पहले परिस्थितियाँ:
मुसोलिनी, हिटलर और तोजो- तीनों की पराजय के बाद अब रह गए हैं- नेताजी।
धुरी राष्ट्रों का मकसद चाहे दुनिया पर राज करने का रहा हो, मगर नेताजी ने इनसे मदद ली थी- भारत को आजाद कराने के लिए। इस लिहाज से नेताजी की हैसियत एक “स्वतंत्रता सेनानी” की बनती है- उनपर अन्तर्राष्ट्रीय युद्धापराध का मुकदमा नहीं चलना चाहिए।
मगर अमेरीका के रूख में कोई नर्मी नहीं है- जाहिर है वह नेताजी पर अन्तर्राष्ट्रीय युद्धापराध का मुकदमा चलाकर उन्हें फाँसी के तख्ते पर लटकते देखना चाहता है।
ब्रिटेन मुकदमे के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता- सुभाष चन्द्र बोस इस धरती पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सबसे बड़े शत्रु हैं- वह सुभाष को देखते ही गोली मार देने के पक्ष में है। नेताजी के आग उगलते भाषणों और अदम्य वीरता से भरपूर सैन्य अभियानों ने न केवल भारत, बल्कि सारे विश्व के गुलाम देशों को झकझोर कर जगा दिया है और महान ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। भारत में तो आजाद हिन्द फौज और नेताजी के जिक्र पर पाबन्दी है ही- बी.बी.सी. वालों को भी आजाद हिन्द फौज के समाचार प्रसारित करने से ब्रिटेन ने रोक दिया है- ताकि नेताजी द्वारा सुलगाई गयी बगावत की आग अन्य एशियायी/अफ्रिकी उपनिवेशों तक न फैले।
रहा सोवियत संघ- वह इस संकट की घड़ी में नेताजी को शरण देने के लिए इच्छुक है या नहीं, इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण अब तक तो नहीं मिला है।
(जब तक भारत सहित बाकी चारों देश- ब्रिटेन, अमेरीका, रूस, जापान- नेताजी से जुड़े सभी गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं करते, तब तक कुछ बातें स्पष्ट होंगी भी नहीं! परिस्थितियों को देखते हुए अनुमान ही लगाना पड़ेगा-)
विश्वयुद्ध के अन्तिम दिनों में परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि अमेरीका और ब्रिटेन एकजुट हो गये हैं, जबकि अमेरीका तथा सोवियत संघ के बीच कड़वाहट पैदा हो चुकी है, (जर्मनी का बँटवारा इसका उदाहरण है; इसके अलावे, पूँजीवाद बनाम साम्यवाद का झगड़ा तो सार्वकालिक है ही) इसलिए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘ब्रिटेन तथा अमेरीका को सदा सशंकित बनाये रखने के लिए नेताजी को गुप्त रुप से सोवियत संघ में शरण देने में’ स्तालिन को फायदा ही है!
यहाँ इन दो तथ्यों पर भी ध्यान देने की जरुरत है:-
1. ‘मित्र राष्ट्र’ के तीन प्रमुख सदस्य देश हैं- अमेरीका, ब्रिटेन और सोवियत संघ। इनमें से अमेरीका और ब्रिटेन के खिलाफ नेताजी ने युद्ध की घोषणा कर रखी है, मगर सोवियत संघ के साथ उनकी मित्रता कायम है। युद्ध के दौरान सोवियत संघ का शासनिक-प्रशासनिक ढाँचा साइबेरिया क्षेत्र में स्थानान्तरित हो गया है, इसलिए आजाद हिन्द सरकार का दूतावास भी साइबेरिया के ओम्स्क शहर में है।
2. ‘धुरी राष्ट्र’ के तीन सदस्य देश हैं- जर्मनी, इटली और जापान। इनमें से जर्मनी और इटली के खिलाफ सोवियत संघ ने युद्ध की घोषणा कर रखी है, मगर जापान के साथ उसकी मित्रता कायम है। स्तालिन ने 8 मई 1945 को ‘माल्टा सम्मेलन’ में रूजवेल्ट और चर्चिल को भरोसा दिलाया था कि जापान के खिलाफ वे मोर्चा खोलेंगे, मगर वास्तव में वे ऐसा नहीं करते। जापान पर दो अणुबमों के प्रहार के बाद- जब जापान आत्मसमर्पण के लिए राजी हो जाता है- तब जाकर 10 अगस्त को सोवियत सेना जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा करते हुए मंचुरिया में प्रवेश करती है। मगर यह एक दिखावा या छलावा (Eyewash) है, असली कारण कुछ और है, जिसका जिक्र आगे आयेगा।
ऊपर की परिस्थिति एवं तथ्यों से जाहिर है कि नेताजी अगर कहीं शरण ले सकते हैं, तो वह है- सोवियत संघ, जहाँ वे 1941 में ही जाना चाहते थे- स्तालिन से सैन्य मदद लेने।
हालाँकि नेताजी के पास दो और विकल्प हैं-
1. माउण्टबेटन की सेना से लड़ते हुए वे युद्धभूमि में शहीद हो जायें; या
2. दक्षिण एशिया के जंगलों में वे छुप जायें- जापान ने स्थानीय लोगों से मदद का भरोसा दिया है, और स्थिति सामान्य होने पर भारत में वे फिर से प्रकट हो जायें।
एक और बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि वियेना (ऑस्ट्रिया) में नेताजी की पत्नी एमिली शेंकेल उनकी तीन साल की नन्हीं बेटी- अनिता- के साथ उनका इन्तजार कर रहीं हैं... और इस वक्त नेताजी के लिए सिंगापुर से ऑस्ट्रिया जाने का रास्ता सोवियत संघ होकर ही जाता है। हालाँकि नेताजी ने पत्र लिखकर एमिली को बता दिया है-
“मैं शायद तुम्हें फिर न देख सकूँ। मगर विश्वास करो, तुम सदा मेरे हृदय में, मेरे विचारों में और मेरे सपनों में रहोगी। अगर नियति ने हमें जीवन में अलग कर भी दिया- तो मैं अपने अगले जन्म में तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा.... मेरी परी! मैं तुम्हारा आभारी हूँ कि तुमने मुझे प्यार किया और मुझे तुमसे प्यार करना सिखाया।”
(“May be I shall never see you again, but believe me, you will always live in my heart, in my thoughts and in my dreams. If fate should thus separate us in the life- I shall long for you in my next life… My angel! I thank you for loving me and for teaching me to love you.”- Essential Writings of Netaji Subhash Chandra Bose, Netaji Research Bureau and Oxford University Press, 1997, pp 160-161.)
चूँकि ओम्स्क में आजाद हिन्द सरकार का दूतावास होने के दस्तावेज हाल में उजागर हो गये हैं, इसलिए यहाँ यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि दूतावास के कौन्सुलेट जेनरल ‘काटोकाचु’ ने सोवियत सरकार से नेताजी को शरण देने के बारे में बात की होगी। (‘काटोकाचु’ एक छद्म नाम है, ये वास्तव में एक भारतीय हैं।) स्तालिन शरण देने को राजी होंगे- मगर गुप्त रुप से, ताकि ब्रिटेन और अमेरीका (मित्र राष्ट्र की दुहाई देकर) उनसे नेताजी की माँग न कर सकें। काटोकाचु ने यह सूचना जापान सरकार और नेताजी को दी होगी।
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और अब घटनाक्रम:
10 अगस्त 1945 की रात।
कुआलालामपुर से मेजर जेनरल इनायत कियानी का सन्देश आता है कि सोवियत संघ ने जापान पर युद्ध की घोषणा कर दी है। नेताजी इस वक्त सिंगापुर के निकट सेरेमबन गेस्ट हाऊस में हैं। उनके साथ हैं- मेजर जेनरल अलगप्पन, कर्नल जी.आर. नागर, कर्नल हबिबुर्रहमान और एस.ए.अय्यर। सभी यहाँ एक संक्षिप्त दौरे पर आये हुए हैं, सो, शॉर्टवेव रेडियो नहीं लाया गया है।
नेताजी इस समाचार से विचलित नहीं होते। उनका मानना है कि इससे उनके अभियान को कोई फर्क नहीं पड़ता।
11 अगस्त।
सेरेमबन में ही आजाद हिन्द फौज के प्रशिक्षण केन्द्र में लम्बी बैठक चलती है, जो रात 10 बजे समाप्त होती है। खाना खाकर जब तक लोग बिस्तर पर जाते हैं, रात्रि के एक बज रहे हैं।
लम्बी दूरी के फोन की घण्टी की आवाज से सभी बिस्तर से बाहर आते हैं।
मलक्का से फोन करने वाला बताता है कि सिंगापुर स्थित आई.आई.एल. मुख्यालय से प्रचार विभाग के प्रधान सचिव डॉ. लक्ष्मैया और कार्यवाहक सचिव श्री गणपति नेताजी से मिलने सेरेमबन पहुँच रहे हैं।
एक बन्द कमरे में नेताजी और एस.ए. अय्यर के सामने लक्ष्मैया और गणपति खबर देते हैं- “जापान ने आत्मसमर्पण का फैसला ले लिया है!”
यूँ तो नेताजी ने 1937 में ही यह लिख दिया था कि अगर जर्मनी और जापान युद्ध को लम्बा खींचते हैं, तो वे ऐंग्लो-अमेरीकन शक्तियों के आगे परास्त हो जायेंगे; मगर जापान इतनी जल्दी आत्मसमर्पण करेगा- यह अनुमान नेताजी को नहीं था। उनका अनुमान था कि जर्मनी के पतन और जापान के आत्मसमर्पण के बीच उन्हें इतना समय मिल जायेगा कि वे आंग-सान की बर्मा डिफेन्स आर्मी को फिर से अँग्रेजों के खिलाफ लाकर उसके साथ आजाद हिन्दी फौज का एक संयुक्त कमान बनाकर अँग्रेजों से लोहा ले सकेंगे। ऐसे में, बर्मा और पूर्वी भारत राष्ट्रवादियों का आधार रहेगा। मगर जापान पर दो अणुबमों के प्रहार के बाद जब जापानी सर्वोच्च सैन्य परिषद में मतभेद उभरता है, तब स्वयं सम्राट हिरोहितो दखल देते हुए आत्मसमर्पण का समर्थन करते हैं।
12 अगस्त।
साढ़े ग्यारह घण्टे की यात्रा करके नेताजी और उनका दल सेरेमबन से सिंगापुर पहुँचता है। जापान के आत्मसमर्पण के प्रभावों को लेकर बैठक होती है और आजाद हिन्द फौज के डिवीजनल कमाण्डरों तथा आई.आई.एल. की शाखाओं के चेयरमैन के लिए जरूरी निर्देश भेजे जाते हैं। सैनिकों- खासकर, झाँसी की रानी रेजीमेण्ट की 500 महिला सैनिकों- की चिन्ता नेताजी के दिमाग में पहले है। स्वयंसेवकों और महिला सैनिकों को समाज में घुल-मिल जाने दिया जाता है।
14 अगस्त।
एक खराब दाँत निकलवाने के बाद डेण्टिस्ट नेताजी को आराम की सलाह देते हैं, मगर वे कम ही आराम कर पाते हैं।
देर रात आजाद हिन्द सरकार के कैबिनेट की महत्वपूर्ण बैठक शुरु होती है। मुद्दा है- नेताजी को सिंगापुर में ही रहकर युद्ध करना चाहिए या नहीं। खुद नेताजी ऐसा चाहते हैं। उनके अनुसार, उनके युद्धबन्दी बनाये जाने या शहीद हो जाने से भारत का स्वतंत्रता संग्राम और तेज होगा। मगर नेताजी के सहयोगी उनसे सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार, नेताजी जीवित रहकर स्वतंत्रता संग्राम को ज्यादा तेज बना सकते हैं।
15 अगस्त।
जापान आधिकारिक रुप से आत्मसमर्पण की घोषणा करता है।
सिंगापुर में उस रात पाँच घण्टों की बैठक के बाद फैसला होता है कि नेताजी सिंगापुर छोड़ देंगे। मगर वे जायेंगे कहाँ- स्याम (थाईलैण्ड), इण्डो-चायना (वियेतनाम), जापान, मंचुकुओ, या... रशिया?- इस प्रश्न पर क्या फैसला हुआ था- इसका जिक्र बैठक में शामिल किसी भी व्यक्ति ने अपने संस्मरण में नहीं किया है। जाहिर है, यहीं से नेताजी को बचाने के रहस्यमयी प्रयासों की शुरुआत हो जाती है। इन्हीं प्रयासों के तहत यह बताया जाता है कि उस बैठक में यह फैसला हुआ था कि अन्तिम सलाह-मशविरे के लिए और जापान को (सहयोग के लिए) धन्यवाद देने के लिए नेताजी टोक्यो जायेंगे। कर्नल हबिबुर्रहमान, कर्नल प्रीतम सिंह, मेजर आबिद हसन, मेजर स्वामी और श्री देबनाथ दास नेताजी के साथ होंगे। ये सभी सायगन होते हुए टोक्यो जायेंगे और फिर वहाँ से किसी ‘अज्ञात’ ठिकाने पर जायेंगे।
यह फैसला भी होता है कि मेजर जेनरल कियानी सिंगापुर में ही रहेंगे और नेताजी की अनुपस्थिति में आजाद हिन्द सरकार/फौज का काम देखेंगे। मेजर जेनरल अलगप्पन और ए.एन. सरकार उनका सहयोग करेंगे।
सारी बातें तय होते-होते भोर के तीन बज जाते हैं।
16 अगस्त।
नेताजी के सहयोगी जिसे ‘अज्ञात’ स्थान बताते हैं, वह सोवियत संघ ही है- इसका प्रमाण है यह टेलीग्राम, जो बैठक समाप्त होने के बाद नेताजी टोक्यो को भेजते हैं:
“मैं अपने कैबिनेट के कुछ विश्वस्त सहयोगियों के साथ सोवियत संघ जाना चाहूँगा। अगर आवश्यकता हुई, तो मैं अकेले ही सोवियत संघ में प्रवेश करूँगा।” (“Along with the trusted persons of my cabinet, I would like to go to the Soviet Union. If it is necessary, I shall enter the Soviet Union alone.” -Leonard A. Gordon: Brothers against the Raj, Page- 538)
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टेलीग्राम पाकर टोक्यो अपने फील्डमार्शल काउण्ट तेराउचि को निर्देश देता है- काटा-काना को सिंगापुर से निकालकर गुप्त रुप से सोवियत संघ पहुँचाने की व्यवस्था की जाय।
सोवियत सैनिक 10 अगस्त को ही मंचुरिया में प्रवेश कर चुके हैं। इन सैनिकों की मदद से काटा-काना को सोवियत संघ में प्रवेश दिलाया जा सकता है।
जापानी सेना के “सोवियत विशेषज्ञ” लेफ्टिनेण्ट जेनरल सिदेयी (दक्षिण-पूर्वी कमान के चीफ ऑव स्टाफ) मनीला में तैनात हैं। तेराउचि तुरन्त उनकी नियुक्ति मंचुरिया के दाईरेन नामक स्थान में करते हैं और उन्हें तत्काल प्रभाव से योगदान देने का निर्देश देते हैं।
हाँ, दाईरेन जाते हुए सायगन में रुककर उन्हें काटा-काना को भी साथ लेना है।
उधर सिंगापुर से काटा-काना भी अपने सहयोगियों के साथ बैंकॉक होते हुए सायगन के लिए रवाना होने वाले हैं।
तेराउचि सायगन में जेनरल ईशोदा को निर्देश देते हैं- काटा-काना को मनीला से आकर ताईपेह होकर दाईरेन जाने वाले विमान में बिठाने की व्यवस्था की जाय।
तेराउचि की योजना की रंगभूमि है- ताईपेह, जो कि फारमोसा का प्रमुख नगर है। (फारमोसा एक टापू है, जिसे अब ताईवान कहते हैं।)
(जापान में नेताजी को “चन्द्र बोस” के नाम से सम्बोधित किया जाता है, जापानी भाषा में- “काटा-काना”।)
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4.4 वह रहस्यमयी विमान यात्रा: सिंगापुर से ताईपेह तक
16 अगस्त 1945। 09:30 (या 10:30) बजे।
एक जापानी बमवर्षक विमान में नेताजी कर्नल हबीबुर्रहमान, कर्नल प्रीतम सिंह, एस.ए. अय्यर और जापानी दुभाषिए श्री निगेशी के साथ बैंकॉक के लिए रवाना होते हैं। उनके मंत्रीमण्डल के अन्य सदस्य- कर्नल गुलजारा सिंह, मेजर आबिद हसन, श्री देबनाथ दास इत्यादि एक दूसरे विमान में हैं।
विमान में कुछ खराबी है, और एक ढीली नली से रिसते पेट्रोल की महक यात्रियों को आती है।
शाम साढ़े तीन बजे विमान बैंकॉक पहुँचते हैं।
कुछ ही मिनटों में नेताजी के आने की खबर फैल जाती है और शाम से लेकर आधी रात के बाद तक नेताजी से मिलने वाले भारतीयों का ताँता लगा रहता है।
इसके बाद ही उन्हें कुछ जरूरी काम निपटाने का समय मिल पाता है।
भोर पाँच बजे नेताजी बिस्तर पर जाते हैं और घण्टे भर आराम करते हैं।
17 अगस्त 1945। 08:00 बजे।
दोनों विमान सभी यात्रियों को लेकर बैंकॉक से उड़ान भरते हैं और तीन घण्टों की संक्षिप्त उड़ान के बाद ग्यारह बजे सायगन के हवाई अड्डे पर उतरते हैं। (सायगन शहर का नाम अब हो-चि-मिन्ह सिटी है। यह वियेतनाम में है, जिसे उन दिनों फ्रेंच इण्डो-चायना कहा जाता था।)
सायगन का वातावरण फ्राँसीसी आक्रमण की अफवाहों से तनावग्रस्त है।
सायगन हवाई अड्डे से दो कारों में बैठकर नेताजी का दल नगर के बाहरी इलाके में स्थित श्री नारायण दास (आई.आई.एल. के आवास विभाग के सचिव) के घर पर जाता है।
मुश्किल से आधा घण्टा ही आराम किया होगा नेताजी ने कि जापानी सम्पर्क अधिकारी कियानो के आगमन के कारण उन्हें जगाया जाता है। कियानो की सूचना है कि सिर्फ नेताजी को लेकर जाने के लिए एक विमान हवाई अड्डे पर तैयार खड़ा है। विमान जा कहाँ रहा है- यह कियानो नहीं बताते। मगर उनका कहना है कि नेताजी को तुरन्त चलना चाहिए- समय बिल्कुल नहीं है।
नेताजी किसी अनजाने गंतव्य स्थान पर जाने के लिए तैयार नहीं हैं।
कियानो भागे-भागे जाते हैं और अपने उच्च अधिकारियों- जेनरल ईशोदा, श्री हाचैया और फील्ड मार्शल तेराउचि के स्टाफ अधिकारी (सम्भवतः कर्नल टाडा) को लेकर आते हैं।
बन्द कमरे में ये सभी नेताजी के साथ बैठक करते हैं- जाहिर है, नेताजी को गुप्त रुप से मंचुरिया पहुँचाने की जो योजना तेराउचि ने बनायी है, उसकी जानकारी नेताजी को दी जाती है। कर्नल हबिब भी बैठक में शामिल हैं।
थोड़ी देर बाद जापानियों को कमरे में छोड़ नेताजी और हबिब बाहर आते हैं। नेताजी ईशारे से हबिब, आबिद, देबनाथ और अय्यर को एक दूसरे कमरे में बुलाते हैं और जापानियों की योजना की जानकारी देते हैं।
“कुछ ही मिनटों में एक विमान उड़ान भरने वाला है,” नेताजी साथियों से पूछते हैं, “जापानियों का कहना है कि उसमें एक ही सीट उपलब्ध है... क्या मुझे अकेले जाना चाहिए?”
थोड़े विचार-विनिमय के बाद तय होता है कि जापानियों से एक और सीट का इन्तजाम करने के लिए कहा जाय। विमान या नेताजी कहाँ जा रहे हैं, इसपर कोई सवाल नहीं उठाता।
“हमने पूछा नहीं और उन्होंने बताया नहीं,” अय्यर अपनी किताब (Unto him a witness) में लिखते हैं, “लेकिन हम जानते थे, और नेताजी भी यह जानते थे कि हम जानते हैं। विमान को मंचुरिया जाना था।”
जापानियों से फिर थोड़ी बातचीत होती है और उसके बाद नेताजी साथियों को सूचित करते हैं- एक और सीट है, और कर्नल हबिब उनके साथ चल रहे हैं।
समय बिल्कुल नहीं है- नेताजी और हबिब कार में बैठकर हवाई अड्डे के लिए रवाना हो जाते हैं।
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सायगन हवाई अड्डा। 17:30 बजे।
जापानी भारी बमवर्षक विमान- मॉडेल 97-2-सैली- उड़ान के लिए तैयार खड़ा है। यह विमान मनीला से आया है। इसके यात्रियों की सूची इस प्रकार है:
1. मेजर ताकिजावा, 3र्ड एयर फोर्स, पायलट
2. वारण्ट ऑफिसर आयोगी, असिस्टेण्ट पायलट
3. सार्जेण्ट ओकिता, नेवीगेटर
4. एक एन.सी.ओ. (नॉन कमीशंड ऑफिसर) तोमिनागा, रेडियो ऑपरेटर
5. एक एन.सी.ओ., जिसका नाम नहीं पता, गन ऑपरेटर
6. लेफ्टिनेण्ट जेनरल सिदेयी, चीफ ऑव स्टाफ, बर्मीज आर्मी कमाण्ड
7. लेफ्टिनेण्ट कर्नल साकाई, स्टाफ ऑफिसर
8. लेफ्टिनेण्ट कर्नल शिरो नोनोगाकी, स्टाफ ऑफिसर, जापान एयर फोर्स
9. मेजर तारो कोनो, स्टाफ ऑफिसर, जापान एयर फोर्स
10. मेजर ईवाओ ताकाहाशी, स्टाफ ऑफिसर
11. कैप्टन केयिकिची अराई, एयर फोर्स इंजीनियर
अब इस सूची में दो नाम और जुड़ जाते हैं:
12. सुभाष चन्द्र बोस, आई.एन.ए. चीफ
13. कर्नल हबिबुर्रहमान खान, एडजुटैण्ट, आई.एन.ए.
विमान में काफी साजो-सामान भी लदा है।
नेताजी और हबिब सहित कुल तेरह लोगों को लेकर विमान सायगन से उड़ान भरता है।
तूरेन। 19:45 बजे।
तूरेन वियेतनाम का ही एक शहर है। विमान यहाँ उतरता है और रात्रि विश्राम करता है।
नेताजी तथा अन्य यात्री होटल मोरिम में ठहरते हैं। (तूरेन शहर का नाम अब दा-नांग है।)
सायगन में एयरबोर्न होने से पहले विमान को पूरे रन-वे का इस्तेमाल करना पड़ा था। जाहिर है, विमान में माल ज्यादा लदा है। सो, तूरेन में 12 मशीनगन तथा कुछ गोला-बारूद उतारकर विमान को 600 किलो हल्का किया जाता है।
18 अगस्त। 05:30 बजे। (या 07:00 बजे?)
सभी 13 यात्रियों को लेकर विमान तूरेन से उड़ान भरता है।
ताईपेह। 14:00 बजे।
बहुत ही अच्छे मौसम में फारमोसा द्वीप के ताईपेह शहर के निकट ताईहोकू हवाई अड्डे पर विमान उतरता है।
विमान में ईंधन भरा जाता है और सभी यात्री सैण्डविच तथा केले का हल्का भोजन करते हैं।
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इसके बाद के घटनाक्रम के दो संस्करण हैं:
1. गवाहों के बयानों पर आधारित घटनाक्रम, जिसमें विमान को दुर्घटनाग्रस्त और नेताजी को उसमें मृत बताया जाता है; और
2. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित घटनाक्रम, जिसके अनुसार विमान मंचुरिया पहुँचा था और नेताजी (कुछ वर्षों तक) सोवियत संघ में ही थे।
न्याय की दुनिया में कहते हैं कि गवाह कुछ कारणों से झूठ बोल सकते हैं, मगर परिस्थितिजन्य साक्ष्य कभी झूठ नहीं बोलते!
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4.5 वह रहस्यमयी विमान दुर्घटना: गवाह जो कहते हैं
निम्नलिखित घटनाक्रम जापानी सैन्य अधिकारियों, नानमोन सैन्य अस्पताल के डॉक्टरों तथा मुख्यरुप से कर्नल हबिबुर्रहमान के बयानों पर आधारित है:-
10 अगस्त 1945 को सोवियत संघ ने जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और उसके सैनिक मंचुरिया में प्रवेश कर गए। उनसे निपटने के लिए 17 अगस्त को ले. जेनरल सिदेयी तथा कुछ अन्य सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति मंचुरिया के दाईरेन नामक स्थान में की गयी। ये अधिकारी साजो-सामान के साथ मनीला से दाईरेन जा रहे थे।
उधर 15 अगस्त को जापान के आत्मसमर्पण के बाद बदली हुई परिस्थितियों में जापान सरकार से सलाह-मशविरा करने तथा धन्यवाद ज्ञापन के लिए नेताजी को टोक्यो जाना था। इसलिए सिदेयी अपना विमान लेकर मनीला से पहले सायगन आ गये और नेताजी को कर्नल हबिबुर्रहमान के साथ विमान में बिठा लिया गया। अन्तिम रुप से विमान को मंचुरिया से टोक्यो ही जाना था। सायगन से उड़कर और तूरेन में रात्रि विश्राम कर विमान 18 अगस्त को दोपहर
14:00 बजे ताईहोकू हवाई अड्डे पर उतरा।
ताईहोकू हवाई अड्डा
ताईहोकू हवाई अड्डे पर विमान में ईंधन भरा जाता है और यात्रीगण जलपान करते हैं।
उड़ान से पहले पायलट, मेजर कोनो और हवाई अड्डे के अनुरक्षण (मेण्टेनेन्स) अधिकारी कैप्टन नाकामुरा विमान की संक्षिप्त जाँच करते हैं। मेजर कोनो को बाँए इंजन में एक खराबी दीखती है, मगर इसे नजरअन्दाज कर विमान को वे उड़ान भरने योग्य घोषित करते हैं। वैसे भी, सूचना है कि सोवियत सैनिक मंचुरिया के निकट आ रहे हैं, अतः वहाँ यथाशीघ्र पहुँचना है।
सभी 13 यात्री (सूची पिछले अध्याय में है) विमान में सवार होते हैं।
एक बयान के अनुसार, आधा घण्टा रुकने के बाद विमान ने 14:30 या 14:35 पर उड़ान भरी; जबकि एक दूसरे बयान के मुताबिक विमान वहाँ दो घण्टे रुका था, जिससे उड़ने का समय बनता है- 16:00 बजे।
विमान टैक्सिंग करते (पहियों पर चलते) हुए 890 मीटर लम्बी हवाई पट्टी के एक किनारे जाकर वापस मुड़ता है और फिर, वह दौड़ना शुरु करता है।
आम तौर पर भारी बमवर्षक विमान आधी हवाई-पट्टी पर ही हवा में उठ जाते हैं, मगर यह विमान हवाई-पट्टी का तीन-चौथाई पार करके भी जमीन से नहीं उठता है।
फिर विमान हवा में उठता है और खड़ी उड़ान भरते हुए ऊपर जाने लगता है।
अचानक तेज धमाका होता है और विमान बाँयी ओर झुक जाता है। पोर्ट (बाँया) इंजन प्रोपेलर (पंखे) सहित जमीन पर आ गिरता है।
विमान जमीन की ओर गोता खाता है।
हवाई अड्डे की चहारदीवारी के 10 से 20 मीटर की दूरी पर विमान जमीन से टकराता है और विमान में आग लग जाती है।
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नानमोन सैन्य अस्पताल
हवाई अड्डे से कुछ दूरी पर स्थित नानमोन सैन्य अस्पताल को पहले तो सूचना मिलती है और फिर, सभी जले तथा घायल यात्रियों को वहाँ लाया जाता है।
एक अच्छी कद-काठी वाले भारतीय की ओर ईशारा करके चिकित्सा अधिकारी कैप्टन योशिनी को बताया जाता है, “ये काटा-काना हैं, महान भारतीय नेता, इन्हें बचाने की कोशिश की जाय।”
‘काटा-काना’ यानि ‘चन्द्र बोस’ सर से पाँव तक जले हुए हैं।
डॉ. टी सुरुता तथा दर्जन भर जापानी और फारमोसी नर्स डॉ. योशिनि की मदद के लिए अस्पताल में मौजूद हैं। डॉ. सुरुता नेताजी की पट्टियाँ करते हैं और डॉ. योशिनी विटा-कैम्फर की दो खुराक तथा डिजिटामाईन के दो इंजेक्शन देते हैं- उनके हृदय को स्थिर करने के लिए। इंफेक्शन से बचाने के लिए रिंगर सोल्यूशन के 500 सी.सी. के तीन इण्ट्रावेनस इंजेक्शन भी योशिनी नेताजी को देते हैं।
प्रारम्भ में ड्रेसिंग रूम में ही नेताजी को चिकित्सा दी जाती है। बेहतर ईलाज के लिए उन्हें 2 नम्बर वार्ड में रखा जाता है। हबिबुर्रहमान भी उसी वार्ड में हैं।
17:00 बजे अस्पताल के ही एक जापानी सैनिक का खून लेकर नेताजी को चढ़ाया जाता है- ताकि उनके हृदय पर दवाब कम पड़े।
ऐसा लग रहा है कि नेताजी पर ईलाज का असर हो रहा है। वे होश में हैं और कई बार पानी भी माँगते हैं। नेताजी को अस्पताल के स्टाफ के साथ वार्तालाप में आसानी हो, इसके लिए लिए दुभाषिए जुकी नाकामुरा को भी बुला लिया गया है। नाकामुरा नेताजी और हबिब से परिचित हैं। नेताजी ताईपेह में जब भी रुकते थे, नाकामुरा उनके साथ होते थे।
समय 19:30।
डॉ. सुरुता पाते हैं कि नेताजी की नब्ज गिर रही है। तुरन्त वे विटा-कैम्फर और डिजिटामाईन के इंजेक्शन देते हैं; मगर नब्ज का धीमा पड़ना जारी है।
23:00।
नेताजी की मृत्यु हो जाती है।
इस वक्त कमरे में 7 लोग मौजूद हैं- डॉ. योशिनी, डॉ. टी. सुरुता, कर्नल हबिबुर्रहमान, जे. नाकामुरा (दुभाषिया), काजो मित्सुई (चिकित्सा अर्दली) और दो नर्स।
(इस समय को याद कर लीजिये- नेताजी की मृत्यु का यह समय डॉ. योशिनी ने ब्रिटिश जाँच एजेन्सी के सामने दर्ज कराया था- 19 अक्तूबर 1946 को, हाँग-काँग के स्टेनली जेल में।)
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दुर्घटनास्थल
• लेफ्टिनेण्ट जेनरल सिदेयी और पायलट मेजर ताकिजावा की मृत्यु घटनास्थल पर होती है, जबकि नेताजी, को-पायलट वारण्ट ऑफिसर आयोगी तथा दो अन्य (दोनों नन-कमीशण्ड ऑफिसर- रेडियो ऑपरेटर और गनर) की मृत्यु अस्पताल में होती है। (याद रखियेगा- नेताजी के अलावे 5 और लोगों की मृत्यु की बात गवाह बताते हैं।)
• 7 लोग दुर्घटना में जीवित बचते हैं। लेफ्टिनेण्ट कर्नल नोनोगाकी, जो कि टरेट् पर बैठे थे, विमान से बाहर आकर जमीन पर गिरते हैं- बिना चोट खाये। लेफ्टिनेण्ट कर्नल साकाई, मेजर ताकाहाशी और कैप्टन अराई विमान के जमीन से टकराते समय तो बेहोश हो जाते हैं, मगर बाद में उन्हें होश आ जाता है- उन्हें मामूली खरोचें आती हैं और वे मामूली रुप से झुलसते हैं।
• जीवित बचे मेजर कोनो याद करते हैं कि विमान के गिरते समय पेट्रोल टैंक खुल गया था और वह उनके तथा नेताजी के बीच आ गिरा था, जिससे वे नेताजी को नहीं देख पा रहे थे। हाँ, ले. जेनरल सिदेयी को उन्होंने देखा, जिनके सर के पिछले हिस्से पर जख्म था।
• स्टीयरिंग गीयर पर गिरने के कारण मेजर ताकिजावा का चेहरा और कपाल कट गया था, जबकि वारण्ट ऑफिसर आयोगी के सीने पर चोटें आयी थीं।
• कर्नल हबिबुर्रहमान याद करते हैं कि जमीन पर गिरने के बाद विमान का अगला हिस्सा टूट कर अलग हो गया और उसमें आग लग गयी। नेताजी हबिब की ओर मुड़कर बोले, “सामने की ओर से बाहर निकलो, पीछे रास्ता नहीं रहा।” विमान का दरवाजा सामान आदि से जाम हो गया था। सो, नेताजी आग से होकर निकले और हबिब ने उनका अनुसरण किया। नेताजी की पैण्ट में आग लगती है और सारे शरीर में फैल जाती है। हबिब उनके कपड़े हटाने में अपने हाथ जला बैठते हैं। फिर हबिब नेताजी को जमीन लुढ़काते हैं- आग बुझाने के लिए। तब तक नेताजी गम्भीर रुप से जल चुके हैं।
• नेवीगेटर सार्जेण्ट ओकिता की रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचता है। उसकी पीठ पर एक लम्बा जख्म बनता है। अस्पताल में कुछ समय बिताने के बाद उसे सितम्बर’ 47 में छुट्टी मिलती है।
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दुर्घटना के कारण
• अधिकतम 9 के स्थान पर विमान में 13 लोग सवार थे।
• ताईपेह हवाई अड्डा छोटा था, बाहर ईंट भट्ठी की चिमनियाँ थीं।
• विमान को मंचुरिया पहुँचने की जल्दी थी।
• एक ईंजन की खराबी को नजरअन्दाज किया गया।
• पायलट द्वय ताईहोकू हवाई अड्डे के लिए नये थे।
• (जापान का) फारमोसा आर्मी कमान अव्यवस्थित हो चला था।
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ताईपेह नगरपालिका
जापान सरकार नेताजी की मृत्यु को गुप्त रखने का आदेश देती है- मीडिया को खबर नहीं दी जाती।
22 अगस्त को नेताजी के शव को ताईपेह नगरपालिका लेकर जाया जाता है- अन्तिम संस्कार के लिए अनुमतिपत्र प्राप्त करने के लिए। शव लेकर आये हैं- हबिबुर्रहमान और कुछ जापानी सैन्य अधिकारी। शव अस्पताल के कम्बल से भली-भाँति ढँका हुआ है।
(याद रखियेगा- मृत्यु 18-19 अगस्त की रात हुई थी और अन्तिम संस्कार 22 अगस्त को होने जा रहा है।)
नगरपालिका के स्वास्थ्य एवं स्वच्छता विभाग को ‘शव’ का ‘मृत्यु प्रमाणपत्र’ दिखाया जाता है, जिसपर डॉ. योशिनी और डॉ. सुरुता के हस्ताक्षर हैं।
‘मृत्यु प्रमाणपत्र’ के ब्यौरे इस प्रकार हैं:-
मृतक का नाम- इचिरो ओकुरा
जन्मतिथि- 1900 अप्रैल 9
मृत्यु का कारण- कार्डियाक अरेस्ट
पेशा- सैनिक, टेम्पोररी, ताईवान गवर्नमेण्ट मिलिटरी
मृत्यु की तारीख- 19 अगस्त 4:00 अपरान्ह
अन्तिम संस्कार के लिए अनुमति की तिथि- 21 अगस्त 1945
अन्तिम संस्कार की तिथि- 22 अगस्त 1945
अन्तिम संस्कार के लिए अनुरोधकर्ता- डॉ. थानिओशी योशोमी; चिकित्सक
चूँकि मृत्यु प्रमाणपत्र में कहीं भी “काटा-काना” का जिक्र नहीं है, इसलिए विभाग के अधिकारी इसे गम्भीरता से नहीं लेते और प्रमाणपत्र को दो कर्मचारियों के हवाले कर देते हैं, जिनकी ड्यूटी है- प्रमाणपत्र के हिसाब से ‘शव’ की जाँच करना।
अब इन दोनों मामूली कर्मचारियों को अलग ले जाकर जापानी सैन्य अधिकारी बताते हैं- यह महान भारतीय नेता काटा-काना का शव है, गोपनीय कारणों से इनका अन्तिम संस्कार ‘इचिरो ओकुरा’ के छद्म नाम से किया जा रहा है और जापान सरकार नहीं चाहती है कि इनके शव की जाँच की जाय।
दोनों कर्मचारी मान जाते हैं और (कम्बल हटाकर) शव की जाँच नहीं करते। इस प्रकार अन्तिम संस्कार के लिए ‘अनुमति पत्र’ स्वास्थ्य एवं स्वच्छता विभाग से हासिल कर लिया जाता है।
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शवदाहगृह
शवदाह गृह में भी फारमोसी (ताईवानी) कर्मचारियों को कुछ समझाया जाता है और वे भी शव पर से अस्पताल के कम्बल को नहीं हटाते।
कम्बल में ढके-ढके ही शव को भट्ठी में भेज दिया जाता है।
अगली सुबह ये ही अधिकारी शवदाह गृह में फिर आते हैं और जापानी परम्परा के अनुसार अस्थिभस्म इकट्ठा करते हैं।
बाद में इस भस्म को टोक्यो के रेन्कोजी मन्दिर में रखा जाता है।

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