीप में बैठे और रूसी सीमा की ओर चले गये। करीब तीन घण्टे के बाद, जीप वापस लौटी और पायलट को टोक्यो वापस लौट जाने का निर्देश दिया गया।”उपर्युक्त जानकारी हमें ‘आई.एन.ए. डिफेन्स कमिटी’ के कॉन्फिडेन्शियल स्टेनो श्री श्यामलाल जैन के उस बयान से मिलती है, जो उन्होंने ‘खोसला आयोग’ (1970 में गठित) के सामने- बाकायदे शपथ उठाकर- दिया था। श्री जैन नेहरूजी के उस ‘अत्यंत भरोसेमन्द सूत्र’ का हस्ताक्षर नहीं पढ़ पाये थे, क्योंकि वह स्पष्ट नहीं था। मगर ‘सामग्री’ उन्हें याद रह गयी। एटली को लिखे पत्र का मजमून तो उन्हें याद रहना ही था, क्योंकि नेहरूजी के लेटरहेड की चार प्रतियों पर उन्होंने खुद इसे टाईप किया था।अगर नेहरूजी के ‘अत्यंत भरोसेमन्द सूत्र’ की जानकारी तथा श्री जैन की याददाश्त एकदम सही है, तो इसका मतलब यह हुआ कि नेताजी 18 अगस्त से 22 अगस्त 1945 तक ताईपेह में ही गुप्त रुप से रह रहे थे। जाहिर है- इसी दौरान विमान-दुर्घटना के ‘नाटक’ के सभी ‘किरदारों’ ने अपने-अपने ‘संवाद’ याद किये होंगे।22 को ‘इचिरो ओकुरा’ के दाह-संस्कार के बाद 23 अगस्त की सुबह विमान नेताजी और सिदेयी को लेकर ताईपेह से मंचुरिया की ओर रवाना हुआ होगा। जब विमान सकुशल दाईरेन में उतर गया होगा और रूसियों के साथ नेताजी का सम्पर्क कायम हो गया होगा, तब जाकर जापान ने विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की खबर को प्रसारित किया होगा।जहाँ तक जीप पर नेताजी के अलावे ‘चार’ और व्यक्तियों के सवार होने की बात है, इनमें एक तो सिदेयी ही रहे होंगे; दूसरे, ओम्स्क शहर से आये आजाद हिन्द सरकार के कौन्सुल जेनरल काटोकाचु रहे होंगे। बाकी दो में से- हो सकता है- एक स्थानीय ‘मार्गदर्शक’ हो और दूसरा काटोकाचु के साथ आया कोई रूसी अधिकारी।जहाँ तक उस विमान की बात है, बताया जाता है कि वह विमान टोक्यो लौटते वक्त समुद्र के ऊपर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। नेताजी को सकुशल गंतव्य तक पहुँचाने का मिशन पूरा करने के बाद पायलट और को-पायलट ने- सबूत मिटाने के लिए- विमान सहित समुद्र में ‘जलसमाधि’ लेने का निर्णय लिया हो, तो इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं। सिदेयी चूँकि नेताजी के साथ थे, अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि वे भी नेताजी के साथ सदा के लिए अज्ञातवास में चले गये होंगे।विजयलक्ष्मी पण्डित मास्को से क्या खबर लायीं थीं?जब देश आजाद हुआ, तब नेहरूजी की बहन विजयलक्ष्मी पण्डित मास्को में थीं। उन्हें सोवियत संघ में भारत की राजदूत घोषित कर दिया जाता है।जैसा कि बताया जाता है- मास्को से लौटकर एकबार पालम हवाई अड्डे पर श्रीमती पण्डित ने कहा- वे सोवियत संघ से ऐसी खबर लायी हैं, जिसे सुनकर देशवासियों को उतनी ही खुशी मिलेगी, जितनी की आजादी से मिली थी।कूटनीति के अनुसार, विदेश से लायी गयी किसी बड़ी खबर को आम करने से पहले (राजदूत को) देश के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री से सलाह लेनी पड़ती है। भारत के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री- दोनों नेहरूजी ही हैं। सो जाहिर है, विजयलक्ष्मी पण्डित फिर कभी वह “आजादी के समान प्रसन्नता देने वाली खबर” देशवासियों को नहीं सुना पायीं।इसी कहानी का एक दूसरा संस्करण भी है, जिसके अनुसार संविधान सभा में श्रीमती पण्डित कहती हैं कि उनके पास एक महत्वपूर्ण समाचार है, जो सारे देश में बिजली की तरंग प्रवाहित कर सकती है। इस पर नेहरूजी उन्हें बैठ जाने का ईशारा करते हैं।वह घटनाक्रम या बात चाहे जो भी रही हो, मगर इतना है कि-1. विजयलक्ष्मी पण्डित को नेहरूजी मास्को से हटाकर वाशिंगटन भेज देते हैं- यानि उन्हें अमेरीका का राजदूत बना दिया जाता है। और2. 1970 में गठित ‘खोसला आयोग’ इस विषय पर बयान देने के लिए श्रीमती पण्डित को बुलाता है, मगर वे उपस्थित नहीं होतीं।डॉ. राधाकृष्णन का राजदूत से उपराष्ट्रपति बनना: माजरा क्या था?मास्को में भारत के अगले राजदूत बनकर जाते हैं- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन।स्तालिन अब भी सोवियत संघ के राष्ट्रपति हैं। वे अक्सर राधाकृष्णन से मिलते हैं और दर्शनशास्त्र पर चर्चा करते हैं। प्रचलित कहानी के अनुसार, स्तालिन ने राधाकृष्णन को साइबेरिया जाकर नेताजी को ‘देखने’ की अनुमति प्रदान कर दी थी। उन्हें कुछ दूरी से नेताजी को देखना था- बातचीत नहीं करनी थी।इस कहानी के एक दूसरे संस्करण के अनुसार, डॉ. राधाकृष्णन मास्को में नेताजी से मिले थे और नेताजी ने बाकायदे उनसे अनुरोध किया था कि वे उनकी (नेताजी की) भारत वापसी की व्यवस्था करें।सच्चाई चाहे जो हो, मगर इतना सच है कि भारत में इन खबरों ने ऐसा जोर पकड़ा कि डॉ. राधाकृष्णन को मास्को से बुलाना पड़ गया। यहाँ तक तो बात सामान्य है- वह खबर एक अफवाह हो सकती है।मगर इसके बाद नेहरूजी राधाकृष्णन को अचानक भारत का उपराष्ट्रपति बनवा देते हैं। जबकि काँग्रेस में उनसे वरिष्ठ कई नेता मौजूद हैं, जिनका स्वतंत्रता संग्राम में भारी योगदान रहा है।मौलाना आजाद के मुँह से निकलता भी है- “क्या हम सब मर गये हैं?”बाद के दिनों में ‘खोसला आयोग’ डॉ. राधाकृष्णन को भी सफाई देने के लिए बुलाता है। वे अस्पताल में आरोग्य लाभ कर रहे हैं, मगर ‘डिक्टेट’ करके वे अपना बयान टाईप करवा सकते थे- कि वह अफवाह सच्ची थी या झूठी; या आयोग खुद चेन्नई जाकर अस्पताल में उनकी गवाही ले सकता था... मगर ऐसा कुछ नहीं होता।ऐसा नहीं है कि डॉ. राधाकृष्णन ने कभी कुछ कहा ही नहीं होगा। कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. सरोज दास और डॉ. एस.एम. गोस्वामी का कहना था कि डॉ. राधाकृष्णन ने उनसे नेताजी के रूस में होने की बात स्वीकारी थी।साइबेरिया जेल का “खिल्सायी मलंग”सोवियत साम्यवादी पार्टी के क्राँतिकारी सदस्य तथा भारत की साम्यवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक अबनी मुखर्जी साइबेरिया की जेल में नेताजी के बगल वाले सेल में ही बन्द थे।जेल में नेताजी “खिल्सायी मलंग” के नाम से जाने जाते थे। ये बातें उन्होंने अपने बेटे जॉर्जी मुखर्जी को बतायी थीं और बाद में जॉर्जी ने भूतपूर्व राजदूत सत्यनारायण सिन्हा को ये बातें बतायीं।अबनी, वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (सरोजिनी नायडु के भाई) के साथी थे। दोनों को स्तालिन ने 1937 से ही कैद कर रखा था। बाद में दोनों को स्तालिन मरवा देते हैं।श्री सिन्हा भारत आकर इसे एक ताजी खबर समझकर नेहरूजी को इसके बारे में बताते हैं। मगर वे चकित रह गये यह देखकर कि खबर पर प्रसन्न होने के बजाय नेहरूजी उन्हें डाँटना शुरु कर देते हैं।तब से दोनों के बीच सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं। श्री सिन्हा ने इस घटना का जिक्र अपनी किताब में किया है। खोसला आयोग को भी उन्होंने इसकी जानकारी दी थी।अय्यर का नोट1952 में एस.ए. अय्यर टोक्यो यात्रा पर जाते हैं। वहाँ से लौटकर एक व्यक्तिगत नोट वे नेहरूजी को सौंपते हैं, जो इस प्रकार है:‘मैंने इसबार एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र की है। कर्नल टाडा ने मुझे बताया कि युद्ध के अन्त में जब जापान ने आत्मसमर्पण किया, तब तेराउचि ने नेताजी की मदद की जिम्मेवारी ली और मुझे (टाडा को) काटा-काना (चन्द्र बोस) के पास उन्हें रूसी सीमा पर पहुँचने की सूचना देने के लिए भेजा- वहाँ उन्हें सारी मदद मिल जायेगी। व्यवस्था की गयी कि चन्द्र बोस सिदेयी के विमान से जायेंगे। जेनरल सिदेयी दाईरेन तक चन्द्र बोस की देख-भाल करेंगे, उसके बाद उन्हें अपने बल पर रूसियों से सम्पर्क करना होगा। जापानी दुनिया के सामने घोषणा कर देंगे कि नेताजी दाईरेन से लापता हो गये। इससे मित्रराष्ट्र वालों की नजरों में वे (जापानी) बरी हो जायेंगे।’कर्नल टाडा के इस कथन से अनुमान लगाया जा सकता है कि-16 से 19 अगस्त 1945, शाम चार बजे तक जापान की योजना सिर्फ इतनी थी कि नेताजी को दाईरेन में उतारकर ‘नेताजी के लापता होने’ की खबर प्रसारित कर देनी है। यह आसान था।19 अगस्त को शाम चार बजे नानमोन अस्पताल में ‘इचिरो ओकुरा’ नामक एक ताईवानी सैनिक की मौत हो जाती है और किसी के दिमाग में यह योजना कौंधती है कि क्यों न ‘इचिरो ओकुरा’ के अन्तिम संस्कार को नेताजी का संस्कार बता दिया जाय?नयी योजना काफी जल्दीबाजी में बनी होगी और इसलिए न तो हवाई पट्टी पर विमान-दुर्घटना के चिन्ह छोड़े जा सके, न ए.टी.सी. के ‘लॉगबुक’ में दुर्घटना की प्रविष्टि बनायी जा सकी, और न ही सिदेयी, ताकिजावा और आयोगी के शवों के (गायब होने के) बारे में कोई कहानी गढ़ी जा सकी।नेहरूजी को माउण्टबेटन की चेतावनीमाउण्टबेटन के बुलावे पर नेहरूजी जब 1946 में (भावी प्रधानमंत्री के रूप में) सिंगापुर जाते हैं, तब गुजराती दैनिक ‘जन्मभूमि’ के सम्पादक श्री अमृतलाल सेठ भी उनके साथ होते हैं। लौटकर श्री सेठ नेताजी के भाई शरत चन्द्र बोस को बताते हैं कि एडमिरल लुई माउण्टबेटन ने नेहरूजी को कुछ इन शब्दों में चेतावनी दी है-‘हमें खबर मिली है कि बोस विमान दुर्घटना में नहीं मरे हैं, और अगर आप जोर-शोर से उनका यशोगान करते हैं और आजाद हिन्द सैनिकों को भारतीय सेना में फिर से शामिल करने की माँग करते हैं, तो आप नेताजी के प्रकट होने पर भारत को उनके हाथों में सौंपने का खतरा मोल ले रहे हैं।’इस चेतावनी के बाद नेहरूजी सिंगापुर के ‘शहीद स्मारक’ (नेताजी द्वारा स्थापित) पर माल्यार्पण का अपना पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम रद्द कर देते हैं। बाद में वे कभी नेताजी की तारीफ नहीं करते; प्रधानमंत्री बनने पर आजाद हिन्द सैनिकों को भारतीय सेना में शामिल नहीं करते, नेताजी को ‘स्वतंत्रता-सेनानी’ का दर्जा नहीं दिलवाते, और... जैसाकि हम और आप जानते ही हैं... हमारी पाठ्य-पुस्तकों में स्वतंत्रता-संग्राम का इतिहास लिखते वक्त इसमें नेताजी और उनकी आजाद हिन्द सेना के योगदान का जिक्र न के बराबर किया जाता है।(उल्लेखनीय है कि 15 से 18 जुलाई 1947 को कानपुर में आई.एन.ए. के सम्मेलन में नेहरूजी से इस आशय का अनुरोध किया गया था कि आजादी के बाद आई.एन.ए. (आजाद हिन्द) सैनिकों को नियमित भारतीय सेना में वापस ले लिया जाय, मगर नेहरूजी इसे नहीं निभाते; जबकि मो. अली जिन्ना पाकिस्तान गये आजाद हिन्द सैनिकों को नियमित सेना में जगह देकर इस अनुरोध का सम्मान रखते हैं।)

नेताजी के रहस्य आज भी कायम.


कोलकाता, 23 जनवरी- नेताजी को लेकर तरह-तरह की अटकलें हैं. 17 जनवरी 1941 को नेताजी देश छोड़ कर चले गये. उसके बाद क्या हुआ, यह कोई नहीं जानता है. इतिहासविद् डॉ पुरबी राय का कहना है कि 1945 में नेताजी रूस में ही मौजूद थे. जवाहर लाल नेहरु ने स्टालिन से संपर्क कर नेताजी के बारे में जानकारी ली थी. वे रूस जाना चाहते थे, लेकिन वहां की सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी. स्टालिन की मौत के बाद ख्रुश्चेव रूस के राष्ट्रपति बने. 1955 में वह कोलकाता के दौरे पर आये थे.सोवियत संघ के पतन के बाद भारत के कुछ विशेषज्ञों ने रूस का दौरा कर यह पता लगाने की कोशिश की थी कि क्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस साइबेरिया के किसी जेल में 1945 के बाद भी रखे गये थे.

यह विशेषज्ञ दल ऐशयाटिक सोसायटी की ओर से भेजा गया था. दल के सदस्यों में से एक ने साइबेरिया के जेल में सजा काट चुके कुछ ऐसे लोगों से भी मुलाकात की, जिनके साथ एक भारतीय कैदी सजा काट रहा था और संभवतरू वही नेताजी थे. इस अपुष्ट सूचना के आधार पर विशेषज्ञों ने भारत सरकार से इस संबंध में रूस सरकार से दस्तावेज मंगाने की दरख्वास्त की थी, परंतु ऐसा नहीं हो सका.
टीम के सदस्यों में ही शामिल एक अन्य विशेषज्ञ डॉ पुरबी राय का मानना है कि इंडियन नेशनल आर्मी को दुनिया के सबसे सुसंगठित सैन्य टुकड़ी के रूप में तैयार करने के कारण नेताजी सुभष चंद्र बोस भारत के कई पड़ोसी राष्ट्रों की नजर में भी खटक रहे थे और शायद इसी कारण उन्हें गुमनामी झेलनी पड़ी. यही वजह है कि आजादी के छह दशक बीत जाने के बाद भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत को लेकर रहस्य बरकरार है.

1956 में नेहरु ने शहनवाज कमेटी की रिपोर्ट पेश की थी. रिपोर्ट में यह कहा गया कि तायकुहू विमान हादसे में नेताजी की मौत हो गयी है. 18 अगस्त 1945 को नेताजी की मौत हुई, यह बताया गया. श्रीमती राय ने कहा कि यह रिपोर्ट सही नहीं है. उनका कहना है कि सरकार सच्चाई लोगों के सामने नहीं ला रही है. इस बारे में नेताजी का भतीजा सुब्रत बोस ने बताया कि जब वे सांसद थे, तो उन्होंने भी केंद्र सरकार से सच्चाई का पता लगाने की मांग की थी. लोग अब भी जानना चाहते हैं कि नेताजी का आखिर हुआ क्या. लोगों को अब तक इस बारे में पुख्ता जानकारी नहीं है. उनका कहना है कि महात्मा गांधी से ज्यादा लोग नेताजी को पसंद करते थे. 1939 में तीन मई को नेताजी ने फॉरवर्ड ब्लॉक नामक राजनीतिक पार्टी की स्थापना की. नेताजी ने कहा था कि वामपंथी यदि एकबद्ध नहीं होंगे, तो दक्षिण पंथियों के खिलाफ वे लड़ाई नहीं लड़ सकते हैं. जब देश से बाहर नेताजी गये, तो उन्होंने अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस को इसकी जानकारी दी थी. इस बात को एकमात्र उनके बड़े भाई ही जानते थे. नेताजी ने अपनी मां प्रभावती देवी को भी इस बात की जानकारी नहीं दी थी. इससे अधिक नेताजी ने कुछ नहीं बताया था.

वीर सावरकार और सुभाषचंद्र बोस.


26 जून 1940 सुभाष चन्द्र बोस सावरकर सदन पहुंचे,
वहां वीर सावरकर से उनकी मुलाकात हुई
सावरकर ने बोस को रायबिहारी बोस के साथ हुए पत्रव्यवहार के बारे में बताया की उन्होंने 1,50000 युद्धबंदी भारतीयों को एकत्रित करके एक सेना बनाई है,
ठीक छ महीने बाद 19 जनवरी 1941 को बोस अचानक गुपचुप तरीके से जर्मनी पहुँच जाते है और रायबिहारी बोस द्वारा नियंत्रित भारतीय सेना को अपने नेतृत्व में ले लेते है,
1940 में हिन्दू महासभा के 26वे अधिवेशन में सावरकर हिन्दुओ को ब्रिटिश सेना में भर्ती होने का आग्रह करते है, उनके कहने पर हिन्दू महासभा के कार्यकर्ता सभी स्कुल, कालेजो, मंदिरों और गुरुद्वारों में पहुंचकर सुभाष जी के लिए चंदा इकठ्ठा करते है और साथ ही लोगो से अपने अपने बच्चो को सेना में भर्ती होने का आग्रह करते है,
सावरकर की दूरदृष्टि से अनभिज्ञ कांग्रेस, कम्युनिस्ट और अन्य राष्ट्रद्रोही संगठन सावरकर पर अंग्रेजो से मिले होए का आरोप लगाते है,

सितम्बर 1941 में फ्री इंडिया रेडिओ से बोलते हुए सुभाश चन्द्र बोस देश को संबोधित करते हुए कहते है की जब कांग्रेस और अन्य दल ब्रिटिश सेना में भर्ती हुए सैनिको को भाड़े के टट्टू कह कर संबोधित कर रहे थे तो ये देख कर बड़ी ख़ुशी हुई की सावरकर बड़ी ही निर्भीकता के साथ देश के युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए कह रहे है, ये सावरकर के ही पुन्य का प्रताप है जो हमे आज उनके द्वारा आग्रह करके ब्रिटिश सेना में भर्ती किये गये सेनानी प्रशिक्षित सैनिको के रूप में मिल रहे है

-: 23 जून 1945 :- आजाद हिंद की अस्थायी सरकार, सिंगापुर रेडियो से प्रसारण




भारत में मेरी बहनों और भाइयों! कल मैंने आपसे कहा था कि किसी भी दशा में ‘काँग्रेस वर्किंग कमिटी’ को ‘ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी’ या ‘काँग्रेस’ की ओर से फैसले नहीं लेने चाहिए वर्किंग कमिटी एक विशिष्ट निकाय है। इसके द्वारा महत्वपूर्ण फैसले करना इसकी शक्तियों का उल्लंघन है, काँग्रेस के संविधान के अनुसार गलत है और नैतिक रुप से अनुचित है। इसी में मुझे जोड़ना चाहिए था- वर्किंग कमिटी द्वारा ऐसा करना न तो बुद्धिमानी है, न ही राजनीतिक। बाहर से एक पर्यवेक्षक के नजरिये से देखने पर लगता है कि वर्किंग कमिटी एक अशोभनीय जल्दीबाजी का प्रदर्शन कर रही है। मैं यह कहने के लिए मजबूर हूँ कि महात्मा गाँधी तथा वर्किंग कमिटी के मुकाबले श्री जिन्ना ने बुद्धिमानी एवं सावधानी भरा कदम उठाया है। मेरे सामने जो रपट है, उसके अनुसार, उन्होंने घोषणा की है कि वे मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों को तब तक शिमला सम्मेलन में शामिल होने की सलाह नहीं दे सकते, जब तक कि 24 तारीख को लॉर्ड वावेल के साथ उनका साक्षात्कार नहीं हो जाता। अब श्री जिन्ना के दिल में मकसद चाहे जो हो, उन्होंने लॉर्ड वावेल द्वारा दिये गये प्रस्ताव को लपकने की हड़बड़ी नहीं दिखायी है। सम्मेलन को आगे बढ़ाने के लिए कहकर श्री जिन्ना ने एक और समझदारी एवं सावधानी भरा कदम उठाया है।
मुझे लगता है कि काँग्रेस वर्किंग कमिटी ने भी शिमला सम्मेलन की तारीख को आगे बढ़ाने के लिए दवाब डाला होता, तो लॉर्ड वावेल मजबूर हो जाते। हालाँकि यह एक अच्छी बात है कि काँग्रेस वर्किंग कमिटी ने अन्तिम निर्णय लेने के लिए शिमला सम्मेलन से पहले तथा सम्मेलन के दौरान बैठकें आयोजित करने का फैसला लिया है। अगर वर्किंग कमिटी के कुछ सदस्य महात्मा गाँधी और अन्यान्य प्रतिनिधियों को जरूरी सलाह देने के उद्देश्य से पहले ही शिमला पहुँचकर वहाँ मौजूद रहते, तो यह एक और नासमझी भरा कदम होता। अगर ऐसा किया गया होता, तो इससे यही जाहिर होता कि वर्किंग कमिटी लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव को हथियाने के लिए कुछ ज्यादा ही तत्पर है। अब जबकि थोड़ा-सा समय मिल गया है, मैं आशा करता हूँ कि काँग्रेस की ओर से अन्तिम फैसला लेने से पहले ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी का एक सम्मेलन बुलाया जायेगा। सिर्फ वर्किंग कमिटी के फैसले पर लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी के बहुत-से नेता अभी जेलों में बन्द हैं। अगर महात्मा गाँधी तथा वर्किंग कमिटी इस बात पर जोर डालते हैं, तो वायसराय को उन्हें रिहा करने का आदेश जारी करना पड़ेगा। अगर वायसराय ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी के सदस्यों को रिहा करने से मना कर देते हैं, तो उनकी नेकनीयती पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए जब मैं ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी बुलाने की माँग कर रहा हूँ, तो मेरा मतलब यह कतई नहीं है कि- वर्तमान में जिस ढंग से यह संस्था संगठित है, उस हिसाब से- यह संस्था हमारी राष्ट्रीय भावना की एकमात्र संरक्षक है! ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी के जिन सदस्यों ने ब्रिटेन के साथ समझौता करने के वर्किंग कमिटी के फैसले विरोध किया है, उनके प्रति काँग्रेस की सर्वोच्च कार्यकारिणी ने हाल में जो व्यवहार किया है, उससे ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी ने अपने ‘प्रतिनिधि’ वाले चरित्र को कुछ हद तक खो दिया है। जो दिग्गज ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष जारी रखना चाहते थे, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना काँग्रेस हाई कमान के लिए क्या हास्यास्पद तथा बदनामी भरा कदम नहीं था? जबकि दूसरी तरफ, सी. राजगोपालाचारी-जैसे काँग्रेसियों को बिना दण्ड दिये छोड़  गया, जो जनता के बीच जाकर ब्रिटिश सरकार के साथ बिना शर्त सहयोग करने की नीति की लगातार वकालत किये जा रहे हैं! जिन भूलाभाई देसाई ने पिछले नागरिक अवज्ञा आन्दोलन में अपनी भूमिका नहीं निभाई, उन्हें सेण्ट्रल असेम्बली में काँग्रेस का नेता बनाना क्या अनुचित और मूर्खतापूर्ण नहीं था? खैर, इन बातों को रहने दिया जाय। ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी में भी मतभेद हैं, फिर भी, अगर मैं यह चाहता हूँ कि वर्किंग कमिटी के स्थान पर ऑल इण्डिया काँग्रेस कमिटी इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर फैसला ले, तो ऐसा इसलिए है कि यह सांवैधानिक रुप से सही और उचित रहेगा। यह मुद्दा काँग्रेस के आधारभूत सिद्धान्तों एवं संकल्पों को प्रभावित करता है- खासतौर पर काँग्रेस के ‘सम्पूर्ण आजादी’ के उद्देश्य को; और अतः यह न्यायोचित होगा कि जनता के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि इसपर फैसला लें।
मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अगर महात्मा गाँधी अतिरिक्त सावधानी नहीं बरतते हैं, तो वायसराय और श्री जिन्ना बड़ी चतुराई से उन्हें एक ऐसी स्थिति में डाल देंगे, जहाँ काँग्रेस को एक्जीक्यूटिव काउन्सिल में सिर्फ उन्हीं सीटों के लिए नामांकन दाखिल करना पड़ेगा, जिन्हें वायसराय ने ‘हिन्दू जाति’ के लिए आरक्षित रख छोड़ा है। दूसरे शब्दों में, इस बात का खतरा बहुत ज्यादा है कि महात्मा गाँधी को चतुराई से ऐसी स्थिति में डाल दिया जायेगा, जहाँ जल्दीबाजी में वे यह स्वीकार कर लेंगे कि ‘काँग्रेस’ शब्द ‘हिन्दू जाति’ का पर्यायवाची है। यह भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की राजनीतिक मृत्यु होगी, जिससे उबर पाना काँग्रेस के लिए असम्भव होगा।
इस खतरे को टाला जा सकता है, अगर शिमला सम्मेलन में काँग्रेस-प्रतिनिधिगण कमाण्डर-इन-चीफ को छोड़कर सभी सीटों के लिए नामों का एक पैनल सौंप दें। क्या काँग्रेस-प्रतिनिधि ऐसा करेंगे? मुझे खुशी है कि वर्किंग कमिटी इस दिशा में सोच रही है। मगर सोचना काफी नहीं है। काँग्रेस-प्रतिनिधियों को वायसराय पर एक्जीक्यूटिव काउन्सिल के गठन के लिए धार्मिक एवं साम्प्रदायिक आधार को त्यागने और इसके स्थान पर राजनीतिक एवं राष्ट्रीय आधार को अपनाने के लिए दवाब बनाना पड़ेगा। हमें अपने सामने खड़ी मुश्किलों को भूलना नहीं चाहिए। मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि शान्ति सम्मेलन या राजनीतिक गोलमेज सम्मेलनों में सिर्फ युद्धरत पक्षों को ही भाग लेने का अधिकार होता है। आज अगर दूरगामी बदलावों की सीढ़ी के रुप में अँग्रेज कार्यकारी परिषद के आंशिक भारतीयकरण के लिए राजी हुए हैं, तो ऐसा श्री जिन्ना या मुस्लिम लीग के कारण नहीं, बल्कि काँग्रेस के कारण हुआ है, जो अपनी सारी ताकत लगाकर ब्रिटिश सरकार के साथ संघर्ष करती आ रही है!
1931 के गोलमेज सम्मेलन के समय मैंने स्पष्ट किया था कि सिर्फ काँग्रेस और काँग्रेस के साथ कन्धा मिलाकर संघर्ष करने वाले ही लन्दन में होने वाले इस सम्मेलन में भाग लेने के हकदार हैं। उस वक्त मैंने देशवासियों को याद दिलाया था कि जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री मिस्टर लॉयड जॉर्ज ने आयरलैण्ड में सिन-फेन पार्टी को छकाते हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी आयरिश पार्टियों को आमंत्रित करना चाहा था, तब सिन-फेन पार्टी ने इस सम्मेलन में भाग लेने से मना कर दिया था, क्योंकि उनके अनुसार ऐसा सम्मेलन आयरलैण्ड का प्रतिनिधित्व नहीं करता। सिन-फेन पार्टी ने अपना संघर्ष जारी रखा और अन्ततः वह दिन आया, जब अँग्रेजों को सिर्फ सिन-फेन पार्टी के साथ गोलमेज सम्मेलन करने के लिए बाध्य होना पड़ा। हमारे मामले में, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जिसने ब्रिटिश सरकार के साथ लड़ाई लड़ी है, सिर्फ उन्हें ही हक है ब्रिटिश प्रतिनिधियों के साथ गोलमेज सम्मेलन में भारत की ओर से बोलने तथा भारत का प्रतिनिधित्व करने का। आखिर मुस्लिम लीग का जो भी महत्व है, वह मोटे तौर पर इसलिए है कि उसे ब्रिटिश का समर्थन प्राप्त है। मुस्लिम लीग को बेवजह महत्व देकर काँग्रेस जमीयत-उल-उलेमा, मजलिस-ए-अहरार, खुदाई-खिदमतगार, आजाद मुस्लिम लीग, शिया कॉन्फ्रेन्स, प्रजा पार्टी, ऑल इण्डिया मोमिन पार्टी इत्यादि राष्ट्रवादी संगठनों के साथ और साथ ही, कौम की आजादी के लिए भारी बलिदान करने वाले भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस में मुस्लिमों के बड़े एवं प्रभावशाली तबके के साथ धोखा कर रही है।
भारत से आनेवाली खबरों से ऐसा जाहिर होता है कि विभिन्न मंचों से लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव का विरोध हो रहा है। दुर्भाग्यवश, यह विरोध संगठित नहीं हो पा रहा है। 1940 में ऐसा ही खतरा पैदा हुआ था, जब काँग्रेस ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ समझौता करने के की दिशा में अग्रसर हो रही थी, तब देश के सार्वजनिक जीवन के तमाम कट्टरपन्थी तत्वों को एकत्रित करते हुए हमने रामगढ़ में ‘अखिल भारतीय समझौता-विरोधी सम्मेलन’ बुलाया था। ऐसा ही एक सम्मेलन फिर होना चाहिए- वह भी बिना किसी देरी के! अभी अगर एक अखिल भारतीय वावेल-विरोधी सम्मेलन आयोजित हो जाता है, तो यह लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव के विरोध में संघर्ष खड़ा करने, संगठित होने तथा एक साझा मंच तैयार करने की दिशा में काफी लाभदायक होगा। इस सम्मेलन के तहत किसी एक खास दिन देशभर में बैठकें की जानी चाहिए और लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव के बारे में भारत की वास्तविक राय को व्यक्त करते हुए प्रस्ताव पारित किये जाने चाहिए। अगर 5 जुलाई को- इंग्लैण्ड में आम चुनाव वाले दिन- इस ‘अखिल भारतीय वावेल-विरोधी दिवस’ को मनाया जाता है, तो यह एक अच्छा विचार रहेगा।
यहाँ पूर्वी एशिया में हम 4 जुलाई को एक उत्सव मनाने जा रहे हैं। सारी दुनिया में 4 जुलाई को अमेरीकी स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाया जाता है। पूर्वी एशिया में इसी दिन ‘इण्डियन इण्डिपेण्डेन्स लीग’ ने नयी रोशनी के साथ खुद को आत्मसात् किया था और अपने जीवन में नये चरण की शुरुआत की थी। सारे पूर्वी एशिया में जहाँ कहीं भी भारतीय हैं, 4 जुलाई को जनमत-सर्वेक्षण के रुप में मनाया जायेगा। हम पूर्वी एशिया के सभी भारतीयों को उस दिन लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव पर अपनी राय देने के लिए अपील करेंगे; और अगर वे प्रस्ताव को खारिज करते हैं, तो हम हर हाल में भारत की आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने के अपने निश्चय पर फिर से कायम हो जायेंगे- चाहे काँग्रेस वर्किंग कमिटी लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव को स्वीकार ही क्यों न कर ले!
घर में मेरी बहनों और भाईयों! आज के लिए बस इतना ही। सोमवार 25 तारीख को मैं भारत के क्रान्तिकारियों को विशेष रुप से सम्बोधित करना चाहूँगा कि अगर काँग्रेस वर्किंग कमिटी लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है, तो उन्हें क्या करना है। वायसराय आते रहेंगे और जाते रहेंगे, मगर भारत बना रहेगा; और स्वतंत्रता के लिए भारत का संघर्ष अन्ततः सफल होकर रहेगा!
जय हिन्द!

Monday, 21 January 2013

वाराहमिहिर/Varahmihir


वाराहमिहिर गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और ज्योतिष शास्त्री थे। इनका जन्म छठी शताब्दी ईसवी में उज्जैन में हुआ। उस समय भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग, गुप्तकाल, चल रहा था। देश वाह्य आक्रमणों से सुरक्षित था और प्रजा सुखी थी। शांति और समृद्धि के समय में विज्ञान, साहित्य और कला के क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई। वाराहमिहिर चन्द्रगुप्त के नवरत्नों में से एक थे। 

वाराहमिहिर के नाम के बारे में एक कथा प्रचलित है। वाराहमिहिर ने ज्योतिष-शास्त्र में विशेष योग्यता प्राप्त थी। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने उन्हें नव-रत्न की उपाधि दी। राजा विक्रमादित्य के पुत्र-जन्म के समय मिहिर ने भविष्यवाणी की कि अमुक वर्ष के अमुक दिन एक सुअर (वाराह) इस बालक को मार डालेगा। राजा ने अपने पुत्र की सुरक्षा के लिए बहुत इंतजाम किये लेकिन अंत में मिहिर की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। तब से मिहिर वाराहमिहिर कहलाये। वाराहमिहिर सूर्य के उपासक थे। यह माना जाता है कि सूर्य के आशीर्वाद से ही उनको ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त हुआ।
वाराहमिहिर ने तीन महत्वपूर्ण ग्रन्थ, वृहज्जातक, वृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका की रचना की।

वृहत्संहिता में प्रकृति की भाषा को समझने और उससे भविष्य का पता लगाने का प्रयास किया गया है। अगर हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि प्रकृति हर पल किसी न किसी रूप में हमें कुछ बताने की कोशिश करती रहती है। प्राचीन समय से ही हिन्दुओं ने प्रकृति की आवाज को सुनने और समझने का प्रयत्न किया है। आज वैज्ञानिक इस बात से सहमत हैं कि पशु-पक्षी मौसम में होने वाले बदलाव को पहले से भांपकर अपने आचरण में परिवर्तन करते हैं। वृहत्संहिता में पशु-पक्षी इत्यादि के आचरण में होने वाले परिवर्तन का अवलोकन करके भविष्यवाणी करने के तरीके बताये गए हैं। इसमें कृषि विज्ञान की जानकारी भी है। कृषि के लिए जमीन की तैयारी, एक पेड़ की कलम को दूसरे में लगाने, सही मौसम में वृक्षों की सिंचाई करने, वृक्षों के आरोपण की दूरी, वृक्षों में उत्पन्न बीमारियों की चिकित्सा, जमीन में गड्ढ़ा कर बोने के तरीके आदि का भी उल्लेख किया है। वाराहमिहिर ने ज्योतिष के आधार पर नक्षत्रों के अनुसार वर्षा के विषय में विस्तृत विवरण दिया है। उस समय भी वर्षा को मापने के लिए एक विशेष मानक पैमाने का प्रचलन था। बृहत्संहिता में ग्रहण का वास्तविक कारण भी बताया गया है। वाराहमिहिर ने लिखा है - चन्द्रग्रहण में चन्द्र पृथ्वी की छाया में आ जाता है तथा सूर्यग्रहण में चन्द्र सूर्य में प्रविष्ट हो जाता है (अर्थात सूर्य एवं पृथ्वी के बीच में चन्द्र आ जाता है)। ‘वृहत्‌ संहिता‘ में अस्त्र-शस्त्रों को बनाने के लिए अत्यंत उच्च कोटि के इस्पात के निर्माण की विधि का वर्णन किया है। भारतीय इस्पात की गुणवत्ता इतनी अधिक थी कि उनसे बनी तलवारों के फारस आदि देशों तक निर्यात किये जाने के ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिलित हैं।
वृहज्जातक में वाराहमिहिर ने ज्योतिष विज्ञान विशेषतः यात्रा मुहूर्त, विवाह मुहूर्त, जन्म-कुंडली आदि का वर्णन किया है।

पंचसिद्धान्तिका में खगोल शास्त्र का वर्णन किया गया है। इसमें वाराहमिहिर के समय प्रचलित पाँच खगोलीय सिद्धांतों का वर्णन है। इस ग्रन्थ में ग्रह और नक्षत्रों का गहन अध्ययन किया गया है। इन सिद्धांतों द्वारा ग्रहों और नक्षत्रों के समय और स्थिति की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इन पुस्तकों में त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए हुए हैं, जो वाराहमिहिर के त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि वाराहमिहिर कुछ समय महरौली (मिहिरावली), दिल्ली में भी रहे। इतिहासकारों के अनुसार चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा वहां पर 27 मंदिरों का निर्माण कराया गया था। यह कार्य वाराहमिहिर के मार्गदर्शन में किया गया। इन मंदिरों को मुस्लिम शासकों द्वारा नष्ट कर दिया गया। इस स्थान को मिहिरावली यानी वाराहमिहिर (मिहिर) की देखरेख में बने मंदिरों की पंक्ति (अवली) के नाम से जाना गया। जगप्रसिद्ध कुतुबमीनार एक समय में वाराहमिहिर की वेधशाला थी।

महर्षि कणाद



हजारों वर्ष पूर्व महर्षि कणाद ने सर्वांगीण उन्नति की व्याख्या करते हुए कहा था ‘यतो भ्युदयनि:श्रेय स सिद्धि:स धर्म:‘ जिस माध्यम से अभ्युदय अर्थात्‌ भौतिक दृष्टि से तथा नि:श्रेयस याने आध्यात्मिक दृष्टि से सभी प्रकार की उन्नति प्राप्त होती है, उसे धर्म कहते हैं।

भारत में प्रथम परमाणु विज्ञानी महर्षि कणाद अपने वैशेषिक दर्शन के १०वें अध्याय में कहते हैं ‘दृष्टानां दृष्ट प्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय‘ अर्थात्‌ प्रत्यक्ष देखे हुए और अन्यों को दिखाने के उद्देश्य से अथवा स्वयं और अधिक गहराई से ज्ञान प्राप्त करने हेतु रखकर किए गए प्रयोगों से अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त होता है।

इसी प्रकार महर्षि कणाद कहते हैं पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, दिक्‌, काल, मन और आत्मा इन्हें जानना चाहिए। इस परिधि में जड़-चेतन सारी प्रकृति व जीव आ जाते हैं।

ईसा से ६०० वर्ष पूर्व ही कणाद मुनि ने परमाणुओं के संबंध में जिन धारणाओं का प्रतिपादन किया, उनसे आश्चर्यजनक रूप से डाल्टन की संकल्पना मेल खाती है। कणाद ने न केवल परमाणुओं को तत्वों की ऐसी लघुतम अविभाज्य इकाई माना जिनमें इस तत्व के समस्त गुण उपस्थित होते हैं बल्कि ऐसी इकाई को ‘परमाणु‘ नाम भी उन्होंने ही दिया तथा यह भी कहा कि परमाणु स्वतंत्र नहीं रह सकते।

कणाद की परमाणु संबंधी यह धारणा उनके वैशेषिक सूत्र में निहित है। कणाद आगे यह भी कहते हैं कि एक प्रकार के दो परमाणु संयुक्त होकर ‘द्विणुक‘ का निर्माण कर सकते हैं। यह द्विणुक ही आज के रसायनज्ञों का ‘वायनरी मालिक्यूल‘ लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि भिन्न भिन्न पदार्थों के परमाणु भी आपस में संयुक्त हो सकते हैं। यहां निश्चित रूप से कणाद रासायनिक बंधता की ओर इंगित कर रहे हैं। वैशेषिक सूत्र में परमाणुओं को सतत गतिशील भी माना गया है तथा द्रव्य के संरक्षण (कन्सर्वेशन आफ मैटर) की भी बात कही गई है। ये बातें भी आधुनिक मान्यताओं के संगत हैं।

हमारे यहां प्राचीन काल से व्रह्मांड क्या है और कैसे उत्पन्न हुआ, क्यों उत्पन्न हुआ इत्यादि प्रश्नों का विचार हुआ। पर जितना इनका विचार हुआ उससे अधिक ये प्रश्न जिसमें उठते हैं, उस मनुष्य का भी विचार हुआ। ज्ञान प्राप्ति का प्रथम माध्यम इन्द्रियां हैं। इनके द्वारा मनुष्य देखकर, चखकर, सूंघकर, स्पर्श कर तथा सुनकर ज्ञान प्राप्त करता है। बाह्य जगत के ये माध्यम हैं। विभिन्न उपकरण इन इंद्रियों को जानने की शक्ति बढ़ाते हैं।

कुछ मामलों में महर्षि कणाद का प्रतिपादन आज के विज्ञान से भी आगे जाता है। महर्षि कणाद कहते हैं, द्रव्य को छोटा करते जाएंगे तो एक स्थिति ऐसी आएगी जहां से उसे और छोटा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि उससे अधिक छोटा करने का प्रत्यन किया तो उसके पुराने गुणों का लोप हो जाएगा। दूसरी बात वे कहते हैं कि द्रव्य की दो स्थितियां हैं- एक आणविक और दूसरी महत्‌। आणविक स्थिति सूक्ष्मतम है तथा महत्‌ यानी विशाल व्रह्माण्ड। दूसरे, द्रव्य की स्थिति एक समान नहीं रहती है। अत: कणाद कहते हैं-

‘धर्म विशेष प्रसुदात द्रव्य
गुण कर्म सामान्य विशेष समवायनां
पदार्थानां साधर्य वैधर्यभ्यां
तत्वज्ञाना नि:श्रेयसम वै.द.-४

अर्थात्‌ धर्म विशेष में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष तथा समवाय के साधर्य और वैधर्म्य के ज्ञान द्वारा उत्पन्न ज्ञान से नि:श्रेयस की प्राप्ति होती है।