Thursday, 24 January 2013

सोवियत संघ में नेताजी के साथ क्या हुआ?



1. देश के आजाद हो जाने के बाद, जीवित होने के बावजूद नेताजी भारत वापस क्यों नहीं लौटे और कहाँ रहे?
2. यदि नेताजी आजादी के बाद भारत लौट आए थे तो फिर जनता के समक्ष प्रकट क्यों नहीं हुए और आजाद भारत के उत्थान में योगदान करने के लिए आगे क्यों नहीं आए?
3. यदि नेताजी आजाद भारत के नवनिर्माण के लिए आगे नहीं आए तो फिर वे गुमनाम रहते हुए किस अन्य बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे?
आज का यह लेख उपर्युक्त में से पहली जिज्ञासा पर केन्द्रित है। नेताजी के लापता हो जाने की परिस्थितियों की मुखर्जी आयोग द्वारा छ: वर्षों तक की गई विस्तृत और गहन जाँच से यह तथ्य साफ उजागर हो गया कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान द्वारा घुटने टेक दिए जाने और उस पर अमेरिका और ब्रिटेन का नियंत्रण स्थापित हो जाने की आसन्न परिस्थितियों के मद्देनज़र नेताजी ने गोपनीय तरीके से सोवियत संघ चले जाने और वहाँ से भारत की आजादी का संग्राम जारी रखने की योजना बना ली थी। इस योजना को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए उनके द्वारा बनाई गई रणनीति के अनुरूप जापानी सेना में उनके विश्वस्त उच्च अधिकारियों ने सुनियोजित तरीके से ताइपेई में 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो जाने की अफवाह फैला दी। इस अफवाह के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत विवेचन फिर कभी करेंगे। इस अफवाह पर ना तो ब्रिटिश सरकार ने कभी भरोसा किया, न अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने और ना ही महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेताओं ने। लेकिन नेताजी के संबंध में सबसे पुख्ता जानकारी यदि किसी के पास हो सकती थी तो वह थी तत्कालीन सोवियत संघ की सरकार, क्योंकि उपलब्ध तथ्य यही संकेत करते हैं कि नेताजी 18 अगस्त, 1945 के बाद सोवियत संघ ही गए थे।
मुखर्जी आयोग भी इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि 18 अगस्त, 1945 के बाद नेताजी सोवियत संघ में कुछ वर्ष अवश्य रहे। सोवियत संघ में उनके साथ क्या हुआ, उन्होंने वहाँ रहते हुए क्या किया और वे वहाँ कब तक और किस स्थान पर रहे, यह जानने के लिए भारत सरकार के प्रतिकूल रवैये के बावजूद जस्टिस मुखर्जी ने सितम्बर, 2005 में रूस का दौरा किया। लेकिन वहाँ उन्हें जाँच में अपेक्षित सहयोग नहीं प्रदान किया गया और आवश्यक अभिलेख और दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। लिहाज़ा, उन्हें रूस से कोई ठोस सुराग हासिल किए बगैर वापस लौट आना पड़ा।
इतना तो तय है कि नेताजी से जुड़े रहस्य की गुत्थी का हल इसी प्रश्न के उत्तर में है कि सोवियत संघ में नेताजी के साथ क्या हुआ, क्या वह वहाँ से निकल पाने में कामयाब हो पाए और क्या भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को नेताजी के जीवित होने की जानकारी थी?
इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए दिल्ली स्थित मिशन नेताजी नामक एक संगठन के प्रतिनिधि अनुज धरने 2 अगस्त, 2006 को सूचना के अधिकार का प्रयोग करते हुए भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में लोक सूचना अधिकारी के समक्ष आवेदन दायर करके नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के लापता हो जाने के संबंध में विदेश मंत्रालय और तत्कालीन सोवियत संघ एवं वर्तमान रूस के बीच अब तक हुए पत्राचार की सत्यापित प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराए जाने की मांग की। इसके उत्तर में लोक सूचना अधिकारी ने 25 अगस्त, 2006 को उत्तर दिया कि उक्त पत्राचार की प्रतिलिपियाँ उपलब्ध नहीं कराई जा सकतीं क्योंकि इसमें विदेशी राष्ट्र के साथ संबंध अंतर्ग्रस्त है और सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1) (क) से (च) के उपबंधों के अनुसार यह दी जा सकने वाली ‘सूचना’ के दायरे से बाहर है।
इस उत्तर से असंतुष्ट अनुज धर ने 23 सितम्बर, 2006 को विदेश मंत्रालय में अपीलीय प्राधिकारी के समक्षअपील दायर की, जिसमें उन्होंने पूछा कि
“यह बात न तो मेरी समझ में आती है और न ही भारत की जनता को समझ में आएगी कि नेताजी जैसे राष्ट्रीय नायक के लापता होने के संबंध में, जिनके बारे में सरकार की यह धारणा है कि उनकी मृत्यु 1945 में ही हो चुकी है, आधिकारिक पत्राचार के उजागर होने से देश के सुरक्षा, सामरिक, वैज्ञानिक अथवा आर्थिक हितों को वर्ष 2006 में खतरा कैसे हो सकता है। नेताजी के लापता होने का संबंध जिस विदेशी राष्ट्र से है वह है सोवियत संघ, जिसका वर्षों पूर्व ही विघटन हो चुका है।….मैं यह समझ पाने में भी विफल हूं कि सोवियत संघ के जमाने के पत्राचार के उजागर होने से मौजूदा रूस सरकार के साथ हमारे संबंध प्रतिकूल रूप से कैसे प्रभावित होंगे।”
इस अपील का विदेश मंत्रालय के सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा 6 नवम्बर, 2006 को दिया गया उत्तर निम्नानुसार है:
नेताजी के संबंध में विदेश मंत्रालय का उत्तर
इस उत्तर में मांगी गई सूचना का मजाक उड़ाते हुए कहा गया कि इसमें दंतकथात्मक उत्तर (anecdotal reply) दिए जाने की अपेक्षा की गई है। सोवियत संघ के साथ हुए पत्राचार की प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराए जाने से इन्कार करते हुए फिर से वही बात दोहराई गई कि इसमें विदेशी राष्ट्र के साथ संबंध अंतर्ग्रस्त है, और सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(क)(i) के मुताबिक यह ‘सूचना’ के दायरे से बाहर है। 
इस उत्तर से असंतुष्ट अनुज ने केन्द्रीय सूचना आयोग में 29 नवम्बर, 2006 को अपील दायर की, जिस पर पिछले सप्ताह 23 मार्च, 2007 को सूचना आयुक्त ओ.पी. केजरीवाल की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान विदेश मंत्रालय की ओर से अजय चौधरी, अतिरिक्त सचिव (पी.पी.) और ए.के. नाग, संयुक्त सचिव एवं केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी उपस्थित थे। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा दिए गए आदेश के प्रासंगिक अंश निम्नानुसार हैं:
Decision:
8. The Commission heard both the sides. The main stand of the Respondents to the information sought by the Appellant which is regarding the correspondence between India and the Government of the erstwhile USSR and present day Russia was that this information could not be disclosed as it was likely (to) affect the country’s relationship with another State. The Commission also saw the Respondents’ reply to the Appellant in their letter dated 6 November 2006 where besides the reason stated above, it also said that the information was not being disclosed as it did not fall under the category of “information” as defined in the RTI Act as it seeks “anecdotal” reply. 
The Commission could not see the applicability of this answer at all in the present case. The only ground, therefore, on which the information has been denied is that disclosure of the information is likely to affect “relations with a foreign state”.
On making enquiries from the Respondents, it was clear that this correspondence has neither been seen nor been examined by an expert to come to such a conclusion. Therefore, the Commission feels that the Applicant’s application has been treated very casually and his request dismissed very summarily which goes against the very spirit of the RTI-Act.
9. The Commission, therefore, directs the Respondents to first have this correspondence examined by their own expert/s and if need be, by an outside expert who they can rely on and then take a firm decision. In case the experts come to the conclusion that the applicability of the denial clause is not relevant in the case, the material can be disclosed to the Appellant. However, in case the Respondents come to the conclusion that the relations between the Government of India and the Government of Russia would be affected through the disclosure of this information, the Commission would like the issue to be settled only after a reference has been made to the Government of Russia. The Commission would also like to examine the documents for itself before coming to a firm conclusion about the denial of this piece of information to the Appellant.
10. The Commission, therefore, directs the Respondents to have this correspondence examined as stated above and a reply send to the Appellant together with a copy to the Commission latest by 30 June 2007 on receipt of which, the Appellant is free to approach the Commission.
11. The Commission ordered accordingly.
Sd/-
(O.P. Kejariwal)
Information Commissioner
Sd/-
(Pankaj K.P. Shreyaskar)
Assistant Registrar
जैसा कि उपर्युक्त आदेश में स्पष्ट रूप से आयोग ने दर्ज किया है कि सूचना के अधिकार के तहत किए गए आवेदन पर कार्रवाई करते हुए अपना उत्तर देने से पहले विदेश मंत्रालय ने तत्कालीन सोवियत संघ के साथ हुए पत्राचारों की फाइल को देखने तक की आवश्यकता नहीं महसूस की। किसी विशेषज्ञ द्वारा फाइलों की जांच किए बगैर ही आवेदन को यह कहते हुए निपटा दिया जाना कि मांगी गई सूचना ही ‘दंतकथात्मक’ है और विदेशी राष्ट्र के साथ रिश्ते प्रभावित हो सकने की आशंका के कारण इस तरह के पत्राचार की प्रतिलिपि नहीं उपलब्ध कराई जाएगी, मंत्रालय के लापरवाह रवैये को दर्शाता है और यह सूचना का अधिकार अधिनियम की मूल भावना के विपरीत है।
केन्द्रीय सूचना आयोग ने विदेश मंत्रालय को स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हैं कि पहले तो वह प्रासंगिक विषय पर तत्कालीन सोवियत संघ और वर्तमान रूस की सरकार के साथ हुए पत्राचार की अपने विशेषज्ञों से, और जरूरी होने पर, बाहरी विशेषज्ञों से जाँच कराए और उसके आधार पर किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुँचे। आयोग ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेजों की विशेषज्ञों द्वारा जाँच किए जाने के बाद यदि मंत्रालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि उनको उजागर किए जाने से भारत सरकार और रूस सरकार के बीच आपसी रिश्ते बिगड़ सकते हैं तो इस बारे में रूस सरकार को पत्र लिखने के बाद ही मामले को निपटाया जाए और ऐसी स्थिति में अपीलकर्ता को सूचना दिए जाने से इन्कार करने के निर्णय पर पहुँचने से पहले आयोग खुद भी उन दस्तावेजों की जाँच करना चाहेगा।
हालांकि इस बात की पूरी आशंका है कि केन्द्रीय सूचना आयोग के उपर्युक्त आदेश के बावजूद विदेश मंत्रालय द्वारा 30 जून, 2007 तक जो उत्तर दिया जाने वाला है, उसमें भी संबंधित पत्राचार की प्रतिलिपि देने से एक बार फिर इन्कार कर दिया जाएगा। लेकिन यदि ऐसा हुआ तो हमारी यह धारणा और भी प्रबल हो जाएगी कि सरकार भारतीय जनता की भावनाओं के प्रति गैर-जवाबदेह है। किसी दूसरे देश के साथ संबंध खराब हो सकने की आशंका का बहाना करके करोड़ों देशवासियों की भावनाओं का मजाक उड़ाते हुए नेताजी से संबंधित महत्वपूर्ण सूचना को अवैध रूप से छिपाया जाना निश्चय ही दुर्भाग्यजनक है। अपने महान राष्ट्रनायक के प्रति कृतघ्नता की ऐसी अनोखी मिसाल दुनिया में अन्यत्र मिलना दुर्लभ है!

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